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 01 / 02 / 20  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *नम्रता का गुण धारण किया ?*

 

➢➢ *सिर्फ एक शिवबाबा को ही याद किया ?*

 

➢➢ *विशेषता रुपी संजीवनी बूटी द्वारा मूर्छित को सुरजीत किया ?*

 

➢➢ *नाम मान शान व साधनों का संकल्प में भी त्याग किया ?*

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*अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  जैसे वर्तमान समय के प्रमाण शरीर के लिए सर्व बीमारियों का इलाज एक्सरसाइज सिखाते हैं, तो इस समय आत्मा को शक्तिशाली बनाने के लिए यह रुहानी एक्सरसाइज का अभ्यास चाहिए। *चारों ओर कितना भी हलचल का वातावरण हो, आवाज में रहते आवाज से परे स्थिति का अभ्यास, अशान्ति के बीच शान्त रहने का अभ्यास बहुतकाल का चाहिए।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं व्यर्थ को समाप्त करने वाला समर्थ हूँ"*

 

  सदा अपने को मास्टर सर्वशक्तिवान आत्मा समझते हो? *सर्वशक्तिवान अर्थात् समर्थ। जो समर्थ होगा वह व्यर्थ के किचड़े को समाप्त कर देगा। मास्टर सर्वशक्तिवान अर्थात् व्यर्थ का नाम निशान नहीं। सदा यह लक्ष्य रखो कि - 'मैं व्यर्थ को समाप्त करने वाला समर्थ हूँ'।*

 

  जैसे सूर्य का काम है किचड़े को भस्म करना। अंधकार को मिटाना, रोशनी देना। तो इसी रीति *मास्टर ज्ञान सूर्य अर्थात् - व्यर्थ किचड़े को समाप्त करने वाले अर्थात् अंधकार को मिटाने वाले। मास्टर सर्वशक्तिवान व्यर्थ के प्रभाव में कभी नहीं आयेगा।* अगर प्रभाव में आ जाते तो कमजोर हुए। बाप सर्वशक्तिवान और बच्चे कमजोर! यह सुनना भी अच्छा नहीं लगता।

 

 *कुछ भी हो - लेकिन सदा स्मृति रहे - 'मैं मास्टर सर्वशक्तिवान हूँ'। ऐसा नहीं समझो कि मैं अकेला क्या कर सकता हूँ.. एक भी अनेकों को बदल सकता है। तो स्वयं भी शक्तिशाली बनो और औरों को भी बनाओ।* जब एक छोटा-सा दीपक अंधकार को मिटा सकता है तो आप क्या नहीं कर सकते! तो सदा वातावरण को बदलने का लक्ष्य रखो। विश्व परिवर्तक बनने के पहले सेवाकेन्द्र के वातावरण को परिवर्तन कर पावरफुल वायुमण्डल बनाओ।

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  अच्छा। अभी खेल में खेल देखा। *अभी बापदादा कहते हैं साक्षी होकर खेल देखा, इन्जाय किया, अभी एक सेकण्ड में एकदम देह से न्यारे पॉवरफुल आत्मिक रूप में स्थित हो सकते हो?* फुलस्टॉप। (बापदादा ने बहुत पॉवरफुल ड्रिल कराई)

 

✧  अच्छा - यही अभ्यास हर समय बीच-बीच में करना चाहिए। अभी-अभी कार्य में आये, अभी-अभी कार्य से न्यारे, साकारी सो निराकारी स्थिति में स्थित हो जाएं। *ऐसे ही यह भी एक अनुभव देखा, कोई समस्या भी आती है तो ऐसे ही एक सेकण्ड में साक्षी दृष्टा बन, समस्या को एक साइडसीन समझ, तूफान को एक तोहफा समझ उसको पार करो।*

 

✧  अभ्यास है ना? आगे चलकर तो ऐसे अभ्यास की बहुत आवश्यकता पडेगी। फुलस्टॉप क्वेचन मार्क नहीं, यह क्यों हुआ, यह कैसे हुआ? *हो गया। फुलस्टॉप और अपने फुल शक्तिशाली स्टेज पर स्थित हो जाओ। समस्या नीचे रह जायेगी, आप ऊँची स्टेज से समस्या को साइडसीन देखते रहेंगे।* अच्छा।

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧  *अब सब बच्चे अपने को आत्मा समझ कर बैठो। सामने किसको देखें? आत्माओं के बाप को।* इस स्थिति में रहने से व्यक्त से न्यारे होकर अव्यक्त स्थिति में रह सकेंगे। मैं आत्मा बिन्दु रूप हूँ - क्या यह याद नहीं आता है? बिन्दी रूप होकर बैठना नहीं आता? ऐसे ही अभ्यास को बढ़ाते जाओगे तो एक सेकण्ड तो क्या, कितने ही घण्टे इसी अवस्था में स्थित होकर इस अवस्था का रस ले सकते हो। *बिन्दु होकर बैठना कोई जड़ अवस्था नहीं है। जैसे बीज में सारा पेड़ समाया हुआ है, वैसे ही मुझ आत्मा में बाप की याद समाई हुई है। ऐसे होकर बैठने से सब रसनायें आयेंगी और साथ ही यह भी नशा होगा कि - हम किसके सामने बैठे हैं।'*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺ *"ड्रिल :- शरीर से ममत्व मिटा देना"*

➳ _ ➳ *मैं आत्मा एकांत में घर में बाबा के कमरे में बैठी हूँ... इस देह और देह की दुनिया से अपना सारा ध्यान हटाकर भृकुटी के मध्य केन्द्रित करती हूँ... भृकुटी के भव्य सिंहासन पर बैठी मैं हीरे जैसे चमकती हुई मणि हूँ...* अविनाशी आत्मा हूँ... परमधाम में रहने वाले परमपिता परमात्मा की संतान हूँ... धीरे-धीरे फ़रिश्ता स्वरुप धारण कर आकाश मार्ग से होते हुए इस विनाशी दुनिया से परे सूक्ष्म वतन में पहुँच जाती हूँ... बापदादा के पास... और उनकी गोद में बैठ जाती हूँ... *प्यारे बाबा मेरे सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए प्यारी शिक्षाएं देते हैं...*

❉ *अपने प्यार की बरसात में मुझे भिगोते हुए प्यारे बाबा कहते हैं:-* मेरे मीठे फूल बच्चे... *अब ईश्वर पिता का मखमली हाथ थाम कर जो देह के मटमैलेपन से बाहर निकले हो तो इस मीठे भाग्य की मधुरता में खो जाओ... ईश्वर पिता से प्यार कर फिर देह की दुनिया की ओर रुख न करो...* इन मधुर यादो में खोकर अपना सुनहरा सतयुगी भाग्य सजाओ...

➳ _ ➳ *मैं आत्मा मीठे बाबा की मीठी यादों में डूबकर बाबा से कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे प्यारे बाबा... मै आत्मा आपके हाथ और साथ को पाकर नये पवित्र जन्म को पा ली हूँ... *आपकी मीठी सी यादो में... देह की अपवित्र दुनिया से निकल कर सतयुगी खुबसूरत सुखो की मालकिन सी सज संवर रही हूँ...*

❉ *मेरे हर श्वांस में अपना नाम लिखते हुए आप समान बनाते हुए मीठा बाबा कहते हैं:-* मीठे प्यारे लाडले बच्चे... कितने मीठे भाग्य से सज गए हो... मीठे बाबा की पसन्द बनकर धरा पर खुशनुमा इठला रहे हो... *इन प्यारी यादो में इस कदर खो जाओ कि... सिवाय बाबा के जेहन में कोई भी याद शेष न हो... ऐसे गहरे दिल के तार ईश्वर पिता से जोड़ लो कि वही दिल पर हमेशा छाया रहे...*

➳ _ ➳ *विनाशी दुनिया से जीते जी मरकर अविनाशी सुखों में उड़ते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* मेरे प्राणप्रिय बाबा... मै आत्मा दुखो की दुनिया से निकल कर सच्चे प्यार की छाँव में आ गयी हूँ... *प्यारे बाबा आपकी सुखभरी छत्रछाया मे पुरानी दुनिया से मरकर नये ब्राह्मण जन्म को पा गयी हूँ...* और यहाँ से घर चलकर सुखो की नगरी में आने का मीठा भाग्य पा रही हूँ..."

❉ *इस दुनिया से न्यारी बनाकर अपनी मीठी गोद की छत्र छाया में बिठाकर मेरे बाबा कहते हैं:-* प्यारे सिकीलधे मीठे बच्चे... अब पुरानी दुनिया की हर बात से उपराम होकर सच्ची यादो में अंतर्मन को छ्लकाओ... *सच्चे प्यार से सदा का नाता जोड़कर उसके प्रेम में प्रति पल भीग जाओ... इन यादो में इतने गहरे डूब जाओ कि... बस उसके सिवाय दुनिया भूली सी हो...*

➳ _ ➳ *मेरा तो एक शिव बाबा- इस स्वमान में टिककर मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा आपके प्यार में रोम रोम से भीगकर... *सच्चे प्रेम को जीने वाली महान भाग्य की धनी हो गयी हूँ... मीठे बाबा अब आप ही मेरा सच्चा सहारा हो...* और आपके संग साथी बनकर ही मुझे अपने घर चलना है..."

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- एक शिवबाबा को ही याद करना है, किसी देह धारी को नही*"
 
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मनमनाभव के महामन्त्र को स्मृति में रखते हुए, देह और देह के सर्व सम्बन्धों से किनारा कर, एक परमात्मा की अव्यभिचारी याद में मैं आत्मा अपने मन बुद्धि को एकाग्र करती हूँ। उस एक *अपने परम प्रिय प्रभु की अव्यभिचारी याद में बैठते ही इस देह रूपी पिंजड़े में कैद मैं आत्मा रूपी पँछी इस देह के पिंजड़े के हर बंधन को तोड़ उड़ चलती हूँ अपने उस परमप्रिय प्रभु, अपने स्वामी, शिव पिता परमात्मा के पास जिनके साथ मेरा जन्म - जन्म का अनादि सम्बन्ध है*। अपने सच्चे शिव प्रीतम की याद मुझे उनसे मिलने के लिए बेचैन कर रही है इसलिए ज्ञान और योग के पंख लगाए मैं आत्मा पँछी और भी तीव्र उड़ान भरते हुए पहुंच जाती हूँ अपने प्रभु के धाम, शांति धाम, निर्वाणधाम में।
 
➳ _ ➳ 
अपने शिव प्रभु को अपने सामने पा कर बिना कोई विलम्ब किये मैं पहुंच जाती हूँ उनके पास और उनकी किरणों रूपी बाहों में समा जाती हूँ। *जन्म जन्मान्तर से अपने शिव पिता परमेश्वर से बिछुड़ी मैं आत्मा अपने शिव प्रभु की किरणों रूपी बाहों में अतीन्द्रिय सुख की गहन अनुभूति में मैं इतना खो जाती हूँ कि देह और देह की दुनिया संकल्प मात्र भी याद नही रहती*। केवल मैं और मेरे प्रभु, दूसरा कोई नही। प्रेम के सागर अपने परम प्रिय मीठे बाबा के अति प्यारे, अति सुन्दर, चित को चैन देने वाले अनुपम स्वरूप को निहारते - निहारते मैं डूब जाती हूँ उनके प्रेम की गहराई में और उनके सच्चे निस्वार्थ रूहानी प्रेम से स्वयं को भरपूर करने लगती हूँ।
 
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मेरे शिव प्रीतम का प्यार उनकी सर्वशक्तियों की किरणों के रूप में निरन्तर मुझ पर बरस रहा है। *उनसे आ रही सर्वशक्तियों रूपी किरणों की मीठी फुहारें मन को रोमांचित कर रही हैं, तृप्त कर रही हैं और साथ ही साथ रावण की जेल में कैद होने के कारण निर्बल हो चुकी मुझ आत्मा को बलशाली बना रही हैं*। अपने शिव प्रभु की सर्व शक्तियों से स्वयं को भरपूर करके, उनके प्यार को अपनी छत्रछाया बना कर अब मैं वापिस देह और देह की दुनिया की में लौट रही हूं। किन्तु *अब मेरे शिव प्रभु का प्यार मेरे लिए ढाल बन चुका है* जो मुझे इस आसुरी दुनिया मे रहते हुए भी आसुरी सम्बन्धों के लगाव से मुक्त कर रहा है।
 
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देह और देह की दुनिया मे रहते हुए भी अब इस दुनिया से मेरा कोई ममत्व नही रहा। यह तन - मन - धन मेरा नही, मेरे बाबा का है, यह सम्बन्धी भी मेरे नही, बाबा ने मुझे इनकी सेवा अर्थ निमित बनाया हैं। *इस स्मृति में रहने से मैं और मेरे से अटैचमेन्ट समाप्त हो गई है। प्रवृति को ट्रस्टी बन कर सम्भालने से अब मैं स्वयं को हर बन्धन से मुक्त, न्यारा और प्यारा अनुभव कर रही हूं*। परमात्म प्रीत से मेरे सभी लौकिक सम्बन्ध भी अलौकिक बन गए हैं इसलिए देह और दैहिक सम्बन्धो में होने वाला लगाव, झुकाव और टकराव अब समाप्त हो गया है।
 
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साक्षी भाव से हर आत्मा के पार्ट को अब मैं साक्षी हो कर देख रही हूं और हर कर्म साक्षी पन की सीट पर सेट हो कर करने से सदा बाप के साथीपन का अनुभव कर रही हूं। *देह और देह के सम्बन्धो के प्रति साक्षीभाव मुझे इस पुरानी दुनिया से स्वत: ही उपराम बना रहा है*। दैहिक दृष्टि और वृति परिवर्तित हो कर रूहानी बन गई है। इसलिए अब सदैव यही अनुभव होता है कि मैं इस देह में मेहमान हूँ। *मैं रूह हूँ और मुझ रूह का करन करावनहार सुप्रीम रूह है। वह चला रहे हैं, मैं चल रही हूं। सदा मैं रूह और सुप्रीम रूह कम्बाइंड हैं*। निरन्तर इस स्मृति में रहने से किसी भी देहधारी के नाम रूप की अब मुझे याद नही आती। केवल अपने शिव प्रभु की अव्यभिचारी याद में रह, मैं उनके ही प्रेम का रसपान करते हुए सदा अतीन्द्रिय सुख के झूले में झूलती रहती हूं।

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

✺   *मैं विशेषता रूपी संजीवनी बूटी द्वारा मूर्छित को सुरजीत करने वाली आत्मा हूँ।*
✺   *मैं विशेष आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

✺ *मैं आत्मा नाम-मान-शान व साधनों का संकल्प में भी त्याग करती हूँ ।*
✺ *मैं आत्मा महान त्यागी हूँ ।*
✺ *मैं आत्मा नाम-मान-शान के संकल्प से भी सदा मुक्त हूँ ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  कई बच्चे समझते हैं बापदादा से तो सम्बन्ध है ही। परिवार में हुआ नहीं हुआ, क्या बात है, (क्या हर्जा है) बीज से तो है ही। लेकिन *आपको विश्व का राज्य करना है ना! तो राज्य में सम्बन्ध में आना ही होगा। इसीलिए सम्बन्ध संपर्क में आना ही है लेकिन सम्बन्ध-सम्पर्क में यथार्थ खजाना मिलता है दुआयें।* बिना सम्बन्ध-सम्पर्क के आपके पास दुआओं का खजाना जमा नहीं होगा। माँ-बाप की दुआयें तो हैं, लेकिन *सम्बन्ध-सम्पर्क में भी दुआयें लेनी हैं। अगर दुआयें नहीं मिलती, फीलिंग नहीं आती तो समझो सम्बन्ध-सम्पर्क में कोई कमी है।* यथार्थ रीत अगर सम्बन्ध-सम्पर्क है तो दुआओं की अनुभूति होनी चाहिए। और दुआओं की अनुभूति क्या होगी? अनुभवी तो हो ना! अगर सेवा से दुआयें मिलती हैं तो दुआयें मिलने का अनुभव यही होगा जो स्वयं भी सम्बन्ध में आते, कार्य करते डबल लाइट (हल्का) होगा, बोझ नहीं महसूस करेगा और *जिनकी सेवा की, सम्बन्ध-सम्पर्क में आये वह भी डबल लाइट फील करेगा। अनुभव करेगा कि यह सम्बन्ध में सदा हल्का अर्थात् इजी हैं, भारी नहीं रहेगा।* सम्बन्ध में आऊँ, नहीं आऊँ... लेकिन दुआयें मिलने के कारण दोनों तरफ नियम प्रमाण, ऐसा इजी भी नहीं - जैसे कहावत है, ज्यादा मीठे पर चींटियाँ बहुत आती हैं। तो इतना इजी भी नहीं, *लेकिन डबल लाइट रहेगा।*

 

✺   *ड्रिल :-  "यथार्थ सम्बन्ध-सम्पर्क का अनुभव"*

 

 _ ➳  *ट्रैफिक कन्ट्रोल बजते ही मैं ज्योतिमय आत्मा एक सेकेंड में सभी संकल्पों को फुलस्टॉप लगा, टिक जाती हूँ ज्योति बिन्दु शिव पिता की याद में...* बाबा से आती सुख-शांति, पवित्रता की सतरंगी किरणें मुझ आत्मा में समा रही है... और मैं ज्योतिमय आत्मा इन किरणों को स्वयं में समाती जा रही हूँ... जैसे-जैसे मैं आत्मा इन किरणों को अपने अन्दर समाती जा रही हूँ... *मैं आत्मा शक्तिशाली बनती जा रही हूँ... मुझ आत्मा का प्रकाश बढ़ता जा रहा है... मैं आत्मा बहुत हल्का फील कर रही हूँ...*

 

 _ ➳  अब मैं ज्योतिमय आत्मा बाबा के महावाक्यों पर चितंन करती हूँ... *"आपको विश्व का राज्य करना है ना ! तो राज्य में सम्बन्ध में आना ही होगा... इसलिए सम्बन्ध-सम्पर्क में आना ही है"...* बाबा के द्वारा कहें महावाक्यों पर गहराई से मैं ज्योतिमय आत्मा मनन कर रही हूँ... तभी अचानक सामने एक बहुत बड़ा स्वर्णिम दरवाजा दिखता है... और *वहाँ से आने वाली लाइट मुझ आत्मा पर पड़ती है... मैं आत्मा उठकर स्वर्णिम द्वार से अन्दर प्रवेश करती हूँ...* अन्दर चारों ओर स्वर्णिम दुनिया के बड़े-बड़े मनभावन चित्र लगे है... मैं आत्मा एक चित्र के नजदीक जाती हूँ... *जैसे ही एक चित्र के पास जाती हूँ... अचानक वो स्थिर चित्र 3 डी में कन्वर्ट हो जाता है... उसमें जो चित्र है वो जैसे सच में चलते हुए प्रतीत हो रहे है... इस चित्र में देवी-देवताएंँ खेलपाल कर रहे है...*

 

 _ ➳  जैसे ही मैं आत्मा दूसरे चित्र के पास जाती हूँ... ये चित्र भी 3 डी में कन्वर्ट हो जाता है... इस चित्र में *देवी-देवताएंँ मिलकर पुष्क विमानों में भ्रमण कर रहे है...* एक और चित्र के पास मैं आत्मा जाती हूँ... ये चित्र भी स्थिर से परिवर्तन हो चलने लग पड़ता है... इसमें देवताओं की सभा लगी हैं... एक दूसरे चित्र के पास मैं आत्मा जाती हूँ... *जहाँ मिलकर कुछ देवी-देवताएंँ रास कर रहें है... कुछ देवताएंँ मिलकर चित्रकला कर रहे है...* तभी अचानक ये सभी दृश्य मुझ आत्मा की आँखों के सामने से गायब हो जाते है... और मैं ज्योतिमय आत्मा उसी स्थान पर पहुंच जाती हूँ... जहाँ बैठ मैं आत्मा चिंतन कर रही थी...

 

 _ ➳  *तभी बाबा ज्ञान उजाला रुपी किरणें बरसाने लगते है... जैसे ही ये ज्ञान उजाला रुपी किरणें मुझ आत्मा में समाती जा रही है... बाबा के द्वारा दिखाए इन चित्रों का राज मुझ आत्मा के सामने स्पष्ट हो रहा है...* मैं आत्मा समझ गयी हूँ... कि यही वो श्रेष्ठ ब्राह्मण परिवार है जिसकी *एक-एक आत्मा देवकुल की महान आत्मा है... और भविष्य में हम सब आत्माएँ एक साथ राज्य में आयेगें राज करेगें...* एक साथ खेलेंगे घूमेंगे... एकमत हो रहेंगे और वो संस्कार यहाँ ही भरने है... धारण करने है...

 

 _ ➳  अब मैं आत्मा देख रही हूँ... स्वयं को सम्बन्ध-संपर्क में आते हुए... *मैं ज्योतिमय आत्मा जिन भी आत्माओं के संपर्क में आ रही हूँ... उन सभी आत्माओं प्रति मुझ आत्मा की दृष्टि श्रेष्ठ महान है... हरेक के प्रति दिल से रिगार्ड है...* मैं आत्मा हरेक में केवल विशेषता देखती हूँ... *मैं आत्मा जिस भी आत्मा के संपर्क में आ रही हूँ वे आत्माएँ हल्का फील कर रही है... उनको अपनेपन का अनुभव हो रहा है...* और मुझ आत्मा के प्रति उनके दिल से दुआएं निकल रही है... *मैं आत्मा सम्बन्ध-संपर्क में आते इजी रहते दुआओं का खजाना जमा कर हरदम डबल लाइट स्थिति का अनुभव कर रही हूँ...* मैं आत्मा यथार्थ रीति सम्बन्ध-संपर्क में आते सदा हल्का और दुआओं से भरपूर अनुभव कर रही हूँ...

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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