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 01 / 01 / 21  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *इस डर्टी दुनिया से दिल तो नहीं लगायी ?*

 

➢➢ *अपने एकाग्र स्वरुप द्वारा सूक्षम शक्ति की लीलाओं का अनुभव किया ?*

 

➢➢ *पवित्रता का पूरा पूरा सबूत दिया ?*

 

➢➢ *सर्व प्राप्तियों को स्वयं में धारण किया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *जैसे कोई कमजोर होता है तो उनको शक्ति भरने के लिए ग्लूकोज चढ़ाते हैं, ऐसे जब अपने को शरीर से परे अशरीरी आत्मा समझते हो तो यह साक्षीपन की अवस्था शक्ति भरने का काम करती हैं* और जितना समय साक्षी अवस्था की स्थिति रहती है उतना ही बाप साथी भी याद रहता है अर्थात् साथ रहता है।

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं रूहानी नशे में स्थित रहने वाली श्रेष्ठ आत्मा हूँ"*

 

  सदा रुहानी नशे में स्थित रहते हो? *रुहानी नशा अर्थात् आत्म अभिमानी बनना। सदा चलते-फिरते आत्मा को देखना यही है रुहानी नशा। रुहानी नशे में सदा सर्व प्राप्ति का अनुभव सहज ही होगा।* जैसे स्थूल नशे वाले भी अपने को प्राप्तिवान समझते हैं, वैसे यह रुहानी नशे में रहने वाले सर्व प्राप्ति स्वरुप बन जाते हैं। इस नशे में रहने से सर्व प्रकार के दुख दूर हो जाते हैं।

 

✧  दु:ख और अशान्ति को विदाई हो जाती है। जब सदाकाल के लिए सुखदाता के, शान्तिदाता के बच्चे बन गये तो दुख अशान्ति को विदाई हो गई ना। अशान्ति का नामनिशान भी नहीं। *शान्ति के सागर के बच्चे अशान्त कैसे हो सकते। रुहानी नशा अर्थात् दुख और अशान्ति की समाप्ति।* उसकी विदाई का समारोह मना दिया? क्योंकि दुख अशान्ति की उत्पत्ति होती है अपवित्रता से। जहाँ अपवित्रता नहीं वहाँ दुख अशान्ति कहाँ से आई।

 

  *पतित पावन बाप के बच्चे मास्टर पतित पावन हो गये। जो औरों को पतित से पावन बनाने वाले हैं वह स्वयं भी तो पावन होंगे ना। जो पावन पवित्र आत्मायें हैं उनके पास सुख और शान्ति स्वत: ही है। तो पावन आत्मायें, श्रेष्ठ आत्मायें विशेष आत्मायें हो। विश्व में महान् आत्मायें हों क्योंकि बाप के बन गये। सबसे बड़े ते बड़ी महानता है पावन बनना।* इसलिए आज भी इसी महानता के आगे सिर झुकाते हैं। वह जड़ चित्र किसके हैं? अभी मन्दिर में जायेंगे तो क्या समझेंगे? किसकी पूजा हो रही है? स्मृति में आता है-कि यह हमारे ही जड़ चित्र हैं। ऐसे अपने को महान् आत्मा समझकर चलो। ऐसे दिव्य दर्पण बनो जिसमें अनेक आत्माओंको अपनी असली सूरत दिखाई दे।

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  ऑर्डर करो, जैसे हाथ को ऊपर उठाना चाहो तो उठा लेते हो। क्रेक नहीं है तो उठा लेते हो ना! ऐसे मन, यह सूक्ष्म शक्ति कन्ट्रोल में आनी है। लाना ही है। *ऑर्डर करो - स्टॉप तो स्टॉप हो जाए।*

 

✧  सेवा का सोची, सेवा में लग जाए। परमधाम में चलो, तो परमधाम में चला जाये। सूक्ष्मवतन में चलो, सेकण्ड में चला जाए। जो सोचो वह ऑर्डर में हो। अभी इस शक्ति को बढाओ। *छोटे-छोटे संस्कारों में, युद्ध में समय नहीं गंवाओ,* आज इस संस्कार को भगाया, कल उसको भगाया।

 

✧  *कन्ट्रोलिंग पॉवर धारण करो तो अलग-अलग संस्कार पर टाइम नहीं लगाना पडेगा।* नहीं सोचना है, नहीं करना है, नहीं बोलना है। स्टॉप। तो स्टॉप हो जाए। यह है कर्मातीत अवस्था तक पहुँचने की विधि।

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧  अभी यह धूम मचाओ। *अन्त:वाहक शरीर से चक्र लगाने का अभ्यास करो।* ऐसा समय आयेगा जो प्लेन भी नहीं मिल सकेगा। ऐसा समय नाजुक होगा तो आप लोग पहले पहुँच जायेंगे। अन्त:वाहक शरीर से चक्र लगाने का अभ्यास ज़रूरी है। *ऐसा अभ्यास करो जैसे प्रैक्टिकल में सब देख कर मिलकर आये हैं।* दूसरे भी अनुभव करें - हाँ, यह हमारे पास वही फ़रिश्ता आया था। फिर ढूँढने निकलेंगे फ़रिश्तों को। अगर इतने सब फ़रिश्ते चक्र लगायें तो क्या हो जाये ? अॉटोमेटिकली सबका अटेन्शन जायेगा। *तो अभी साकारी के साथसाथ आकारी सेवा भी ज़रूर चाहिए।* अच्छा - अभी अमृतवेले शरीर से डिटैच हो कर चक्र लगाओ।

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- कामजीत जगतजीत बनना"*

 

_ ➳  *परमधाम की ऊंची स्थिति में स्थित मैं आत्मा...* बाबा के समीप पहुँच जाती हूँ... सुनहरा लाल... तेजोमय प्रकाश छाया है जहाँ... *वह निज धाम हैं मेरा... बिंदुओ का घर...  बिंदुओ का बाप बिन्दुरुप में स्थित है जहाँ...* सर्वत्र शांति ही शांति हैं... निःसंकल्पता अपना साम्राज्य फैलाएं हैं...   अखुट शांति की किरणों से परमधाम सजा हुआ हैं... और *मैं आत्मा अखुट शांति के साम्राज्य की मालिक बन गई हूँ...* बिन्दुरूपी बाप की किरणों को अपने मे समाती मैं आत्मा... बाबा के संग चलती हूँ... सूक्ष्म वतन की ओर... *दो बिंदु का सफर... एक बाप... एक बच्चा...* पहुँचते हैं सूक्ष्म वतन में... *बाबा का ब्रह्मा तन में प्रवेश का अलौकिक नजारा देख कर मैं आत्मा भावविभोर हो जाती हूँ...*

 

  *बापदादा ने अपनी प्यार भरी दृष्टि से मुझ आत्मा को फरिश्ता स्वरूप में इमर्ज कर बोले:-* "बच्ची... कौनसी दुनिया मे खो गई हों ? क्या मेरे साथ हों ? साथ चलते चलते कहीं साथ छूट तो नहीं गया ? बिंदु देश से स्थूल देश मे आकर अपनी पहचान को ही भूला दिया ? मुझ को भी भूल गई ? अब विस्मृति रूपी निंद्रा को तोड़... *उगते सूरज की पहली किरणों रूपी ज्ञान को जान... मुझ एक बाप को जान... अपनी अस्तित्व को जान...* इस स्थूल जगत के मोह-माया से मुक्त्त हो जाओ..."

 

_ ➳  *बापदादा के हाथो में अपने हाथो को झुलाती... बाबा को देख मंद मंद मुस्कुरा कर मैंने कहा :-* "बाबा... पहले मैं इस मायावी जगत में खो गई थी... अब तो बस आप मे ही खो रही हूँ... संसार रूपी हद के समुंदर को पार कर... बिन्दुरूपी बेहद के महासागर में समा रही हूँ... *अपने स्वधर्म... सुख... शांति... और पवित्रता से... स्थूल जगत के मोह माया को... विकारों को... परास्त कर रही हूँ..."* बापदादा से आती हुई रंगबिरंगी किरणों के झरनों में अपने आप को सदा बहार बनाती जा रही हूँ..."

 

  *मुझ आत्मा को अपने किरणों से भरपूर करते बाबा बोले :-* "मीठे बच्चे... संसार... विषय वैतरणी नदी समान है... 63 जन्मो से इस नदी में डूब रहे हो... अब इस संगमयुग में... *सच्ची प्रीत सिर्फ मुझसे रखो... मनसा... वाचा... कर्मणा... मेरे बन जाओ...* *पवित्रता की राह पर चलो...* अपने स्वधर्म में टिक जाओ... अपने स्वरूप को पहचानो... *तुम यह शरीर नहीं... शरीर को चलाने वाली आत्मा हो... शक्तियों की महा ज्योति हो..."*

 

_ ➳  *अपने असली स्वधर्म... शक्तियो... को जान मैं आत्मा... अपने स्वरूप में आपेही स्थित हो कर अपने संस्कारो को बापदादा की अमानत समझ कर... बाबा से कह रही हूँ :-* "संभाल कर जतन कर रही हूँ मेरे बाबा... तेरी श्रीमत का... कदम... कदम पर तुझे ही पा रही हूँ मैं... तुझे ही महसूस कर रही हूँ... 63 जन्मों के विकारों से माया के जंजीरो से... खुद को मुक्त्त कर रही हूँ... *अपनी असली पहचान का स्वरूप बन रही हूँ मेरे बाबा..."*

 

  *मेरी प्यार भरी बातों से बापदादा मुस्कुरा कर बोले :-* "मेरी लाडली फूल बच्ची... मेरे रूप में समा जाओ... देह अभिमान के चोले से बाहर निकल... आत्मिक स्थिति की अधिकारी बन जाओ... *सर्वस्व समर्पण कर... बेहद के सर्वस्व की साम्राज्ञी बन जाओ... मैं आया हूँ तुम्हे ले जाने...* दुःखो से छुड़ाने... मोह- माया से ... विकारों से... मुक्त्त कर *परिस्तान की परी बनाने... अपने असली धाम... परमधाम में स्थित हो जाओ..."*

 

_ ➳  *बापदादा के हाथों में अपना हाथ रखती में फरिश्ता... उसकी शक्तियों को... अपने में समाती मैं आत्मा... बाबा से कहती हूँ :-* "बाबा... आप से मिली शिक्षाओं को... सर आँखों पर रख... नखशिख पालन कर रही हूँ... *अपने स्वधर्म में स्थित हो कर...* अपने संगमयुग को... एक बाप की श्रीमत पर चल... आप की दिलतख्तनशीन बन रही हूँ... *अंतिम जन्म में... मोहजीत... मायाजीत... जगतजीत का वरदानी तिलक... बापदादा के हाथों... लगवाया हैं... इस स्मृति को सदैव मैं आत्मा अपने मन मंदिर में जागती ज्योत बनाकर रख रही हूँ..*

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- इस डर्टी दुनिया से दिल नही लगानी है*"

 

_ ➳  अपने दिल मे दिलाराम शिव बाबा की मीठी याद को समाये मैं मन ही मन विचार करती हूँ कि *आज दिन तक देह और देह की इस झूठी दुनिया, देह के झूठे सम्बन्धो को दिल मे बसा कर सिवाय दर्द के और कुछ नही पाया किन्तु जब से दिलाराम बाबा को दिल मे बसाया है तब से दिल को असीम सुकून और चैन मिला है*। ऐसा सुकून और चैन जिसे पाकर अब और कुछ पाने की इच्छा ही शेष नही रही। तो जब हर इच्छा से अविद्या हो चुकी तो फिर इस पतित दुनिया से दिल क्यों लगाना!

 

_ ➳  मन ही मन स्वयं से बातें करती मैं स्वयं से ही प्रतिज्ञा करती हूँ कि अब सिवाय एक दिलाराम बाप के इस दिल में और किसी की याद कभी नही आयेगी। *इस पतित दुनिया से दिल हटाकर अब सर्व सम्बन्धो का सुख मुझे केवल अपने दिलाराम बाबा से लेना है और इन नश्वर सम्बन्धों से पूरी तरह ममत्व मिटाये नष्टोमोहा बनना है* ताकि हम ब्राह्मणों का अंत का जो पेपर है नष्टोमोहा स्मृतिलब्धा का उसमे मैं पास विद ऑनर हो सकूँ।

 

_ ➳  इसी प्रतिज्ञा के साथ अपने निराकारी ज्योतिबिन्दु स्वरुप में स्थित हो कर, दिल को आराम देने वाली *अपने दिलाराम बाबा की मीठी याद में मैं अपने मन बुद्धि को एकाग्र करके बैठ जाती हूँ और सेकेंड में देह के बन्धन से न्यारी हो कर भृकुटि सिहांसन को छोड़ मैं दिव्य ज्योतिबिन्दु आत्मा अब देह से बाहर आ जाती हूँ*। अपनी नश्वर देह और आस - पास की हर वस्तु को साक्षी हो कर देखते हुए अब मैं उन सबसे किनारा कर अपने शिव पिता से मिलन मनाने ऊपर की ओर जा रही हूँ। अपने दिलाराम बाबा की मीठी याद रूपी स्नेह की डोर को थामे मैं निरन्तर ऊपर उड़ती जा रही हूँ।

 

_ ➳  पांचो तत्वों को पार कर, सूक्ष्म लोक से परें, आत्माओं की उस प्रकाशमयी निराकारी दुनिया मे मैं प्रवेश करती हूँ जहां मेरे दिलाराम शिव बाबा रहते हैं। *मन बुद्धि के नेत्रों से अपने शिव पिता को अपने अति समीप पाकर मैं मन ही मन हर्षित हो रही हूँ। प्रेम के सागर मेरे शिव पिता के स्नेह की मीठी मीठी लहरें उड़ - उड़ कर मेरे पास आ रही हैं*।  अपने शिव पिता के स्नेह की शीतल फुहारों के नीचे मैं असीम आनन्द की अनुभूति कर रही हूँ। अपनी असीम शक्तियाँ मुझमें प्रवाहित कर बाबा मुझे आप समान शक्तिशाली बना रहे हैं। स्वयं को मैं सर्वशक्तियों से सम्पन्न अनुभव कर रही हूँ।

 

_ ➳  सर्वशक्तियों से भरपूर हो कर सर्वशक्ति सम्पन्न स्वरूप बन अब मैं आत्मा वापिस लौट रही हूँ। परमधाम से नीचे वापिस साकारी लोक में आकर अब मैं अपने शरीर रूपी रथ पर फिर से विराजमान हो गई हूँ।

मेरे शिव पिता परमात्मा के असीम स्नेह की मीठी अनुभूति अब मुझे इस पतित दुनिया से उपराम कर रही है। *दिलाराम बाबा के निःस्वार्थ प्रेम के अनुभव ने मेरी दृष्टि, वृति को बदल दिया है। इस पतित दुनिया से दिल हटाकर, दिल मे निरन्तर दिलाराम बाबा की मीठी याद को समा कर एक असीम आनन्दमयी सुखदाई स्थिति का अनुभव अब मैं हर पल कर रही हूँ*

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं अपने एकाग्र स्वरूप द्वारा सूक्ष्म शक्त्ति की लीलाओं का अनुभव करने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं अंतर्मुखी आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा सर्व प्राप्तियों को सदा स्वयं में धारण करती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा सदैव विश्व की स्टेज पर प्रत्यक्ष होती हूँ  ।*

   *मै आत्मा सर्व प्राप्तियों को प्रत्यक्षता का आधार बनाती हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  1. दादियों का एक संकल्प बापदादा के पास पहुँचा है। *दादियाँ चाहती हैं कि अभी बापदादा साक्षात्कार की चाबी खोलेयह इन्हों का संकल्प हैं।* आप सब भी चाहते होबापदादा चाबी खोलेंगे या आप निमित्त बनेंगे? अच्छा, बापदादा चाबी खोले, ठीक है। बापदादा हाँ जी करते हैं, (ताली बजा दी) पहले पूरा सुनो। बापदादा को चाबी खोलने में क्या देरी हैलेकिन करायेगा किस द्वाराप्रत्यक्ष किसको करना हैबच्चों को या बाप कोबाप को भी बच्चों द्वारा करना है क्योंकि *अगर ज्योतिबिन्दु का साक्षात्कार भी हो जाए तो कई तो बिचारे..., बिचारे हैं ना! तो समझेंगे ही नहीं कि यह क्या है।* अन्त में शक्तियाँ और पाण्डव बच्चों द्वारा बाप प्रत्यक्ष होना है।

 

 _ ➳  2. तो *ब्रह्मा बाप को फालो करो।* अशरीरीबिन्दी आटोमेटिकली हो जायेंगे।

 

 _ ➳  3. आप भी *एक रूहानी रोबट की स्थिति तैयार करो।* जिसको कहेंगे रूहानी कर्मयोगीफरिश्ता कर्मयोगी। पहले आप तैयार हो जाना।

 

 _ ➳  4. बापदादा ऐसे रूहानी चलते-फिरते कर्मयोगी फरिश्ते देखने चाहते हैं। *अमृतवेले उठोबापदादा से मिलन मनाओरूह-रूहान करोवरदान लो।* जो करना है वह करो। लेकिन बापदादा से रोज अमृतवेले 'कर्मयोगी फरिश्ता भवका वरदान लेके फिर कामकाज में जाओ।

 

 _ ➳  5. इस स्थिति की धरनी तैयार करो तो बापदादा साक्षात बाप बच्चों द्वारा साक्षात्कार अवश्य करायेगा। *'साक्षात् बाप और साक्षात्कार' - यह दो शब्द याद रखना।* बस हैं ही फरिश्ते। सेवा भी करते हैं, ऊपर की स्टेज से फरिश्ते आये, सन्देश दिया फिर ऊपर चले गये अर्थात् ऊँची स्मृति में चले गये। 

 

✺   *ड्रिल :-  "बापदादा से रोज अमृतवेले 'कर्मयोगी फरिश्ता भव' का वरदान लेने का अनुभव"*

 

 _ ➳  हमारी मीठी मीठी दादियों के मन में विश्व कल्याण के कितने श्रेष्ठ संकल्प है... दादियों ने बापदादा को प्रत्यक्ष करने के लिए अपना सब कुछ समर्पित किया है... विश्व की सर्व आत्माओ के लिए दादियों का संकल्प है की *बापदादा साक्षात्कार की चाबी खोले...* बापदादा को तो साक्षात्कार की चाबी खोलने में कोई देरी नहीं लगती... लेकिन *वो साक्षात्कार भी हम बच्चों के द्वारा ही करायेंगे... बाप को बच्चों के द्वारा ही प्रत्यक्ष होना है...* क्योंकि बाप तो निराकार ज्योतिबिन्दु है... अगर ज्योतिबिन्दु का साक्षात्कार भी हो जाए तो कई तो बिचारे समझेंगे ही नहीं कि यह क्या है... तो अंत में शक्तियाँ और पाण्डव बच्चों द्वारा बाप प्रत्यक्ष होना है...

 

 _ ➳  अमृतवेला में मैं सदा रूहानी खुश्बु से महकती हुई बापदादा की दिलतख्तनशीन ब्राह्मण आत्मा.. *अपने फरिश्ताई ड्रेस में...* अपने सेवा स्थान से उड चलती हू अपने प्यारे मधुबन *पांडव भवन की ओर...* रास्ते में पेड़ पहाडियों को निहारते हुए... जो भी आत्मा सामने दिखे... उन्हे शांति की शक्ति से भरपूर करते हुए *पहुंची बापदादा के कमरे में...* वहाँ मुझे आते देख बापदादा मुस्कुराएं और *मुझे अपनी मीठी दृष्टि से निहाल करने लगे...* बापदादा के नयनो से प्रेम की किरणें मुझ पर बरस रही है... मैं परमात्म प्रेम से तृप्त अनुभव कर रही हूँ... *बापदादा के इस रूहानी मिलन में वो परमानंद का अनुभव* हो रहा है जो आजतक कभी नहीं हुआ...

 

 _ ➳  उनसे रूह-रूहान करते हुए मैं स्वयं को पद्मापद्म भाग्यशाली महसूस कर रही हूँ... बापदादा अपना प्रेम से भरपूर हाथ मेरे मस्तक पर रखते हुए मुझे *कर्मयोगी फरिश्ता भव का वरदान दे रहे* है... बापदादा का यह वरदान पाकर मैं आत्मा धन्य हो गई... बापदादा से विदाई लेकर वापस लौटती हूँ... लेकिन अब मेरी स्थिति पहले से अधिक श्रेष्ठ है... *मेरा हर कर्म ब्रह्मा बाप समान है...* चलना-फिरना, बोलना, हंसना, उठना-बैठना... हर कर्म में मैं आत्मा ब्रह्माबाप को फाॅलो कर रही हूँ... मैं *अशरीरी स्थिति की अनुभूति में मग्न* हूँ... इस श्रेष्ठ स्मृति में ही हर कर्म हो रहा है... *आटोमेटिकली बिन्दी अवस्था...*

 

 _ ➳  कर्म करते हुए भी कर्मो से एकदम न्यारी प्यारी अवस्था... एक ऐसी स्थिति है जो मैं स्वयं को *रूहानी रोबट अनुभव* कर रही हूँ... मैं रूहानी *कर्मयोगी फरिश्ता उडता जा रहा हूँ... मैं इस ही स्मृति में उडता जा रहा हू* कि मैं बाबा का रूहानी रोबट हूँ... सूक्ष्मवतन से नीचे उतर कर... सेवा करते हुए सबको बापदादा का परिचय बोल से और चाल चलन से देते हुए... फिर से ऊपर चलते हुए मुझे निकलती हुई लाइट माइट की किरणें पूरे ग्लोब पर पड रही हैं... आत्माएं मुझे देखकर धन्य-धन्य अनुभव कर रही है... सारी आत्माएं मुझसे निकलती लाइट माइट अनुभव कर रही हैं... उन लाइट और माइट से *सारी ब्राह्मण आत्माएं भी कर्मयोगी फरिश्ता बन गई है...*

 

 _ ➳  विश्व की सारी ब्राह्मण आत्मायें ग्लोब के आसपास चक्र लगा रही है... सबसे निकलती लाइट माइट अंधो की लाठी बन चुकी है... हर *एक ब्राह्मण आत्मा ब्रह्मा बाप समान संपूर्ण सम्पन्न और कर्मातीत स्थिति के लिए पुरूषार्थ कर रहा है...* हर एक ब्राह्मण में बापदादा का साक्षात्कार सारी धरती की आत्माओ को हो रहा है... *चारों ओर साक्षात्कार की धूम मची है...* सबको अनुभव हो रहा है कि कोई फरिश्ते आए... और साक्षात्कार करा कर भगवान का सन्देश दिया और चले गए... अन्त में शक्तियाँ और पाण्डव बच्चों द्वारा बाप प्रत्यक्ष हुए... दादियों का संकल्प भी पूरा हुआ... सभी के मन से यही आवाज निकल रहा है वाह बाबा वाह... और बाप भी कह रहे है वाह बच्चें वाह...

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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