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 01 / 05 / 22  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *सर्व किनारों को छोड़ एक बाप को अपना सहारा बनाया ?*

 

➢➢ *व्यक्त से अव्यक्त होने का अभ्यास किया ?*

 

➢➢ *एकान्तप्रिय , एकनामी और एकरस होकर एक का पाठ पक्का किया ?*

 

➢➢ *यथा शक्ति न बन सदा सर्व्शाक्तिवान बनकर रहे ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *तपस्वी अर्थात् सदा बाप की लगन में लवलीन, प्रेम के सागर में समाए हुए, ज्ञान, आनन्द, सुख, शान्ति के सागर में समाये हुए को ही कहेंगे तपस्वी।* ऐसे त्याग, तपस्या वाले ही सेवाधारी कहे जाते हैं।

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं बाबा की अति स्नेही और सहयोगी आत्मा हूँ"*

 

   सदा बाप की अति स्नेही, सहयोगी आत्मायें अनुभव करते हो? स्नेही की निशानी क्या होती है? जिससे स्नेह होता है उसके हर कार्य में सहयोगी जरूर होंगे। *अति स्नेही आत्मा की निशानी सदा बाप के श्रेष्ठ कार्य में सहयोगी होगी। जितना जितना सहयोगी, उतना सहजयोगी क्योंकि बाप के सहयोगी हैं ना। दिन-रात यही लग्न रहे-बाबा और सेवा, इसके सिवाए कुछ है ही नहीं। अगर लौकिक कार्य भी करते हो तो बाप की श्रीमत प्रमाण करते हो, इसलिए वह भी बाप का कार्य है।*

 

  *लौकिक में भी अलौकिकता ही अनुभ्व करेंगे, कभी लौकिक कार्य समझ न थकेगे, न फंसेंगे, न्यारे रहेंगे। तो ऐसे स्नेही और सहयोगी आत्मायें हो। न्यारे होकर कर्म करेंगे तो बहुत अच्छा कर्म होगा। कर्म में फंसकर करने से अच्छा नहीं होता, सफलता भी नहीं होती, मेहनत भी बहुत और प्राप्ति भी नहीं। इसलिए सदा बाप के स्नेह में समाई हुई सहयोगी आत्मायें हैं।* सहयोगी आत्मा कभी भी माया की योगी हो नहीं सकती, उसका माया से किनारा हो जायेगा।

 

  *हर संकल्प में 'बाबा' और 'सेवा', तो जो नींद भी करेंगे, उसमें भी बड़ा आराम मिलेगा, शान्ति मिलेगी, शक्ति मेलेगी। नींद, नींद नहीं होगी, जैसे कमाई करके खुशी में लेटे हैं। इतना परिवर्तन हो जाता है! 'बाबा-बाबा' करते रहो। बाबा कहा और कार्य सफल हुआ पड़ा है। क्योंकि बाप सर्वशक्तिवान है। सर्वशक्तिवान बाप की याद स्वत: ही हर कार्य को शक्तिशाली बना देती है।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  मास्टर आलमाइटी अथार्टी अपने को समझते हो? *जब आलमाइटी अथार्टी भी हो तो क्या अपनी बुद्धि की लगन को अथार्टी से जहाँ चाहो वहाँ नहीं लगा सकते?* अथार्टी के आगे यह अभ्यास मुश्किल है वा सहज है? जैसे स्थूल कर्मेन्द्रियों को जब चाहो, जहाँ चाहो वहाँ लगा सकते हो ना। 

 

✧  अभी हाथ को ऊपर या नीचे करना चाहो तो कर सकते हो ना। *तो जैसे स्थूल में इन्द्रियों का मालिक बन जब कार्य में लगा सकते हो वैसे ही संकल्प को वा बुद्धि को जहाँ लगाने चाहो वहाँ लगा सकते हो इसको ही ईश्वरीय अथार्टी कहा जाता है।* जो बुद्धि की लगन भी ऐसे ही सहज जहाँ चाहो वहाँ लगा सकते हो जैसे स्थूल हाथ - पाँव को बिल्कुल सहज रीति जहाँ चाहो वहाँ चलाते हैं। वा कर्म में लगाते हैं। ऐसे अभ्यासी को ही मास्टर सर्वशक्तिवान वा मास्टर नाँलेजफुल कहा जाता है।

 

✧  अगर यह अभ्यास नहीं है तो मास्टर सर्वशक्तिवान वा नाँलेजफुल नहीं कह सकते। *नाँलेजफुल का अर्थ ही है जिसको फुल नाँलेज हो कि इस समय क्या करना है, क्या नहीं करना है। इससे क्या लाभ है, और न करने से क्या  हानी है।* यह नाँलेज रखने वाले ही नाँलेजफुल हैं और साथ - साथ मास्टर सर्वशक्तिवान होने कारण सर्व शक्तियों के आधार से यह अभ्यास सहज और निरंतर बन ही जाता है।

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧  सभी स्वयं को कर्मातीत अवस्था के नजदीक अनुभव करते जा रहे हो? *कर्मातीत अवस्था के समीप पहुँचने की निशानी जानते हो? समीपता की निशानी समानता है।* किस बात में? आवाज में आना व आवाज से परे हो जाना साकार स्वरूप में कर्मयोगी बनना और साकार स्मृति से परे न्यारे निराकारी स्थिति में स्थित होना, सुनना और स्वरूप होना, मनन करना और मग्न रहना, रूह-रूहान में आना और रूहानियत में स्थित हो जाना, सोचना और करना, कर्मेन्द्रियों द्वारा प्राप्त हुए साधनों को स्वयं प्रति कार्य में लगाना और प्रकति के साधनों से समय प्रमाण निराधार होना, देखना, सम्पर्क में आना और देखते हुए न देखना, सम्पक में आते कमल-पुष्प् के समान रहना, इन सभी बातों में समानता। *उसको कहा जाता है - कर्मातीत अवस्था की समीपता।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  तपस्या का फाउंडेशन बेहद का वैराग्य"*

 

_ ➳  सुबह की गुलाबी सी धूप में सूर्य की सुनहरी किरणों को... गुलाब के फूलो पर गिरते हुए देख रही हूँ... कि *ये किरणे किस तरहा गुलाब के सौंदर्य में चार चाँद लगा रही है... उनका रूप लावण्य किस कदर चमक उठा है.*.. और फिर मै आत्मा अपने ज्ञान सूर्य बाबा की यादो में खो जाती हूँ... मुझ आत्मा के देह की संगति में कंटीले स्वरूप.... *कैसे मेरे बाबा ने अपनी शक्तियो और गुणो की किरणों में... रूहानियत से भर कर खिला हुआ, खुशबूदार फूल बना दिया है... कि आज मेरी सुगन्ध का विश्व मुरीद हो गया है..*. मुझे जो सौंदर्य मिला है वह स्वयं भगवान ने दिया है... जो पूरे विश्व में कहीं और मिल ही नही सकता है... सारा विश्व इस खूबसूरती को चाह रहा है... और *यह मेरी जागीर बन गया है क्योकि सिर्फ मेरे पास ही तो भगवान है.*..

 

   *मीठे बाबा ने मुझ आत्मा को देहभान से न्यारा बनाते हुए कहा :-* "मीठे प्यारे फूल बच्चे... मीठे बाबा के साथ की ऊँगली पकड़कर... इस देह भान से उबर कर... स्वयं को आत्मिक स्वरूप में स्थित करो... इस पतित और विकारो से ग्रसित दुनिया में लिप्त रहकर... बुद्धि को और ज्यादा मलिन न करो... *ईश्वर पिता की यादो भरे हाथ को पकड़कर, बेहद के सन्यासी बनकर मुस्कराओ.*.."

 

_ ➳  *मै आत्मा मीठे बाबा से देवताई श्रंगार पाकर कहती हूँ :-* "मीठे मीठे बाबा मेरे... मै आत्मा आपकी छत्रछाया में दुखो की दुनिया से निकलकर... सुखो भरी छाँव में आ गयी हूँ... *हद के दायरों से निकलकर, बेहद की सन्यासी बन, असीम खुशियो से भर गयी हूँ.*.. मेरा जीवन खुशनुमा बहारो से भर गया है..."

 

   *प्यारे बाबा ने मुझ आत्मा को कांटे से खुशबूदार फूल बनाते हुए कहा :-* "मीठे प्यारे लाडले बच्चे... संगम के वरदानी समय में ईश्वरीय यादो की बहारो से सजे... खुशनुमा मौसम में अपने महान भाग्य के मीठे गीत गाओ... *पतित दुनिया की हदो से निकलकर... बेहद के गगन में, खुशियो भरा उन्मुक्त पंछी बन उड़ जाओ..*. बेहद के सन्यासी बन तपस्या में खो जाओ..."

 

_ ➳  *मै आत्मा मीठे बाबा की बाँहों में अपना सतयुगी भाग्य सजाकर कहती हूँ :-* "ओ मेरे प्यारे बाबा... *आपने मेरा जीवन खुशियो का चमन बना दिया है... ज्ञान और याद की रौनक से झिलमिला कर, आत्मिक भाव में जगमगा दिया है.*.. मै आत्मा देह की सारी सीमाओ से निकल कर... बेहद के आसमाँ में खुशियो की परी बनकर उड़ रही हूँ...

 

   *मीठे बाबा ने मुझ आत्मा को सतयुगी दुनिया का मालिक बनाते हुए कहा :-* "मीठे प्यारे सिकीलधे बच्चे... सदा ईश्वरीय यादो में खोये रहो... भगवान को पाकर भी, अब देह की मिटटी में मनबुद्धि के हाथो को पुनः मटमैला न करो...इस पतित दुनिया में स्वयं को और न फंसाओ... *बेहद के वैराग्य को अपनाकर, यादो में मन बुद्धि को निर्मलता से सजाकर... असीम सुखो के अधिकारी बन मुस्कराओ.*.."

 

_ ➳  *मै आत्मा प्यारे बाबा की श्रीमत को दिल में समाकर जीवन को खुबसूरत बनाकर कहती हूँ :-* "प्यारे प्यारे बाबा मेरे... आपने मेरा जीवन बेहद के सन्यास से भरकर, कितना हल्का और प्यारा कर दिया है... मन और बुद्धि व्यर्थ से निकलकर... अब कितनी प्यारी और सुखदायी हो गयी है... *मेरे सारे बोझ काफूर हो गए है, और मै आत्मा बेफ़िक्र बादशाह बनकर मुस्करा रही हूँ.*.."मीठे बाबा को अपना प्यारा मन और बुद्धि की झलक दिखाकर, मै आत्मा... कर्मक्षेत्र पर लौट आयी...

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- सर्व प्रकार के सहारे छोड़ सिर्फ एक को अपना सहारा अनुभव करना*"

 

_ ➳  इस देह, देह की दुनिया और देह से जुड़े सम्बन्धों में उलझे सारे संसार की सभी मनुष्य आत्माओं की दुर्दशा के बारे में एकान्त में बैठ मैं विचार कर रही हूँ कि आज मनुष्य कैसा बन गया है कि रिश्तों की मर्यादा को ही भूल गया है। *बस अपना स्वार्थ पूरा करने के लिए सब एक दूसरे कर साथ जुड़े तो है किन्तु काँटे बन एक दूसरे को ही लहू लुहान कर रहें हैं*। इसलिए आज यह दुनिया जो कभी फूलों का बगीचा थी, काँटो का जंगल बन गई है जहाँ सभी एक दो को काँटा लगाकर एक दूसरे को दुख और पीड़ा ही दे रहें हैं। *धन्यवाद मेरे प्यारे पिता का जिन्होंने मुझे इस काँटो के जंगल से निकाल फूलों के बगीचे में चलने का अति सहज रास्ता दिखा दिया है*।

 

_ ➳  अपने प्यारे पिता का दिल की गहराइयों से शुक्रिया अदा करके, देह, देह की दुनिया और देह से जुड़े हर सम्बन्ध से किनारा कर, "मेरा तो एक दूसरा ना कोई" इस निश्चय में स्थित होकर, एकांतवासी बन उस एक अपने प्यारे पिता की याद में अपने मन और बुद्धि को मैं एकाग्र करके बैठ जाती हूँ। *अंतर्मुखता की गुफा में बैठ, अपने मीठे बाबा की दिल को सुकून देने वाली अति मीठी याद में खोये हुए, मैं स्वयं को एक बहुत सुंदर खुशबूदार फूलों के बगीचे में देख रही हूँ*। मेरे ऊपर मेरे दिलाराम बाबा अपने स्नेह के पुष्पों की वर्षा कर रहें हैं। उनके प्यार की शीतल फुहारें मुझे आनन्दित कर रही है। *मेरा मन मयूर खुशी में नाच रहा है और दिल के सितार का हर तार जैसे गा रहा है कि बाबा ही मेरा संसार है*।

 

_ ➳  दिल को आराम देने वाली अपने दिलाराम बाबा की याद में बैठ, इस खूबसूरत दृश्य का भरपूर आनन्द लेकर, अपने जीवन को अपने प्रेम के रंग से महकाने वाले अपने मीठे बाबा से स्नेह मिलन मनाने के लिए अब मैं मन बुद्धि की एक अति सुखदाई, आनन्दमयी आंतरिक यात्रा पर चल पड़ती हूँ। *अपने निराकार स्वरूप में, निराकार शिव पिता से उनकी निराकारी दुनिया मे स्नेह मिलन मनाने की रूहानी यात्रा पर धीरे - धीरे आगे बढ़ती हुई मैं देह की कुटिया से बाहर निकलती हूँ और ऊपर आकाश की ओर उड़ जाती हूँ*। उमंग उत्साह के पँख लगाए, मंगल मिलन के गीत गाती अपने प्यारे पिता के प्रेम की लगन में मग्न मैं आत्मा पँछी, पुरानी दुनिया को भूल उस लोक की ओर जा रही हूँ जो स्थूल और सूक्ष्म हदों से भी परें हैं।

 

_ ➳  पाँच तत्वों की बनी साकारी दुनिया को पार कर, आकारी फरिश्तो की दुनिया से होती हुई मैं पहुँच जाती हूँ आत्माओं की निराकारी दुनिया में। वाणी से परे अपने इस निर्वाण धाम घर में पहुंच कर मैं गहन सुख और शांति का अनुभव कर रही हूँ। देख रही हूँ मैं अपने सामने अपने शिव परम पिता परमात्मा को। *शक्तियों की अनन्त किरणे बिखेरता उनका अति सुंदर मनोहारी स्वरूप मन को लुभा रहा है। मन बुद्धि रूपी नेत्रों से एकटक उन्हें निहारते हुए धीरे - धीरे मैं उनके बिल्कुल समीप पहुँच जाती हूँ। और उनकी सर्वशक्तियों की किरणो की छत्रछाया के नीचे जा कर बैठ जाती हूँ*। बाबा का असीम स्नेह और वात्सलय उनकी ममतामयी किरणों के रूप में निरन्तर मुझ पर बरसते हुए, मुझमे असीम बल भर कर मुझे शक्तिशाली बना रहा है।

 

_ ➳  बाबा के इस निस्वार्थ प्रेम को स्वयं में समा कर अब मैं वापिस लौट आती हूँ और अपने साकार तन में भृकुटि के अकालतख्त पर आकर फिर से विराजमान हो जाती हूँ। अपने ब्राह्मण स्वरूप में अब मैं स्थित हूँ और बाबा के प्रेम की लगन में मग्न हो कर हर कर्म कर रही हूँ। *बाबा के असीम स्नेह और प्यार की अनुभूति मुझे देह से जुड़े रिश्तों रूपी पुराने काँटो से सम्बन्ध तोड़ने में विशेष मदद कर रही है। चलते - फिरते हर कर्म करते अब मेरी बुद्धि का योग बाबा के साथ स्वत: ही जुटा रहता है*। मनमनाभव की स्थिति में सदा स्थित रहते हुए , हर पल, हर घड़ी बाबा की छत्रछाया के नीचे रहकर, निश्चय बुद्धि निश्चिन्त अवस्था का अनुभव अब मैं हर पल कर रही हूँ। *"मेरा तो एक, दूसरा ना कोई" इस निश्चय में पक्का रहते हुए मैं सहजयोगी जीवन जीने का भरपूर आनन्द प्रतिपल ले रही हूँ*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं यथार्थ याद द्वारा सर्व शक्ति सम्पन्न बनने वाली सदा शस्त्रधारी आत्मा हूँ।*

   *मैं कर्मयोगी आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा संकल्प और कर्म को सदा महान बना लेती हूँ  ।*

   *मैं मास्टर सर्वशक्तिमान् हूँ  ।*

   *मैं महान आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

अव्यक्त बापदादा :-

 

_ ➳  आज बापदादा अपने पावन बच्चों को देख रहे हैं। हरेक ब्राह्मण आत्मा कहाँ तक पावन बनी है - यह सबका पोतामेल देख रहे हैं। *ब्राह्मणों की विशेषता है ही पवित्रता'। ब्राह्मण अर्थात् पावन आत्मा। पवित्रता को कहाँ तक अपनाया है, उसको परखने का यन्त्र क्या है? पवित्र बनो'', यह मन्त्र सभी को याद दिलाते हो लेकिन श्रीमत प्रमाण इस मन्त्र को कहाँ तक जीवन मे लाया है?* जीवन अर्थात् सदाकाल। जीवन में सदा रहते हो ना! तो जीवन में लाना अर्थात् सदा पवित्रता को अपनाना। इसको परखने का यन्त्र जानते हो?

 

✺  *"ड्रिल :- अपनी चेकिंग कर सदा पवित्रता को अपने जीवन में अपनाना*

 

_ ➳  *मैं आत्मा सागर के किनारे प्यारे बाबा का हाथ पकड़ मॉर्निंग वाक कर रही हूँ...* ठंडी-ठंडी हवाएं चल रही हैं... सागर की लहरें हमारे पैरों को भीगो रहे हैं... *लग रहा है जैसे सागर की लहरें भी प्यारे बाबा का कोमल स्पर्श पाकर ख़ुशी से लहरा रहे हों...* ठंडी हवाएं बाबा को छूकर ख़ुशी में झूम रही हों... मैं आत्मा भी बाबा का हाथ और जोर से पकड़ उनके मुलायम मखमली स्पर्श से ख़ुशी की अनुभूति कर रही हूँ... *मेरे प्राणों से प्यारे बाबा सतगुरु बन मुझ आत्मा को पवित्रता की विशेषताओं को समझाकर सम्पूर्ण पवित्र बनने की शिक्षा दे रहे हैं...* सतगुरु बाबा मुझ आत्मा को पवित्र बनो, योगी बनो का मन्त्र देते हैं...

 

_ ➳  मैं आत्मा चेकिंग करती हूँ कि क्या मैं पवित्रता को सदा अपने जीवन में अपनाती हूँ या कभी-कभी... *मैं आत्मा अपनी सूक्ष्म चेकिंग कर दिनचर्या को परखती हूँ...* क्या मैं आत्मा सदा सुख-शांति की अनुभूति करती हूँ या बीच-बीच में क्यों, क्या, कैसे के क्वेश्चन्स में फंसकर दुःखी-अशांत हो जाती हूँ... *अगर दुःख-अशांति का अनुभव करती हूँ अर्थात सम्पूर्ण पवित्रता की धारणा नहीं हुई है...*

 

_ ➳  *मैं आत्मा संसार सागर से ऊपर उड़ते हुए पहुँच जाती हूँ परमधाम में पवित्रता के सागर के पास...* मैं आत्मा पवित्रता के सागर में गोते खा रही हूँ... *पवित्रता के सागर से निकलती किरणें मुझ आत्मा के अन्दर तक समा रहे हैं...* मुझ आत्मा से विकारों रूपी मैल बाहर निकल रहा है... मुझ आत्मा की सारी अशुद्धता खत्म हो रही है... मैं आत्मा शुद्ध पवित्र बन रही हूँ... मैं आत्मा पवित्रता की शक्ति को धारण कर रही हूँ...

 

_ ➳  *अब मैं आत्मा श्रीमत प्रमाण पवित्रता की शक्ति पर चलती हूँ... मैं आत्मा हर क्यों, क्या, कैसे के सवालों से परे रहती हूँ...* मैं आत्मा पवित्रता की शक्ति को धारण कर स्मृति स्वरुप बन गई हूँ... मुझ आत्मा को फिर से उस विषय सागर में वापस नहीं जाना है... *मुझे तो पवित्र बन अपने घर वापस जाना है...* मैं आत्मा सदा पवित्र बनो, योगी बनो के मन्त्र की स्मृति में रहती हूँ... *अब मैं आत्मा पवित्रता को सदाकाल के लिए अपने जीवन में अपनाकर सुख-शांति की अनुभूति कर रही हूँ...*

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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