05-01-20 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "अव्यक्त-बापदादा" रिवाइज: 30-03-85 मधुबन


तीन-तीन बातों का पाठ

आज बापदादा अपने सदा के साथी बच्चों से मिलने आये हैं। बच्चे ही बाप के सदा साथी हैं, सहयोगी हैं, क्योंकि अति स्नेही हैं। जहाँ स्नेह होता है उसके ही सदा सहयोगी साथी बनते हैं। तो स्नेही बच्चे होने कारण बाप बच्चों के बिना कोई कार्य कर नहीं सकते। और बच्चे बाप के सिवाए कोई कार्य कर नहीं सकते। इसलिए स्थापना के आदि से बाप ने ब्रह्मा के साथ ब्राह्मण बच्चे रचे। अकेला ब्रह्मा नहीं। ब्रह्मा के साथ ब्राह्मण बच्चे भी पैदा हुए। क्यों? बच्चे सहयोगी साथी हैं इसलिए जब बाप की जयन्ती मनाते हो तो साथ में क्या कहते हो? शिव जयन्ती सो ब्रह्मा की जयन्ती, ब्राह्मणों की जयन्ती। तो साथ-साथ बापदादा और बच्चे सभी की आदि रचना हुई और आदि से ही बाप के सहयोगी साथी बने। तो बाप अपने सहयोगी साथियों से मिल रहे हैं। साथी अर्थात् हर कदम में, हर संकल्प में, बोल में साथ निभाने वाले। फालो करना अर्थात् साथ निभाना। ऐसे हर कदम में साथ निभाने वाले अर्थात् फालो फादर करने वाले सच्चे साथी हैं। अविनाशी साथी हैं। जो सच्चे साथी हैं उन्हों का हर एक कदम स्वत: ही बाप समान चलता रहता है। यहाँ वहाँ हो नहीं सकता। सच्चे साथी को मेहनत नहीं करनी पड़ती। यह कदम ऐसे उठाऊं वा वैसे उठाऊं। स्वत: ही बाप के कदम ऊपर कदम रखने के सिवाए जरा भी यहाँ वहाँ हो नहीं सकता। ऐसे सच्चे साथी बच्चों के मन में, बुद्धि में, दिल में क्या समाया हुआ है? मैं बाप का, बाप मेरा। बुद्धि में है जो बाप का बेहद के खजानों का वर्सा है वह मेरा। दिल में दिलाराम और दिल, और कुछ हो नहीं सकता। तो जब बाप ही याद रूप में समाया हुआ है तो जैसी स्मृति वैसी स्थिति और वैसे ही कर्म स्वत: ही होते हैं। जैसे भक्ति मार्ग में भी भक्त निश्चय दिखाने के लिए यही कहते हैं कि देखो हमारे दिल में कौन है! आप कहते नहीं हो लेकिन स्वत: ही आपके दिल से दिलाराम ही सभी को अनुभव होता अर्थात् दिखाई देता है। तो सच्चे साथी हर कदम में बाप समान मास्टर सर्वशक्तिवान हैं।
आज बापदादा बच्चों को बधाई देने आये हैं। सभी सहयोगी साथी बच्चे अपने-अपने उमंग उत्साह से याद में, सेवा में आगे बढ़ते जा रहे हैं। हरेक के मन में एक ही दृढ़ संकल्प है कि विजय का झण्डा लहराना ही है। सारे विश्व में एक रूहानी बाप की प्रत्यक्षता का झण्डा लहरने वाला ही है। जिस ऊंचे झण्डे के नीचे सारे विश्व की आत्मायें यह गीत गायेंगी कि एक बाप आ गया। जैसे अभी आप लोग झण्डा लहराते हो तो सभी झण्डे के नीचे गीत गाते हो और फिर क्या होता है! झण्डा लहराने से सभी के ऊपर फूलों की वर्षा होती है। ऐसे सभी की दिल से यह गीत स्वत: ही निकलेगा। सर्व का एक बाप। गति सद्गति दाता एक बाप। ऐसे गीत गाते ही अविनाशी सुख शान्ति का वर्सा, पुष्पों की वर्षा समान अनुभव करेंगे। बाप कहा और वर्से का अनुभव किया। तो सबके मन में यह एक ही उमंग उत्साह है इसलिए बापदादा बच्चों के उमंग उत्साह पर बच्चों को बधाई देते हैं। विदाई तो नहीं देंगे ना। बधाई। संगमयुग का हर समय बधाई का समय है। तो मन की लगन पर, सेवा की लगन पर बापदादा सभी बच्चों को बधाई दे रहे हैं। सेवा में सदा आगे बढ़ने का सभी का उमंग है। ऐसा कोई नहीं होगा जिसको सेवा में आगे बढ़ने का उमंग न हो। अगर उमंग नहीं होता तो यहाँ कैसे आते! यह भी उमंग की निशानी है ना! उमंग-उत्साह है और सदा रहेगा। साथ-साथ उमंग-उत्साह से आगे बढ़ते हुए सेवा में सदा निर्विघ्न हैं? उमंग उत्साह तो बहुत अच्छा है, लेकिन निर्विघ्न सेवा और विघ्न पार करते-करते सेवा करना, इसमें अन्तर है। निर्विघ्न अर्थात् न किसी के लिए विघ्न रूप बनते और न किसी विघ्न स्वरूप से घबराते। यह विशेषता उमंग-उत्साह के साथ-साथ अनुभव करते हो? या विघ्न आते हैं? एक हैं विघ्न पाठ पढ़ाने आते, दूसरा है विघ्न हिलाने आते हैं। अगर पाठ पढ़कर पक्के हो गये तो वह विघ्न लगन में परिवर्तन हो जाते। अगर विघ्न में घबरा जाते हैं तो रजिस्टर में दाग पड़ जाता है। फर्क हुआ ना।
ब्राह्मण बनना माना माया को चैलेन्ज करना है कि विघ्न भले आओ। हम विजयी हैं। तुम कुछ कर नहीं सकते। पहले माया के फ्रेन्ड्स थे। अब चैलेन्ज करते हो कि मायाजीत बनेंगे। चैलेन्ज करते हो ना। नहीं तो विजयी किस पर बनते हो? अपने ऊपर? विजयी रत्न बनते हो तो विजय माया पर ही प्राप्त करते हो ना! विजय माला में पिराये जाते हो, पूजे जाते हो। तो मायाजीत बनना अर्थात् विजयी बनना है। ब्राह्मण बनना अर्थात् माया को चैलेन्ज करना। चैलेन्ज करने वाले खेल करते हैं। आया और गया। दूर से ही जान लेते हैं, दूर से ही भगा देते हैं। टाइम वेस्ट नहीं करते हैं। सेवा में तो सभी बहुत अच्छे हो। सेवा के साथ-साथ निर्विघ्न सेवा का रिकार्ड हो। जैसे पवित्रता का आदि से रिकार्ड रखते हो ना। ऐसा कौन है जो संकल्प में भी आदि से अब तक अपवित्र नहीं बना है? तो यह विशेषता देखते हो ना। सिर्फ इस एक पवित्रता की बात से पास विथ आनर तो नहीं होंगे। लेकिन सेवा में, स्व स्थिति में, सम्पर्क, सम्बन्ध में, याद में, सभी में जो आदि से अब तक अचल हैं, हलचल में नहीं आये हैं, विघ्नों के वशीभूत नहीं हुए हैं। सुनाया ना कि न विघ्नों के वश होना है न स्वयं किसके आगे विघ्न रूप बनना है। इसकी भी मार्क्स जमा होती हैं। एक प्युरिटी, दूसरा अव्यभिचारी याद। याद के बीच में जरा भी कोई विघ्न न हो। इसी रीति से सेवा में सदा निर्विघ्न हो और गुणों में सदा सन्तुष्ट हो और सन्तुष्ट करने वाले हो। सन्तुष्टता का गुण सभी गुणों की धारणा का दर्पण है। तो गुणों में सन्तुष्टता का स्व प्रति और दूसरों से सर्टीफिकेट लेना होता। यह है पास विथ आनर की निशानी, अष्ट रत्नों की निशानी। सबमें नम्बर लेने वाले हो ना कि बस एक में ही ठीक हैं। सेवा में अच्छा हूँ। बधाई तो बापदादा दे ही रहे हैं। अष्ट बनना है, इष्ट बनना है। अष्ट बनेंगे तो इष्ट भी इतना ही महान बनेंगे। उसके लिए तीन बातें सारा वर्ष याद रखना और चेक करना। और यह तीनों ही बातें अगर जरा भी संकल्प मात्र में रही हुई हों तो विदाई दे देना। आज बधाई का दिन है ना। जब छुट्टी देते हो तो विदाई में क्या करते हो? (मिश्री, बादामी, इलायची देते हैं) उसमें तीन चीजें होती हैं। तो बापदादा को भी तीन चीजें देंगे ना। विदाई नहीं बधाई है तब तो मुख मीठा कराते हो। तो जैसे यहाँ तीन चीजें किसलिए देते हो? फिर जल्दी आने की याद रहेगी। बापदादा भी आज तीन बातें बता रहे हैं, जो सेवा में कभी-कभी विघ्न रूप भी बन जाती हैं। तो तीन बातों के ऊपर विशेष फिर से बापदादा अटेन्शन दिला रहे हैं, जिस अटेन्शन से स्वत: ही पास विद आनर बन ही जायेंगे।
एक बात- किसी भी प्रकार का हद का लगाव न हो। बाप का लगाव और चीज है लेकिन हद का लगाव न हो। दूसरा- किसी भी प्रकार का स्वयं का स्वयं से वा किसी दूसरे से तनाव अर्थात् खींचातान नहीं हो। लगाव नहीं हो, माया से युद्ध के बजाए आपस में खींचातान न हो। तीसरा- किसी भी प्रकार का कमजोर स्वभाव न हो। लगाव, तनाव और कमजोर स्वभाव। वास्तव में स्वभाव शब्द बहुत अच्छा है। स्वभाव अर्थात् स्व का भाव। स्व श्रेष्ठ को कहा जाता है। श्रेष्ठ भाव है, स्व का भाव है, आत्म-अभिमान है। लेकिन भाव-स्वभाव, भाव-स्वभाव शब्द बहुत बोलते हो ना। तो यह कमजोर स्वभाव है। जो समय प्रति समय उड़ती कला में विघ्न रूप बन जाता है। जिसको आप लोग रॉयल रूप में कहते हो मेरी नेचर ऐसी है। नेचर श्रेष्ठ है तो बाप समान हैं। विघ्न रूप बनती है तो कमजोर स्वभाव है। तो तीनों शब्दों का अर्थ जानते हो ना। कई प्रकार के तनाव हैं, तनाव का कारण है " मैं-पन"। मैंने यह किया। मैं यह कर सकती हूँ! मैं ही करूँगा! यह जो मैं-पन है, यह तनाव पैदा करता है। "मैं" यह देह-अभिमान का है। एक है मैं श्रेष्ठ आत्मा हूँ। एक है मैं फलानी हूँ, मैं समझदार हूँ, मैं योगी हूँ, मैं ज्ञानी हूँ। मैं सेवा में नम्बर आगे हूँ। यह मैं-पन तनाव पैदा करता है। इसी कारण सेवा में कहाँ-कहाँ जो तीव्रगति होनी चाहिए वह तीव्र के बजाए धीमी गति हो जाती है। चलते रहते हैं लेकिन स्पीड नहीं हो सकती। स्पीड तीव्र करने का आधार है-दूसरे को आगे बढ़ता हुआ देख सदा दूसरे को बढ़ाना ही अपना बढ़ना है। समझते हो ना सेवा में क्या मैं-पन आता है? यह मैं-पन ही तीव्रगति को समाप्त कर देता है। समझा!
यह तीन बातें तो देंगे ना कि फिर साथ में ले जायेंगे। इसको कहा जाता है त्याग से मिला हुआ भाग्य। सदा बांटके खाओ और बढ़ाओ। यह त्याग का भाग्य मिला है। सेवा का साधन यह त्याग का भाग्य है। लेकिन इस भाग्य को मैं-पन में सीमित रखेंगे तो बढ़ेगा नहीं। सदा त्याग के भाग्य के फल को औरों को भी सहयोगी बनाए बांटके आगे बढ़ो। सिर्फ मैं, मैं नहीं करो, आप भी खाओ। बांटकर एक दो में हाथ मिलाते हुए आगे बढ़ो। अभी सेवा के बीच में यह वायब्रेशन दिखाई देते हैं। तो इसमें फराखदिल हो जाओ। इसको कहते हैं जो ओटे सो अर्जुन। एक दो को नहीं देखो। यह भी तो ऐसे करते हैं ना! यह तो होता ही है, लेकिन मैं विशेषता दिखाने के लिए निमित्त बन जाऊं। ब्रह्मा बाप की विशेषता क्या रही! सदा बच्चों को आगे रखा। मेरे से बच्चे होशियार हैं। बच्चे करेंगे! इतने तक त्याग के भाग्य का त्याग किया। अगर कोई प्यार के कारण, प्राप्ति के कारण ब्रह्मा की महिमा करते थे तो उसको भी बाप की याद दिलाते थे। ब्रह्मा से वर्सा नहीं मिलेगा। ब्रह्मा का फोटो नहीं रखना है। ब्रह्मा को सब कुछ नहीं समझना। तो इसको कहा है त्याग के भाग्य का भी त्याग कर सेवा में लग जाना। इसमें डबल महादानी हो जाते। दूसरा आफर करे, स्वयं अपनी तरफ न खींचे। अगर स्वयं अपनी महिमा करते, अपनी तरफ खींचते हैं तो उसको क्या शब्द कहते हैं! मुरलियों में सुना है ना। ऐसा नहीं बनना। कोई भी बात को स्वयं अपनी तरफ खींचने की खैंचातान कभी नहीं करो। सहज मिले वह श्रेष्ठ भाग्य है। खींच के लेने वाला इसको श्रेष्ठ भाग्य नहीं कहेंगे। उसमें सिद्धि नहीं होती। मेहनत ज्यादा सफलता कम क्योंकि सभी की आशीर्वाद नहीं मिलती है। जो सहज मिलता है उसमें सभी की आशीर्वाद भरी हुई है। समझा!
तनाव क्या है! लगाव को तो उस दिन स्पष्ट किया था। कोई भी कमजोर स्वभाव न हो। ऐसे भी नहीं समझो मैं तो इस देश का रहने वाला हूँ इसलिए मेरा स्वभाव, मेरा चलना, मेरा रहना ऐसा है, नहीं। देश के कारण, धर्म के कारण, संग के कारण ऐसा मेरा स्वभाव है। यह नहीं। आप कौन से देश वाले हो! यह तो सेवा के लिए निमित्त स्थान मिले हैं। न कोई विदेशी है, न यह नशा हो कि मैं भारतवासी हूँ। सभी एक बाप के हैं। भारतवासी भी ब्राह्मण आत्मायें हैं। विदेश में रहने वाले भी ब्राह्मण आत्मायें हैं। अन्तर नहीं है। ऐसे नहीं भारतवासी ऐसे हैं, विदेशी ऐसे हैं। यह शब्द भी कभी नहीं बोलो। सब ब्राह्मण आत्मायें हैं। यह तो सेवा के लिए स्थान है। सुनाया था ना कि आप विदेश में क्यों पहुँचे हो? वहाँ क्यों जन्म लिया? भारत में क्यों नहीं लिया? वहाँ गये हो सेवा स्थान खोलने के लिए। नहीं तो भारतवासियों को वीसा का कितना प्राबलम है। आप सब तो सहज रहे पड़े हो। कितने देशों में सेवा हो रही है! तो सेवा के लिए विदेश में गये हो। बाकी हो सभी ब्राह्मण आत्मायें इसलिए कोई भी किसी आधार में स्वभाव नहीं बनाना। जो बाप का स्वभाव वह बच्चों का स्वभाव। बाप का स्वभाव क्या है? सदा हर आत्मा के प्रति कल्याण वा रहम की भावना का स्वभाव। हर एक को ऊंचा उठाने का स्वभाव, मधुरता का स्वभाव, निर्माणता का स्वभाव। मेरा स्वभाव ऐसा है यह कभी नहीं बोलना। मेरा कहाँ से आया। मेरा तेज़ बोलने का स्वभाव है, मेरा आवेश में आने का स्वभाव है। स्वभाव के कारण हो जाता है। यह माया है। कईयों का अभिमान का स्वभाव, ईर्ष्या का, आवेश में आने का स्वभाव होता है, दिलशिकस्त होने का स्वभाव होता है। अच्छा होते भी अपने को अच्छा नहीं समझते। सदैव अपने को कमजोर ही समझेंगे। मैं आगे जा नहीं सकती। कर नहीं सकती। यह दिलशिकस्त स्वभाव यह भी रांग है। अभिमान में नहीं आओ। लेकिन स्वमान में रहो तो इसी प्रकार के स्वभाव को कहा जाता है कमजोर स्वभाव। तो तीनों बातों का अटेन्शन सारा वर्ष रखना। इन तीनों बातों से सेफ रहना है। मुश्किल तो नहीं है ना। साथी आदि से अन्त तक सहयोगी साथी है। साथी तो समान चाहिए ना। अगर साथियों में समानता नहीं होगी तो साथी प्रीत की रीति निभा नहीं सकते। अच्छा यह तो 3 बातें अटेन्शन में रखेंगे। लेकिन इन तीन बातों से सदा किनारा करने के लिए और 3 बातें याद रखनी हैं। आज तीन का पाठ पढ़ा रहे हैं। सदा अपने जीवन में एक बैलेन्स रखना है। सब बातों में बैलेन्स हो। याद और सेवा में बैलेन्स। स्वमान, अभिमान को समाप्त करता। स्वमान में स्थित रहना। यह सब बातें स्मृति में रहें। ज्यादा रमणीक भी नहीं, ज्यादा गम्भीर भी नहीं, बैलेन्स हो। समय पर रमणीक, समय पर गम्भीर। तो एक है - बैलेन्स। दूसरा - सदा अमृतवेले बाप से विशेष ब्लैसिंग लेनी है! रोज़ अमृतवेले बापदादा बच्चों प्रति ब्लैसिंग की झोली खोलते हैं। उससे जितना लेने चाहो उतना ले सकते हो। तो बैलेन्स, ब्लैसिंग तीसरा ब्लिसफुल लाइफ।। तीनों बातें स्मृति में रहने से वह तीनों बातें जो अटेन्शन देने की हैं, वह स्वत: ही समाप्त हो जायेंगी। समझा! अच्छा और तीन बातें सुनो!
लक्ष्य रूप में वा धारणा के रूप में विशेष तीन बातें ध्यान में रखनी हैं। वह छोड़नी हैं और वह धारण करनी है। छोड़ने वाली तो छोड़ दी ना सदा के लिए, उसको याद करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। लेकिन यह तीन बातें जो सुनाई यह स्मृति में रखना और धारणा स्वरूप में विशेष याद रखना। एक - सब बातों में रीयल्टी हो, मिक्स नहीं। इसको कहते हैं - रीयल्टी। संकल्प में, बोल में, सब बात में रीयल। सच्ची दिल पर साहेब राज़ी। सच की निशानी क्या होगी? सच तो बिठो नच। जो सच्चा होगा वह सदा खुशी में नाचता रहेगा। तो एक रीयल्टी, दूसरा - रॉयल्टी। छोटी-छोटी बात में कभी भी बुद्धि झुकाव में न आये। जैसे रॉयल बच्चे होते हैं तो उन्हों की कब छोटी-सी चीज़ पर नज़र नहीं जायेगी। अगर नज़र गई तो उसको रॉयल नहीं कहा जाता। किसी भी छोटी-छोटी बातों में बुद्धि का झुकाव हो जाए तो उसको रॉयल्टी नहीं कहा जाता। जो रॉयल होता है वह सदा प्राप्ति स्वरूप होता है। कहाँ ऑख वा बुद्धि नहीं जाती। तो यह है रूहानी रॉयल्टी। कपड़ों की रॉयल्टी नहीं। तो रीयल्टी, रॉयल्टी और तीसरा युनिटी। हर बात में, संकल्प में, बोल में, कर्म में भी सदा एक दो में युनिटी दिखाई दे। ब्राह्मण माना ही एक। लाख नहीं, एक। इसको कहा जाता है युनिटी। वहाँ अनेक स्थिति के कारण एक भी अनेक हो जाते और यहाँ अनेक होते भी एक हैं। इसको कहा जाता है युनिटी। दूसरे को नहीं देखना है। हम चाहते हैं युनिटी करें लेकिन यह नहीं करते हैं। अगर आप करते रहेंगे तो उसको डिसयुनिटी का चांस ही नहीं मिलेगा। कोई हाथ ऐसे करता, दूसरा न करे तो आवाज नहीं होगा। अगर कोई डिसयुनिटी का कोई भी कार्य करता है, आप युनिटी में रहो तो डिसयुनिटी वाले कब डिसयुनिटी का काम कर नहीं सकेंगे। युनिटी में आना ही पड़ेगा इसलिए तीन बातें - रीयल्टी, रॉयल्टी और युनिटी। यह तीनों ही बातें सदा बाप समान बनने में सहयोगी बनेंगी। समझा - आज तीन का पाठ पढ़ लिया ना। बाप को तो बच्चों पर नाज़ है। इतने योग्य बच्चे और योगी बच्चे किसी बाप के हो ही नहीं सकते। योग्य भी हो, योगी भी हो और एक-एक पदमापदम भाग्यवान हो। सारे कल्प में इतने और ऐसे बच्चे हो ही नहीं सकते। इसलिए विशेष अमृतवेले का टाइम बापदादा ने ब्राह्मण बच्चों के लिए क्यों रखा है? क्योंकि विशेष बापदादा हर बच्चे की विशेषता को, सेवा को, गुणों को सदा सामने लाते हैं। और क्या करते हैं? जो हर बच्चे की विशेषता है, गुण है, सेवा है, उसको विशेष वरदान से अविनाशी बनाते हैं इसलिए खास यह समय बच्चों के लिए रखा है। अमृतवेले की विशेष पालना है। हर एक को बापदादा स्नेह के सहयोग की, वरदान की पालना देते हैं। समझा - क्या करते हैं और आप लोग क्या करते हो? शिवबाबा सुखदाता है, शान्ति दाता है... ऐसे कहते हो ना। और बाप पालना देते हैं। जैसे माँ बाप बच्चों को सवेरे तैयार करते, साफ सुथरा करके फिर कहते अब सारा दिन खाओ पियो पढ़ो। बापदादा भी अमृतवेले यह पालना देते अर्थात् सारे दिन के लिए शक्ति भर देते हैं। विशेष पालना का यह समय है। यह एकस्ट्रा वरदान का, पालना का समय है। अमृतवेले वरदानों की झोली खुलती है। जितना जो वरदान लेने चाहे सच्ची दिल से, मतलब से नहीं। जब मतलब होगा तब कहेंगे हमको यह दो, जो मतलब से मांगता है तो बापदादा क्या करते हैं! उनका मतलब सिद्ध करने के लिए उतनी शक्ति देता है, मतलब पूरा हुआ और खत्म। फिर भी बच्चे हैं, ना तो नहीं करेंगे। लेकिन सदा ही वरदानों से पलते रहो, चलते रहो, उड़ते रहो उसके लिए जितना अमृतवेला शक्तिशाली बनायेंगे उतना सारा दिन सहज होगा। समझा।
सदा स्वयं को पास विद आनर बनने के लक्ष्य और लक्षण में चलाने वाले, सदा स्वयं को ब्रह्मा बाप समान त्याग का भाग्य बांटने वाले, नम्बरवन त्यागी श्रेष्ठ भाग्य बनाने वाले, सदा सहज प्राप्ति के अधिकारी बन स्व उन्नति और सेवा की उन्नति करने वाले, सदा हर कदम में सहयोगी, साथी बन आगे बढ़ने वाले, स्मृति, स्थिति शक्तिशाली बनाने से सदा बाप को फालो करने वाले, ऐसे सदा सहयोगी साथी, फरमानबरदार, आज्ञाकारी, सन्तुष्ट रहने वाले, सर्व को राजी करने के राज़ को जानने वाले, ऐसी श्रेष्ठ आत्माओं को, महान पुण्य आत्माओं को, डबल महादानी बच्चों को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।

वरदान:

मन्सा बन्धनों से मुक्त, अतीन्द्रिय सुख की अनुभूति करने वाले मुक्ति दाता भव

अतीन्द्रिय सुख में झूलना-यह संगमयुगी ब्राह्मणों की विशेषता है। लेकिन मन्सा संकल्पों के बंधन आन्तरिक खुशी वा अतीन्द्रिय सुख का अनुभव करने नहीं देते। व्यर्थ संकल्पों, ईर्ष्या, अलबेलेपन वा आलस्य के संकल्पों के बंधन में बंधना ही मन्सा बंधन है, ऐसी आत्मा अभिमान के वश दूसरों का ही दोष सोचती रहती है, उनकी महसूसता शक्ति समाप्त हो जाती है इसलिए इस सूक्ष्म बंधन से मुक्त बनो तब मुक्ति दाता बन सकेंगे।

स्लोगन:

ऐसा खुशियों की खान से सम्पन्न रहो जो आपके पास दु:ख की लहर भी न आये।