19-08-18 प्रात:मुरली ओम् शान्ति ''अव्यक्त-बापदादा'' रिवाइज: 29-12-83 मधुबन


संगमयुग - सहज प्राप्ति का युग

आज रहमदिल, दिलवाला बाप अपने बड़ी दिल रखने वाले दिल खुश बच्चों से मिलने आये हैं। जैसे बापदादा सदा बड़ी दिल वाले बेहद की दिल वाले हैं, इसलिए सर्व की दिल लेने वाले दिलाराम हैं। ऐसे बच्चे भी बेहद की दिल, फ्राकदिल, दातापन की दिल रखने वाले सदा दिल खुश से जहान को खुश करते हैं। ऐसे खुशनसीब आत्मायें हो। आप श्रेष्ठ आत्माएं ही जहान के आधार हो। आप सभी जगते, जागती ज्योत बनते तो जहान वाले भी जगते। आप सोते हैं तो जहान सोता है। आप सबकी चढ़ती कला होती तो सर्व आत्माओं का कल्याण हो जाता। सर्व यथा-शक्ति समय प्रमाण मुक्ति और जीवन-मुक्ति को प्राप्त होते हैं। आप विश्व पर राज्य करते हो तो सर्व आत्माएं मुक्ति की स्थिति में रहती हैं। तीनों लोकों में आपके राज्य के समय दु:ख अशान्ति का नाम निशान नहीं। ऐसी सर्व आत्माओं को बाप द्वारा सुख-शान्ति की अंचली दिलाते हो जो उसी अंचली द्वारा बहुत समय की मुक्ति की आशा सर्व की पूर्ण हो जाती है। ऐसे सर्व आत्माओं को, विश्व को यथाशक्ति प्राप्ति कराने वाले स्व प्राप्ति स्वरूप हो ना! क्योंकि डायरेक्ट सर्व प्राप्तियों के दाता, सर्व शक्तियों के विधाता सेकण्ड में सर्व अधिकार देने वाले वरदाता, श्रेष्ठ भाग्य-विधाता, अविनाशी बाप के बच्चे बने। ऐसी अधिकारी आत्माओं को सदा अधिकार को याद करते रूहानी श्रेष्ठ नशा और सदा की खुशी रहती है? बेहद की दिल वाले किसी हद के प्राप्ति की तरफ दिल आकर्षित तो नहीं होती? सदा सहज प्राप्ति के अनुभवी मूर्त बने हो वा ज्यादा मेहनत करने के बाद थोड़ा-सा फल प्राप्त करते हो? वर्तमान समय सीजन है प्रत्यक्ष फल खाने की। एक शक्तिशाली संकल्प वा कर्म किया और एक बीज द्वारा पदमगुणा फल पाया। तो सीज़न का फल अर्थात् सहज फल की प्राप्ति करते हो? फल अनुभव होता है वा फल निकलने के पहले माया रूपी पंछी फल को खत्म तो नहीं कर देते हैं? तो इतना अटेन्शन रहता है वा मेहनत करते, योग लगाते, पढ़ाई भी पढ़ते, यथाशक्ति सेवा भी करते फिर भी जैसा प्राप्त होना चाहिए वैसा नहीं होता। होना सदा चाहिए क्योंकि एक का पदमगुणा है तो अनगिनत फल की प्राप्ति हुई ना। फिर भी सदा नहीं रहता। जितना चाहिए उतना नहीं रहता। उसका कारण? संकल्प, कर्म रूपी बीज शक्तिशाली नहीं। वातावरण रूपी धरनी शक्तिशाली नहीं वा धरनी और बीज ठीक है, फल भी निकलता है लेकिन "मैंने किया", इस हद के संकल्प द्वारा कच्चा फल खा लेते वा माया की भिन्न-भिन्न समस्याएं, वातावरण, संगदोष, परमत वा मनमत, व्यर्थ संकल्प रूपी पंछी फल को समाप्त कर देते हैं, इसलिए फल अर्थात् प्राप्तियों से अनुभूतियों के खजाने से वचिंत रह जाते। ऐसी वंचित आत्माओं के बोल यही होते कि पता नहीं क्यों! ऐसे व्यर्थ मेहनत करने वाले तो नहीं हो ना! सहज योगी हो ना? सहज प्राप्ति की सीज़न पर मेहनत क्यों करते हो! वर्सा है, वरदान है, सीज़न है, बड़ी दिल वाला दाता है। फ्राकदिल भाग्य विधाता है फिर भी मेहनत क्यों? सदा दिलतख्तनशीन बच्चों को मेहनत हो नहीं सकती। संकल्प किया और सफलता मिली। विधि का स्विच आन किया और सिद्धि प्राप्त हुई। ऐसे सिद्धि स्वरूप हो ना वा मेहनत कर करके थक जाते हो? मेहनत करने का कारण है - अलबेलापन और आलस्य। स्मृति स्वरूप के किले के अन्दर नहीं रहते हो वा किले में रहते हुए कोई न कोई शक्ति की कमजोरी के दरवाजे वा खिड़की खोल देते हो इसलिए माया को चांस दे देते हो। चेक करो कि कौन-सी शक्ति की कमी है अर्थात् कौन-सा रास्ता खुला हुआ है? संकल्प में भी दृढ़ता नहीं है तो समझो थोड़ा सा रास्ता खुला हुआ हैइसलिए कहते हो चल तो ठीक रहे हैं, नियम तो सब पालन कर रहे हैं, श्रीमत पर चल रहे हैं लेकिन नम्बरवन खुशी और दृढ़ता से नहीं। नियम पर चलना ही पड़ेगा, ब्राह्मण परिवार की लोकलाज के वश, क्या कहेंगे, क्या समझेंगे... इस मजबूरी वा भय से नियम तो नहीं पालन करते? दृढ़ता की निशानी है सफलता। जहाँ दृढ़ता हैं वहाँ सफलता न हो, यह हो नहीं सकता। जो संकल्प में भी नहीं होगा वह प्राप्ति होगी अर्थात् संकल्प से प्राप्ति ज्यादा होगी। तो वर्तमान समय सहज सर्व प्राप्ति का युग है इसलिए सदा सहज योगी भव के अधिकारी और वरदानी बनो। समझा। मास्टर सर्वशक्तिवान बन करके भी मेहनत की तो मास्टर बन के क्या किया! मेहनत से छुड़ाने वाला, मुश्किल को सहज करने वाला बाप मिला फिर भी मेहनत! बोझ उठाते हो इसलिए मेहनत करते। बोझ छोड़ो, हल्के बनो तो फरिश्ता बन उड़ते रहेंगे। अच्छा!

ऐसे सदा दिल खुश, सदा सहज फल की प्राप्ति स्वरूप, सदा वरदाता द्वारा सफलता को पाने वाले वरदानी, वारिस बच्चों को दिलाराम बाप का याद-प्यार और नमस्ते।

पार्टियों से

पंजाब ज़ोन:- सभी स्वदर्शन चक्रधारी हो? स्वदर्शन चक्र चलता रहता है? जहाँ स्वदर्शन चक्र है वहाँ सर्व विघ्नों से मुक्त हैं क्योंकि स्वदर्शन चक्र माया के विघ्नों को समाप्त करने के लिए हैं। जहाँ स्वदर्शन चक्र है वहाँ माया नहीं। बाप के बच्चे बने और स्व का दर्शन हुआ। बाप का बच्चा बनना अर्थात् स्वदर्शन चक्रधारी बनना। ऐसे स्वदर्शन चक्रधारी ही विश्व कल्याणकारी हैं क्योंकि विघ्न-विनाशक हैं। विघ्न-विनाशक गणेश को कहते हैं। गणेश की कितनी पूजा होती है। कितना प्यार से पूजा करते हैं, कितना सजाते हैं, कितना खर्चा करते हैं, ऐसे विघ्न-विनाशक हैं, यह संकल्प ही विघ्न को समाप्त कर देता है क्योंकि संकल्प ही स्वरूप बनाता है। विघ्न हैं, विघ्न हैं कहने से विघ्न स्वरूप बन जाते, कमजोर संकल्प से कमजोर सृष्टि की रचना हो जाती है क्योंकि एक संकल्प कमजोर है तो उसके पीछे अनेक कमजोर संकल्प पैदा हो जाते हैं। एक क्यों और क्या का संकल्प अनेक क्यों, क्या में ले आता है। समर्थ संकल्प उत्पन्न हुआ - मैं महावीर हूँ, मैं श्रेष्ठ आत्मा हूँ, तो सृष्टि भी श्रेष्ठ होती है। तो जैसा संकल्प वैसी सृष्टि। यह सारी संकल्प की बाजी है। अगर खुशी का संकल्प रचो तो उसी समय खुशी का वातावरण अनुभव होगा। दु:ख का संकल्प रचो तो खुशी के वातावरण में भी दु:ख का वातावरण लगेगा। खुशी का अनुभव नहीं होगा। तो वातावरण बनाना, सृष्टि रचना अपने हाथ में है, दृढ़ संकल्प रचो तो विघ्न छू मंत्र हो जायेंगे। अगर सोचते पता नहीं होगा या नहीं होगा तो मंत्र काम नहीं करता। जैसे कोई डाक्टर के पास जाते हैं तो डाक्टर भी पहले यही पूछते हैं कि तुम्हारा मेरे में फेथ है। कितनी भी बढ़िया दवाई हो लेकिन अगर फेथ नहीं तो उस दवाई का असर नहीं हो सकता। वह विनाशी बात है, यहाँ है अविनाशी बात। तो सदा विघ्न-विनाशक आत्मायें हैं, पूज्य आत्मायें हैं, आपकी अभी भी किस रूप में पूजा हो रही है? यह लास्ट का विकारी जन्म होने के कारण इस रूप का यादगार नहीं रखते हैं लेकिन किस न किस रूप में आपका यादगार है। तो सदा अपने को मास्टर सर्वशक्तिवान, विघ्न-विनाशक शिव के बच्चे गणेश समझकर चलो। अपना ही संकल्प रचते हो कि "पता नहीं, पता नहीं", तो इस कमजोर संकल्प के कारण ही फंस जाते हो। तो सदा खुशी में झूलने वाले सर्व के विघ्न हर्ता बनो। सर्व की मुश्किल को सहज करने वाले बनो। इसके लिए बस सिर्फ दृढ़ संकल्प और डबल लाइट। मेरा कुछ नहीं, सब कुछ बाप का है। जब बोझ अपने ऊपर रखते हो तब सब प्रकार के विघ्न आते हैं। मेरा नहीं तो निर्विघ्न। मेरा है तो विघ्नों का जाल है। तो जाल को खत्म करने वाले विघ्न-विनाशक। बाप का भी यही कार्य है। जो बाप का कार्य वह बच्चों का कार्य। कोई भी कार्य खुशी से करते हो तो उस समय विघ्न नहीं होता। तो खुशी-खुशी कार्य में बिज़ी रहो। बिज़ी रहेंगे तो माया नहीं आयेगी। अच्छा-

2- सदा सफलता के चमकते हुए सितारे हैं, यह स्मृति रहती है? आज भी इस आकाश के सितारों को सब कितना प्यार से देखते हैं क्योंकि रोशनी देते हैं, चमकते हैं इसलिए प्यारे लगते हैं। तो आप भी चमकते हुए सितारे सफलता के हो। सफलता को सभी पसन्द करते हैं, कोई प्रार्थना भी करते हैं तो कहते यह कार्य सफल हो। सफलता सब मांगते हैं और आप स्वयं सफलता के सितारे बन गये। आपके जड़ चित्र भी सफलता का वरदान अभी तक देते हैं, तो कितने महान हो, कितने ऊंच हो, इसी नशे और निश्चय में रहो। सफलता के पीछे भागने वाले नहीं लेकिन मास्टर सर्वशक्तिवान अर्थात् सफलता स्वरूप। सफलता आपके पीछे-पीछे स्वत: आयेगी।

3- सदा अपने को बाप के साथ रहने वाले सदा का सहयोग लेने वाली आत्मायें समझते हो? सदा साथ का अनुभव करते हो? जहाँ सदा बाप का साथ है वहाँ सहज सर्व प्राप्ति हैं। अगर बाप का साथ नहीं तो सर्व प्राप्ति भी नहीं क्योंकि बाप है सर्व प्राप्तियों का दाता। जहाँ दाता साथ है वहाँ प्राप्तियाँ भी साथ होंगी। सदा बाप का साथ अर्थात् सर्व प्राप्तियों के अधिकारी। सर्व प्राप्ति स्वरूप आत्मायें अर्थात् भरपूर आत्मायें सदा अचल रहेंगी। भरपूर नहीं तो हिलते रहेंगे। सम्पन्न अर्थात् अचल। जब बाप साथ दे रहा है तो लेने वालों को लेना चाहिए ना। दाता दे रहा है तो पूरा लेना चाहिए थोड़ा नहीं। भक्त थोड़ा लेकर खुश हो जाते लेकिन ज्ञानी अर्थात् पूरा लेने वाले।

जर्मन ग्रुप से:- सदा अपने को बाप के समीप रत्न समझते हो? जितना दूर रहते, देश से दूर भले हो लेकिन दिल से नजदीक हो। ऐसे अनुभव होता है ना? जो सदा याद में रहते हैं, याद समीप अनुभव कराती है। सहज योगी हो ना। जब बाबा कहा तो "बाबा" शब्द ही सहज योगी बना देता है। बाबा शब्द जादू का शब्द है। जादू की चीज़ बिना मेहनत के प्राप्ति कराती है। आप सभी को जो भी चाहिए सुख चाहिए, शान्ति चाहिए, शक्ति चाहिए जो भी चाहिए " बाबा" शब्द कहेंगे तो सब मिल जायेगा। ऐसा अनुभव है। बापदादा भी बिछुड़े हुए बच्चे जो फिर से आकर मिले हैं, ऐसे बच्चों को देख खुश होते हैं। ज्यादा खुशी किसको? आपको है या बाप को? बापदादा सदा हर बच्चे की विशेषता सिमरण करते हैं। कितने लकी हो। अनुभव करते हो कि बाप हमको याद करते हैं? सभी अपनी-अपनी विशेषता में विशेष आत्मा हो। यह विशेषता तो सभी की है जो दूर देश में होते, दूसरे धर्म में जाकर फिर भी बाप को पहचान लिया। तो इस विशेष संस्कार से विशेष आत्मा हो गये। अच्छा - ओम् शान्ति।

वरदान:-

सेवा के क्षेत्र में स्व-सेवा और सर्व की सेवा का बैलेन्स रखने वाले मायाजीत भव

सर्व की सेवा के साथ-साथ पहले स्व सेवा आवश्यक है। यह बैलेन्स सदा स्व में और सेवा में उन्नति को प्राप्त कराता है इसलिए सेवा के क्षेत्र में भाग-दौड़ करते दोनों बातों का बैलेन्स रखो तो मायाजीत बन जायेंगे। बैलेन्स रखने से कमाल होती है। नहीं तो सेवा में बाह्यमुखता के कारण कमाल के बजाए अपने वा दूसरों के भाव-स्वभाव की धमाल में आ जाते हो। सेवा की भाग-दौड़ में माया बुद्धि की भाग दौड़ करा देती है।

स्लोगन:-

अपनी विशेषताओं के बीज को सर्वशक्तियों के जल से सींच कर उन्हें फलदायक बनाओ।