28-08-2026        प्रात:मुरली    ओम् शान्ति     "बापदादा"        मधुबन


“मीठे बच्चे - तुम ड्रामा के गुप्त राज़ को जानते हो कि यह संगमयुग ही चढ़ती कला का युग है, सतयुग से लेकर कलायें कम होती जाती हैं''

प्रश्नः-
सबसे उत्तम सेवा कौन सी है और वह सेवा कौन करता है?

उत्तर:-
भारत को स्वर्ग बनाना, रंक को राव बनाना, पतित को पावन बनाना - यह है सबसे उत्तम सेवा। ऐसी सेवा एक बाप के सिवाए और कोई भी नहीं कर सकता। बाप ने ऐसी महान सेवा की है तब तो बच्चे उनकी इज्जत करते हैं, सबसे पहले सोमनाथ का मन्दिर बनाकर उनकी पूजा करते हैं।

गीत:-
आखिर वह दिन आया आज....

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) रचयिता और रचना का ज्ञान बुद्धि में रख सतोप्रधान बनने का पुरुषार्थ करना है। बस एक ही चिंता रखनी है कि हमें सतोप्रधान जरूर बनना है।

2) इस बेहद के ड्रामा को बुद्धि में रख अपार खुशी में रहना है, बाप समान इज्जत पाने के लिए पतितों को पावन बनाने की सेवा करनी है।

वरदान:-
अधिकारीपन की स्मृति द्वारा सर्व शक्तियों का अनुभव करने वाले प्राप्ति स्वरूप भव

यदि बुद्धि का संबंध सदा एक बाप से लगा हुआ रहे तो सर्व शक्तियों का वर्सा अधिकार के रूप में प्राप्त होता है। जो अधिकारी समझकर हर कर्म करते हैं उन्हें कहने वा संकल्प में भी मांगने की आवश्यकता नहीं रहती। यह अधिकारी पन की स्मृति ही सर्व शक्तियों के प्राप्ति का अनुभव कराती है। तो नशा रहे कि सर्व शक्तियां हमारा जन्म-सिद्ध अधिकार हैं। अधिकारी बन करके चलो तो अधीनता समाप्त हो जायेगी।

स्लोगन:-
स्वयं के साथ-साथ प्रकृति को भी पावन बनाना है तो सम्पूर्ण लगाव मुक्त बनो।

ये अव्यक्त इशारे - अपवित्रता के बीज को भी समाप्त कर सम्पूर्ण स्वच्छ (पवित्र) बनो

अगर पवित्रता का नियम पक्का है तो लगाव मुक्त, ईर्ष्या और क्रोध से भी मुक्त बनो। चिड़चिड़ापन भी न हो। यह भी लगाव नहीं रखो कि यह होना ही चाहिए। स्वार्थ या ईर्ष्या के वश कोई बात कहेंगे और वह पूरी नहीं होगी तो क्रोध पैदा होगा इसलिए पवित्रता के पिल्लर को पक्का करो तो यह पिल्लर लाइट हाउस का काम करेगा।