24-06-2022     प्रात:मुरली  ओम् शान्ति 15.12.63 "बापदादा"    मधुबन


(मम्मा के पुण्य स्मृति दिवस पर प्रात:क्लास में सुनाने के लिए मातेश्वरी जी के मधुर महावाक्य)

'कर्म ही सुख और दु:ख का कारण हैं"

 


यह तो सभी मनुष्य जानते हैं कि जीवन में दु:ख और सुख कर्म के आधार से प्रालब्ध रूप में चलते हैं। जरूर पहले ऐसे कर्म किये हैं जिसकी प्रालब्ध दु:ख या सुख के रूप में भोगनी होती है। तो सुख और दु:ख का सम्बन्ध हो गया है कर्म से। कर्म को किस्मत नहीं कहेंगे। कई ऐसे समझते हैं कि जो किस्मत में होगा इसीलिये दु:ख और सुख को किस्मत समझ लेते हैं, यह तो ऐसे हुआ जैसे यह किस्मत कोई भगवान ने बनाई है या किसी और ने बनाई है इसलिए कह देते हैं कि जो किस्मत में होगा लेकिन यह समझना भी बहुत जरूरी है कि किस्मत भी किसने बनाई? किस्मत कोई परमात्मा ने नहीं बनाई हैं। ऐसे भी नहीं किस्मत कोई पहले से ही बनी पड़ी है। नहीं। यह दु:ख व सुख जो मनुष्य भोगता है, उस दु:ख सुख को बनाने वाला भी मनुष्य ही है क्योंकि कर्म करने वाला मनुष्य है, इसलिए यह रेसपान्सिब्लिटी अपनी हो गई। जो करनी सो भरनी, यह तो कॉमन कहावत है और जो करेगा सो पायेगा। गीता में भी वर्णन है कि जीवात्मा अपना ही मित्र है और अपना ही शत्रु है। ऐसे नहीं कहा कि मैं तुम्हारा शत्रु हूँ, मैं तुम्हारा मित्र हूँ। नहीं। जीवात्मा अपना शत्रु और अपना मित्र है, इसलिये अपने साथ मित्रता और अपने साथ शत्रुता, दु:ख और सुख करने वाला खुद मनुष्य हुआ। तो यह बात इतनी स्पष्ट है कि दु:ख सुख का रेसपान्सिबुल मनुष्य खुद अपने आप है इसलिए जब किसी भी रूप में दु:ख आता है तो उसको भगाने की कोशिश करते हैं। कोई लड़ाई-झगड़ा खड़ा हो जाता है तो उसको खत्म करने की कोशिश करते हैं, इसमें किसी-किसी का अकाले मृत्यु भी हो जाता है तो भी दु:ख होता है। तो समझते हैं कि पता नहीं मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ? फिर उसी वेग में (जोश में) आकर भगवान को भी गाली देने लग पड़ते हैं। अभी तुम्हारे आगे यह जो बातें आई, यह किया किसने? यह अकाले मृत्यु जो आया, यह जो रोग के रूप में दु:ख आया, क्या यह भगवान ने किया? यह जो लड़ाई-झगड़े संसार के जितने भी दु:ख के कारण हैं, क्या वह सब भगवान ने किये? अरे! भगवान जिसको कहते हो दु:ख हर्ता, सुख कर्ता, इसलिए तो जब कोई भी दु:ख आता है तो उनको याद करते हो। शरीर को रोग लगता है तो भी कहते हो हे भगवान! दु:ख में उनको ही याद करते हो, अगर उसी ने दिया है तो जो दु:ख देने वाला है उसको क्या करना चाहिए? बताओ। भला यह भी तो सोचना चाहिए कि दु:ख के समय जो याद आता है, उनके लिये तो कह भी नहीं सकते कि यह दु:ख उसने दिया। यह भी तो समझने की बात है। जब याद करते हैं तो जरूर उनका सम्बन्ध हमारे साथ कोई दूसरी बात का है, ना कि दु:ख देने का है। इससे सिद्ध होता है कि दु:ख का कारण अथवा इसका रेसपान्सिबुल कोई और है! उसमें भी कोई तीसरा तो है नहीं। एक मैं और दूसरा मेरा रचता, बस। दो ही चीज़ें हैं ना। एक मैं उनकी रचना या उनकी सन्तान कहो और दूसरा है बाप। तो या बाप रेस्पान्सिबुल है या मैं रेसपान्सिबुल हूँ! लेकिन जब मेरे पास दु:ख आता है तो मुझे दिखाई ऐसे पड़ता है, जैसे उस रचता ने ही मुझे दु:ख दिया है। अन्दर से लगता भी है कि वो तो मेरा सुखदाता है। जैसे सुख के लिये सहारा मांगते हैं कि हे भगवान यह दु:ख दूर करना, भगवान मेरी आयु बड़ी करना। देखो, आयु के लिये भी मांगते हैं। तो आयु की भी, दु:ख की भी, शरीर के रोग की भी और जो भी लड़ाई-झगड़े कोई भी ऐसा अशान्ति का कारण आता है, तो भगवान से मांगते हैं। कोई बच्चा ऐसा होता है तो भी कहते हैं भगवान इसको सुमत देना, तो मत भी उनसे मांगते हैं। किसी भी बात से जब कुछ दु:ख या कष्ट होता है तो कष्ट में याद भी उसे करते हैं और उसकी मांग भी उससे करते हैं। जब उससे ही मांग करते हैं तो जरूर वह उसका दाता है और वही हमको सुख देने वाला है, माना इन सब बातों का इलाज़ केवल उनके पास ही है। ऐसे ही सिर्फ याद नहीं करते हैं, उनके पास इलाज़ है। तो यह सभी हमारी जो हैबिट चलती है, भले जानते हैं या नहीं जानते हैं लेकिन भगवान को दु:ख के समय याद जरूर करते हैं। कोई भी बात होती है तो मुख से निकलता है ओ माई गॉड''। भले कोई जाने न जाने कि वह गॉड कौन है, क्या है, पर मुख से निकलता जरूर है। तो यह भी समझने की बातें है कि आखिर भी हम जिसको याद करते हैं, क्या उनका हमारे इन सभी दु:खों से कोई कनेक्शन है! क्या वह दु:ख का दाता है या उनका कनेक्शन सुख देने से है! यह तो हमारी याद से भी सिद्ध हो जाता है कि उनका कोई दु:ख देने का काम है ही नहीं। अगर देता तो याद क्यों करते? दु:ख देने वाले के लिए तो अन्दर गुस्सा आता है, सोचते हैं कि इसके लिए पता नहीं क्या करें.. परन्तु भगवान के प्रति तो सदा और दु:ख के समय तो खास प्रेम आता है। अन्दर से आता है कि जैसे वह हमारा कोई बड़ा मित्र है। अन्दर वह खुशी आती है। तो जरूर उनका हमारे साथ सुख का सम्बन्ध है। तो दु:ख का कारण जरूर कोई और है! अभी और कोई तीसरा तो है ही नहीं, एक मैं दूसरा वह, तो जरूर मैं रेसपान्सिबुल हुआ।

तो जिस चीज़ के लिये मैं निमित्त हूँ, और मैं ही दु:ख में दु:खी होता हूँ, और पैदा भी मैं अपने से अपने आप करता हूँ तो यह देखो कितनी बेसमझी है। जिस चीज़ से छुटकारा चाहते हैं, वह चीज़ मैं अपने लिये खुद ही बनाता हूँ, आश्चर्य की बात है ना। मनुष्य चाहता नहीं हूँ फिर भी दु:ख बनता जाता है, तो जरूर वह कोई बात से अन्जान है, बेसमझ है। तो जिस बात का पता नहीं लगता है उसका पहले पता निकालना चाहिए ना। जरूर मुझे उसकी कुछ नॉलेज (समझ) होनी चाहिए। तो इसी समझ की पहले खोज़ करनी चाहिए। परन्तु आश्चर्य है कि आज तो ऐसी बात समझने के लिए भी देखो कई बिचारे कितने बहाने देते हैं। कहेंगे फुर्सत नहीं है, समय नहीं है। क्या करें गृहस्थ धन्धा आदि सम्भालें या यह करे, वह करें, क्या करें...इसलिए वह देखते, सम्भालते हुए भी उसमें दु:खी हुए पड़े हैं। अब जबकि मैंने ही मेरा मेरा कहके यह दु:ख का रूप बना दिया, उसको दु:ख के रूप में लाया है तो पहले उसकी खोज़ होनी चाहिए। बनाने के पहले उसकी जानकारी रखनी चाहिए कि यह जो चीज़ बनाकरके मैं दु:खी होता हूँ, उसका कारण क्या है! पहले मुझे यह समझ तो होनी चाहिए कि मैं दु:खी क्यों हूँ! क्या सुख हमारे लिए होता ही नहीं है! इसका भी तो पता निकालना चाहिए।

इसी जानकारी के लिये यहाँ बताया जाता है कि जिन चीज़ों को तुमने मेरी समझा है, यही दु:ख का कारण हैं। दु:ख मिटाने का इलाज़ क्या है, वह भी जीवन के लिए जानना बड़ा आवश्यक है। परन्तु जानते हुए भी कहते हैं क्या करें, कैसे करें, क्या अपना गृहस्थ-व्यवहार छोड़ दें! तो आश्चर्य लगता है कि देखो मनुष्य की बुद्धि, जो समझ मिलते भी उसे धारण नहीं कर पाते। हम अनुभव से उसी बातों को समझ करके और धारण करके बतलाते हैं कि यह अनुभव की चीज़ है। जरूर अनुभव हुआ है तभी तो कहते हैं कि प्रैक्टिकल में किस तरह से सुख की प्राप्ति हो सकती है। जो बहुतकाल की आश रखते आये हो, अभी वह जो सुख दाता है, वह स्वयं हमको अपना यह परिचय दे रहा है कि हे बच्चे, तुम दु:खी हुए क्यों हो? कारण तो तुम्हारा ही है लेकिन तुम्हारे में ऐसी कौनसी बात है जो तुम्हें खुद को पता नहीं चलता है, जिसके कारण दु:ख उठा रहे हो। क्या तुम्हारे कर्म ही दु:ख का कारण बनते जा रहे हैं! वह आकरके समझो देखो, हम इतनी ऑफर करते हैं। तो भी आश्चर्य है देखो, यह सुनते भी बिचारे कहते हैं, शायद बस यही चलना है। इसको ही कहा जाता है अहो मम माया! एकदम माया पकड़कर बैठी है। और चाहते भी जिस चीज़ के लिये सारा दिन माथा-कुटी करते हैं, वही बाप सामने से बतलाते हैं, कि बच्चे तुम्हारे सुख का कारण और दु:ख का कारण क्या है।

बाप खुद कहते हैं मैं तुम्हारे सभी दु:ख हरने और तुमको सुख देने आया हूँ, तब तो गाते हो दु:ख हर्ता, सुख कर्ता। कभी ऐसे नहीं कहते कि आज दु:ख कर्ता सुख हर्ता। नहीं। तो हर दु:ख का वो हर्ता है। बाप कहते हैं बच्चे मैं आया ही हूँ तुम्हारे दु:ख हरने। लेकिन उसके लिए तुम्हें ऐसे कर्म करना सिखाऊंगा जिससे तुम्हारे दु:ख नष्ट हो जायें। सिर्फ मैं जो सिखाता हूँ, समझाता हूँ उसको समझ करके वह पुरुषार्थ करो, जिससे दु:ख नष्ट हो जाएं। तुम्हारे ही दु:ख नष्ट करने की मैं शिक्षा देता हूँ जिसको धारण कर लो क्योंकि तेरी चीज़ है ना। परन्तु कई तो बिचारे ऐसे कारण देते हैं जैसेकि हम कोई भगवान के ऊपर मेहरबानी करते हैं। कई फिर कहते हैं कि समय मिल गया तो कर लेंगे! अरे भाई! खिलाना-पिलाना यह सब जो बातें हैं, उसी कर्म से बनाये हुए खाते में ही तो तुम मूँझ पड़े हो, उसमें ही तो दु:खी हुए हो। जबकि एक तरफ कहते हो दु:ख से छूटें और दूसरे तरफ इन सब दु:खों से छूटने का रास्ता खुद बाप समझा रहे हैं तो भी देखो, कोई की बुद्धि में मुश्किल बैठता है। इसी प्रकार माया इन 5 विकारों को कहा जाता है, परन्तु मनुष्य बिचारे फिर धन सम्पत्ति को माया समझ लेते हैं। कई फिर शरीर को भी माया कह देते हैं। उससे बचने के उपाय करते रहते हैं, परन्तु बाप कहते हैं कि तुम्हारे दु:ख का कारण कुछ और है। यह प्रकृति तो मेरी रचना है, जो अनादि है वो कोई दु:ख का कारण नहीं है। तुम्हारे में एक्स्ट्रा अलग से कोई चीज़ आई है, जो दु:ख का कारण है, उसको ही 5 विकार (माया) कहा जाता है। विकार कोई शरीर नहीं है, संसार विकार नहीं है, धन सम्पत्ति विकार नहीं है। विकार एक अलग चीज़ है, जो आने से फिर यह सभी चीज़ें दु:ख का कारण बन चुकी हैं। नहीं तो यह सब पदार्थ आत्मा के सुख का कारण हैं। उनके लिये यह सम्पत्ति, धन आदि जो हैं, वह सब सुख के कारण हैं। लेकिन इन सभी बातों का पूर्ण ज्ञान न होने के कारण यह सब चीज़ें दु:ख में आ गई हैं। ऐसे भी नहीं है कि मैंने यह जो अनादि रचना रची हुई है, वह कोई दु:ख का कारण है, नहीं। दु:ख के कारण तुम बने हो, तुम्हारे में कोई और अलग चीज़ आई है। वह अलग चीज़ है यह माया 5 विकार, अभी उसी को तुम्हें निकालना है। मनुष्य फिर कह देते हैं यह सब भगवान ने दिया है, अगर भगवान ने दिया तो वह सुख की चीज़ें दी होगी ना। इसमें तुमने विकार डाल करके इन सभी चीज़ों को खराब कर दिया है इसलिये बाप कहते हैं तुम इन विकारों को निकाल दो तो सदा के लिए सुखी हो जायेंगे। यह सारी बातें समझने की हैं। इसके लिए थोड़ा टाइम तो देना होगा। दु:खों को नाश करने की विधि सीखनी होगी। इसके लिए कहते हैं बार-बार आओ, कुछ समझो। परन्तु ऐसे नहीं यहाँ से सुना और बाहर गये फिर बात खत्म। कई फिर कह देते हैं यह तो बड़े या बूढ़ों का काम है। क्या जीवन बनाना, यह बूढ़ों को ही जरूरी है! बूढ़ा तो वह हुआ जो उल्टी सीढ़ी चढ़ जाते हैं फिर देख करके उतरते हैं, उससे तो क्यों नहीं सीढ़ी चढ़ने से पहले ही सम्भल जायें कि हमको जीवन कैसे चलानी चाहिए, इसलिये उन्हों को राय देंगे कि इन बातों को समझ करके अपने जीवन में दु:ख की जो जड़ है, दु:ख का जो कारण है, उसको मिटाने का पूरा पूरा यत्न (पुरुषार्थ) करना चाहिए।

भगवान बाप जो सबका पिता है, उस पर जो हमारा हक है, उसको भी समझना और वह हक लेना है। खाली ऐसे थोड़ेही उनको बाप कहना है लेकिन उनके द्वारा हमें क्या प्राप्ति करनी है, उसको भी तो कोई आ करके सुने और समझे। हम सबको आफर तो करते ही रहेंगे। आगे भी निमंत्रण और सन्देश देते ही रहे हैं। फिर कोटों में कोई जागते हैं। आगे भी ऐसे हुआ है तब तो भगवान ने खुद कहा है कि कोटो में कोई मुझे जानते हैं। तो यहाँ आकरके इस चीज़ को समझके और कुछ धारण करने की बातें करो। एक ही दिन में यह सब बातें समझाने में नहीं आ सकती हैं। अच्छा। मीठे मीठे बच्चों प्रति यादप्यार और नमस्ते।

वरदान:-
अपने पूज्य स्वरूप की स्मृति से सदा रूहानी नशे में रहने वाले जीवनमुक्त भव

ब्राह्मण जीवन का मजा जीवनमुक्त स्थिति में है। जिन्हें अपने पूज्य स्वरूप की सदा स्मृति रहती है उनकी आंख सिवाए बाप के और कहाँ भी डूब नहीं सकती। पूज्य आत्माओं के आगे स्वयं सब व्यक्ति और वैभव झुकते हैं। पूज्य किसी के पीछे आकर्षित नहीं हो सकते। देह, सम्बन्ध, पदार्थ वा संस्कारों में भी उनके मन-बुद्धि का झुकाव नहीं रहता। वे कभी किसी बंधन में बंध नहीं सकते। सदा जीवन-मुक्त स्थिति का अनुभव करते हैं।

स्लोगन:-
सच्चा सेवाधारी वह है जो निमित्त और निर्माण है।