05-05-19 प्रात:मुरली ओम् शान्ति ''अव्यक्त-बापदादा'' रिवाइज: 26-11-84 मधुबन


सच्चे सहयोगी ही सच्चे योगी

आज बच्चों के मिलन स्नेह को देख रहे हैं। एक बल एक भरोसा, इसी छत्रछाया के नीचे मिलन के उमंग उत्साह से ज़रा भी हलचल, लगन को हिला न सकी। रूकावट, थकावट बदलकर स्नेह का सहज रास्ता अनुभव कर पहुँच गये हैं। इसको कहा जाता है हिम्मते बच्चे मददे बाप। जहाँ हिम्मत है वहाँ उल्हास भी है। हिम्मत नहीं तो उल्हास भी नहीं। ऐसे सदा हिम्मत उल्हास में रहने वाले बच्चे एकरस स्थिति द्वारा नम्बरवन ले लेते हैं। कैसे भी कड़े ते कड़ी परिस्थिति हो लेकिन हिम्मत और उल्हास के पंखों द्वारा सेकण्ड में उड़ती कला की ऊंची स्थिति से हर बड़ी और कड़ी परिस्थिति छोटी और सहज अनुभव होगी क्योंकि उड़ती कला के आगे सब छोटे-छोटे खेल के खिलौने अनुभव होंगे। कितनी भी भयानक बातें भयानक के बजाए स्वभाविक अनुभव होंगी। दर्दनाक बातें दृढ़ता दिलाने वाली अनुभव होंगी। कितने भी दु:खमय नज़ारे आयें लेकिन खुशी के नगाड़े, दु:ख के नज़ारों का प्रभाव नहीं डालेंगे और ही शान्ति और शक्ति से औरों के दु:ख दर्द की अग्नि को शीतल जल के सदृश्य सर्व के प्रति सहयोगी बनेंगे। ऐसे समय पर तड़पती हुई आत्माओं को सहयोग की आवश्यकता होती है। इसी सहयोग द्वारा ही श्रेष्ठ योग का अनुभव करेंगे। सभी आपके इस सच्चे सहयोग को ही सच्चे योगी मानेंगे। और ऐसे ही हाहाकार के समय “सच्चे सहयोगी सो सच्चे योगी”, इस प्रत्यक्षता से प्रत्यक्षफल की प्राप्ति से ही जय-जयकार होगी। ऐसे समय का ही गायन है-एक बूँद के प्यासे...यह शान्ति की शक्ति की, एक सेकण्ड की अनुभूति रूपी बूँद तड़पती हुई आत्माओं को तृप्ती का अनुभव करायेगी। ऐसे समय पर एक सेकण्ड की प्राप्ति उन्हें ऐसे अनुभव करायेगी - सेकण्ड में अनेक जन्मों की तृप्ती वा प्राप्ति हो गई। लेकिन वह एक सेकण्ड की शक्तिशाली स्थिति की बहुतकाल से अभ्यासी आत्मा, प्यासे की प्यास बुझा सकती है। अब चेक करो ऐसे दु:ख दर्द, दर्दनाक भयानक वायुमण्डल के बीच सेकण्ड में मास्टर विधाता, मास्टर वरदाता, मास्टर सागर बन ऐसी शक्तिशाली स्थिति का अनुभव करा सकते हो? ऐसे समय पर यह क्या हो रहा है, यह देखने वा सुनने में लग गये तो भी सहयोगी नहीं बन सकेंगे। यह देखने और सुनने की ज़रा भी नाम मात्र इच्छा भी सर्व की इच्छायें पूर्ण करने की शक्तिशाली स्थिति बनाने नहीं देगी इसलिए सदा अपने अल्पकाल की इच्छा मात्रम् अविद्या की शक्तिशाली स्थिति में अब से अभ्यासी बनो। हर संकल्प, हर श्वास के अखण्ड सेवाधारी, अखण्ड सहयोगी सो योगी बनो। जैसे खण्डित मूर्ति का कोई मूल्य नहीं, पूज्यनीय बनने की अधिकारी नहीं। ऐसे खण्डित सेवाधारी खण्डित योगी ऐसे समय पर अधिकार प्राप्त कराने के अधिकारी नहीं बन सकेंगे इसलिए ऐसे शक्तिशाली सेवा का समय समीप आ रहा है। समय घण्टी बजा रहा है। जैसे भगत लोग अपने ईष्ट देव वा देवियों को घण्टी बजाकर उठाते हैं, सुलाते हैं, भोग लगाते हैं। तो अभी समय घण्टी बजाए ईष्ट देव, देवियों को अलर्ट कर रहा है। जगे हुए तो हैं ही लेकिन पवित्र प्रवृत्ति में ज्यादा बिजी हो गये हैं। प्यासी आत्माओं की प्यास मिटाने की, सेकण्ड में अनेक जन्मों की प्राप्ति वाली शक्तिशाली स्थिति के अभ्यास के लिए तैयारी करने की समय घण्टी बजा रहा है। प्रत्यक्षता के पर्दे खुलने का समय आप सम्पन्न ईष्ट आत्माओं का आठान कर रहा है। समझा। समय की घण्टी तो आप सबने सुनी ना। अच्छा!

ऐसे हर परिस्थिति को उड़ती कला द्वारा सहज पार करने वाले, बहुत काल की सेकण्ड में प्राप्ति द्वारा तृप्ती कराने वाले अखण्ड सेवाधारी, अखण्ड योगी, सदा मास्टर दाता, वरदाता स्वरूप, सदा इच्छा मात्रम् अविद्या की स्थिति से सर्व की इच्छायें पूर्ण करने वाले, ऐसे मास्टर सर्वशक्तिवान समर्थ बच्चों को बापदादा का याद प्यार और नमस्ते।

(कानपुर का समाचार गंगे बहन ने बापदादा को सुनाया) सदा अचल अडोल आत्मा। हर परिस्थिति में बाप की छत्रछाया के अनुभवी हैं ना? बापदादा बच्चों को सदा सेफ रखते हैं। सेफ्टी का साधन सदा ही बाप द्वारा मिला हुआ है इसलिए सदा ही बाप का स्नेह का हाथ और साथ है। “नथिंग न्यु” इसके अभ्यासी हो गये हैं ना! जो बीता नथिंग-न्यु। जो हो रहा है नथिंग न्यु। स्वत: ही टचिंग होती रहती है। यह रिहर्सल हो रही है। ऐसे समय पर सेफ्टी का, सेवा का क्या साधन हो? क्या स्वरूप हो? इसकी रिहर्सल होती है। फाइनल में हाहाकार के बीच जय-जयकार होनी है। अति के बाद अन्त और नये युग का आरम्भ हो जायेगा। ऐसे समय पर न चाहते भी सबके मन से यह प्रत्यक्षता के नगाड़े बजेंगे। नज़ारा नाजुक होगा लेकिन बजेंगे प्रत्यक्षता के नगाड़े। तो रिहर्सल से पार हो गई। बेफिकर बादशाह बन पार्ट बजाया। बहुत अच्छा किया। पहुँच गई, यही स्नेह का स्वरूप है। अच्छा-सोच से तो असोच है ही। जो हुआ वाह वाह! इसमें भी कईयों का कुछ कल्याण ही होगा इसलिए जलने में भी कल्याण, तो बचने में भी कल्याण। हाय नहीं कहेंगे, हाय जल गया, नहीं। इसमें भी कल्याण। बचने के टाइम जैसे वाह वाह करते हैं, वाह बच गया ऐसे ही जलने के समय भी वाह वाह! इसी को ही एकरस स्थिति कहा जाता है। बचाना अपना फर्ज है लेकिन जलने वाली चीज़ जलनी ही है। इसमें भी कई हिसाब-किताब होंगे। आप तो हैं ही बेफिकर बादशाह। एक गया लाख पाया, यह है ब्राह्मणों का स्लोगन। गया नहीं लेकिन पाया इसलिए बेफिकर। और अच्छा कोई मिलना होता है इसलिए जलना भी खेल, बचना भी खेल। दोनों ही खेल हैं। यही तो देखेंगे कि यह कितने बेफिकर बादशाह हैं, जल रहा है लेकिन यह बादशाह हैं क्योंकि छत्रछाया के अन्दर हैं। वह फिकर में पड़ जाते हैं क्या होगा, कैसे होगा। कहाँ से खायेंगे, कहाँ से चलेंगे और बच्चों को यह फिकर है ही नहीं। अच्छा-

अभी तैयारी तो करनी पड़े ना! जायेंगे, यह नहीं सोचे लेकिन सबको ले जायेंगे, यह सोचो। सबको साक्षात्कार कराके, तृप्त करके प्रत्यक्षता का नगाड़ा बजाके फिर जायेंगे। पहले क्यों जायें! आप तो बाप के साथ-साथ जायेंगे। प्रत्यक्षता की भी वन्डरफुल सीन अनुभव करके जायेंगे ना! यह भी क्यों रह जाए। यह मानसिक भक्ति, मानसिक पूजा, प्रेम के पुष्प.. यह अन्तिम दृश्य बहुत वन्डरफुल है। एडवान्स पार्टी में किसका पार्ट है, वह दूसरी बात है। बाकी यह सीन देखना तो बहुत आवश्यक है। जिसने अन्त किया उसने सब कुछ किया इसलिए बाप अन्त में आता तो सब कुछ कर लिया ना। तो क्यों नहीं बाप के साथ-साथ यह वन्डरफुल सीन देखते हुए साथ चलो। यह भी कोई-कोई का पार्ट है। तो जाने का संकल्प नहीं करो। चले गये तो भी अच्छा। रह गये तो बहुत अच्छा। अकेले जायेंगे तो भी एडवांस पार्टी में सेवा करनी पड़ेगी इसलिए जाना है यह नहीं सोचो, सबको साथ ले जाना है, यह सोचो। अच्छा-यह भी एक अनुभव बढ़ा। जो होता है उससे अनुभव की डिग्री बढ़ जाती है। जैसे औरों की पढ़ाई में डिग्री बढ़ती है, यह भी अनुभव किया माना डिग्री बढ़ी।

पार्टियों से मुलाकात:

सभी अपने को स्वराज्य अधिकारी समझते हो? स्वराज्य अब संगमयुग पर, विश्व का राज्य भविष्य की बात है। स्वराज्य अधिकारी ही विश्व राज्य अधिकारी बनते हैं। सदा अपने को स्वराज्य अधिकारी समझ इन कर्मेंन्द्रियों को कर्मचारी समझ अपने अधिकार से चलाते हो या कभी कोई कर्मेन्द्रिय राजा बन जाती है। आप स्वयं राजा हैं या कभी कोई कर्मेन्द्रिय राजा बन जाती? कभी कोई कर्मेन्द्रिय धोखा तो नहीं देती है? अगर किसी से भी धोखा खाया तो दु:ख लिया। धोखा दु:ख प्राप्त कराता। धोखा नहीं तो दु:ख नहीं। तो स्वराज्य की खुशी में, नशे में, शक्ति में रहने वाले। स्वराज्य का नशा उड़ती कला में ले जाने वाला नशा है। हद के नशे नुकसान प्राप्त कराते, यह बेहद का नशा अलौकिक रूहानी नशा सुख की प्राप्ति कराने वाला है। तो यथार्थ राज्य है राजा का, प्रजा का राज्य हंगामें का राज्य है। आदि से राजाओं का राज्य रहा है। अभी लास्ट जन्म में प्रजा का राज्य चला है। तो आप अभी राज्य अधिकारी बन गये। अनेक जन्म भिखारी रहे और अब भिखारी से अधिकारी बन गये। बापदादा सदा कहते - बच्चे खुश रहो, आबाद रहो। जितना अपने को श्रेष्ठ आत्मा समझ, श्रेष्ठ कर्म, श्रेष्ठ बोल, श्रेष्ठ संकल्प करेंगे तो इस श्रेष्ठ संकल्प से श्रेष्ठ दुनिया के अधिकारी बन जायेंगे। यह स्वराज्य आपका जन्म-सिद्ध अधिकार है, यही आपको जन्म-जन्म के लिए अधिकारी बनाने वाला है। अच्छा।

अव्यक्त बापदादा के प्रेरणादायक अनमोल महावाक्य

1. सबको एक बात का इन्तजार है, वह कौन सी बात है? जो शुरू की पहेली है मैं कौन? वही लास्ट तक भी है। सबको इंतजार है आखिर भी भविष्य में मैं कौन या माला में कहाँ? अब यह इन्तजार कब पूरा होगा? सब एक दो में रूहरिहान भी करते हैं 8 में कौन होंगे, 100 में कौन होंगे, 16000 का तो कोई सवाल ही नहीं। आखिर भी 8 में या 100 में कौन होंगे? विदेशी सोचते हैं हम कौन-सी माला में होंगे और शुरू में आने वाले फिर सोचते हैं लास्ट सो फास्ट हैं। ना मालूम हमारा स्थान है या लास्ट वालों का है? आखिर हिसाब क्या है? किताब तो बाप के पास है ना। फिक्स नहीं किये गये हैं। आप लोगों ने भी आर्ट काम्पीटीशन की तो चित्र कैसे चुना? पहले थोड़े अलग किये फिर उसमें से एक, दो, तीन नम्बर लगाया। पहले चुनने होते हैं फिर नम्बरवार फिक्स होते हैं। तो अब चुने गये हैं लेकिन फिक्स नहीं हुए हैं। पीछे आने वालों का क्या होगा? सदैव कुछ सीटस अन्त तक भी होती हैं। रिजर्वेशन होती है तो भी लास्ट तक कुछ कोटा रखते हैं लेकिन वह कोटों में कोई, कोई में भी कोई होता है।

अच्छा आप सब किस माला में हो? अपने में उम्मीद रखो। कोई न कोई ऐसी वन्डरफुल बात होगी जिनके आधार पर आप सबकी उम्मीदें पूरी हो जायेंगी। अष्ट रत्नों की विशेषता एक विशेष बात से हैं। अष्ट रत्न प्रैक्टिकल में जैसे यादगार है विशेष तो जो अष्ट शक्तियाँ हैं वह हर शक्ति उनके जीवन में प्रैक्टिकल दिखाई देगी। अगर एक शक्ति भी प्रैक्टिकल जीवन में कम दिखाई देती है तो जैसे अगर मूर्ति की एक भुजा खण्डित हो तो पूज्यनीय नहीं होती, उसी प्रकार से अगर एक शक्ति की भी कमी दिखाई देती तो अष्ट देवताओं की लिस्ट में अब तक फिक्स नहीं कहें जायेंगे। दूसरी बात - अष्ट देवतायें भक्तों के लिए विशेष इष्ट माने जाते हैं। इष्ट अर्थात् महान पूज्य। इष्ट द्वारा हर भक्त को हर प्रकार की विधि और सिद्धि प्राप्त होती है। यहाँ भी जो अष्ट रत्न होंगे वह सर्व ब्राह्मण परिवार के आगे अब भी इष्ट अर्थात् हर संकल्प और चलन द्वारा विधि और सिद्धि का मार्ग दर्शन करने वाले सबके सामने अब भी ऐसे ही महानमूर्त माने जायेंगे। तो अष्ट शक्तियाँ भी होंगी और परिवार के सामने इष्ट अर्थात् श्रेष्ठ आत्मा, महान आत्मा, वरदानी आत्मा के रूप में होंगे। यह है अष्ट रत्नों की विशेषता। अच्छा।

2. दुनिया के वायब्रेशन से अथवा माया से सेफ रहने का साधन- सदा “एक बाप दूसरा न कोई”, जो इसी लगन में मगन रहते वह माया के हर प्रकार के वार से बचे रहते हैं। जैसे जब लड़ाई के समय बाम्ब्स गिराते हैं तो अण्डरग्राउण्ड हो जाते हैं, तो उसका असर उनको नहीं होता तो ऐसे ही जब एक लगन में मगन रहते तो दुनिया के वायब्रेशन से, माया से बचे रहेंगे, सदा सेफ रहेंगे। माया की हिम्मत नहीं जो वार करे। लगन में मगन रहो। यही है सेफ्टी का साधन।

3. बाप के समीप रत्नों की निशानी - बाप के समीप रहने वालों के ऊपर बाप के सत के संग का रंग चढ़ा हुआ होगा। सत के संग का रंग है रूहानियत। तो समीप रत्न सदा रूहानी स्थिति में स्थित होंगे। शरीर में रहते हुए न्यारे, रूहानियत में स्थित रहेंगे। शरीर को देखते हुए भी न देखें और आत्मा जो न दिखाई देने वाली चीज़ है - वह प्रत्यक्ष दिखाई दे - यही तो कमाल है। रूहानी मस्ती में रहने वाले ही बाप को साथी बना सकते हैं क्योंकि बाप रूह है।

4. पुरानी दुनिया के सर्व आकर्षणों से परे होने की सहज युक्ति - सदैव नशे में रहो कि हम अविनाशी खजाने के मालिक हैं। जो बाप का खज़ाना ज्ञान, सुख शान्ति, आनंद है... वह सर्व गुण हमारे हैं। बच्चा बाप की प्रापर्टी का स्वत: ही मालिक होता है। अधिकारी आत्मा को अपने अधिकार का नशा रहता है, नशे में सब भूल जाता है ना। कोई स्मृति नहीं होती, एक ही स्मृति रहे बाप और मैं इसी स्मृति से पुरानी दुनिया की आकर्षण से आटोमेटिकली परे हो जायेंगे। नशे में रहने वाले के सामने सदा निशाना भी स्पष्ट होगा। निशाना है फरिश्तेपन का और देवतापन का।

5. एक सेकण्ड का वन्डरफुल खेल, जिससे पास विद् ऑनर बन जायें - एक सेकेण्ड का खेल है अभी-अभी शरीर में आना और अभी-अभी शरीर से अव्यक्त स्थिति में स्थित हो जाना। इस सेकेण्ड के खेल का अभ्यास है? जब चाहो जैसे चाहो उसी स्थिति में स्थित रह सको। अन्तिम पेपर सेकेण्ड का ही होगा, जो इस सेकण्ड की हलचल में आया तो फेल, अचल रहा तो पास। ऐसी कन्ट्रोलिंग पावर है? अभी ऐसा अभ्यास तीव्र रूप का होना चाहिए। जितना हंगामा हो उतना स्वयं की स्थिति अति शान्त। जैसे सागर बाहर आवाज सम्पन्न होता, अन्दर बिल्कुल शान्त, ऐसा अभ्यास चाहिए। कन्ट्रोलिंग पावर वाले ही विश्व को कन्ट्रोल कर सकते हैं। जो स्वयं को नहीं कर सकते वह विश्व का राज्य कैसे करेंगे। समेटने की शक्ति चाहिए। एक सेकण्ड में विस्तार से सार में चले जायें और एक सेकेण्ड में सार से विस्तार में आ जायें, यही है वन्डरफुल खेल।

6. अतीन्द्रिय सुख के झूले में झूलते रहो - आपको सभी आत्मायें सुख में झूलता देख दु:खी से सुखी बन जायें। आपके नयन, मुख चेहरा सब सुख दे, ऐसा सुखदायी बनो। ऐसा सुखदाई जो बनता उसे संकल्प में भी दु:ख की लहर नहीं आ सकती। अच्छा।

वरदान:-

मन-बुद्धि की एकाग्रता द्वारा सर्व सिद्धियां प्राप्त करने वाले सदा समर्थ आत्मा भव

सर्व सिद्धियों को प्राप्त करने के लिए एकाग्रता की शक्ति को बढ़ाओ। यह एकाग्रता की शक्ति सहज निर्विघ्न बना देती है, मेहनत करने की आवश्यकता नहीं रहती। एक बाप दूसरा न कोई - इसका सहज अनुभव होता है, सहज एकरस स्थिति बन जाती है। सर्व के प्रति कल्याण की वृत्ति, भाई-भाई की दृष्टि रहती है। लेकिन एकाग्र होने के लिए इतना समर्थ बनो जो मन-बुद्धि सदा आपके आर्डर अनुसार चले। स्वप्न में भी सेकण्ड मात्र भी हलचल न हो।

स्लोगन:-

कमल पुष्प के समान न्यारे रहो तो प्रभू के प्यार का पात्र बन जायेंगे।