03-06-2022 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


मीठे बच्चे - यह खेल है कब्रिस्तान और परिस्तान का, इस समय कब्रिस्तान है फिर परिस्तान बनेगा - तुम्हें इस कब्रिस्तान से दिल नहीं लगानी है''

प्रश्नः-
मनुष्य कौन सी एक बात को जान लें तो सब संशय दूर हो जायेंगे?

उत्तर:-
बाप कौन है, वह कैसे आते हैं - यह बात जान लें तो सब संशय दूर हो जायेंगे। जब तक बाप को नहीं जाना तब तक संशय मिट नहीं सकते। निश्चयबुद्धि बनने से विजय माला में आ जायेंगे लेकिन एक-एक बात में सेकण्ड में पूरा निश्चय होना चाहिए।

गीत:-
छोड़ भी दे आकाश सिंहासन...

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) और सब संग तोड़ मात-पिता को पूरा-पूरा फालो करना है। इस पुरानी दुनिया से बेहद का वैराग्य रख इसे भूल जाना है।

2) यह अन्त का समय है, सब खत्म होने के पहले अपने पास जो कुछ है, उसे इनश्योर कर भविष्य में फुल बादशाही का अधिकार लेना है।

वरदान:-
ब्राह्मण जीवन में सदा खुशी की खुराक खाने और खिलाने वाले श्रेष्ठ नसीबवान भव

विश्व के मालिक के हम बालक सो मालिक हैं - इसी ईश्वरीय नशे और खुशी में रहो। वाह मेरा श्रेष्ठ भाग्य अर्थात् नसीब। इसी खुशी के झूले में सदा झूलते रहो। सदा खुशनसीब भी हो और सदा खुशी की खुराक खाते और खिलाते भी हो। औरों को भी खुशी का महादान दे खुशनसीब बनाते हो। आपकी जीवन ही खुशी है। खुश रहना ही जीना है। यही ब्राह्मण जीवन का श्रेष्ठ वरदान है।

स्लोगन:-
हर परिस्थिति में सहनशील बनो तो मौज का अनुभव करते रहेंगे।

मातेश्वरी जी के अनमोल महावाक्य

1- यह अपना ईश्वरीय ज्ञान अपनी बुद्धि से नहीं निकाला हुआ है, न कोई अपनी समझ अथवा कल्पना है अथवा संकल्प है परन्तु यह ज्ञान सारी सृष्टि का जो रचता है उस द्वारा सुना हुआ ज्ञान है। और साथ-साथ सुनकर अनुभव और विवेक में जो लाया जाता है वो प्रैक्टिकल आपको सुना रहे हैं। अगर अपने विवेक की बात होती तो सिर्फ अपने पास चलती परन्तु यह तो परमात्मा द्वारा सुन विवेक से अनुभव में धारणा करते हैं। जो बात धारण करते हैं वो जरूर जब विवेक और अनुभव में आती है तब अपनी मानी जाती है। यह बात भी इन द्वारा हम जान चुके हैं। तो परमात्मा की रचना क्या है? परमात्मा क्या है? बाकी कोई अपने संकल्प की बात नहीं है अगर होती तो अपने मन में उत्पन्न होती, यह अपना संकल्प है इसलिए जो अपने को स्वयं परमात्मा द्वारा मुख्य धारणा योग्य प्वाइन्ट मिली हुई हैं वो है मुख्य योग लगाना परन्तु योग के पहले ज्ञान चाहिए। योग करने के लिये पहले ज्ञान क्यों कहते हैं? पहले सोचना, समझना और बाद में योग लगाना.. हमेशा ऐसे कहा जाता है पहले समझ चाहिए, नहीं तो उल्टा कर्म चलेगा इसलिए पहले ज्ञान जरूरी है। ज्ञान एक ऊंची स्टेज है जिसको जानने के लिए बुद्धि चाहिए क्योंकि ऊंचे ते ऊंचा परमात्मा हमको पढ़ाता है।

2) यह ईश्वरीय ज्ञान एक तरफ तोड़ना दूसरे तरफ जोड़ना। एक परमात्मा के संग जोड़ो, जिस शुद्ध सम्बन्ध से हमारे ज्ञान की सीढ़ी आगे बढ़ेगी क्योंकि इसी समय आत्मा कर्मबन्धन वश हो गई है। वह आदि में कर्मबन्धन से रहित थी, बाद में कर्मबन्धन में आई और अब फिर से उनको अपने कर्मबन्धनों से छूटना है। अब अपने कर्मों की बंधायमानी भी न हो और कर्म करना अपने हाथ में रहे माना कर्म पर कन्ट्रोल हो तब ही कर्मों की बंधायमानी नहीं आयेगी, इसको ही जीवनमुक्ति कहते हैं। नहीं तो कर्मबन्धन में, चक्र में आने से सदाकाल के लिये जीवनमुक्ति नहीं मिलेगी। अब तो आत्मा से पॉवर निकल गई है और उनके कन्ट्रोल बिगर कर्म हो रहे हैं लेकिन कर्म आत्मा से होना चाहिए और आत्मा में जोर आना चाहिए और कर्मों को इस स्थिति में आना चाहिए जो कर्मों की बंधायमानी न रहे, नहीं तो मनुष्य दु:ख सुख के लपेट में आ जाते हैं क्योंकि कर्म उन्हों को खींचता रहता है, आत्मा की शक्ति उस पॉवर में आती है, जो कर्मों के बंधायमानी में न आवे, यह है रिजल्ट। इन बातों को धारण करने से सहज हो जायेगा, इस क्लास का मकसद यही है। बाकी अपने को कोई वेद शास्त्र पढ़ डिग्री हांसिल नहीं करनी है, बल्कि इस ईश्वरीय ज्ञान से अपने को अपनी जीवन बनानी है जिस कारण ईश्वर से वो शक्ति लेनी है। अच्छा - ओम् शान्ति।