04-11-2019-Hin

“मीठे बच्चे - सभी को पहले-पहले अल्फ का पाठ पक्का कराओ, आप आत्मा भाई-भाई हैं”

Q- किस एक बात में श्रीमत, मनुष्य मत के बिल्कुल ही विपरीत है?

A- मनुष्य मत कहती है हम मोक्ष में चले जायेंगे। श्रीमत कहती हैं यह ड्रामा अनादि अविनाशी है। मोक्ष किसी को मिल नहीं सकता। भल कोई कहे यह पार्ट बजाना हमको पसन्द नहीं। परन्तु इसमें कुछ भी कर नहीं सकते। पार्ट बजाने आना ही है। श्रीमत ही तुम्हें श्रेष्ठ बनाती है। मनुष्य मत तो अनेक प्रकार की है।

D- 1) बुद्धि में सदा याद रहे कि अभी हम थोड़े समय के लिए संगमयुग में बैठे हैं, पुरानी दुनिया विनाश होगी तो हम नई दुनिया में ट्रान्सफर हो जायेंगे इसलिए इससे बुद्धियोग निकाल देना है।-----2) सभी आत्माओं को बाप का परिचय दे कर्म, अकर्म, विकर्म की गुह्य गति सुनानी है, पहले अल्फ का ही पाठ पक्का कराना है।

V- कर्म और योग के बैलेन्स द्वारा कर्मातीत स्थिति का अनुभव करने वाले कर्मबन्धन मुक्त भव-----कर्म के साथ-साथ योग का बैलेन्स हो तो हर कर्म में स्वत: सफलता प्राप्त होती है। कर्मयोगी आत्मा कभी कर्म के बन्धन में नहीं फंसती। कर्म के बन्धन से मुक्त को ही कर्मातीत कहते हैं। कर्मातीत का अर्थ यह नहीं है कि कर्म से अतीत हो जाओ। कर्म से न्यारे नहीं, कर्म के बन्धन में फंसने से न्यारे बनो। ऐसी कर्मयोगी आत्मा अपने कर्म से अनेकों का कर्म श्रेष्ठ बनाने वाली होगी। उसके लिए हर कार्य मनोरंजन लगेगा, मुश्किल का अनुभव नहीं होगा।

S- परमात्म प्यार ही समय की घण्टी है जो अमृतवेले उठा देती है।