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 01 / 04 / 19  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *"हमारा सबसे ऊंचा कुल है" - सदा यह स्मृति रही ?*

 

➢➢ *योग अग्नि द्वारा पाप नाश किये ?*

 

➢➢ *माया के विकराल रूप के खेल को साक्षी होकर देखा ?*

 

➢➢ *किसी के भाव स्वभाव से जले तो नहीं ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  अभ्यास की प्रयोगशाला में बैठ, योग का प्रयोग करो तो एक बाप का सहारा और माया के अनेक प्रकार के विघ्नों का किनारा अनुभव करेंगे। *अभी ज्ञान के सागर, गुणों के सागर, शक्तियों के सागर में ऊपर-ऊपर की लहरों में लहराते हो इसलिए अल्पकाल की रिफ्रेशमेंट अनुभव करते हो। लेकिन अब सागर के तले में जाओ तो अनेक प्रकार के विचित्र अनुभव कर रत्न प्राप्त करेंगे।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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✺   *"मैं विघ्न-विनाशक अचल-अड़ोल आत्मा हूँ"*

 

  सदा अपने को अचल अडोल आत्मायें अनुभव करते हो? किसी भी प्रकार की हलचल अचल अडोल स्थिति में विघ्न नहीं डाले। ऐसी विघ्न-विनाशक अचल अडोल आत्मायें बने हो। विघ्न-विनाशक आत्मायें हर विघ्न को ऐसे पार करती जैसे विघ्न नहीं - एक खेल है। तो खेल करने में सदा मजा आता है ना। कोई परिस्थिति को पार करना और खेल करना अन्तर होगा ना। *अगर विघ्न-विनाशक आत्मायें हैं तो परिस्थिति खेल अनुभव होती है। पहाड़ राई के समान अनुभव होता है। ऐसे विघ्न-विनाशक हो, घबराने वाले तो नहीं।*

 

  नालेजफुल आत्मायें पहले से ही जानती हैं कि यह सब तो आना ही है, होना ही है। जब पहले से पता होता है तो कोई बात-बड़ी बात नहीं लगती। अचानक कुछ होता है तो छोटी बात भी बडी लगती। पहले से पता होता तो बडी बात भी छोटी लगती। *आप सब नालेजफुल हो ना। वैसे तो नालेजफुल हो लेकिन जब परिस्थितियों का समय होता है उस समय नालेजफुल की स्थिति भूले नहीं, अनेक बार किया हुआ अब सिर्फ रिपीट कर रहे हो। जब नथिंग न्यु है तो सब सहज है।*

 

  आप सब किले की पक्की ईटें हो। एक-एक ईट का बहुत महत्व है। एक भी ईट हिलती तो सारी दिवार को हिला देती। *तो आप ईट अचल हो, कोई कितना भी हिलाने की कोशिश करे लेकिन हिलाने वाला हिल जाए आप न हिलें।  ऐसी अचल आत्माओंको, विघ्न विनाशक आत्माओंको बापदादा रोज मुबारक देते हैं।* ऐसे बच्चे ही बाप की मुबारक के अधिकारी हैं। ऐसे अचल अडोल बच्चों को बाप और सारा परिवार देखकर हर्षित होता है।

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  अपरोक्ष रीति से वतन का अनुभव बताया। अपरोक्ष रूप से कितना समय वतन में साथ रहते हो? जैसे इस वक्त जिसके साथ स्नेह होता है, वह कहां विदेश में भी है तो उनका मन ज्यादा उस तरफ रहता है। जिस देश में वह होता है उस देश का वासी अपने को समझते हैं। *वैसे ही तुमको अब सूक्ष्मवतनवासी बनना है*।

  

✧  सूक्ष्मवतन को स्थूलवतन में इमर्ज करते हो वा खुद को सूक्ष्मवतन में साथ समझते हो? क्या अनुभव है? *सूक्ष्मवतनवासी बाप को यहाँ इमर्ज करते हो वा अपने को भी सूक्ष्मवतनवासी बनाकर साथ रहते हो*? बापदादा तो यही समझते हैं कि स्थूलवतन में रहते भी सूक्ष्मवतनवासी बन जाते, यहाँ भी जो बुलाते हो यह भी सूक्ष्मवतन के वातावरण में ही सूक्ष्म से सर्वीस ले सकते हो। अव्यक्त स्थिती में स्थित होकर मदद ले सकते हो। व्यक्त रूप में अव्यक्त मदद मिल सकती है।

     

✧  *अभी ज्यादा समय अपने को फरिश्ते ही समझो*। फरिश्तों की दुनिया में रहने से बहुत ही हल्कापन अनुभव होगा जैसे कि सूक्ष्म वतन को ही स्थूलवतन में बसा दिया है। स्थूल और सूक्ष्म में अन्तर नहीं रहेगा। तब सम्पूर्ण स्थिती में भी अन्तर नहीं रहेगा। यह व्यक्त देश जैसे अव्यक्त देश बन जायेगा। सम्पूर्णता के समीप आ जायेगे।

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧  *ऐसे समझें अन्त तक पहले पाठ के अभ्यासी रहेंगे?* अन्त तक अभ्यासी हो रहेंगे व स्वरूप भी बनेंगे? *अन्त के कितना समय पहले ये अभ्यास समाप्त होगा और स्वरूप बन जायेंगे? जब तक शरीर छोड़ेंगे तब तक अभ्यासी रहेंगे?*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- सब ख़त्म हो जाना है इसलिए बेहद का वैराग्य रखना"*

 

➳ _ ➳  मैं आत्मा हद की दुनिया, वस्तु, वैभव, हद के संबंधों से न्यारी होती हुई बेहद बाबा के पास बेहद की दुनिया में पहुँच जाती हूँ... वतन में बेहद बाबा के सम्मुख बैठ उनको निहारती हुई उनकी आँखों में खो जाती हूँ... मैं आत्मा इस देह की भी सुध-बुध खो बैठी हूँ... *कई जन्मों से मैं आत्मा इस देह, देह के सम्बन्धी, देह के पदार्थों के वश होकर काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार जैसे विकारों को अपना संस्कार बना ली थी... और अपने निज स्वरुप और निज गुणों को भूल गई थी... मैं आत्मा बेहद की सन्यासी बनने वतन में आकारी शरीर धारण कर आकारी बाबा की शिक्षाओं को धारण कर रही हूँ...* 

 

❉   *नई दुनिया का निर्माण करते हुए इस पुरानी दुनिया से बेहद का वैरागी बनाने प्यारे बाबा कहते हैं:-* मेरे मीठे फूल बच्चे... *इस पुरानी दुखदायी विकारी दुनिया से दिल जो लगाओगे तो उन्ही दुखो में अपना दामन उलझाओगे... तो अब समझदार बन अपना भला करो... अपनी कमाई अपने फायदे के बारे में निरन्तर सोचो...* और दिल उस मीठी सुखदायी दुनिया से लगाओ जो पिता से तोहफा मिल रहा...

 

➳ _ ➳  *मैं आत्मा पुरानी दुनिया से सन्यास लेकर निज स्वरुप में चमकते हुए, गुणों की खुशबू से महकते हुए कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे प्यारे बाबा... *मै आत्मा अब नये घर नयी दुनिया के सपनो में खोयी हूँ यह दुखदायी दुनिया मेरे काम की नही है...* मै आत्मा बाबा के बसाये सुखभरे स्वर्ग को यादो में बसाकर मुस्कराती ही जा रही हूँ...

 

❉   *दुखों का साया मिटाकर स्वर्ग के नजारों को दिखाते हुए मेरे प्रीतम प्यारे मीठे बाबा कहते हैं:-* मीठे प्यारे लाडले बच्चे... *इस दुःख धाम से अब बेहद के वैरागी बनो... इस दुनिया में अब ऐसा कुछ नही है जिससे दिल लगाया जाय... अब तो ईश्वर पिता सम्मुख है... उससे उसकी सारी सम्पत्ति खजानो को बाँहों में भरने का खबसूरत समय है...* तो यादो में डूबकर ईश्वर पिता को पूरा लूट लो...

 

➳ _ ➳  *सुखों के दीप जलाकर सद्गुणों का श्रृंगार कर दिव्य जीवन बनाकर मैं आत्मा कहती हूँ:-* मेरे प्राणप्रिय बाबा...मै आत्मा मीठे बाबा की सारी सम्पत्ति की हकदार बन रही हूँ... *सिर्फ यादो मात्र से सच्चे स्वर्ग को घर रूप में पाने वाली महान भाग्यशाली बन रही हूँ... और इस पतित दुनिया को सदा का भूल गई हूँ... और नयी दुनिया में खो गयी हूँ...*

 

❉   *अंतर्मन की प्यास बुझाकर जीवन को ज्योतिर्मय बनाते हुए मेरे ज्योतिर्बिन्दु बाबा कहते हैं:-* प्यारे सिकीलधे मीठे बच्चे... *कितने महान भाग्यशाली हो ईश्वर स्वयं धरती पर उतर आया है और पत्थरो की दुनिया से निकाल कर सोने की दुनिया स्वर्ग में स्थापित कर रहा है... इस महान भाग्य के नशे से रोम रोम को भिगो दो...* और इस पुरानी दुनिया से उपराम होकर ईश्वरीय सौगात के स्वर्ग में विचरण करो...

 

➳ _ ➳  *प्यारे बागबान बाबा के गुलदस्ते में सजकर मन उपवन में मयूरी बन नाचते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... *मै आत्मा मीठे बाबा को पाकर निहाल हूँ अपने अदभुत से भाग्य पर चकित सी हूँ... इस दुनिया में खपकर एक कण सच्चा प्यार न मिला और बाबा की यादो भर में सुखो का स्वर्ग घर रूप में मिला...* तो क्यों न इस सच्चे रिश्ते में भीगूँ और रोम रोम से मीठे बाबा को याद करूँ...

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- योग अग्नि द्वारा पाप नाश करने हैं*"

 

➳ _ ➳  कर्मो की गुह्य गति का ज्ञान देने वाले अपने प्यारे शिव पिता परमात्मा द्वारा उच्चारे महावाक्यों को स्मृति में लाकर, एकान्त में बैठ मैं उन पर विचार सागर मन्थन कर रही हूँ और सोच रही हूँ कितनी गुह्य है कर्मो की गति। *देह अभिमान में आकर मनुष्य द्वारा किया हुआ एक छोटा सा कर्म यहां तक कि मन मे किसी के प्रति चलने वाला एक गलत संकल्प भी कितना बड़ा हिसाब किताब बना देता है*! पूरे 63 जन्म ना जाने ऐसे कितने हिसाब - किताब जाने - अनजाने मुझ आत्मा से बने हैं। अज्ञानता के कारण ना जाने ऐसे कितने विकर्म मुझ आत्मा से होते आये जिनका बोझ मुझ आत्मा के ऊपर चढ़ता गया।

 

➳ _ ➳  किन्तु अब जबकि बाबा ने आकर कर्मो की अति गुह्य गति का राज़ बिल्कुल स्पष्ट रीति समझा दिया है और साथ ही कर्मो का जो खाता जाने अनजाने में मुझ आत्मा से बन चुका है उसे साफ करने का भी कितना सहज उपाय मेरे दिलाराम बाबा ने आकर मुझे समझाया है। *सहज राजयोग द्वारा, योगबल से पुराने कर्मो के खाते को साफ करने की जो सुन्दर विधि मेरे बाबा ने आकर मुझे सिखाई है उसके लिए दिल से बाबा को शुक्रिया अदा करके, अब मैं अपने द्वारा किये हुए 63 जन्मो के विकर्मो को योगबल से भस्म करने के लिए स्वयं को अपने आत्मिक स्वरूप में स्थित करती हूँ* और देह से न्यारी अशरीरी आत्मा बन देह से बाहर निकल आती हूँ।

 

➳ _ ➳  साक्षी होकर अपनी देह को और अपने आस - पास उपस्थित हर वस्तु को देखते हुए, इन सबके आकर्षण से स्वयं को मुक्त अनुभव करते हुए मैं चैतन्य शक्ति आत्मा निर्बन्धन होकर अब ऊपर आकाश को ओर चल पड़ती हूँ। *5 तत्वों से बनी साकारी दुनिया को  पार कर, सूर्य, चांद, और समस्त तारामण्डल को क्रॉस करती हुई उससे ऊपर फरिश्तो की आकारी दुनिया को पार करके अपनी निराकारी दुनिया में मैं प्रवेश करती हूँ और अपने निराकार शिव पिता के पास जाकर, उनकी सर्वशक्तियों की किरणों रूपी बाहो में समा जाती हूँ*। अपने प्यारे प्रभु की किरणों रूपी बाहों के झूले में झूलती उनसे मंगल मिलन मनाकर अब मैं उनकी सर्वशक्तियों की जवालास्वरूप किरणों के नीचे बैठ जाती हूँ।

 

➳ _ ➳  अपनी बीज रूप अवस्था में स्थित होकर, बीज रूप अपने शिव पिता परमात्मा की सर्वशक्तियों के नीचे जा कर बैठते ही उन  शक्तियों का प्रवाह तीव्र होने लगता है और देखते ही देखते अग्नि का रूप धारण कर लेता है। *योग की एक ऐसी अग्नि मेरे चारों और प्रज्वलित हो उठती है, जिसमे मुझ आत्मा के ऊपर चढ़ी विकारों की कट जलने लगती है, विकर्म विनाश होने लगते है और जो भी पुराने कर्मो का खाता है वो साफ होने लगता है*। मैं स्पष्ट अनुभव कर रही हूँ योग की अग्नि में जलकर जैसे - जैसे पुराने कर्मो का खाता साफ हो रहा है मेरी खोई हुई चमक पुनः लौट रही है। स्वयं को मैं बहुत ही लाइट और माइट अनुभव कर रही हूँ।

 

➳ _ ➳  ईश्वरीय शक्तियों से भरपूर सूक्ष्म ऊर्जा का भण्डार बन, अपने चारों और सर्वशक्तियों के दिव्य कार्ब को धारण कर अब मैं आत्मा देह की दुनिया मे कर्म करने के लिए वापिस लौट रही हूँ। *साकार सृष्टि पर आकर, अपने साकार शरीर मे मैं आत्मा प्रवेश करती हूँ और भृकुटी के अकाल तख्त पर विराजमान हो जाती हूँ*। विकर्मो का बोझ अंशमात्र भी मुझ आत्मा के ऊपर ना रहे इसके लिए अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित होकर अब मैं घड़ी - घड़ी साकारी सो निराकारी स्वरूप की ड्रिल करते हुए, योग का बल अपने अन्दर जमा कर रही हूँ।

 

➳ _ ➳  ईश्वरीय सेवा अर्थ साकार सृष्टि पर आकर अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित होना और सेवा से उपराम होकर, *अपने निराकार स्वरूप में स्थित हो, परमधाम जाकर बीज रूप स्थिति में स्थित होकर, बीज रूप परमात्मा की सर्वशक्तियों की जवालास्वरूप किरणों के नीचे बैठ, पुराने कर्मो के खाते को योगबल से साफ करने का पुरुषार्थ अब मैं निरन्तर कर रही हूँ*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

✺   *मैं माया के विकराल रूप के खेल को साक्षी हो कर देखने वाली मायाजीत आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

✺   *मैं किसी के भाव-स्वभाव में जलने से मुक्त होने वाली, व्यर्थ बातों को एक कान से सुन दूसरे से निकाल देने वाली सहनशील आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  आजकल के लोग एक तरफ स्व प्राप्ति के लिए इच्छुक भी हैं, लेकिन हिम्मतहीन हैं। हिम्मत नहीं है। सुनने चाहते भी हैं, लेकिन बनने की हिम्मत नहीं है। ऐसी आत्माओं को परिवर्तन करने के लिए पहले तो आत्माओं को हिम्मत के पँख लगाओ। हिम्मत के पँख के आधार है अनुभव। अनुभव कराओ। *अनुभव ऐसी चीज है, जरा सी अंचली मिलने के बाद अनुभव किया तो अनुभव के पँख कहो, या अनुभव के पाँव कहो उससे हिम्मत में आगे बढ़ सकेंगे।* इसके लिए विशेष इस वर्ष निरन्तर अखण्ड महादानी बनना पड़े, अखण्ड। मन्सा द्वारा शक्ति स्वरूप बनाओ। महादानी बन मन्सा द्वारा, वायब्रेशन द्वारा निरन्तर शक्तियों का अनुभव कराओ। वाचा द्वारा ज्ञान दान दो, कर्म द्वारा गुणों का दान दो। *सारा दिन चाहे मन्सा, चाहे वाचा, चाहे कर्म तीनों द्वारा अखण्ड महादानी बनो। समय प्रमाण अभी दानी नहीं, कभी-कभी दान किया, नहीं, अखण्ड दानी क्योंकि आत्माओं को आवश्यकता है।*

 

✺   *ड्रिल :-  "आत्माओं को हिम्मत के पँख लगाने का अनुभव"*

 

 _ ➳  मैं आत्मा कितनी सौभाग्यशाली हूँ जो स्वयं भगवान ने मुझे ढूंढ लिया और सृष्टि के आदि मध्य अंत का ज्ञान दे मुझे भटकने से बचा लिया... बाबा के दिये ज्ञान को बुद्धि में बिठा मैं आत्मा अपने जीवन को परिवर्तित कर रही हूँ... बाबा से योग लगा कर उनकी सर्व शक्तियों को स्वयं में भरकर अपने विकारों को दूर कर रही हूँ... *एक ओर जहां विश्व की अन्य आत्मायें ईश्वर को पाने के लिए भटक रही हैं और व्रत तप उपवास तीर्थ यात्रायें कर रही हैं वहीं मैं आत्मा हर रोज़ आपसे मिलन मना रही हूँ...* मेरे बाबा से मिले प्यार को और उनके परिचय को अब मुझे सभी आत्माओ को देना है... मैं आत्मा अपने प्राण प्यारे बाबा को याद कर रही हूँ और देह के बंधन से मुक्त होकर ऊपर की ओर उड़ जाती हूँ... फरिश्ता बन कर सूक्ष्म वतन में प्रवेश करती हूँ...

 

 _ ➳  सूक्ष्म वतन में ब्रह्मा बाबा के सम्मुख आकर ठहरती हूँ... *बाबा से निकलते सफेद प्रकाश से सारा सूक्ष्म वतन चांदनी सा जगमगा रहा है...* बाबा की ये शीतल किरणें मुझ पर पड़ने से मैं भी चमक उठी हूँ... मैं बड़े से प्यार से बाबा से दृष्टि ले रही हूँ और देखती हूँ कि ब्रह्मा बाबा की भृकुटि में शिव बाबा प्रवेश करते हैं... *शिवबाबा के प्रवेश करने से ब्रह्मा बाबा दिव्य तेज से आलोकित होने लगते हैं...* और बापदादा की ये अत्यन्त ही पॉवरफुल किरणें मुझ फरिश्ते में भी समाने लगती हैं... मैं बापदादा के प्रेम में डूबती जा रही हूँ और उनके स्नेह को स्वयं में समाकर इस सृष्टि का चक्र लगाने नीचे की ओर आ रही हूँ...

 

 _ ➳  नीचे की ओर उतरते हुए मैं विश्व के ग्लोब पर आकर बैठ गई हूँ... और विश्व की समस्त आत्माओ को देख रही हूँ... मैं देखती हूँ कि कई आत्मायें जिन्होंने बाबा का ज्ञान भी सुना है और स्वयं को परिवर्तन भी करना चाहती हैं परंतु आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं जुटा पाती... स्वप्राप्ति की इच्छा रखती हैं पर हिम्मत की कमी से आगे नहीं बढ़ पा रही हैं... *ऐसी सभी आत्माओ को मैं शक्तिशाली वाइब्रेशन दे रही हूँ जिससे ये आत्मायें हिम्मतवान बन अपनी कमी कमज़ोरियों को दूर कर रही हैं और स्वयं को परिवर्तित कर रही हैं...*

 

 _ ➳  अब मैं आत्मा साकार लोक में वापस आती हूँ और अपनी देह में फरिश्ते रूप से प्रवेश कर रही हूं... मैं आत्मा स्वयं को बेहद शक्तिशाली महसूस कर रही हूँ... मैं आत्मा अन्य आत्माओ के सम्पर्क में आती हूँ तो *मेरे चेहरे की मुस्कान और मीठे स्वभाव से आत्मायें महसूस करती हैं कि इन्हें ज़रूर कुछ मिल गया है जो ये इतने परिवर्तित हो गए हैं...* और मेरे साथ उनका ये अनुभव उन्हें भी परिवर्तित होने में मदद कर रहा है... मुझ आत्मा को देख कर उनमे भी हिम्मत आती है कि वे भी स्व को परिवर्तन कर सकती हैं... *मैं अपने अनुभव से उन्हें भी उमंग उत्साह के पंख देकर उनको आगे बढ़ाने के निमित बन रही हूँ...*

 

 _ ➳  मैं आत्मा अपने सर्व ओर की आत्माओ को निरंतर पॉवरफुल वाइब्रेशन दे रही हूँ... सभी आत्मायें इन वाइब्रेशन को कैच करती हैं और स्वयं में शक्तियों को अनुभव कर रही हैं... *मैं आत्मा कभी उनको मन्सा द्वारा शक्तियों का अनुभव करा रही हूँ तो कभी वाणी से उन्हें ज्ञान देकर उनके मन को शक्तिशाली बना रही हूँ...* कभी कर्म द्वारा उन्हें गुणों का दान दे रही हूँ... अपने प्यारे बाबा की संतान मैं आत्मा मन्सा वाचा कर्मणा गुणों और शक्तियों का दान अपने सभी भाई बहनों को देकर उन्हें भी हिम्मत के पंख दे आगे बढ़ाती जा रही हूँ...

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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