03-11-19 प्रात:मुरली ओम् शान्ति ''अव्यक्त-बापदादा'' रिवाइज: 02-03-85 मधुबन


वर्तमान ईश्वरीय जन्म-अमूल्य जन्म

आज रत्नागर बाप अपने अमूल्य रत्नों को देख रहे हैं। यह अलौकिक अमूल्य रत्नों की दरबार है। एक एक रत्न अमूल्य है। इस वर्तमान समय के विश्व की सारी प्रापर्टी वा विश्व के सारे खजाने इकट्ठे करो उसके अन्तर में एक एक ईश्वरीय रत्न कई गुणा अमूल्य है। आप एक रत्न के आगे विश्व के सारे खजाने कुछ भी नहीं है। इतने अमूल्य रत्न हो। यह अमूल्य रत्न सिवाए इस संगम-युग के सारे कल्प में नहीं मिल सकते। सतयुगी-देव-आत्मा का पार्ट इस संगमयुगी ईश्वरीय अमूल्य रत्न बनने के पार्ट के आगे सेकण्ड नम्बर हो जाता है। अभी तुम ईश्वरीय सन्तान हो, सतयुग में दैवी सन्तान होंगे। जैसे ईश्वर का सबसे श्रेष्ठ नाम है, महिमा है, जन्म है, कर्म है, वैसे ईश्वरीय रत्नों का वा ईश्वरीय सन्तान आत्माओं का मूल्य सर्वश्रेष्ठ है। इस श्रेष्ठ महिमा का वा श्रेष्ठ मूल्य का यादगार अभी भी 9 रत्नों के रूप में गाया और पूजा जाता है। 9 रत्नों को भिन्न-भिन्न विघ्न-विनाशक रत्न गाया जाता है। जैसा विघ्न वैसी विशेषता वाला रत्न रिंग बनाकर पहनते हैं वा लाकेट में डालते हैं वा किसी भी रूप से उस रत्न को घर में रखते हैं। अभी लास्ट जन्म तक भी विघ्न-विनाशक रूप में अपना यादगार देख रहे हो। नम्बरवार जरूर हैं लेकिन नम्बरवार होते हुए भी अमूल्य और विघ्न-विनाशक सभी हैं। आज भी श्रेष्ठ स्वरूप से आप रत्नों का आत्मायें स्वमान रखती हैं। बड़े प्यार से, स्वच्छता से सम्भालकर रखती हैं क्योंकि आप सभी जो भी हो चाहे अपने को इतना योग्य नहीं भी समझते हो लेकिन बाप ने आप आत्माओं को योग्य समझ अपना बनाया है। स्वीकार किया “तू मेरा मैं तेरा।'' जिस आत्मा के ऊपर बाप की नज़र पड़ी, वह प्रभू नज़र के कारण अमूल्य बन ही जाते हैं। परमात्म दृष्टि के कारण ईश्वरीय सृष्टि के, ईश्वरीय संसार के श्रेष्ठ आत्मा बन ही जाते हैं। पारसनाथ से सम्बन्ध में आये तो पारस का रंग लग ही जाता है इसलिए परमात्म प्यार की दृष्टि मिलने से सारा कल्प चाहे चैतन्य देवताओं के रूप में, चाहे आधाकल्प जड़ चित्रों के रूप में वा भिन्न-भिन्न यादगार के रूप में जैसे रत्नों के रूप में भी आपका यादगार है, सितारों के रूप में भी आपका यादगार है। जिस भी रूप में यादगार है, सारा कल्प सर्व के प्यारे रहे हो क्योंकि अविनाशी प्यार के सागर के प्यार की नज़र सारे कल्प के लिए प्यार के अधिकारी बना देती है इसलिए भक्त लोग आधी घड़ी एक घड़ी की दृष्टि के लिए तड़पते हैं कि नज़र से निहाल हो जावें इसलिए इस समय के प्यार की नज़र अविनाशी प्यार के योग्य बना देती है। अविनाशी प्राप्ति स्वत: ही हो जाती है। प्यार से याद करते, प्यार से रखते। प्यार से देखते।
दूसरी बात - स्वच्छता अर्थात् पवित्रता। तुम इस समय बाप द्वारा पवित्रता का जन्म-सिद्ध अधिकार प्राप्त करते हो। पवित्रता वा स्वच्छता अपना स्वधर्म जानते हो - इसलिए पवित्रता को अपनाने के कारण जहाँ आपका यादगार होगा वहाँ पवित्रता वा स्वच्छता अभी भी यादगार रूप में चल रही है। और आधाकल्प तो है ही पवित्र पालना, पवित्र दुनिया। तो आधाकल्प पवित्रता से पैदा होते, पवित्रता से पलते और आधाकल्प पवित्रता से पूजे जाते हैं।
तीसरी बात - बहुत दिल से, श्रेष्ठ समझ, अमूल्य समझ सम्भालते हैं क्योंकि इस समय स्वयं भगवान् मात-पिता के रूप से आप बच्चों को सम्भालते हैं अर्थात् पालना करते हैं। तो अविनाशी पालना होने के कारण, अविनाशी स्नेह के साथ सम्भालने के कारण सारा कल्प बड़ी रॉयल्टी से, स्नेह से, रिगार्ड से सम्भाले जाते हो। ऐसे प्यार, स्वच्छता, पवित्रता और स्नेह से सम्भालने के अविनाशी पात्र बन जाते हो। तो समझा कितने अमूल्य हो? हर एक रत्न का कितना मूल्य है! तो आज रत्नागर बाप हर एक रत्न के मूल्य को देख रहे थे। सारे दुनिया की अक्षोणी आत्मायें एक तरफ हैं लेकिन आप 5 पाण्डव अक्षोणी से शक्तिशाली हो। अक्षोणी आपके आगे एक के बराबर भी नहीं हैं, इतने शक्तिशाली हो। तो कितने मूल्यवान हो गये! इतने मूल्य को जानते हो? कि कभी-कभी अपने आपको भूल जाते हो। जब अपने आपको भूलते हो तो हैरान होते हो। अपने आपको नहीं भूलो। सदा अपने को अमूल्य समझ करके चलो। लेकिन छोटी सी गलती नहीं करना। अमूल्य हो लेकिन बाप के साथ के कारण अमूल्य हो। बाप को भूलकर सिर्फ अपने को समझेंगे तो भी रांग हो जायेगा। बनाने वाले को नहीं भूलो। बन गये लेकिन बनाने वाले के साथ बने हैं, यह है समझने की विधि। अगर विधि को भूल जाते तो समझ, बेसमझ के रूप में बदल जाती। फिर मैं-पन आ जाता है। विधि को भूलने से सिद्धि का अनुभव नहीं होता, इसलिए विधि पूर्वक अपने को मूल्यवान जान विश्व के पूर्वज बन जाओ। हैरान भी नहीं हो कि मैं तो कुछ नहीं। न यह सोचो कि मैं कुछ नहीं, न यह समझो कि मैं ही सब कुछ हूँ। दोनों ही रांग हैं। मैं हूँ लेकिन बनाने वाले ने बनाया है। बाप को निकाल देते हो तो पाप हो जाता है। बाप है तो पाप नहीं है। जहाँ बाप का नाम है वहाँ पाप का नाम निशान नहीं। और जहाँ पाप है वहाँ बाप का नामनिशान नहीं है। तो समझा अपने मूल्य को।
भगवान की दृष्टि के पात्र बने हो, साधारण बात नहीं। पालना के पात्र बने हो। अविनाशी पवित्रता के जन्म-सिद्ध के अधिकार के अधिकारी बने हो, इसलिए जन्म सिद्ध अधिकार कभी मुश्किल नहीं होता है। सहज प्राप्त होता है। ऐसे ही स्वयं अनुभवी हो कि जो अधिकारी बच्चे हैं उन्हों को पवित्रता मुश्किल नहीं लगती। जिन्हों को पवित्रता मुश्किल लगती वह डगमग ज्यादा होते हैं। पवित्रता स्वधर्म है, जन्म सिद्ध अधिकार है तो सदा सहज लगेगा। दुनिया वाले भी दूर भागते हैं वह किसलिए? पवित्रता मुश्किल लगती है। जो अधिकारी आत्मायें नहीं उन्हों को मुश्किल ही लगेगा। अधिकारी आत्मा आते ही दृढ़ संकल्प करती कि पवित्रता बाप का अधिकार है, इसलिए पवित्र बनना ही है। दिल को पवित्रता सदा आकर्षित करती रहेगी। अगर चलते-चलते कहाँ माया परीक्षा लेने आती भी है, संकल्प के रूप में, स्वप्न के रूप में तो अधिकारी आत्मा नॉलेजफुल होने के कारण घबरायेगी नहीं। लेकिन नॉलेज की शक्ति से संकल्प को परिवर्तित कर देगी। एक संकल्प के पीछे अनेक संकल्प पैदा नहीं करेगी। अंश को वंश के रूप में नहीं लायेगी। क्या हुआ, यह हुआ...यह है वंश। सुनाया था ना क्यों से क्यू लगा देते हैं। यह वंश पैदा कर देते हैं। आया और सदा के लिए गया। पेपर लेने के लिए आया, पास हो गये समाप्त। माया क्यों आई, कहाँ से आई। यहाँ से आई वहाँ से आई। आनी नहीं चाहिए थी। क्यों आ गई। यह वंश नहीं होना चाहिए। अच्छा आ भी गई तो आप बिठाओ नहीं। भगाओ! आई क्यों...ऐसा सोचेंगे तो बैठ जायेगी। आई आगे बढ़ाने के लिए, पेपर लेने के लिए। क्लास को आगे बढ़ाने के लिए अनुभवी बनाने के लिए आई! क्यों आई, ऐसे आई, वैसे आई यह नहीं सोचो। फिर सोचते हैं क्या माया का ऐसा रूप होता है। लाल है, हरा है, पीला है। इस विस्तार में चले जाते हैं। इसमें नहीं जाओ। घबराते क्यों हो, पार कर लो। पास विथ आनर बन जाओ। नॉलेज की शक्ति है, शस्त्र है। मास्टर सर्वशक्तिवान हो, त्रिकालदर्शी हो, त्रिवेणी हो। क्या कमी है! जल्दी में घबराओ नहीं। चींटी भी आ जाती तो घबरा जाते हैं। ज्यादा सोचते हो। सोचना अर्थात् माया को मेहमानी देना। फिर वह घर बना देगी। जैसे रास्ते चलते कोई गन्दी चीज दिखाई भी दे तो क्या करेंगे! खड़े होकर सोचेंगे कि यह किसने फेंकी, क्यों-क्या हुआ! होनी नहीं चाहिए, यह सोचेंगे वा किनारा कर चले जायेंगे। ज्यादा व्यर्थ संकल्पों के वंश को पैदा होने न दो। अंश के रूप में ही समाप्त कर दो। पहले सेकण्ड की बात होती है फिर उसको घण्टों में, दिनों में, मास में बढ़ा देते हो। और अगर एक मास के बाद पूछेंगे कि क्या हुआ था तो बात सेकण्ड की होगी, इसलिए घबराओ नहीं। गहराई में जाओ-ज्ञान की गहराई में जाओ, बात की गहराई में नहीं जाओ। बापदादा इतने श्रेष्ठ मूल्यवान रत्नों को छोटे-छोटे मिट्टी के कणों से खेलते हुए देखते तो सोचते हैं यह रत्न, रत्नों से खेलने वाले मिट्टी के कणों से खेल रहे हैं! रत्न हो रत्नों से खेलो!
बापदादा ने कितने लाडप्यार से पाला है फिर मिट्टी के कण कैसे देख सकेंगे। फिर मैले होकर कहते-अभी साफ करो, साफ करो। घबरा भी जाते हैं। अभी क्या करूँ कैसे करूँ। मिट्टी से खेलते ही क्यों हो। वह भी कण जो धरनी में पड़े रहने वाले। तो सदा अपने मूल्य को जानो। अच्छा!
ऐसे सारे कल्प के मूल्यवान आत्माओं को, प्रभू प्यार की पात्र आत्माओं को, प्रभू पालना की पात्र आत्माओं को, पवित्रता के जन्म-सिद्ध अधिकार के अधिकारी आत्माओं को, सदा बाप और मैं इस विधि से सिद्धि को पाने वाली आत्माओं को, सदा अमूल्य रत्न बन रत्नों से खेलने वाले रॉयल बच्चों को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते!
पार्टियों से
1- सदा बाप के नयनों में समाई हुई आत्मा स्वयं को अनुभव करते हो? नयनों में कौन समाता है? जो बहुत हल्का बिन्दू है। तो सदा है ही बिन्दू और बिन्दू बन बाप के नयनों में समाने वाले। बापदादा आपके नयनों में समाये हुए हैं और आप सब बापदादा के नयनों में समाये हुए हो। जब नयनों में है ही बापदादा तो और कुछ दिखाई नहीं देगा। तो सदा इस स्मृति से डबल लाइट रहो कि मैं हूँ ही बिन्दू। बिन्दू में कोई बोझ नहीं। यह स्मृति स्वरूप सदा आगे बढ़ाती रहेगी। आंखों में बीच में देखो तो बिन्दू ही है। बिन्दु ही देखता है। बिन्दू न हो तो आंख होते भी देख नहीं सकते। तो सदा इसी स्वरूप को स्मृति में रख उड़ती कला का अनुभव करो। बापदादा बच्चों के वर्तमान और भविष्य के भाग्य को देख हर्षित हैं, वर्तमान कलम है भविष्य के तकदीर बनाने की। वर्तमान को श्रेष्ठ बनाने का साधन है-बड़ों के ईशारों को सदा स्वीकार करते हुए स्वयं को परिवर्तन कर लेना। इसी विशेष गुण से वर्तमान और भविष्य तकदीर श्रेष्ठ बन जाती है।
2- सभी के मस्तक पर भाग्य का सितारा चमक रहा है ना! सदा चमकता है? कभी टिमटिमाता तो नहीं है? अखण्ड ज्योति बाप के साथ आप भी अखण्ड ज्योति सदा जगने वाले सितारे बन गये। ऐसे अनुभव करते हो। कभी वायु हिलाती तो नहीं है दीपक वा सितारे को? जहाँ बाप की याद है वह अविनाशी जगमगाता हुआ सितारा है। टिमटिमाता हुआ नहीं। लाइट भी जब टिमटिम करती है तो बन्द कर देते हैं, किसी को अच्छी नहीं लगती। तो यह भी सदा जगमगाता हुआ सितारा। सदा ज्ञान सूर्य बाप से रोशनी ले औरों को भी रोशनी देने वाले। सेवा का उमंग-उत्साह कायम रहता है। सभी श्रेष्ठ आत्मायें हो, श्रेष्ठ बाप की श्रेष्ठ आत्मायें हो।
याद की शक्ति से सफलता सहज प्राप्त होती है। जितना याद और सेवा साथ-साथ रहती है तो याद और सेवा का बैलेन्स सदा की सफलता की आशीर्वाद स्वत: प्राप्त कराता है, इसलिए सदा शक्तिशाली याद स्वरूप का वातावरण बनने से शक्तिशाली आत्माओं का आह्वान होता है और सफलता मिलती है। निमित्त लौकिक कार्य है लेकिन लगन बाप और सेवा में है। लौकिक भी सेवा प्रति है, अपने लगाव से नहीं करते, डायरेक्शन प्रमाण करते हैं, इसलिए बाप के स्नेह का हाथ ऐसे बच्चों के साथ है। सदा खुशी में गाओ, नाचो यही सेवा का साधन है। आपकी खुशी को देख दूसरे खुश हो जायेंगे तो यही सेवा हो जायेगी। बापदादा बच्चों को सदा कहते हैं - जितना महादानी बनेंगे उतना खजाना बढ़ता जायेगा। महादानी बनो और खजानों को बढ़ाओ। महादानी बन खूब दान करो। यह देना ही लेना है। जो अच्छी चीज़ मिलती है वह देने के बिना रह नहीं सकते।
सदा अपने भाग्य को देख हर्षित रहो। कितना बड़ा भाग्य मिला है, घर बैठे भगवान मिल जाए इससे बड़ा भाग्य और क्या होगा! इसी भाग्य को स्मृति में रख हर्षित रहो। तो दु:ख और अशान्ति सदा के लिए समाप्त हो जायेंगे। सुख स्वरूप, शान्त स्वरूप बन जायेंगे। जिसका भाग्य स्वयं भगवान बनाये वह कितने श्रेष्ठ हुए। तो सदा अपने में नया उमंग, नया उत्साह अनुभव करते आगे बढ़ते चलो क्योंकि संगमयुग पर हर दिन का नया उमंग, नया उत्साह है।
जैसे चल रहे हैं, नहीं। सदा नया उमंग, नया उत्साह सदा आगे बढ़ाता है। हर दिन ही नया है। सदा स्वयं में वा सेवा में कोई न कोई नवीनता जरूर चाहिए। जितना अपने को उमंग-उत्साह में रखेंगे उतना नई-नई टचिंग होती रहेगी। स्वयं किसी दूसरी बातों में बिजी रहते तो नई टचिंग भी नहीं होती। मनन करो तो नया उमंग रहेगा।
बांधेलियों को यादप्यार देते हुए:- बांधेलियों की याद तो सदा बाप के पास पहुंचती है और बापदादा सभी बांधेलियों को यही कहते हैं कि योग अर्थात याद की लगन को अग्नि रूप बनाओ। जब लगन अग्नि रूप बन जाती तो अग्नि में सब भस्म हो जाता। तो यह बन्धन भी लगन की अग्नि में समाप्त हो जायेंगे और स्वतंत्र आत्मा बन जो संकल्प करते उसकी सिद्धि को प्राप्त करेंगी। स्नेही हो, स्नेह की याद पहुंचती है। स्नेह के रेसपान्स में स्नेह मिलता है। लेकिन अभी याद को शक्तिशाली अग्नि रूप बनाओ। फिर वह दिन आ जायेगा जो सम्मुख पहुंच जायेंगी।

वरदान:

सदा रूहानी स्थिति में रह दूसरों की भी रूह को देखने वाले रूहानी रूहे गुलाब भव

रूहे गुलाब अर्थात् जिसमें सदा रूहानी खुशबू हो। रूहानी खुशबू वाले जहाँ भी देखेंगे, जिसको भी देखेंगे तो रूह को देखेंगे, शरीर को नहीं। तो स्वयं भी सदा रूहानी स्थिति में रहो और दूसरों की भी रूह को देखो। जैसे बाप ऊंचे से ऊंचा है, ऐसे उसका बगीचा भी ऊंचे से ऊंचा है, जिस बगीचे का विशेष श्रृंगार रूहे गुलाब आप बच्चे हो। आपकी रूहानी खुशबू अनेक आत्माओं का कल्याण करने वाली है।

स्लोगन:

मर्यादा तोड़कर किसी को सुख दिया तो वह भी दु:ख के खाते में जमा हो जायेगा।