13-03-2019-Hin

“मीठे बच्चे - जितना समय मिले अन्तर्मुखी रहने का पुरूषार्थ करो, बाहरमुखता में न आओ, तब ही पाप कटेंगे''

Q- चढ़ती कला का पुरूषार्थ क्या है जो बाप हर बच्चे को सिखलाते हैं?

A- 1. बच्चे चढ़ती कला में जाना है तो बुद्धियोग एक बाप से लगाओ। फलाना ऐसा है, यह ऐसा करता है, इसमें यह अवगुण हैं - इन बातों में जाने की दरकार नहीं। अवगुण देखने से मुँह मोड़ लो। 2. कभी भी पढ़ाई से रूठना नहीं। मुरली में जो अच्छी-अच्छी प्वाइंट्स हैं, उन्हें धारण करते रहो, तब ही चढ़ती कला हो सकती है।

D- 1) किसी में भी कोई अवगुण दिखाई दे तो अपना मुँह मोड़ लेना है। पढ़ाई से कभी रूठना नहीं है। दत्तात्रेय मिसल सबसे गुण उठाने हैं।-----2) बाहर से बुद्धि निकाल अन्तर्मुखी रहने का अभ्यास करना हैं। धन्धेधोरी में रहते देही-अभिमानी रहना है। बहुत बातचीत में नहीं आना है।

V- सुख स्वरूप बन हर आत्मा को सुख देने वाले मास्टर सुखदाता भव-----जो बच्चे सदा यथार्थ कर्म करते हैं उन्हें उस कर्म का प्रत्यक्षफल खुशी और शक्ति मिलती है। उनका दिल सदा खुश रहता है, उन्हें संकल्प मात्र भी दु:ख की लहर नहीं आ सकती। संगमयुगी ब्राह्मण अर्थात् दु:ख का नाम निशान नहीं क्योंकि सुखदाता के बच्चे हैं। ऐसे सुख-दाता के बच्चे स्वयं भी मास्टर सुखदाता होंगे। वे हर आत्मा को सदा सुख देंगे। वे कभी न दु:ख देंगे न दु:ख लेंगे।

S- मास्टर दाता बन सहयोग, स्नेह और सहानुभूति देना - यही रहमदिल आत्मा की निशानी है।