08-09-2021 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


मीठे बच्चे - अपने से बड़ों का रिगॉर्ड रखना यह भी दैवीगुण है, जो होशियार अच्छा समझाने वाले हैं, उनको फॉलो करना है''

प्रश्नः-
सतयुग में कोई भी भक्ति की रसम-रिवाज नहीं होती है - क्यों?

उत्तर:-
क्योंकि ज्ञान का सागर बाप ज्ञान देकर सद्गति में भेज देते हैं। भक्ति का फल मिल जाता है। ज्ञान मिलने से भक्ति का जैसे डायओर्स हो जाता। जब है ही ज्ञान की प्रालब्ध का समय तो भक्ति, तप दान पुण्य करने की जरूरत ही क्या! वहाँ यह कोई भी रसम हो नहीं सकती।

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) जो पढ़ाई में होशियार हैं, अच्छा समझाते हैं - उनका संग करना है, उन्हें रिगॉर्ड देना है। कभी भी अहंकार में नहीं आना है।

2) ज्ञान की नई-नई बातों को अच्छी रीति समझना वा समझाना है। इसी खुशी में रहना है कि हम हैं स्वदर्शन चक्रधारी।

वरदान:-
एक बाप की याद में सदा मगन रह एकरस अवस्था बनाने वाले साक्षी दृष्टा भव

अभी ऐसे पेपर आने हैं जो संकल्प, स्वप्न में भी नहीं होंगे। परन्तु आपकी प्रैक्टिस ऐसी होनी चाहिए जैसे हद का ड्रामा साक्षी होकर देखा जाता है फिर चाहे दर्दनाक हो या हंसी का हो, अन्तर नहीं होता। ऐसे चाहे कोई का रमणीक पार्ट हो, चाहे स्नेही आत्मा का गम्भीर पार्ट हो.....हर पार्ट साक्षी दृष्टा होकर देखो, एकरस अवस्था हो। परन्तु ऐसी अवस्था तब रहेगी जब सदा एक बाप की याद में मगन होंगे।

स्लोगन:-
दृढ़ निश्चय से अपने भाग्य को निश्चित कर दो तो सदा निश्चिंत रहेंगे।