01-03-2019-Hin

“मीठे बच्चे - बाप और बच्चों की एक्टिविटी में जो अन्तर है उसे पहचानो, बाप तुम बच्चों के साथ खेल सकता, खा नहीं सकता''

Q- सत का संग तारे, कुसंग बोरे - इसका भावार्थ क्या है?

A- तुम अभी सत का संग करते हो अर्थात् बाप से बुद्धियोग लगाते हो तो पार हो जाते हो। फिर धीरे-धीरे कुसंग अर्थात् देह के संग में आते हो तो उतरते जाते हो क्योंकि संग का रंग लगता है इसलिए कहा जाता - सत का संग तारे, कुसंग बोरे। तुम देह सहित देह के सब सम्बन्धों को भूल बाप का संग करो अर्थात् बाप को याद करो तो बाप समान पावन बन जायेंगे।

D- 1) एक बाप को साथी बनाकर तुम्हीं से बैठूँ, तुम्हीं से सुनूँ, तुम्हीं से खाऊं.... यह अनुभव करना है। कुसंग छोड़ सत के संग में रहना है।-----2) कर्मों का हिसाब-किताब याद की यात्रा और कर्मभोग से चुक्तू कर सम्पूर्ण पावन बनना है। संगमयुग पर स्वयं को पूरा ट्रांसफर करना है।

V- प्वाइंट स्वरूप में स्थित हो मन बुद्धि को निगेटिव के प्रभाव से सेफ रखने वाले विशेष आत्मा भव-----जैसे कोई सीजन होती है तो सीजन से बचने के लिए उसी प्रमाण अटेन्शन रखा जाता है। बारिश आयेगी तो छाते, रेनकोट आदि का अटेन्शन रखेंगे। सर्दी आयेगी तो गर्म कपड़े रखेंगे....ऐसे वर्तमान समय मन बुद्धि में निगेटिव भाव और भावना पैदा करने का विशेष कार्य माया कर रही है इसलिए विशेष सेफ्टी के साधन अपनाओ। इसका सहज साधन है - एक प्वाइंट स्वरूप में स्थित होना। आश्चर्य और क्वेश्चनमार्क के बजाए बिन्दू लगाना अर्थात् विशेष आत्मा बनना।

S- आज्ञाकारी वह है जो हर संकल्प, बोल और कर्म में जी हजूर करता है।