05-02-2020-Hin

“मीठे बच्चे - पास विद् ऑनर होना है तो बुद्धियोग थोड़ा भी कहीं न भटके, एक बाप की याद रहे, देह को याद करने वाले ऊंच पद नहीं पा सकते”

Q- सबसे ऊंची मंजिल कौन-सी है?

A- आत्मा जीते जी मरकर एक बाप की बने और कोई याद न आये, देह-अभिमान बिल्कुल छूट जाये - यही है ऊंची मंजिल। निरन्तर देही-अभिमानी अवस्था बन जाये-यह है बड़ी मंजिल। इसी से कर्मातीत अवस्था को प्राप्त करेंगे।

D- 1. किसी भी देहधारी से लगाव नहीं रखना है। शरीर को याद करना भी भूतों को याद करना है, इसलिए किसी के नाम-रूप में नहीं लटकना है। अपनी देह को भी भूलना है।-----2. भविष्य के लिए अविनाशी कमाई जमा करनी है। सेन्सीबुल बन ज्ञान की प्वाइन्ट्स को बुद्धि में धारण करना है। जो बाप ने समझाया है वह समझकर दूसरों को सुनाना है।

V- सच्चे साफ दिल के आधार से नम्बरवन लेने वाले दिलाराम पसन्द भव-----दिलाराम बाप को सच्ची दिल वाले बच्चे ही पसन्द है। दुनिया का दिमाग न भी हो लेकिन सच्ची साफ दिल हो तो नम्बरवन ले लेंगे क्योंकि दिमाग तो बाप इतना बड़ा दे देता है जिससे रचयिता को जानने से रचना के आदि, मध्य, अन्त की नॉलेज को जान लेते हो। तो सच्ची साफ दिल के आधार से ही नम्बर बनते हैं, सेवा के आधार से नहीं। सच्चे दिल की सेवा का प्रभाव दिल तक पहुंचता है। दिमाग वाले नाम कमाते हैं और दिल वाले दुआयें कमाते हैं।

S- सर्व के प्रति शुभ चिंतन और शुभ कामना रखना ही सच्चा परोपकार है।