09-09-18 प्रात:मुरली ओम् शान्ति ''अव्यक्त-बापदादा'' रिवाइज: 14-01-84 मधुबन


डबल सेवाधारी स्वत: ही मायाजीत

आज दिलाराम बाप अपने दिल तख्तनशीन बच्चों से वा अपने स्नेही, सहयोगी बच्चों से दिल की लेन-देन करने आये हैं। बाप की दिल में क्या रहता और बच्चों की दिल में क्या रहता है, आज सभी के दिल का हाल-चाल लेने आये हैं। खास दूरांदेशी डबल विदेशी बच्चों से दिल की लेन-देन करने आये हैं। मुरली तो सुनते रहते हो लेकिन आज रूहरिहान करने आये हैं कि सभी बच्चे सहज सरल रूप से आगे बढ़ते जा रहे हो? कोई मुश्किल, चलने में थकावट तो नहीं लगती, थकते तो नहीं हो? किसी छोटी बड़ी बातों में कनफ्यूज़ तो नहीं होते हो? जब किसी न किसी ईश्वरीय मार्यादा वा श्रीमत के डायरेक्शन को संकल्प में, वाणी में वा कर्म में उल्लंघन करते हो तब कन्फ्यूज होते हो। नहीं तो बहुत खुशी-खुशी से, सुख चैन आराम से बाप के साथ-साथ चलने में कोई मुश्किल नहीं, कोई थकावट नहीं, कोई उलझन नहीं। किसी भी प्रकार की कमजोरी सहज को मुश्किल बना देती है। तो बापदादा बच्चों को देख रूहरिहान कर रहे थे कि इतने लाडले, सिकीलधे श्रेष्ठ आत्मायें, विशेष आत्मायें, पुण्य आत्मायें, सर्व श्रेष्ठ पावन आत्मायें, विश्व के आधारमूर्त आत्मायें और फिर मुश्किल कैसे? उलझन में कैसे आ सकते हैं? किसके साथ चल रहे हैं? बापदादा स्नेह और सहयोग की बाँहों में समाते हुए साथ-साथ ले जा रहे हैं। स्नेह, सहयोग के बांहों की माला सदा गले में पड़ी हुई है। ऐसे माला में पिराये हुए बच्चे और उलझन में आवें यह हो कैसे सकता! सदा खुशी के झूले में झूलने वाले सदा बाप की याद में रहने वाले मुश्किल वा उलझन में आ नही सकते! कब तक उलझन और मुश्किल का अनुभव करते रहेंगे? बाप की पालना की छत्रछाया के अन्दर रहने वाले उलझन में कैसे आ सकते हैं। बाप का बनने के बाद, शक्तिशाली आत्मायें बनने के बाद, माया के नॉलेजफुल बनने के बाद सर्वशक्तियों, सर्व खजानों के अधिकारी बनने के बाद क्या माया वा विघ्न हिला सकते हैं? (नहीं) बहुत धीरे-धीरे बोलते हैं। बोलो, सदाकाल के लिए नहीं। देखना - सभी का फोटो निकल रहा है। टेप भरी है आवाज की। फिर वहाँ जाकर बदल तो नहीं जायेंगे ना! अभी से सिर्फ स्नेह के, सेवा के, उड़ती कला के विशेष अनुभवों के ही समाचार देंगे ना। माया आ गई, गिर गये, उलझ गये, थक गये, घबरा गये, ऐसे-ऐसे पत्र तो नहीं आयेंगे ना! जैसे आजकल की दुनिया में समाचार पत्रों में क्या खबरें निकलती हैं? दु:ख की, अशान्ति की, उलझनों की।

लेकिन आपके समाचार पत्र कौन से होंगे? सदा खुशखबरी के। खुशी के अनुभव - आज मैंने यह विशेष अनुभव किया। आज यह विशेष सेवा की। आज मंसा के सेवा की अनुभूति की। आज दिल शिकस्त को दिलखुश बना दिया। नीचे गिरे हुए को उड़ा दिया। ऐसे पत्र लिखेंगे ना क्योंकि 63 जन्म उलझे भी, गिरे भी, ठोकरें भी खाई। सब कुछ किया और 63 जन्मों के बाद यह एक श्रेष्ठ जन्म, परिवर्तन का जन्म, चढ़ती कला से भी उड़ती कला का जन्म, इसमें उलझना, गिरना, थकना बुद्धि से भटकना, यह बापदादा देख नहीं सकते क्योंकि स्नेही बच्चे हैं ना। तो स्नेही बच्चों का यह थोड़ा-सा दु:ख की लहर का समय सुखदाता बाप देख नहीं सकते। समझा! तो अभी सदाकाल के लिए बीती को बीती कर लिया ना। जिस समय कोई भी बच्चा ज़रा भी उलझन में आता वा माया के विघ्नों के वश हो जाता, कमजोर हो जाता उस समय वतन में बापदादा के सामने उन बच्चों का चेहरा कैसा दिखाई देता है, मालूम है? मिक्की माउस के खेल की तरह। कभी माया के बोझ से मोटे बन जाते। कभी पुरुषार्थ के हिम्मतहीन छोटे बन जाते। मिक्की माउस भी कोई छोटा, कोई मोटा होता है ना! मिक्की माउस तो नहीं बनेंगे ना। बापदादा भी यह खेल देख हँसते रहते हैं। कभी देखो फरिश्ता रूप, कभी देखो महादानी रूप, कभी देखो सर्व के स्नेही सहयोगी रूप, कभी डबल लाइट रूप और कभी-कभी फिर मिक्की माउस भी हो जाते हैं। कौन-सा रूप अच्छा लगता है? यह छोटा-मोटा रूप तो अच्छा नहीं लगता है ना। बापदादा देख रहे थे कि बच्चों को अभी कितना कार्य करना है। किया है वह तो करने के आगे कुछ भी नहीं है। अभी कितनों को सन्देश दिया है? कम से कम सतयुग की पहली संख्या 9 लाख तो बनाओ। बनाना तो ज्यादा है लेकिन अभी 9 लाख तो बनाओ। बापदादा देख रहे थे कि कितनी सेवा अभी करनी है, जिसके ऊपर इतनी सेवा की जिम्मेवारी है। वह कितने बिजी होंगे! उन्हों को और कुछ सोचने की फुर्सत होगी? जो बिज़ी रहता है वह सहज ही मायाजीत होता है। बिजी किसमें हैं? दृष्टि द्वारा, मंसा द्वारा, वाणी द्वारा, कर्म द्वारा, सम्पर्क द्वारा चारों प्रकार की सेवा में बिजी। मंसा और वाणी वा कर्म दोनों साथ-साथ हों। चाहे कर्म करते हो, चाहे मुख से बोलते हो, जैसे डबल लाइट हो, डबल ताजधारी हो, डबल पूज्य हो, डबल वर्सा पाते हो तो सेवा भी डबल चाहिए। सिर्फ मंसा नहीं, सिर्फ कर्म नहीं। लेकिन मंसा के साथ-साथ वाणी। मंसा के साथ-साथ कर्म। इसको कहा जाता है डबल सेवाधारी। ऐसे डबल सेवाधारी स्वत: ही मायाजीत रहते हैं। समझा! सिंगल सेवा करते हो। सिर्फ वाणी में वा सिर्फ कर्म में आ जाते हो तो माया को साथी बनने का चांस मिल जाता है। मंसा अर्थात् याद। याद है बाप का सहारा। तो जहाँ डबल है, साथी साथ में है तो माया साथी बन नहीं सकती। सिंगल होते हो तो माया साथी बन जाती है। फिर कहते सेवा तो बहुत की। सेवा की खुशी भी होती है लेकिन फिर सेवा के बीच में माया भी आ गई। कारण? सिंगल सेवा की। डबल सेवाधारी नहीं बनें। अभी इस वर्ष डबल विदेशी किस बात में प्राइज़ लेंगे? प्राइज़ लेनी तो है ना!

जो सेवाकेन्द्र इस वर्ष सेवा में, स्व की स्थिति में सदा निर्विघ्न रह, निर्विघ्न बनाने का वायब्रेशन विश्व में फैलायेंगे, सारे वर्ष में कोई भी विघ्न वश नहीं होंगे - ऐसी सेवा और स्थिति में जिस भी सेवाकेन्द्र का एक्जैम्पुल होगा उसको नम्बर वन प्राइज़ मिलेगी। ऐसी प्राइज लेंगे ना! जितने भी सेन्टर्स लें। चाहे देश के हों, चाहे विदेश के हों लेकिन सारे वर्ष में निर्विघ्न हों। यह सेन्टर के पोतामेल का चार्ट रखना। जैसे और पोतामेल रखते हो ना। कितनी प्रदर्शनियाँ हुई, कितने लोग आये, वैसे यह पोतामेल हर मास का नोट करना। यह मास सब क्लास के आने वाले ब्राह्मण परिवार निर्विघ्न रहे। माया आई, इसमें कोई ऐसी बात नहीं। ऐसे नहीं कि माया आयेगी ही नहीं। माया आवे लेकिन माया के वश नहीं होना है। माया का काम है आना और आपका काम है माया को जीतना। उनके प्रभाव में नहीं आना है। अपने प्रभाव से माया को भगाना है न कि माया के प्रभाव में आना है। तो समझा कौन-सी प्राइज़ लेनी है। एक भी विघ्न में आया तो प्राइज नहीं क्योंकि साथी हो ना। सभी को एक दो को साथ देते हुए अपने घर चलना है ना। इसके लिए सदा सेवाकेन्द्र का वातावरण ऐसा शक्तिशाली हो जो वातावरण भी सर्व आत्माओं के लिए सदा सहयोगी बन जाए। शक्तिशाली वातावरण कमज़ोर को भी शक्तिशाली बनाने में सहयोगी होता है। जैसे किला बांधा जाता है ना। किला क्यों बांधते हैं कि प्रजा भी किले के अन्दर सेफ रहे। एक राजा के लिए कोठरी नहीं बनाते, किला बनाते थे। आप सभी भी स्वयं के लिए, साथियों के लिए, अन्य आत्माओं के लिए ज्वाला का किला बांधो। याद के शक्ति की ज्वाला हो। अभी देखेंगे कौन प्राइज लेते हैं? वर्ष के अन्त में। न्यू ईयर मनाने आते हो ना, तो जो विजयी होंगे, उन्हों को विशेष निमंत्रण देकर बुलाया जायेगा। अकेले विजयी नहीं होंगे। पूरा सेन्टर विजयी हो। उस सेन्टर की सेरीमनी करेंगे। फिर देखेंगे विदेश आगे आता है वा देश? अच्छा और कोई मुश्किल तो नहीं, कोई भी माया का रूप तंग तो नहीं करता है ना। यादगार में कहानी क्या सुनी है! सूपनखा उसको तंग करने आई तो क्या किया? माया का नाक काटने नहीं आता? यहाँ सब सहज हो जाता है, उन्होंने तो इन्ट्रेस्टिंग बनाने के लिए कहानी बना दी है। माया पर एक बार वार कर लिया, बस। माया में कोई दम नहीं है। बाकी है अन्दर की कमजोरी। मरी पड़ी है। थोड़ा-सा रहा हुआ श्वांस चल रहा है। इसको खत्म करना और विजयी बनना है क्योंकि अन्तिम समय पर तो पहुँच गये हैं ना! सिर्फ विजयी बन विजय के हिसाब से राज्य भाग्य पाना है इसलिए यह अन्तिम श्वांस पर निमित्त मात्र विजयी बनना है। माया जीत जगतजीत हैं ना। विजय प्राप्त करने का फल राज्य भाग्य है इसलिए सिर्फ निमित्त मात्र यह माया से खेल है। युद्ध नहीं है, खेल है। समझा! आज से मिक्की माउस नहीं बनना। अच्छा!

सतयुग की स्थापना के बारे में कुछ जानकारी

अपने कल्प पहले वाले स्वर्ग के मर्ज हुए संस्करों को इमर्ज करो तो स्वयं ही अपने को सतयुगी शहज़ादी वा शहजादे अनुभव करेंगे और जिस समय वह सतयुगी संस्कार इमर्ज करेंगे तो सतयुग की सभी रीति-रसम ऐसे स्पष्ट इमर्ज होगी जैसे कल की बात है। कल ऐसा करते थे - ऐसा अनुभव कर सकते हो! सतयुग का अर्थ ही है, जो भी प्रकृति के सुख हैं, आत्मा के सुख हैं, बुद्धि के सुख हैं, मन के सुख हैं, सम्बन्ध का सुख है, जो भी सुख होते वह सब हाजिर हैं। तो अब सोचो प्रकृति के सुख क्या होते हैं, मन का सुख क्या होता है, सम्बन्ध का सुख क्या होता है - ऐसे इमर्ज करो। जो भी आपको इस दुनिया में अच्छे ते अच्छा दिखाई देता है - वह सब चीजें प्युअर रूप में, सम्पन्न रूप में, सुखदाई रूप में वहाँ होंगी। चाहे धन कहो, मन कहो, मौसम कहो, सब प्राप्ति तो श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ हैं, उसको ही सतयुग कहा जाता है। एक बहुत अच्छे ते अच्छी सुखदाई सम्पन्न फैमली समझो; वहाँ राजा प्रजा समान मर्तबे होते हुए भी परिवार के रूप में चलता है। यह नहीं कहेंगे कि यह दास-दासी है। नम्बर होंगे, सेवा होगी लेकिन दासी है, इस भावना से नहीं चलेंगे। जैसे परिवार के सब सम्बन्ध खुश मिज़ाज, सुखी परिवार, समर्थ परिवार, जो भी श्रेष्ठता है वह सब है। दुकानों में भी खरीदारी करेंगे तो हिसाब-किताब से नहीं। परिवार की लेन-देन के हिसाब से कुछ देंगे कुछ लेंगे। गिफ्ट ही समझो। जैसे परिवार में नियम होता है - किसके पास ज्यादा चीज़ होती है तो सभी को बांटते हैं। हिसाब-किताब की रीति से नहीं। कारोबार चलाने के लिए कोई को कोई डियुटी मिली हुई है, कोई को कोई। जैसे यहाँ मुधबन में है ना। कोई कपड़े सम्भालाता, कोई अनाज सम्भालता, कोई पैसे तो नहीं देते हो ना। लेकिन चार्ज़ वाले तो हैं ना। ऐसे वहाँ भी होंगे। सब चीजें अथाह हैं, इसलिए जी हाजिर। कमी तो है ही नहीं। जितना चाहिए, जैसा चाहिए वह लो। सिर्फ बिजी रहने का यह एक साधन है। वह भी खेल-पाल है। कोई हिसाब-किताब किसको दिखाना तो है नहीं। यहाँ तो संगम है ना। संगम माना एकानामी। सतयुग माना खाओ, पियो, उड़ाओ। इच्छा मात्रम् अविद्या है। जहाँ इच्छा होती वहाँ हिसाब-किताब करना होता। इच्छा के कारण ही नीचे ऊपर होता है। वहाँ इच्छा भी नहीं, कमी भी नहीं। सर्व प्राप्ति हैं और सम्पन्न भी हैं तो बाकी और क्या चाहिए। ऐसे नहीं अच्छी चीज लगती तो ज्यादा ले ली। भरपूर होंगे। दिल भरी हुई होगी। सतयुग में तो जाना ही है ना। प्रकृति सब सेवा करेगी। (सतयुग में बाबा तो नहीं होंगे) बच्चों का खेल देखते रहेंगे। कोई तो साक्षी भी हो ना। न्यारा तो न्यारा ही रहेगा ना। प्यारा रहेगा लेकिन न्यारा रह करके प्यारा रहेगा। प्यारे का खेल तो अभी कर रहे हैं ना। सतयुग में न्यारापन ही अच्छा है। नहीं तो जब आप सभी गिरेंगे तो कौन निकालेगा। सतयुग में आना अर्थात् चक्र में आना। अच्छा - सतयुग में जब आप जन्म लो तब निमंत्रण देना, आप अगर संकल्प इमर्ज करेंगी तो फिर आयेंगे। सतयुग में आना अर्थात् चक्र में आना। बापदादा को स्वर्ग की बातों में आप आकर्षण कर रहे हो! अच्छा-इतने तो वैभव होंगे जो सब खा भी नहीं सकेंगे। सिर्फ देखते रहेंगे। अच्छा!

ऐसे सदा सर्व समर्थ आत्माओं को, सदा मायाजीत, जगतजीत आत्माओं को, सदा सहज योगी भव के वरदानी बच्चों को, डबल सेवाधारी, डबल ताजधारी, डबल लाइट बच्चों को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।

वरदान:-

रूहानियत में रहकर स्वमान की सीट पर बैठने वाले सदा सुखी, सर्व प्राप्ति स्वरूप भव

हर एक बच्चे में किसी न किसी गुण की विशेषता है। सभी विशेष हैं, गुणवान हैं, महान हैं, मास्टर सर्वशक्तिमान् हैं-यह रूहानी नशा सदा स्मृति में रहे-इसको ही कहते हैं स्वमान। इस स्वमान में अभिमान आ नहीं सकता। अभिमान की सीट कांटों की सीट है इसलिए उस सीट पर बैठने का प्रयत्न नहीं करो। रूहानियत में रहकर स्वमान की सीट पर बैठ जाओ तो सदा सुखी, सदा श्रेष्ठ, सदा सर्व प्राप्ति स्वरूप का अनुभव करते रहेंगे।

स्लोगन:-

अपनी शुभ भावना से हर आत्मा को दुआ देने वाले और क्षमा करने वाले ही कल्याणकारी हैं।