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 01 / 03 / 18  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *"तुम्ही से बैठूं... तुम्ही से सुनूं... तुम्ही से खाऊं" - यह अनुभव किया ?*

 

➢➢ *स्वयं को पूरा ट्रान्सफर किया ?*

 

➢➢ *पॉइंट स्वरुप में स्थित हो मन बुधी को नेगेटिव के प्रभाव से सेफ रखा ?*

 

➢➢ *हर संकल्प, बोल और कर्म में जी हुज़ूर किया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *परमात्म प्यार में ऐसे समाये रहो जो कभी हद का प्रभाव अपनी ओर आकर्षित न कर सके।* सदा बेहद की प्राप्तियों में मगन रहो जिससे रूहानियत की खुशबू वातावरण में फैल जाए।

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं सफलता का सितारा हूँ"*

 

  सदा सफलता के चमकते हुए सितारे हैं, यह स्मृति रहती है? *आज भी इस आकाश के सितारों को सब कितने प्यार से देखते हैं क्योंकि रोशनी देते हैं, चमकते हैं इसलिए प्यारे लगते हैं। तो आप भी चमकते हुए सितारे सफलता के हो।*

 

  *सफलता को सभी पसन्द करते हैं, कोई प्रार्थना भी करते हैं तो कहते - यह कार्य सफल हो। सफलता सब मांगते हैं और आप स्वयं सफलता के सितारे बन गये।*

 

  आपके जड़ चित्र भी सफलता का वरदान अभी तक देते हैं, तो कितने महान हो, कितने ऊँच हो, इसी नशे और निश्चय में रहो। *सफलता के पीछे भागने वाले नहीं लेकिन मास्टर सर्वशक्तिवान अर्थात् सफलता स्वरूप। सफलता आपके पीछे-पीछे स्वत: आयेगी।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  *अभी एक मिनट ऐसा पॉवरफुल सर्वशक्तियों सम्पन्न विश्व की आत्माओं को किरणें दो जो चारों ओर आपके शक्तियों का वायब्रेशन विश्व में फैल जाये।* (बापदादा ने ड़िल कराई) अच्छा।

 

✧  आज चारों ओर के सम्पूर्ण समान बच्चों को देख रहे हैं। समान बच्चे ही बाप के दिल में समाये हुए हैं। *समान बच्चों की विशेषता है - वह सदा निर्विघ्न, निर्विकल्प, निर्मान और निर्मल होंगे। ऐसी आत्मायें सदा स्वतंत्र होती है, किसी भी प्रकार के हद के बन्धन में बंधयमान नहीं होती।* तो अपने आप से पूछो ऐसी बेहद की स्वतंत्र आत्मा बने हैं। *सबसे पहली स्वतंत्रा है देहभान से स्वतन्त्र।* जब चाहे तब देह का आधार ले, जब चाहे देह से नयारे हो जाए। देह की आकर्षण में नहीं आये।

 

✧  दूसरी बात - *स्वतन्त्र आत्मा कोई भी पुराने स्वभाव और संस्कार के बन्धन में नहीं होगी।* पुराने स्वभाव और संस्कार से मुक्त होगी। साथ-साथ किसी भी देहधारी आत्मा के सम्बन्ध-सम्पर्क में अकर्षित नहीं होगी। सम्बन्ध-सम्पर्क में आते न्यारे और प्यारे होंगे। *तो अपने को चेक करो - कोई भी छोटी-सी कर्मन्द्रिय बन्धन तो नहीं बांधती?*

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧  *जैसे और स्थूल वस्तुओं को जब चाहो तब लो और जब चाहो तब छोड़ सकते हैं ना। वैसे इस देह के भान को जब चाहें तब छोड़ देही अभिमानी बन जायें - यह प्रैक्टिस इतनी सरल हैं, जितनी कोई स्थूल वस्तु की सहज होती है?* रचयिता जब चाहे रचना का आधर ले जब चाहे तब रचना के आधार को छोड़ दे ऐसे रचयिता बने हो? जब चाहें तब न्यारे, जब चाहें तब प्यारे बन जायें।

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺  *"ड्रिल :- बाप और बच्चों की एक्टिविटी में जो अंतर है उसे पहचानना"*

 

_ ➳  *मेरा बाबा कितना ही प्यारा है और बाबा का ज्ञान भी उतना ही प्यारा और न्यारा है... स्वयं भगवान इस धरा पर आकर सम्मुख बैठ सत्य ज्ञान देकर मेरे जीवन के अज्ञान अंधकार को मिटा दिया... मेरी बंद बुद्धि का ताला खोल दिया... मैं आत्मा हूं  परमात्मा मेरा सत्य पिता है... ये कितना सुन्दर ड्रामा  है ड्रामा में मैं आत्मा अविनाशी पार्ट बजा रही हूँ* ज्ञान, गुण, शक्तियों की वर्षा कर मेरे पुराने स्वभाव संस्कारों को परिवर्तन कर रहे हैं... इन्हीं सब बातों का मंथन करते हुए मैं आत्मा अपने बाबा को शुक्रिया कर और भी प्यारी प्यारी बातें सुनने पहुँच जाती हूँ वतन में बापदादा के पास...

 

  *सारी दुनिया जिसे ढूंढ रही है वो प्यारा बाबा मेरे सम्मुख बैठ 21 जन्मों की वर्सा का वरदान देते हुए कहते हैं:-* मेरे मीठे फूल बच्चे... *जिस ईश्वर के दीदार मात्र को कभी व्याकुल थे, आज वह सम्मुख बैठा पढ़ा रहा... अथाह खजानो को हथेली पर सजा, बच्चों पर दिल खोल कर लुटा रहा...* ऐसे मीठे बाबा से सब कुछ लेकर विश्व के मालिक बन मीठा मुस्कराओ...

 

_ ➳  *जीवन में हर खुशी से भरपूर होकर मोस्ट लकी अनुभव करते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे प्यारे बाबा... *मै आत्मा देवताओ के दर्शन को तरसती थी, आज भगवान को सामने देख, अपने भाग्य की जादूगरी पर मोहित हो गई हूँ...* और अथाह ज्ञान रत्नों को पाकर मालामाल होती जा रही हूँ..."

 

  *पारलौकिक सुखों की दिव्य बरसात करते हुए मेरे पारलौकिक मीठे बाबा कहते हैं:-* "मीठे प्यारे लाडले बच्चे... *दुनिया जिसे बहुत मुश्किल समझ जगह जगह ढूंढ रही... वह परमात्मा आप बच्चों के दिल के कितना करीब आ बैठा है... दुनिया साक्षात्कार को चाहती है... आप भाग्यवान बच्चे गोद में बैठे पढ़ रहे...* और देवताई शानो शौकत पाकर संपत्तिवान बन रहे..."

 

_ ➳  *ऊंचे भाग्य को पाकर अतीन्द्रिय सुखों की ऊंची उड़ान भरते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* "मेरे प्राणप्रिय बाबा... *मै आत्मा मीठे भाग्य पर फ़िदा हूँ, जिसने भगवान से मिलवाकर मुझे असीम सुखो की खुबसूरत दुनिया का भाग्य दिलाया है...* मुझे ईश्वरीय धन से धनवान् बनाकर 21 जनमो का बेफिक्र सा सजाया है..."

 

  *गुप्त ख़ज़ानों की चाबी देकर सर्व ख़ज़ानों की मालिक बनाते हुए मेरे बाबा कहते हैं:-* "प्यारे सिकीलधे मीठे बच्चे... *मीठे सौभाग्य ने भगवान से मिलवाया है, तो भगवान की सारी जागीरे बाँहों में भरकर, सतयुगी सुखो की बहारो में, आनन्द के गीत गाओ... जितना चाहो उतना खजानो की दौलत को पाओ...* रत्नों की खानो के मालिक बनकर विश्व धरा पर इठलाओ..."

 

_ ➳  *सर्व ख़ज़ानों को बटोरकर अपनी झोली भरते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* "हाँ मेरे मीठे बाबा... मैं आत्मा आपकी वारिस होकर, सारे खजानो की मालिक बन गई हूँ... *संगम के मीठे पलों में ईश्वरीय दौलत को बाँहों में भरकर, सुनहरे सुखो को पाने वाली और खुशियो में खिलखिलाने खुशनसीब आत्मा बन गयी हूँ..."*

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- कुसंग छोड़ सत के संग में रहना है*"

 

_ ➳  "संग तारे, कुसंग बौरे" मुरली में आने वाली इस कहावत को स्मृति में ला कर मैं विचार करती हूँ कि आज दिन तक आसुरी दुनिया के आसुरी मनुष्यों का संग करते - करते मेरी बुद्धि कितनी मलीन हो गई थी जो अपने ही आत्मा भाईयों के गुणों को ना देख उनके अवगुणों को देख उनकी निंदा करने लगी थी। किन्तु *भगवान बाप ने आ कर, अपना सत्य संग देकर, मुझ पत्थर बुद्धि को पारस बुद्धि बना दिया। ज्ञान का दिव्य चक्षु दे कर, मुझ आत्मा को होली हंस बना कर, अवगुण रूपी पत्थर को छोड गुण रूपी मोती चुगना सिखा दिया*।

 

_ ➳ऐसे होली हंस बनाने वाले अपने प्यारे मीठे शिव बाबा का शुक्रिया अदा करने के लिए, अब मैं अपने निराकार ज्योति बिंदु स्वरूप में स्थित होती हूँ और *मन बुद्धि की उस मीठी रूहानी यात्रा पर चल पड़ती हूँ जो सीधी मुझे मेरे ज्ञान सूर्य अति मीठे, अति प्यारे, सिकीलधे बाबा तक ले जाती है*। मन बुद्धि की यात्रा पर चलते, अनेक सुंदर, अद्भुत अनुभूतियाँ करते, मैं अपने निराकार बाबा के पास उनकी निराकारी दुनिया की ओर बढ़ रही हूँ।

 

_ ➳आकाश मण्डल को पार करके, सूक्ष्म लोक को पार करते हुए अब मैं स्वयं को अपनी रूहानी मंजिल के बिल्कुल समीप अनुभव कर रही हूँ। *मेरे शिव पिता की शक्तिशाली किरणों का एक दिव्य आभामंडल मुझे मेरे चारों और दिखाई दे रहा है*। इस आभामंडल के बिल्कुल बीचों - बीच गहन आनन्द की अनुभूति करते हुए मैं अपने शिव पिता के अति समीप जा रही हूँ। *समीपता की इस स्थिति में सिवाय दो बिंदुओं के और कुछ भी मुझे दिखाई नही दे रहा*। मेरे अति समीप ज्योति बिंदु शिवबाबा और उनके बिल्कुल सामने मैं ज्योति बिंदु आत्मा।

 

_ ➳अपने निराकार ज्योति बिंदु बाबा की किरणों के साये में मैं स्वयं को देख रही हूँ। उनकी शक्तिशाली किरणों रूपी बाहों में समा कर मैं उनकी सर्वशक्तियों को स्वयं में भरता हुआ महसूस कर रही हूँ। *बाबा की शक्तिशाली किरणों का तेज प्रवाह निरन्तर मुझ आत्मा में प्रवाहित हो कर, मुझे भी बाप समान बना रहा है*। सर्वशक्तिवान बाप की सन्तान स्वयं को मैं मास्टर सर्वशक्तिवान आत्मा के रूप में देख रही हूँ और स्वयं को बहुत ही शक्तिशाली अनुभव कर रही हूँ। *परमात्म संग का रंग स्वयं पर चढ़ा हुआ मैं स्पष्ट अनुभव कर रही हूँ*।

 

_ ➳परमात्म शक्तियों से स्वयं को भरपूर करके और अपने शिव पिता परमात्मा के अविनाशी संग के रंग में स्वयं को रंग कर अब मैं वापिस साकारी दुनिया की ओर लौट रही हूँ । मेरे शिव पिता परमात्मा के अविनाशी संग का रंग अब मुझे आसुरी दुनिया के आसुरी मनुष्यो के संग से दूर कर रहा है। *आसुरी दुनिया और आसुरी मनुष्यों के बीच रहते हुए भी उनकी आसुरी वृति का अब मुझ पर कोई प्रभाव नही पड़ता*। निंदा, चुगली करने वालों के संग से दूर, केवल अपने शिव पिता परमात्मा के संग में सदा रहते हुए अब मैं सदा परमात्म प्रेम की मस्ती में खोई रहती हूँ और हर प्रकार के कुसंग से बची रहती हूँ।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं पॉइंट स्वरूप में स्थित हो मनबुद्धि को निगेटिव के प्रभाव से सेफ रखने वाली विशेष आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं हर संकल्प, बोल और कर्म में जी हजूर करने वाली आज्ञाकारी आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  1. *भटकती हुई आत्मायें, प्यासी आत्मायें, अशान्त आत्मायें, ऐसी आत्माओं को अंचली तो दे दो।* फिर भी आपके भाई-बहनें हैं। तो अपने भाईयों के ऊपर, अपनी बहनों के ऊपर रहम आता है ना! देखो, *आजकल परमात्मा अपने को आपदा के समय याद करते लेकिन शक्तियों को, देवताओं में भी गणेश है, हनुमान है और भी देवताअों को ज्यादा याद करते हैं, तो वह कौन है? आप ही हो ना!* आपको रोज याद करते हैं। पुकार रहे हैं - हे कृपालु, दयालु रहम करो, कृपा करो। जरा-सी एक सुख-शान्ति की बूँद दे दो। आप द्वारा एक बूँद की प्यासी हैं। तो दुःखियों का, प्यासी आत्माओं का आवाज हे शक्तियाँ, हे देव नहीं पहुँच रहा है! पहुँच रहा है ना? बापदादा जब पुकार सुनते हैं तो शक्तियों को और देवों को याद करते हैं।

 

 _ ➳  2. *उन्हों को भी कुछ समय दो। एक बूँद से भी प्यास तो बुझाओ, प्यासे के लिए एक बूँद भी बहुत महत्त्व वाली होती है।*

 

✺   *ड्रिल :-  "प्यासी, अशान्त आत्माओं को सुख-शान्ति की अंचली देने का अनुभव"*

 

 _ ➳  *मधुबन की बगिया में झूले पर बैठी मैं लगन में मगन आत्मा शिव बाबा की यादों में मगन हूँ...* बाबा की शीतल किरणों के फूल मुझ आत्मा पर बरस रहे है... *अतिन्द्रिय सुख के झूले में, मैं आत्मा झूल रही हूँ... मीठे बाबा के असीम प्यार का अनुभव कर रही हूँ...* गुणों, शक्तियों और वरदानों की बारिश बाबा मुझ आत्मा पर कर रहे है... मैं आत्मा इस परमात्म बारिश में भीगकर भरपूर हो रही हूँ... और अतिइन्द्रिय सुख के झूले में झूल रही हूँ... उड़ रही हूँ... *आत्मा के सातों गुणों का अनुभव कर रही हूँ...* तभी अचानक कुछ आवाजें मुझ आत्मा को सुनाई देतीं है... *हे माँ कृपा करो, सुख दो शांति दो दया करो रहम करो माँ... मैं आत्मा और ध्यान से इन आवाजों को सुनती हूँ...* तभी कुछ और आवाजें आती है... हे शांति देवा, हे बुद्धि बल दाता रहम करो... *हे संकट मोचन हमारे संकट हरो राह दिखाओं सुख दो शांति दो... दुखी-अंशात आत्माओं की आवाज सुनकर मैं आत्मा अपने ईष्ट देव स्वरूप को इमर्ज करती हूँ...* और मैं आत्मा चलती हूँ बाबा संग उन स्थानों की ओर जहाँ से, ये अशांत दुखी आत्माएँ पुकार रही है...

 

 _ ➳  मैं आत्मा देख रही हूँ... स्वयं को ऊँची चोटी पर स्थित भव्य विशाल मन्दिर में... *मैं अष्ट भुजाधारी माँ दुर्गा हूँ... असुर संहारिणी हूँ पाप नाशिनी हूँ... जग उध्दारक हूँ...* लाखों भक्तों की लाइनें लगी... भक्त आत्माएँ पुकार रही है... *हे जगत जननी माँ... हे पाप नाशिनी... कष्ट हारिणी माँ शांति दो... सुख दो माँ... इन आत्माओं के नयन दो पल की शांति और खुशी के लिए तरस रहे है...* ये दुखियारी आत्माएँ पुकार रही है... हे माँ कृपा करो... रहम करो... *मैं आत्मा अपने वरदानी स्वरूप में स्थित हो जाती हूँ... मुझ आत्मा के नयनों से शांति और पवित्रता की किरणें निकल सभी अशांत दुखी आत्माओं पर पड़ रही है...* सभी आत्माएँ सुख और शांति की अनुभूति कर रही है... उनके सभी कष्ट-पीड़ाएँ समाप्त हो रही है... *मुझ माँ दुर्गा के वरदानी हस्त से शक्तियों की किरणें निकल इन सभी आत्माओं पर पड़ रही है... ये सभी आत्माएँ मजबूत बन रही है... इनका उमंग-उत्साह बढ रहा है... इनका मन शांत हो रहा है...* सभी आत्माओं की मनोकामनाएँ पूर्ण हो रही है...

 

 _ ➳  अब मैं आत्मा देख रही हूँ... स्वयं को बहुत बड़े मन्दिर में अपने वरदानी स्वरूप में... *मैं आत्मा बुद्धि-बल दाता सिद्धि विनायक गणेश हूँ... मैं आत्मा विघ्न-विनाशक हूँ... दुख हर्ता सुख कर्ता हूँ...* मैं वरदानी-महादानी आत्मा देख रही हूँ... भक्तों की भीड़ लगी है... वे पुकार रहे है *हे गणपति देवा दुख हरो... सुख दो ! शांति दो ! हमारे जीवन के विघ्नों को हरो मंगल मोरया...* हे देवा रहम करो... कृपा करो... मुझ वरदानी आत्मा की दृष्टि जैसे-जैसे इन, एक पल की शांति की प्यासी आत्माओं पर पड़ रही है *ये आत्माएँ असीम सुख और शांति का अनुभव कर रही है... मुझ विघ्न विनाशक गणेश के हाथों से शक्तिशाली किरणें इन आत्माओं पर पड़ रही है... इनके विघ्न नष्ट हो रहे है... इनका मनोबल बढ़ रहा है...* इनकी मनोकामनाएं पूर्ण हो रही है... *सभी आत्माएँ खुश होकर जा रही है... भरपूर होकर जा रही है...*

 

 _ ➳  अब मैं आत्मा देख रही हूँ... स्वयं को बहुत बड़े भव्य सुन्दर मन्दिर में अपने वरदानी स्वरूप में... *मैं आत्मा महावीर पवन पुत्र हनुमान हूँ... मैं भव्य मन्दिर में विराजमान संकट मोचन हनुमान हूँ... भक्त आत्माओं की भीड़ लगी है...* डर, चिंता, भय के काले बादलों ने इन आत्माओं के जीवन में ग्रहण लगा दिया है... *अंशात और दुखी होकर वे आत्माएँ पुकार रही है... हे संकट मोचन, हे महावीर हमारा कल्याण करों, शांति दो...* इन दुखों के संकटों से हमें बाहर निकालों... हे महावीर कृपा करो... वे आरती गा रहे है... *जय जय हनुमान गोसाई कृपा करहु गुरु देव की नाई... मुझ संकट मोचन महावीर हनुमान के मस्तक और नयनों से शक्तियों की किरणें निकल कर सभी अशांत, दुखी, परेशान संकट मे घिरी आत्माओं पर पड़ रही है...* इनके कष्ट मिट रहे है... इनके संकट खत्म हो रहे है... *सभी आत्माएँ सुख-शांति की अनुभूति कर रही है... सभी आत्माओं का मनोबल बढ़ रहा है... सभी आत्माएँ खुश और सन्तुष्ट होकर जा रही है...*

 

 _ ➳  अब मैं आत्मा देख रही हूँ... स्वयं को अति सुन्दर विशाल मन्दिर में... *मैं आत्मा माँ सन्तोषी हूँ... सबको सन्तोष देने वाली, मैं मां सन्तोषी देख रही हूँ... भक्तों की भीड़ को जो नंगे पांव सीढीयाँ चढते हे माँ सन्तोषी, सुख दो माँ, शांति दो... जय माँ सन्तोषी कह पुकार रहे है...* वे एक पल की शांति और खुशी की अंचली मांग रहे है... कृपा करो हे जगत जननी कृपा करो... *कुछ आत्माएँ मन्दिर में आरती गा रही है... मैं तो आरती उतारु रे सन्तोषी माता की जय जय सन्तोषी माता जय जय माँ...* मुझ माँ सन्तोषी के नयनों से शीतल किरणें इन सभी आत्माओं पर पड़ रही है... *ये सभी आत्माएँ सुख और शांति की अनुभूति कर रही है...* मुझ सन्तोषी माँ के वरदानी हाथों से किरणें निकल इन आत्माओं पर पड़ रही है... सभी आत्माओं की मनोकामनाएं पूर्ण हो रही है... *इनका मन शांत हो गया है... सन्तोष से परिपूर्ण हो गया है... सभी आत्माएँ सन्तुष्ट होकर जा रही है... खुश होकर जा रही है... शुक्रिया मीठे बाबा शुक्रिया...*

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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