05-08-2022 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


मीठे बच्चे - समय बहुत थोड़ा है इसलिए रूहानी धन्धा करो, सबसे अच्छा धंधा है - बाप और वर्से को याद करना, बाकी सब खोटे धन्धे हैं''

प्रश्नः-
तुम बच्चों के अन्दर कौनसी उत्कण्ठा होनी चाहिए?

उत्तर:-
कैसे हम बिगड़ी हुई आत्माओं को सुधारें, सभी को दु:ख से छुड़ाकर 21 जन्मों के लिए सुख का रास्ता बतावें। सबको बाप का सच्चा-सच्चा परिचय दें - यह उत्कण्ठा तुम बच्चों में होनी चाहिए।

गीत:-
भोलेनाथ से निराला...

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) बहुत-बहुत मीठा बनना है। क्रोध का अंश भी निकाल देना है। बाप समान रहमदिल बन सर्विस पर तत्पर रहना है।

2) मौत सामने खड़ा है। वानप्रस्थ अवस्था है इसलिए बाप को और वर्से को याद करना है। भारत को रामराज्य बनाने की सेवा में अपना सब कुछ सफल करना है।

वरदान:-
देह-अभिमान के अंशमात्र की भी बलि चढ़ाने वाले महाबलवान भव

सबसे बड़ी कमजोरी है देह-अभिमान। देह-अभिमान का सूक्ष्म वंश बहुत बड़ा है। देह-अभिमान की बलि चढ़ाना अर्थात् अंश और वंश सहित समर्पित होना। ऐसे बलि चढ़ाने वाले ही महाबलवान बनते हैं। यदि देह अभिमान का कोई भी अंश छिपाकर रख लिया, अभिमान को ही स्वमान समझ लिया तो उसमें अल्पकाल की विजय भल दिखाई देगी लेकिन बहुतकाल की हार समाई हुई है।

स्लोगन:-
इच्छा नहीं थी लेकिन अच्छा लग गया-यह भी जीवनबंध स्थिति है।

मातेश्वरी जी के अनमोल महावाक्य

1- इस अविनाशी ज्ञान को परमात्म ज्ञान कहते हैं, इस ज्ञान का मतलब है जीते जी मर जाना इसलिए कोटों में कोई विरला यह ज्ञान लेने की हिम्मत रखता है। यह तो हम जानते हैं कि यह ज्ञान प्रैक्टिकल जीवन बनाता है, हम जो सुनते हैं वो प्रैक्टिकल में बनते हैं, ऐसा ज्ञान कोई साधू संत महात्मा दे नहीं सकते। वो लोग ऐसे नहीं कहेंगे मनमनाभव, अब यह फरमान सिर्फ परमात्मा ही कर सकता है। मनमनाभव का अर्थ है मेरे साथ योग लगाओ। अगर मेरे साथ योग लगायेंगे तो मैं तुम्हें पापों से मुक्त कर वैकुण्ठ की बादशाही दूँगा। वहाँ तुम चलकर राज्य करेंगे इसलिए इस ज्ञान को राजाओं का राजा कहते हैं। अब यह ज्ञान लेना बहुत महंगा सौदा है, ज्ञान लेना अर्थात् एक ही धक से जीते जी मर जाना। शास्त्रों आदि का ज्ञान लेना तो बिल्कुल सस्ता सौदा है। उसमें तो घड़ी-घड़ी मरना होगा क्योंकि वो परमात्मा का ज्ञान नहीं देते इसलिए बाबा कहते हैं अभी जो करना है वो अब करो फिर यह व्यापार नहीं रहेगा।

2- परमपिता परमात्मा को सत् चित्त आनंद स्वरूप भी कहते हैं, अब परमात्मा सत् क्यों कहते हैं? क्योंकि वह अविनाशी इमार्टल है, वो कब असत् नहीं होता, अजर अमर है और परमात्मा को चैतन्य स्वरूप भी कहते हैं। चैतन्य का अर्थ है परमात्मा भी मन बुद्धि सहित है, उसको नॉलेजफुल पीसफुल कहते हैं। वो ज्ञान और योग सिखला रहे हैं इसलिए परमात्मा को चैतन्य भी कहते हैं, भल वो अजन्मा भी है वो हम आत्माओं मुआफिक जन्म नहीं लेता, परमात्मा को भी यह नॉलेज और शान्ति देने के लिये ब्रह्मा तन का लोन लेना पड़ता है। तो वो जब चैतन्य है तभी तो मुख द्वारा हमें ज्ञान योग सिखला रहे हैं और फिर परमात्मा को सत-चित-आनंद स्वरूप भी कहते हैं, तो यह सब गुण परमात्मा में भरे हुए हैं इसलिए परमात्मा को सुख दु:ख से न्यारा कहते हैं। हम ऐसे नहीं कहेंगे कि परमात्मा कोई दु:ख दाता है, नहीं। वो सदा सुख आनंद का भण्डार है, जब उसके गुण ही सुख आनंद देने वाले हैं तो फिर हम आत्माओं को वह दु:ख कैसे दे सकते हैं!

3- बहुत मनुष्य ऐसे समझ बैठे हैं कि यह जो अनादि बना बनाया सृष्टि ड्रामा चल रहा है वो सारा परमात्मा चला रहा है इसलिए वो कहते हैं कि मनुष्य के कुछ नाहीं हाथ... करनकरावनहार स्वामी... सबकुछ परमात्मा ही करता है। सुख दु:ख दोनों भाग परमात्मा ने ही बनाया है। अब ऐसी बुद्धि वालों को कौनसी बुद्धि कहा जायेगा? पहले-पहले उन्हों को यह समझना जरूर है कि यह अनादि बनी बनाई सृष्टि का खेल ऑटोमेटिक चलता रहता है। साथ-साथ यह भी कहते हैं कि यह सबकुछ परमात्मा ही करता है। यह जो परमात्मा को करनकरावनहार कहते हैं, यह नाम फिर कौनसी हस्ती के ऊपर पड़ा है? अब इन बातों को समझना है। पहले तो यह समझना है कि यह जो सृष्टि का अनादि नियम है वो तो बना बनाया है, जैसे परमात्मा अनादि है, वैसे यह चक्र भी आदि से लेकर अन्त तक अनादि अविनाशी बना बनाया है। जैसे बीज में अण्डरस्टुड वृक्ष का ज्ञान है और वृक्ष में अण्डरस्टुड बीज है, दोनों कम्बाइंड हैं, दोनों अविनाशी हैं, बाकी बीज का क्या काम है, बीज बोना झाड़ निकलना। अगर बीज न बोया जाए तो वृक्ष उत्पन्न नहीं होता। तो परमात्मा भी स्वयं इस सारी सृष्टि का बीजरूप है और परमात्मा का पार्ट है बीज बोना। परमात्मा ही कहता है मैं परमात्मा हूँ ही तब जब बीज बोता हूँ, नहीं तो बीज और वृक्ष अनादि है, अगर बीज नहीं बोया जाए तो वृक्ष कैसे निकलेगा! मेरा नाम परमात्मा ही तब है जब मेरा परम कार्य है, मेरी सृष्टि वही है जो मैं खुद पार्टधारी बन बीज बोता हूँ। सृष्टि की आदि भी करता हूँ और अन्त भी करता हूँ, मैं करनधारी बन बीज बोता हूँ, आदि करता हूँ बीज बोने समय फिर अन्त का भी बीज़ आता है फिर सारा झाड़ बीज की ताकत पकड़ लेता है। बीज का मतलब है रचना करना फिर उनकी अन्त करना। पुरानी सृष्टि की अन्त करना और नई सृष्टि की आदि करना, इसको ही कहते हैं परमात्मा सबकुछ करता है। अच्छा। ओम् शान्ति।