14.09.2020

''मीठे बच्चे - तुम अभी सच्ची-सच्ची पाठशाला में बैठे हो, यह सतसंग भी है, यहाँ तुम्हें सत बाप का संग मिला है, जो पार लगा देता है''

प्रश्नः-

हिसाब-किताब के खेल में मनुष्यों की समझ और तुम्हारी समझ में कौन सा अन्तर है?

उत्तर:-

मनुष्य समझते हैं - यह जो दु:ख-सुख का खेल चलता है, यह दु:ख-सुख सब परमात्मा ही देते हैं और तुम बच्चे समझते हो कि यह हर एक के कर्मों के हिसाब का खेल है। बाप किसी को भी दु:ख नहीं देते। वह तो आते ही हैं सुख का रास्ता बताने। बाबा कहते हैं - बच्चे, मैंने किसी को भी दु:खी नहीं किया है। यह तो तुम्हारे ही कर्मों का फल है।

वरदान:-

बाप समान वरदानी बन हर एक के दिल को आराम देने वाले मास्टर दिलाराम भव

जो बाप समान वरदानी मूर्त बच्चे हैं वह कभी किसी की कमजोरी को नहीं देखते, वह सबके ऊपर रहमदिल होते हैं। जैसे बाप किसी की कमजोरियां दिल पर नहीं रखते ऐसे वरदानी बच्चे भी किसी की कमजोरी दिल में धारण नहीं करते, वे हरेक की दिल को आराम देने वाले मास्टर दिलाराम होते हैं इसलिए साथी हो या प्रजा सभी उनका गुणगान करते हैं। सभी के अन्दर से यही आशीर्वाद निकलती है कि यह हमारे सदा स्नेही, सहयोगी हैं।

स्लोगन:-

संगमयुग पर श्रेष्ठ आत्मा वह है जो सदा बेफिक्र बादशाह है।