06-03-2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


“मीठे बच्चे - ज्ञान सागर बाप तुम्हें रत्नों की थालियां भर-भर कर देते हैं, जितना चाहे अपनी झोली भरो, सब फिकरातों से फ़ारिग हो जाओ''

प्रश्नः-

ज्ञान मार्ग की कौन-सी बात भक्ति मार्ग में भी पसन्द करते हैं?

उत्तर:-

स्वच्छता। ज्ञान मार्ग में तुम बच्चे स्वच्छ बनते हो। बाप तुम्हारे मैले कपड़ों को स्वच्छ बनाने आये हैं, आत्मा जब स्वच्छ अर्थात् पावन बन जाती है तब घर में जाने के, उड़ने के पंख लग जाते हैं। भक्ति में भी स्वच्छता को बहुत पसन्द करते हैं। स्वच्छ बनने के लिए गंगा में जाकर स्नान करते, लेकिन पानी से आत्मा स्वच्छ नहीं बन सकती।

ओम् शान्ति।

मीठे-मीठे बच्चे, तुम्हें याद की यात्रा को भूलना नहीं है। सुबह को जैसे यह प्रैक्टिस करते हो, उसमें वाणी नहीं चलती है क्योंकि वह है निर्वाणधाम में जाने की युक्ति। पावन बनने के सिवाए तुम बच्चे जा नहीं सकते, उड़ नहीं सकते। यह भी समझते हो सतयुग जब होता है तो कितनी ढेर आत्मायें उड़कर जाती हैं। अभी तो कितनी करोड़ आत्मायें हैं। वहाँ सतयुग में जाकर कुछ लाख बचेंगे। बाकी सब उड़ जाते हैं। जरूर कोई तो आकर पंख देते हैं ना। इस याद की यात्रा से ही आत्मा पवित्र हो जाती है। इनके सिवाए और कोई उपाय है नहीं पावन होने का। पतित-पावन भी एक बाप को ही कहते हैं फिर कोई ईश्वर कहते, परमात्मा कहते वा भगवान् कहते हैं। है तो एक। अनेक नहीं हैं। बाप सबका एक है। लौकिक बाप सबका अपना-अपना होता है। बाकी पारलौकिक तो सबका एक ही है। वह एक जब आते हैं तो सबको सुख देकर जाते हैं। फिर सुख में उनको याद करने की दरकार नहीं। वह भी पास्ट हो गया ना। अब बाप बैठ पास्ट, प्रेजन्ट, फ्युचर का राज़ समझाते हैं। झाड़ का पास्ट, प्रेजन्ट, फयुचर बहुत इज़ी है। तुम जानते हो कि कैसे बीज से झाड़ होता है। फिर वृद्धि को पाते-पाते आखरीन अन्त आ जाता है। उसको कहा जाता है आदि, मध्य, अन्त। यह है वैराइटी धर्मों का झाड़, वैराइटी फीचर का झाड़। सबके फीचर अपने-अपने हैं। फूलों में तुम देखेंगे जैसा-जैसा झाड़ वैसे-वैसे उनके फूल निकलते हैं। उन सब फूलों के फीचर्स एक रहेंगे। परन्तु इस मनुष्य सृष्टि रूपी झाड़ में वैराइटी है। उसमें हर एक झाड़ की शोभा अपनी-अपनी होती है। इस झाड़ में अनेक प्रकार की शोभा है। जैसे बाप समझाते हैं - श्याम सुन्दर, यह देवी-देवताओं के लिए है। जब वह सतोप्रधान से तमोप्रधान बनते हैं तो वही सुन्दर से श्याम बनते हैं। ऐसे श्याम-सुन्दर और कोई धर्म में नहीं बनते हैं। उन्हों के फीचर्स भी देखो। जापानियों के फीचर्स, युरोपियन्स के फीचर्स, चीनियों के फीचर्स देखो। इन्डिया वालों के फीचर्स बदली होते जाते हैं। उन्हों के लिए ही श्याम-सुन्दर का गायन है, और कोई धर्म के लिए नहीं। यह मनुष्य सृष्टि का झाड़ है। वैराइटी धर्म हैं। वह सब नम्बरवार कैसे आते हैं, यह नॉलेज तुम बच्चों को अभी मिलती है। और कोई यह बात समझा न सके। यह कल्प है 5 हज़ार वर्ष का। इसको वृक्ष कहो या दुनिया कहो, आधा में है भक्ति, जिसको रावण राज्य कहा जाता है। 5 विकारों का राज्य चलता है, काम चिता पर चढ़कर पतित सांवरे बन जाते हैं। रावण सम्प्रदाय वालों की चलन और दैवी सम्प्रदाय वालों की चलन में रात-दिन का फ़र्क है। मनुष्य उन्हों की महिमा गाते हैं, अपने को नींच पापी कहते हैं। अनेक प्रकार के मनुष्य हैं। भक्ति तो तुमने बहुत की है। पुनर्जन्म लेते-लेते भक्ति करते आये हो। पहले होती है अव्यभिचारी भक्ति। एक की भक्ति पहले-पहले शुरू करते हैं फिर व्यभिचारी हो जाती है। अन्त में फिर बिल्कुल ही व्यभिचारी बन जाते हैं, तब बाप आकर अव्यभिचारी ज्ञान देते हैं। जिस ज्ञान से सद्गति होती है, इसका जब तक पता नहीं है तो भक्ति के ही घमण्ड में रहते हैं। यह पता नहीं है कि ज्ञान का सागर एक ही परमात्मा है। भक्ति में कितने वेद शास्त्र याद कर जबानी भी सुनाते हैं। यह सब है भक्ति का विस्तार। भक्ति की शोभा है। बाप कहते हैं यह मृगतृष्णा समान शोभा है। वो रेत पानी जैसी दूर से ऐसी चमकती है जैसे चांदी। हिरण को प्यास लगती है तो वह उस रेत में भागते-भागते फंस जाता है। भक्ति भी ऐसे है, उसमें सब फँस पड़े हैं, उससे निकालने में बच्चों को मेहनत लगती है। विघ्न भी इसमें पड़ते हैं क्योंकि बाप पवित्र बनाते हैं। द्रोपदी ने भी पुकारा। सारी दुनिया में द्रोपदियां और दुर्योधन हैं। और फिर ऐसे भी कहेंगे कि तुम सब पार्वतियां हो जो अमरकथा सुन रही हो। बाप तुमको अमरलोक के लिए अमर कथा सुना रहे हैं। यह है मृत्युलोक। यहाँ अकाले मृत्यु होती रहती है। बैठे-बैठे हार्टफेल हो जाते हैं। तुम हॉस्पिटल में जाकर समझा सकते हो। यहाँ तुम्हारी आयु कितनी कम है, बीमार हो पड़ते हो। वहाँ बीमारी होगी नहीं।

भगवानुवाच - अपने को आत्मा समझो, मुझ बाप को याद करो। औरों से ममत्व मिटा दो तो तुम्हारे विकर्म विनाश होंगे। फिर कभी बीमार होंगे नहीं। काल खायेगा नहीं। आयु भी बड़ी होगी। इन देवताओं की आयु बड़ी थी ना। फिर बड़ी आयु वाले कहाँ गये? पुनर्जन्म लेते-लेते आयु कम हो जाती है। यह दु:ख-सुख का खेल है, इसको कोई जानते नहीं। मेले-मलाखड़े आदि कितने होते हैं। कुम्भ के मेले में कितने लोग स्नान करने के लिए जाकर इकट्ठे होते हैं परन्तु फायदा कुछ भी नहीं। रोज़ तुम स्नान करते हो, पानी तो सब जगह सागर से ही आता है। सबसे अच्छा पानी तो कुएं का होता है। नदियों में तो किचड़ा पड़ता रहता है। कुएं का पानी तो नेचुरल शुद्ध होता है। तो उनसे स्नान करना बहुत अच्छा होता है। पहले यह रिवाज़ था, अब नदियों का रिवाज पड़ा है। भक्ति मार्ग में भी स्वच्छता को पसन्द करते हैं। अब परमात्मा को पुकारते हैं कि आकर हमको स्वच्छ बनाओ। गुरुनानक ने भी परमात्मा की महिमा गाई है कि मूत पलीती कपड़ धोये.... बाप आकर मूत पलीती कपड़ों को स्वच्छ बनाते हैं। यहाँ बाप आत्मा को स्वच्छ बनाते हैं। वो लोग आत्मा को निर्लेप समझते हैं। बाप कहते हैं - यह है ही रावण राज्य। सृष्टि की उतरती कला है। गायन भी है चढ़ती कला तेरे भाने सर्व का भला। सर्व की सद्गति हो जाती है। हे बाबा, आपके द्वारा सबका भला हो जाता है। सतयुग में सबका भला होता है। वहाँ सब शान्ति में हैं, एक ही राज्य है। उस समय और सब शान्तिधाम में रहते हैं। अब यह लोग माथा मारते हैं कि विश्व में शान्ति हो। उनसे पूछो - आगे कभी विश्व में शान्ति थी, जो अब फिर मांग रहे हो? वो फिर कह देते हैं अभी कलियुग में 40 हज़ार वर्ष और पड़े हैं। मनुष्य घोर अन्धियारे में हैं। कहाँ 5 हज़ार वर्ष का सारा कल्प, कहाँ एक कलियुग के ही 40 हज़ार वर्ष बचे हुए बताते हैं! अनेक मते हैं। बाप आकर सच बताते हैं कि जन्म भी 84 ही हैं। लाखों वर्ष हों फिर तो मनुष्य जानवर आदि भी बन सकते हैं, परन्तु कायदा ही नहीं है। 84 जन्म मनुष्य का ही लेते हैं। उसका हिसाब-किताब भी बाप बतलाते हैं। यह नॉलेज तुम बच्चों को धारण करनी है। ऋषि-मुनि तो नेती-नेती करके गये हैं अर्थात् हम नहीं जानते हैं तो नास्तिक ठहरे। जरूर कोई आस्तिक होंगे। आस्तिक हैं देवतायें, नास्तिक हैं रावण राज्य में। ज्ञान से तुम आस्तिक बनते हो फिर 21 जन्मों का वर्सा मिल जाता है। फिर ज्ञान की दरकार नहीं रहती है। अब पुरुषोत्तम संगमयुग है जबकि हम उत्तम ते उत्तम पुरुष स्वर्ग के मालिक बन रहे हैं। इसमें जितना जो पढ़ेंगे उतना ऊंच पद पायेंगे। पढ़ेंगे-लिखेंगे होंगे विश्व के मालिक, नहीं तो कम पद। परन्तु वह राजाई है सुख की। यहाँ है दु:ख की। आस्तिक बने हैं तो सुख की राजाई करते हैं। फिर रावण आने से नास्तिक बनते हैं, तो दु:ख होता है। भारत जब सालवेन्ट था तो अथाह धन था, सोमनाथ का मन्दिर कितना भारी बनाया हुआ है। मन्दिर बनाने के लिए इतने पैसे थे तो खुद के पास कितने पैसे होंगे! यह इतने पैसे कहाँ से मिले? शास्त्रों में लिखा है - सागर ने थालियां भर-भर कर दी। अब ज्ञान सागर तुमको रत्नों की थालियां भरकर देते हैं। अब तुम्हारी झोली भर रही है। वो शंकर के आगे जाकर कहते हैं भर दो झोली, बाप को जानते नहीं। अब तुम जानते हो - बाप हमारी झोली भर रहे हैं। जितना जिसको चाहिए सो भरे। जितना अच्छी रीति पढ़ेंगे उतना स्कॉलरशिप मिलेगी। चाहे तो ऊंच ते ऊंच डबल सिरताज बनो, चाहे गरीब प्रजा वा दास-दासी। बहुत हैं जो फ़ारकती भी दे देते हैं, यह भी ड्रामा में नूँध है। बाप कहते हैं मुझे कोई फिक्र नहीं। मैं तो फिक्र से फ़ारिग हूँ। तुमको भी बना रहा हूँ। फिक्र से फ़ारिग स्वामी कींदा सतगुरू.... स्वामी जो सबका बाप है, उनको मालिक भी कहते हैं। बाप कहते हैं मैं तुम्हारा बेहद का टीचर भी हूँ। भक्ति मार्ग में तुम अनेक टीचर्स से अनेक विद्यायें पढ़ते हो। बाप जो तुमको पढ़ाते हैं यह सबसे न्यारी नॉलेज है। वह है ज्ञान का सागर, जानी जाननहार नहीं कहना। ऐसे बहुत कहते हैं - आप तो हमारे अन्दर को जानते हो। बाप कहते हैं - मैं कुछ नहीं जानता हूँ। मैं तो तुम बच्चों को पढ़ाने के लिए आता हूँ, तुम आत्मा अपने इस तख्त पर विराजमान हो। मैं भी इस तख्त पर बैठा हूँ। आत्मा कितनी छोटी बिन्दी है - यह कोई जानता ही नहीं। तब बाप कहते हैं - पहले आत्मा को समझो फिर बाप को समझेंगे। बाप पहले-पहले आत्मा का ज्ञान समझाते हैं। फिर बाप का परिचय देते हैं। भक्ति में सालिग्राम बनाए पूजा कर फिर ख़लास कर देते हैं। बाप कहते हैं यह सब है गुड़ियों की पूजा। जो इन सब बातों को अच्छी रीति समझते हैं वह औरों का भी कल्याण करते हैं। बाप भी कल्याणकारी है तो बच्चों को भी बनना है। कोई तो औरों को दलदल से निकालते-निकालते खुद फँस मरते हैं। अपवित्र बन पड़ते हैं। की कमाई चट कर देते हैं, इसलिए बाप कहते हैं खबरदार रहना। काम चिता पर बैठने से ही तुम काले बन पड़े हो। तुम कहेंगे हम ही गोरे थे, हम ही काले बने। हम ही देवता थे, हम ही नीचे उतरे। नहीं तो 84 जन्म कौन लेते हैं। यह हिसाब बाप समझाते हैं। बच्चों को बहुत मेहनत करनी पड़ती है। आधाकल्प से जो विषय सागर में पड़े हैं उनसे निकालना मासी का घर नहीं है। अगर कोई थोड़ा भी ज्ञान लेते हैं तो उनका विनाश नहीं होता है। यह कथा है ही सत्य नारायण बनने की, फिर प्रजा भी बनती है। थोड़ा समझकर चले जाते हैं, हो सकता है फिर आकर समझें। आगे चलकर मनुष्यों में वैराग्य भी होगा। जैसे शमशान में वैराग्य आता है, बाहर निकले तो खलास। तुम भी जब समझाते हो, अच्छा-अच्छा करते हैं, बाहर गये खलास। कहते हैं यह काम उतारकर आयेंगे। बाहर जाने से माया माथा मूड़ लेती है। कोटो में कोई निकलता है। राजाई पद पाना - इसमें मेहनत लगती है। हर एक दिल से पूछे - बेहद के बाप को हम कितना याद करते हैं? कहते हैं बाप की याद भूल जाती है। अरे, अज्ञान काल में कभी ऐसे कहते हैं कि हमको बाप भूल जाता है।

बाबा कहते हैं भल कितने भी तूफान आयें तुमको हिलना नहीं है। तूफान आयेगा, सिर्फ कर्मेन्द्रियों से कर्म नहीं करना। कहते हैं - बाबा, माया ने जादू लगा दिया। बाबा कहते हैं - मीठे-मीठे बच्चे, याद करो तो कट निकल जायेगी। आत्मा पर कट (जंक) चढ़ती है, वह निकलेगी याद से। बाप भी बिन्दी है। सिवाए बाप की याद के और कोई उपाय नहीं कट उतारने का। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) कल्याणकारी बाप के हम बच्चे हैं इसलिए अपना और सर्व का कल्याण करना है। कोई ऐसा कर्म न हो जो की कमाई खत्म हो जाए इसमें खबरदार रहना है।

2) पढ़ाई अच्छी तरह से पढ़कर ज्ञान रत्नों से अपनी झोली भरपूर करनी है। स्कॉलरशिप लेने का पुरुषार्थ करना है। बाप समान फिक्र से फ़ारिग, निश्चिन्त रहना है।

वरदान:-

ब्राह्मण जन्म की विशेषता को नेचरल नेचर बनाने वाले सहज पुरुषार्थी भव

ब्राह्मण जन्म भी विशेष, ब्राह्मण धर्म और कर्म भी विशेष अर्थात् सर्वश्रेष्ठ है क्योंकि ब्राह्मण कर्म में फालो साकार ब्रह्मा बाप को करते हैं। तो ब्राह्मणों की नेचर ही विशेष नेचर है, साधारण वा मायावी नेचर ब्राह्मणों की नेचर नहीं। सिर्फ यही स्मृति स्वरूप में रहे कि मैं विशेष आत्मा हूँ, यह नेचर जब नेचरल हो जायेगी तब बाप समान बनना सहज अनुभव करेंगे। स्मृति स्वरूप सो समर्थी स्वरूप बन जायेंगे - यही सहज पुरुषार्थ है।

स्लोगन:-

पवित्रता और शान्ति की लाईट चारों ओर फैलाने वाले ही लाइट हाउस हैं।