14-04-19 प्रात:मुरली ओम् शान्ति ''अव्यक्त-बापदादा'' रिवाइज: 07-05-84 मधुबन


बैलेन्स रखने से ही ब्लैसिंग की प्राप्ति

आज प्रेम स्वरूप, याद स्वरूप बच्चों को प्रेम और याद का रिटर्न देने के लिए प्रेम के सागर बाप इस प्यार की महफिल बीच आये हैं। यह रूहानी प्यार की महफिल रूहानी सम्बन्ध की मिलन महफिल है, जो सारे कल्प में अब ही अनुभव करते हो। सिवाए इस एक जन्म के और कभी भी रूहानी बाप का रूहानी प्यार मिल न सके। यह रूहानी प्यार रूहों को सच्ची राहत देता है। सच्ची राह बताता है। सच्ची सर्व प्राप्ति कराता है। ऐसा कभी संकल्प में भी आया था कि इस साकार सृष्टि में इस जन्म में और ऐसी सहज विधि से ऐसे आत्मा और परमात्मा का रूहानी मिलन सन्मुख होगा? जैसे बाप के लिए सुना था कि ऊंचे ते ऊंचा बहुत तेजोमय, बड़े ते बड़ा है, वैसे ही मिलने की विधि भी मुश्किल और बड़े अभ्यास से होगी - यह सोचते-सोचते नाउम्मींद हो गये थे लेकिन बाप ने ना उम्मींद बच्चों को उम्मींदवार बना दिया। दिलशिकस्त बच्चों को शक्तिशाली बना दिया। कब मिलेगा, वह अब मिलन का अनुभव करा दिया। सारे प्रापर्टी का अधिकारी बना दिया। अभी अधिकारी आत्मायें अपने अधिकार को जानते हो ना! अच्छी तरह से जान लिया है वा जानना है?

आज बापदादा बच्चों को देख रूहरिहान कर रहे थे कि सभी बच्चों को निश्चय भी सदा है, प्यार भी है, याद की लगन भी है, सेवा का उमंग भी है। लक्ष्य भी श्रेष्ठ है। किसी से भी पूछेंगे क्या बनना है? तो सभी कहेंगे लक्ष्मी-नारायण बनने वाले हैं। राम सीता कोई नहीं कहते। 16 हजार की माला भी दिल से पसन्द नहीं करते। 108 की माला के मणके बनेंगे। यही उमंग सभी को रहता है। सेवा में, पढ़ाई में हरेक अपने को किसी से भी कम योग्य नहीं समझते हैं। फिर भी सदा एकरस स्थिति, सदा उड़ती कला की अनुभूति, सदा एक में समाये हुए, देह और देह की अल्पकाल की प्राप्तियों से सदा न्यारे, विनाशी सुध-बुध भूले हुए हों ऐसी सदा की स्थिति अनुभव करने में नम्बरवार हो जाते हैं। यह क्यों? बापदादा इसका विशेष कारण देख रहे थे। क्या कारण देखा? एक ही शब्द का कारण है।

सब कुछ जानते हैं और सब कुछ सबको प्राप्त भी है, विधि का भी ज्ञान है, सिद्धि का भी ज्ञान है। कर्म और फल दोनों का ज्ञान है, लेकिन सदा बैलेन्स में रहना नहीं आता। यह बैलेन्स की ईश्वरीय नीति समय पर निभाने नहीं आती इसलिए हर संकल्प में, हर कर्म में बापदादा तथा सर्व श्रेष्ठ आत्माओं की श्रेष्ठ आशीर्वाद, ब्लैसिंग प्राप्त नहीं होती। मेहनत करनी पड़ती है। सहज सफलता अनुभव नहीं होती। किस बात का बैलेन्स भूल जाता है? एक तो याद और सेवा। याद में रह सेवा करना - यह है याद और सेवा का बैलेन्स। लेकिन सेवा में रह समय प्रमाण याद करना, समय मिला याद किया, नहीं तो सेवा को ही याद समझना इसको कहा जाता है अनबैलेन्स। सिर्फ सेवा ही याद है और याद में ही सेवा है। यह थोड़ा-सा विधि का अन्तर सिद्धि को बदल लेता है। फिर जब रिजल्ट पूछते कि याद की परसेन्टज कैसी रही? तो क्या कहते? सेवा में इतने बिजी थे, कोई भी बात याद नहीं थी। समय ही नहीं था या कहते सेवा भी बाप की ही थी, बाप तो याद ही था। लेकिन जितना सेवा में समय और लगन रही उतना ही याद की शक्तिशाली अनुभूति रही? जितना सेवा में स्वमान रहा उतना ही निर्माण भाव रहा? ये बैलेन्स रहा? बहुत बड़ी, बहुत अच्छी सेवा की - यह स्वमान तो अच्छा है लेकिन जितना स्वमान उतना निर्माण भाव रहे। करावनहार बाप ने निमित्त बन सेवा कराई। यह है निमित्त, निर्माण भाव। निमित्त बने, सेवा अच्छी हुई, वृद्धि हुई, सफलता स्वरूप बनें, यह स्वमान तो अच्छा है लेकिन सिर्फ स्वमान नहीं, निर्माण भाव का भी बैलेन्स हो। यह बैलेन्स सदा ही सहज सफलता स्वरूप बना देता है। स्वमान भी जरूरी है। देह भान नहीं, स्वमान। लेकिन स्वमान और निर्माण दोनों का बैलेन्स न होने कारण स्वमान, देह-अभिमान में बदल जाता है। सेवा हुई, सफलता हुई, यह खुशी तो होनी चाहिए। वाह बाबा आपने निमित्त बनाया! मैंने नहीं किया, यह मैं-पन स्वमान को देह-अभिमान में ले आता है। याद और सेवा का बैलेन्स रखने वाले स्वमान और निर्माण का भी बैलेन्स रखते। तो समझा बैलेन्स किस बात में नीचे ऊपर होता है!

ऐसे ही जिम्मेवारी के ताजधारी होने के कारण हर कार्य में जिम्मेवारी भी पूरी निभानी है। चाहे लौकिक सो अलौकिक प्रवृत्ति है, चाहे ईश्वरीय सेवा की प्रवृत्ति है। दोनों प्रवृत्ति की अपनी-अपनी जिम्मे-वारी निभाने में जितना न्यारा उतना प्यारा। यह बैलेन्स हो। हर जिम्मवारी को निभाना, यह भी आवश्यक है लेकिन जितनी बड़ी जिम्मेवारी उतना ही डबल लाइट। जिम्मेवारी निभाते हुए जिम्मेवारी के बोझ से न्यारे हो, इसको कहते हैं बाप का प्यारा। घबरावे नहीं क्या करूँ, बहुत जिम्मेवारी है। यह करूँ वा नहीं, क्या करूँ, यह भी करूँ वह भी करूँ, बड़ा मुश्किल है! यह महसूसता अर्थात् बोझ है। तो डबल लाइट तो नहीं हुए ना। डबल लाइट अर्थात् न्यारा। कोई भी जिम्मेवारी के कर्म के हलचल का बोझ नहीं। इसको कहा जाता है न्यारे और प्यारे का बैलेन्स रखने वाले।

दूसरी बात - पुरुषार्थ में चलते-चलते पुरुषार्थ से जो प्राप्ति होती उसका अनुभव करते-करते बहुत प्राप्ति के नशे और खुशी में आ जाते। बस हमने पा लिया, अनुभव कर लिया। महावीर, महारथी बन गये, ज्ञानी बन गये, योगी भी बन गये, सेवाधारी भी बन गये। यह प्राप्ति बहुत अच्छी है लेकिन इस प्राप्ति के नशे में अलबेलापन भी आ जाता है। इसका कारण? ज्ञानी बने, योगी बने, सेवाधारी बने लेकिन हर कदम में उड़ती कला का अनुभव करते हो? जब तक जीना है तब तक हर कदम में उड़ती कला में उड़ना है। इस लक्ष्य से जो आज करते उसमें और नवीनता आई या जहाँ तक पहुँचे वही सीमा सम्पूर्णता की सीमा समझ लिया? पुरुषार्थ में प्राप्ति का नशा और खुशी भी आवश्यक है लेकिन हर कदम में उन्नति वा उड़ती कला का अनुभव भी आवश्यक है। अगर यह बैलेन्स नहीं रहता तो अलबेलापन, ब्लैसिंग प्राप्त करा नहीं सकता इसलिए पुरुषार्थी जीवन में जितना पाया, उसका नशा भी हो और हर कदम में उन्नति का अनुभव भी हो, इसको कहा जाता है बैलेन्स। यह बैलेन्स सदा रहे। ऐसे नहीं समझना हम तो सब जान गये। अनुभवी बन गये। बहुत अच्छी रीति चल रहे हैं। अच्छे बने हो, यह तो बहुत अच्छा है लेकिन और आगे उन्नति को पाना है। ऐसे विशेष कर्म कर सर्व आत्माओं के आगे निमित्त एक्जैम्पुल बनना है। यह नहीं भूलना। समझा किन-किन बातों में बैलेन्स रखना है? इस बैलेन्स द्वारा स्वत: ही ब्लैसिंग मिलती रहती है। तो समझा नम्बर क्यों बनते हैं? कोई किस बात के बैलेन्स में, कोई किस बात के बैलेन्स में अलबेले बन जाते हैं।

बाम्बे निवासी तो अलबेले नहीं हो ना? हर बात में बैलेन्स रखने वाले हो ना? बैलेन्स की कला में होशियार हो ना। बैलेन्स भी एक कला है। इस कला में सम्पन्न हो ना! बाम्बे को कहा ही जाता है - सम्पत्ति सम्पन्न देश। तो बैलेन्स की सम्पत्ति, ब्लैसिंग की सम्पत्ति में भी सम्पन्न हो ना! नरदेसावर की ब्लैसिंग है! बाम्बे वाले क्या विशेषता दिखायेंगे? बाम्बे में मल्टीमिल्युनियर्स बहुत हैं ना। तो बाम्बे वालों को ऐसी आत्माओं को यह अनुभव कराना आवश्यक है कि रूहानी अविनाशी पद्मापद्म पति सर्व खजानों की खानों के मालिक क्या होता है, यह उन्हों को अनुभव कराओ। यह तो सिर्फ विनाशी धन के मालिक हैं, ऐसे लोगों को इस अविनाशी खजाने का महत्व सुनाकर अविनाशी सम्पत्ति सम्पन्न बनाओ। वो महसूस करें कि यह खजाना अविनाशी श्रेष्ठ खजाना है। ऐसी सेवा कर रहे हो ना! सम्पति वालों की नज़र में यह अविनाशी सम्पत्तिवान आत्मायें श्रेष्ठ हैं, ऐसा अनुभव करें। समझा। ऐसे नहीं सोचना कि इन्हों का पार्ट तो है ही नहीं। अन्त में इन्हों के भी जागने का पार्ट है। सम्बन्ध में नहीं आयेंगे, लेकिन सम्पर्क में आयेंगे इसलिए अब ऐसी आत्माओं को भी जगाने का समय पहुँच गया है। तो जगाओ खूब अच्छी तरह से जगाओ क्योंकि सम्पत्ति के नशे की नींद में सोये हुए हैं। नशे वालों को बार-बार जगाना पड़ता है। एक बार से नहीं जागते। तो अब ऐसे नशे में सोने वाली आत्माओं को अविनाशी सम्पत्ति के अनुभवों से परिचित कराओ। समझा। बाम्बे वाले तो मायाजीत हो ना! माया को समुद्र में डाल दिया ना। तले में डाला है या ऊपर-ऊपर से? अगर ऊपर कोई चीज़ होती है तो फिर लहरों से किनारे आ जाती, तले में डाल दिया तो स्वाहा। तो माया फिर किनारे तो नहीं आ जाती है ना? बाम्बे निवासियों को हर बात में एक्जैम्पुल बनना है। हर विशेषता में एक्जैम्पुल। जैसे बाम्बे की सुन्दरता देखने के लिए सभी दूर-दूर से भी आते हैं ना! ऐसे दूर-दूर से देखने आयेंगे। हर गुण के प्रैक्टिकल स्वरूप एक्जैम्पल बनो। सरलता जीवन में देखनी हो तो इस सेन्टर में जाकर इस परिवार को देखो। सहनशीलता देखनी हो तो इस सेन्टर में इस परिवार में जाकर देखो। बैलेन्स देखना हो तो इन विशेष आत्माओं में देखो। ऐसी कमाल करने वाले हो ना। बाम्बे वालों को डबल रिटर्न करना है। एक जगत अम्बा माँ की पालना का और दूसरा ब्रह्मा बाप की विशेष पालना का। जगत अम्बा माँ की पालना भी बाम्बे वालों को विशेष मिली है। तो बाम्बे को इतना रिटर्न करना पड़ेगा ना। हर एक स्थान, हरेक विशेष आत्मा द्वारा बाप की, माँ की विशेष आत्माओं की विशेषता दिखाई दे - इसको कहा जाता है रिटर्न करना। अच्छा - भले पधारे। बाप के घर में वा अपने घर में भले पधारे।

बाप तो सदा बच्चों को देख हर्षित होते हैं। एक-एक बच्चा विश्व का दीपक है। सिर्फ कुल का दीपक नहीं, विश्व का दीपक है। हरेक विश्व के कल्याण अर्थ निमित्त बने हुए हैं तो विश्व के दीपक हो गये ना। वैसे तो सारा विश्व भी बेहद का कुल है। उसी नाते से बेहद के कुल के दीपक भी कह सकते हैं। लेकिन हद के कुल के नहीं। बेहद के कुल के दीपक कहो वा विश्व के दीपक कहो। ऐसे हो ना। सदा जगे हुए दीपक हो ना? टिमटिमाने वाले तो नहीं! जब लाइट टिमटिमाती है तो देखने से ऑखें खराब हो जाती हैं। अच्छा नहीं लगता है ना। तो सदा जगे हुए दीपक हो ना। ऐसे दीपकों को देख बापदादा सदा हर्षित होते हैं। समझा। अच्छा!

सदा हर कर्म में बैलेन्स रखने वाले, सदा बाप द्वारा ब्लैसिंग लेने वाले, हर कदम में उड़ती कला का अनुभव करने वाले, सदा प्यार के सागर में समाये हुए, समान स्थिति में स्थित रहने वाले, पद्मापद्म भाग्यवान श्रेष्ठ आत्माओं को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।

दादियों से:- सभी ताजधारी रत्न हो ना! सदा जितना बड़ा ताज उतना ही हल्के से हल्के। ऐसा ताज धारण किया है, इस ताज को धारण करके हर कर्म करते हुए भी ताजधारी रह सकते हैं। जो रत्न जड़ित ताज होगा वह फिर भी समय प्रमाण धारण करते और उतारते हैं लेकिन यह ताज ऐसा है जो उतारने की आवश्यकता ही नहीं। सोते हुए भी ताजधारी और उठते हैं तो भी ताजधारी। अनुभव है ना! ताज हल्का है ना? कोई भारी तो नहीं है! नाम बड़ा, वज़न हल्का है। सुखदाई ताज है। खुशी देने वाला ताज है। ऐसा ताजधारी बाप बनाते हैं जो जन्म-जन्म ताज मिलता रहे। ऐसे ताजधारी बच्चों को देख बापदादा हर्षित होते हैं। बापदादा ने ताजपोशी का दिन अभी से ही मना करके सदा की रसम का नियम बना दिया है। सतयुग में भी ताजपोशी दिवस मनाया जायेगा। जो संगम पर ताजपोशी दिवस मनाया, उसी का ही यादगार अविनाशी चलता रहेगा। अव्यक्त वतन में सेवाधारी है लेकिन साकार वतन से वानप्रस्थ हुए ना। स्वयं बाप साकार वतन से वानप्रस्थ हो बच्चों को ताज तख्त दे और स्वयं अव्यक्त वतन में चले। तो ताजपोशी का दिन हो गया ना! विचित्र ड्रामा है ना। अगर जाने के पहले बताते तो वन्डरफुल ड्रामा नहीं होता। ऐसा विचित्र ड्रामा है, जिसका चित्र नहीं खींचा जा सकता। विचित्र बाप का विचित्र पार्ट है, जिसका चित्र बुद्धि में संकल्प द्वारा भी नहीं खींच सकते, इसको कहते हैं विचित्र इसलिए विचित्र ताजपोशी हुई। बापदादा सदा महावीर बच्चों को ताजपोशी करने वाले ताजधारी स्वरूप में देखते हैं। बापदादा साथ देने में नहीं छिपे लेकिन साकार दुनिया से छिपकर अव्यक्त दुनिया में उदय हो गये। साथ रहेंगे, साथ चलेंगे यह तो वायदा है ही। यह वायदा कभी छूट नहीं सकता इसलिए तो ब्रह्मा बाप इन्तजार कर रहे हैं। नहीं तो कर्मातीत बन गये तो जा सकते हैं। बन्धन तो नहीं है ना। लेकिन स्नेह का बन्धन है। स्नेह के बन्धन के कारण साथ चलने का वायदा निभाने के कारण बाप को इन्तजार करना ही है। साथ निभाना है और साथ चलना है। ऐसे ही अनुभव है ना। अच्छा हरेक विशेष है। विशेषता एक-एक की वर्णन करें तो कितनी होगी। माला बन जायेगी इसलिए दिल में ही रखते हैं, वर्णन नहीं करते। अच्छा!

वरदान:-

व्यर्थ वा डिस्टर्व करने वाले बोल से मुक्त डबल लाइट अव्यक्त फरिश्ता भव

अव्यक्त फरिश्ता बनना है तो व्यर्थ बोल जो किसी को भी अच्छे नहीं लगते हैं उन्हें सदा के लिए समाप्त करो। बात होती है दो शब्दों की लेकिन उसे लम्बा करके बोलते रहना, यह भी व्यर्थ है। जो चार शब्दों में काम हो सकता है वो 12-15 शब्दों में नहीं बोलो। कम बोलो-धीरे बोलो....यह स्लोगन गले में डालकर रखो। व्यर्थ वा डिस्टर्ब करने वाले बोल से मुक्त बनो तो अव्यक्त फरिश्ता बनने में बहुत मदद मिलेगी।

स्लोगन:-

जो स्वयं को परमात्म प्यार के पीछे कुर्बान करते हैं, सफलता उनके गले की माला बन जाती है।