18-11-2020     प्रात:मुरली       ओम् शान्ति       "बापदादा"     मधुबन


“मीठे बच्चे - अभी तुम सत्य बाप द्वारा सत्य देवता बन रहे हो, इसलिए सतयुग में सतसंग करने की जरूरत नहीं''

प्रश्नः-
सतयुग में देवताओं से कोई भी विकर्म नहीं हो सकता है, क्यों?

उत्तर:-
क्योंकि उन्हें सत्य बाप का वरदान मिला हुआ है। विकर्म तब होता है जब रावण का श्राप मिलने लगता है। सतयुग-त्रेता में है ही सद्गति, उस समय दुर्गति का नाम नहीं। विकार ही नहीं जो विकर्म हो। द्वापर-कलियुग में सबकी दुर्गति हो जाती इसलिए विकर्म होते रहते हैं। यह भी समझने की बातें हैं।


धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) कर्म, अकर्म और विकर्म की गुह्य गति को बुद्धि में रख अब कोई विकर्म नहीं करने हैं, ज्ञान और योग की धारणा करके दूसरों को सुनाना है।

2) सत्य बाप की सत्य नॉलेज देकर मनुष्यों को देवता बनाने की सेवा करनी है। विकारों के दलदल से सबको निकालना है।

वरदान:-
अपनी पावरफुल स्थिति द्वारा मन्सा सेवा का सर्टीफिकेट प्राप्त करने वाले स्व अभ्यासी भव

विश्व को लाइट और माइट का वरदान देने के लिए अमृतवेले याद के स्व अभ्यास द्वारा पावरफुल वायुमण्डल बनाओ तब मन्सा सेवा का सर्टीफिकेट प्राप्त होगा। लास्ट समय में मन्सा द्वारा ही नज़र से निहाल करने की, अपनी वृत्ति द्वारा उनकी वृत्तियों को बदलने की सेवा करनी है। अपनी श्रेष्ठ स्मृति से सबको समर्थ बनाना है। जब ऐसा लाइट माइट देने का अभ्यास होगा तब निर्विघ्न वायुमण्डल बनेगा और यह किला मजबूत होगा।

स्लोगन:-
समझदार वह है जो मन्सा-वाचा-कर्मणा तीनों सेवायें साथ-साथ करते हैं।