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 01 / 07 / 20  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *सर्विस के साथ साथ याद का चार्ट भी रखा ?*

 

➢➢ *हर कार्य फ्राकदिल बनकर किया ?*

 

➢➢ *सवा कल्याण के प्रतक्ष्य प्रमाण द्वारा विश्व कल्याण की सेवा की ?*

 

➢➢ *दूसरो के विचारों को अपने विचारों से मिलाया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *अब अपनी उड़ती कला द्वारा फरिश्ता बन चारों ओर चक्कर लगाओ और जिसको शान्ति चाहिए, खुशी चाहिए, सन्तुष्टता चाहिए, फरिश्ते रूप में उन्हें अनुभूति कराओ।* वह अनुभव करें कि इन फरिश्तों द्वारा शान्ति, शक्ति, खुशी मिल गई।

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं अपनी शक्तिशाली वृत्ति से वायुमण्डल को परिवर्तन करने वाली विश्व-परिवर्तक आत्मा हूँ"*

 

  सदा अपनी शक्तिशाली वृत्ति से वायुमण्डल को परिवर्तन करने वाली विश्व-परिवर्तक आत्माएं हो ना। इस ब्राह्मण जीवन का विशेष आक्यूपेशन क्या है? अपनी वृत्ति से, वाणी से और कर्म से विश्व-परिवर्तन करना। तो सभी ऐसी सेवा करते हो? या टाइम नहीं मिलता है? *वाणी के लिए समय नहीं है तो वृत्ति से, मन्सा-सेवा से परिवर्तन करने का समय तो है ना। सेवाधारी आत्माएं सेवा के बिना रह नहीं सकती। ब्राह्मण जन्म है ही सेवा के लिए। और जितना सेवा में बिजी रहेंगे उतना ही सहज मायाजीत बनेंगे। तो सेवा का फल भी मिल जाये और मायाजीत भी सहज बन जायें-डबल फायदा है ना।*

 

  *जरा भी बुद्धि को फुर्सत मिले तो सेवा में जुट जाओ। सेवा के सिवाए समय गँवाना नहीं है। निरन्तर योगी, निरन्तर सेवाधारी बनो-चाहे संकल्प से करो, चाहे वाणी से, चाहे कर्म से। अपने सम्पर्क से भी सेवा कर सकते हो। चलो, मन्सा-सेवा करना नहीं आवे लेकिन अपने सम्पर्क से, अपनी चलन से भी सेवा कर सकते हो। यह तो सहज है ना।* तो चेक करो कि सदा सेवाधारी हैं वा कभी-कभी के सेवाधारी हैं? अगर कभी-कभी के सेवाधारी होंगे तो राज्य-भाग्य भी कभी-कभी मिलेगा।

 

  इस समय की सेवा भविष्य प्राप्ति का आधार है। कभी भी कोई यह बहाना नहीं दे सकते कि चाहते थे लेकिन समय नहीं है। कोई कहते हैं-शरीर नहीं चलता है, टांगें नहीं चलती हैं, क्या करें? कोई कहती हैं-कमर नहीं चलती, कोई कहती हैं-टांगे नहीं चलती। लेकिन बुद्धि तो चलती है ना! तो बुद्धि द्वारा सेवा करो। आराम से पलंग पर बैठकर सेवा करो। अगर कमर टेढ़ी है तो लेट जाओ लेकिन सेवा में बिजी रहो। *बिजी रहना ही सहज पुरुषार्थ है। मेहनत नहीं करनी पड़ेगी। बार-बार माया आवे और भगाओ-तो मेहनत होती है, युद्ध होती है। बिजी रहने वाले युद्ध से छूट जाते हैं। बिजी रहेंगे तो माया की हिम्मत नहीं होगी आने की और जितना अपने को बिजी रखेंगे उतना ही आपकी वृत्ति से वायुमण्डल परिवर्तन होता रहेगा।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  जैसे साइन्स के साधन एरोप्लेन जब उडते हैं तो पहले चेकिंग होती है फिर माल भरना होता है। जो भी उसमें चाहिए - जैसे पेट्रोल चाहिए, हवा चाहिए, खाना चाहिए, जो भी चाहिए, उसके बाद धरती को छोडना होता है फिर उडना होता है। *ब्राह्मण आत्मा रूपी विमान भी अपने स्थान पर तो आ ही गये।* लेकिन जो डायरेक्शन था अथवा है एक सेकण्ड में उडने का, उसमें *कोई चेकिंग करने में रह गये। मैं आत्मा हूँ शरीर नहीं हूँ - इसी चेकिंग में रह गये और कोई ज्ञान के मनन द्वारा स्वयं को शक्तियों से सम्पन्न बनाने में रह गये।*

 

✧  मैं मास्टर ज्ञान स्वरूप हूँ मैं मास्टर सर्वशक्तिवान हूँ - इस शुद्ध संकल्प तक रहे, लेकिन स्वरूप नहीं बन पाये। *तो दूसरी स्टेज भरने तक रह गये और कोई भरने में बिजी होने के कारण उडने से रह गये।* क्योंकि शुद्ध संकल्प में तो रमण कर रहे थे लेकिन यह देह रूपी धरती को छोड नहीं सकते थे। अशरीरी स्टेज पर स्थित नहीं हो पाते थे। बहुत चुने हुए थोडे से बाप के डायरेक्शन प्रमाण सेकण्ड में उडकर सूक्ष्मवतन या मूलवतन में पहुँचे।

 

✧  जैसे बाप प्रवेश होते हैं और चले जाते हैं, तो जैेसे परमात्मा प्रवेश होने योग्य हैं वैसे मरजीवा जन्मधारी ब्राह्मण आत्मायें अर्थात महान आत्मायें भी प्रवेश होने योग्य हैं। स्वतन्त्र हो। तीनों लोकों के मालिक हो। *इस समय त्रिलोकीनाथ हो। तो नाथ अपने स्थान पर जब चाहें तब जा सकते हैं।*

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ *याद में निरन्तर रहने का सहज साधन है - 'प्रवृत्ति में रहते पर-वृत्ति में रहना'। पर-वृत्ति अर्थात् आत्मिक रूप।* ऐसे आत्मिक रूप में रहने वाला सदा न्यारा और बाप का प्यारा होगा। *कुछ भी करेगा लेकिन ऐसे महसूस होगा जैसे काम नहीं किया है लेकिन खेल किया है।* खेल में मज़ा आता है ना, इसलिए सहज लगता है। *तो प्रवृत्ति में रहते खेल कर रहे हो, बन्धन में नहीं। स्नेह और सहज योग के साथ-साथ शक्ति की और एडीशन करो तो तीनों के बैलेन्स से हाईजम्प लगा लेंगे।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- सर्विस को बढाने के लिए प्लैन बनाना"*

➳ _ ➳  *परमधाम से ब्रह्मा तन में अवतरित होकर परमपिता परमात्मा ने रूद्र ज्ञान यज्ञ रचा... परमात्मा इस यज्ञ में मेरे सारे अवगुणों, विकारों, विकर्मों को स्वाहा कर मुझे फिर से देवताई गुणों से सजाकर निर्विकारी और कर्मातीत बना रहे हैं...*  बाबा ने मुझ आत्मा को इस यज्ञ की सच्ची रक्षक बनाकर इसकी संभाल करने का जिम्मा दिया है... मैं आत्मा बाप समान रूहानी सेवा करने, सर्विस की भिन्न-भिन्न युक्तियाँ लेने पहुँच जाती हूँ सूक्ष्म वतन पारसनाथ बाबा के पास पारसबुद्धि बनने...

❉  *ज्ञान की नई-नई गुह्य बातो को समझाते हुए ज्ञान सागर प्यारे बाबा कहते हैं:-* "मेरे मीठे फूल बच्चे... ज्ञान खजाने को पाकर जो खुशियो में झूम रहे हो... *इस सच्चे ज्ञान की झनकार से हर दिल को मन्त्रमुग्ध बनाओ... विशालबुद्धि बन बड़ी ही युक्ति से भक्तिमय दिल को जीत आओ... और सच के आइने में उन्हें भी देवताई सूरत दिखलाओ... सच्चे ज्ञान प्रकाश से ईश्वरीय प्रीत का दीवाना बनाओ..."*

➳ _ ➳  *ज्ञान वीणा बजाकर सबके दिलों में ज्ञान की धुन से ज्ञानवान बनाते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* "हाँ मेरे प्यारे बाबा... मैं आत्मा ज्ञान मशाल लिए हर दिल को मान्यताओ के अँधेरे से बाहर निकाल... सदा का रौशन कर रही हूँ... *हर दिल को युक्ति से समझा कर ज्ञान अमृत का नशा चढ़ा रही हूँ... सच्चे ज्ञान को पाकर हर दिल खुशियो में झूम रहा है..."*

❉  *ज्ञान मानसरोवर में डुबोकर मेरे मन मंदिर में ज्ञान का शंख बजाते हुए मीठे रूहानी बाबा कहते हैं:-* "मीठे प्यारे लाडले बच्चे... *युक्ति से विश्व का अँधेरा दूर करने वाली रूहानी जादूगर बनो... ईश्वर पिता धरा पर आकर ईश्वरीय खानो को लुटा रहा... यह खुशखबरी हर दिल को सुनाओ... और विशालबुद्धि से ज्ञान गुह्य राजो को बताकर ईश्वरीय ज्ञान से आबाद करो...* ज्ञान रत्नों से हर दिल का दामन सजाकर, सच्चे सुखो का पता दे आओ..."

➳ _ ➳  *अमूल्य ज्ञान रत्नों से हर आत्मा को मालामाल करते हुए मैं रूहानी सेवाधारी आत्मा कहती हूँ:-* "मेरे प्राणप्रिय बाबा... मैं आत्मा आप समान हर दिल को खुशनसीब बना रही हूँ... *प्यारे बाबा आपकी मीठी यादो में गहरे उतरकर... यह सुख की लहर सबके दिल तक पहुंचा रही हूँ... सच्चे ज्ञान को पाने की चमक से हर दिल मुस्करा रहा है... मेरा बाबा आ गया यह गीत गुनगुना रहा है..."*

❉  *ज्ञान चन्द्रमा के मस्तक में चमकते हुए ज्ञान सूर्य प्यारे बाबा मुझ आत्मा सितारे से कहते हैं:-* "मेरे सिकीलधे मीठे बच्चे... सच्चे सुखो की बहारो से हर दिल पर सदा की मुस्कान सजाओ... *ज्ञान रत्नों की दौलत और गहन राजो से, अज्ञान अँधेरा मिटा कर, सदा का नूरानी हर दिल को बनाओ... हर भ्रम को दूरकर सच्चाई को छ्लकाओ... और युक्तियों से उन्हें सच भरी राहो में सुख का अधिकारी बनाओ..."*

➳ _ ➳  *मीठे बाबा का पता हर दिल को देकर उनकी बगिया में सुखों के फूल बिखेरते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* "हाँ मेरे मीठे बाबा... मैं आत्मा सबको खुशियो से भरने वाली ज्ञान परी बन मुस्करा रही हूँ... *सबको देह की मिटटी से निकाल आत्मिक नशे से भर रही हूँ... सत्य ज्ञान और सच्चे आनंद का सुख दिला रही हूँ... ईश्वरीय यादो में रोम रोम पुलकित करा, अनन्त दुआओ को पा रही हूँ..."*

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- मास्टर रूहानी सर्जन बन सबको ज्ञान इंजेक्शन लगाना है*"

 

_ ➳  सड़क पर पैदल चलते हुए मैं सामने से आ रहे हर मनुष्य की भृकुटि पर विराजमान अपने आत्मा भाई को देखती जा रही हूँ और विचार करती हूँ कि आज हर आत्मा 5 विकारों की बीमारी से पीड़ित है तभी तो सब दुखी और अशांत दिखाई दे रहें हैं। *केवल ज्ञान का इंजेक्शन ही इन बीमार रूहों का उपचार है। सुप्रीम सर्जन शिव पिता द्वारा दिया जा रहा सत्य ज्ञान ही हर रूह को 5 विकारों की बीमारी से मुक्त करने का उपाय है* और अपने शिव पिता के इस रूहानी मिशन में रूहानी सेवाधारी बन रूहों का ज्ञान का इंजेक्शन लगाकर उन्हें इस बीमारी से छुड़ाने का जो कर्तव्य भगवान ने हम बच्चों को दिया है उस कर्तव्य को करना हर ब्राह्मण बच्चे का फर्ज और भगवान के स्नेह का रिटर्न है।

 

_ ➳  अपने शिव पिता के रूहानी हॉस्पिटल का रूहानी सर्जन बन अब मुझे हर मनुष्य आत्मा को ज्ञान का इंजेक्शन लगा कर 5 विकारों की बीमारी से छुड़ाने का ही रूहानी धन्धा हर समय करना है *इन्ही विचारों के साथ अपने शिव पिता का आह्वान कर, उनकी छत्रछाया के नीचे स्वयं को अनुभव करते अब मैं अपने आस पास से गुजरने वाली हर आत्मा को मनसा साकाश द्वारा परमात्म अवतरण का संदेश देती जा रही हूँ*। चलते - चलते एक पार्क में पहुँच कर वहाँ एकत्रित लोगों के समूह को परमात्म ज्ञान दे कर उन्हें 5 विकारों की बीमारी से मुक्त होने का उपाय बता कर वापिस अपने सेवा स्थल पर लौट आती हूँ।

 

_ ➳  अपने मन बुद्धि को परमात्म याद में स्थिर करके स्वयं को परमात्म शक्तियों से भरपूर करने के लिए अब मैं अपने निराकारी ज्योति बिंदु स्वरूप में स्थित हो कर, नश्वर देह से ममत्व निकाल, स्वयं को उससे बिल्कुल न्यारा करते हुए, उससे बाहर आ जाती हूँ। *देह से न्यारी होकर एक बहुत ही सुन्दर उपराम स्थिति का मैं अनुभव कर रही हूँ*। हर बन्धन, हर बोझ से मुक्त यह उपराम स्थिति मुझे धीरे धीरे ऊपर आकाश की और ले कर जा रही है। *एक अदभुत हल्केपन का अनुभव करते हुए मैं चैतन्य ज्योति ऊपर की और उड़ते हुए आकाश को पार कर जाती हूँ*।

 

_ ➳  आकाश को पार करके, उससे भी बहुत ऊपर सफेद प्रकाश की एक बहुत सुंदर दुनिया मे मैं प्रवेश करती हूँ जहाँ चारों और लाइट के सूक्ष्म आकारी शरीर वाले फ़रिश्ते उड़ते हुए दिखाई दे रहें हैं। *फ़रिश्तों की इस दुनिया को भी मैं आत्मा पार कर जाती हूँ और उससे ऊपर अंतहीन विशाल ब्रह्माण्ड में मैं प्रवेश करती हूँ*। लाल प्रकाश की इस दुनिया में चारों और डायमण्ड के समान चमकती मणियों का आगार मन को बहुत सुंदर अनुभूति करवा रहा है। समस्त ब्रह्माण्ड में फैले शांति के अनन्त वायब्रेशन मुझ आत्मा को गहन शान्ति का अनुभव करवा रहें हैं।

 

_ ➳  शान्ति की इस दिव्य अलौकिक दुनिया मे विचरण करते, *स्वयं को गहन शान्ति की शक्ति से भरपूर करते अब मैं ज्ञान, गुण और शक्तियों के सागर अपने शिव पिता के पास पहुँच कर उनकी शीतल किरणों की छत्रछाया के नीचे जाकर बैठ जाती हूँ और स्वयं को ज्ञान, गुणों और सर्वशक्तियों से भरपूर करने के बाद उस विशाल ब्रह्माण्ड से वापिस लौट कर फ़रिश्तों की आकारी दुनिया मे आ जाती हूँ*। यहाँ आ कर मैं आत्मा अपना लाइट का सूक्ष्म आकारी शरीर धारण कर लेती हूँ और अपने प्यारे बापदादा से दृष्टि और वरदान लेने के लिए उनके सम्मुख पहुँच जाती हूँ।

 

_ ➳  अपनी लाइट माइट और ज्ञान के अखुट खजानों से बापदादा मुझ फ़रिश्ते को भरपूर कर देते हैं और रूहानी सेवाधारी बन रूहों को ज्ञान का इंजेक्शन लगाने का रूहानी धन्धा करने का फरमान देकर, विजय का तिलक मेरे मस्तक पर लगा कर मुझे विदा करते हैं। *ज्ञान और योग का बल स्वयं में भरकर अब मैं फिर से अपने ओरिजनल ज्योति बिंदु स्वरूप में स्थित हो जाती हूँ और फ़रिशतो की दुनिया से नीचे आ कर साकारी मनुष्यों की दुनिया मे लौट कर, अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित हो कर ईश्वरीय सेवा में लग जाती हूँ*।

 

_ ➳  कभी स्थूल साकार तन द्वारा मुख से अपने सम्बन्ध सम्पर्क में आने वाली आत्माओं को ज्ञान रत्नों का दान देकर तो *कभी सूक्ष्म आकारी फ़रिशता स्वरूप द्वारा मनसा साकाश की सूक्ष्म सेवा करते विश्व की सर्व रूहों को ज्ञान का इंजेक्शन लगा कर उन्हें पाँच विकारों की बीमारी से मुक्त करने का रूहानी धन्धा अब मैं निरन्तर कर रही हूँ*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं स्व कल्याण के प्रत्यक्ष प्रमाण द्वारा विश्व कल्याण की सेवा करने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं सदा सफलतामूर्त आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा दूसरे के विचारों को सदा अपने विचारों से मिला लेती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा सर्व को रिगार्ड देती हूँ  ।*

   *मैं निर्मान चित्त आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा-:

 

_ ➳  कोई भी कार्य करते बाप की याद में लवलीन रहो। लवलीन आत्मा कर्म करते भी न्यारी रहेगी। *कर्मयोगी अर्थात् याद में रहते हुए कर्म करने वाला सदा कर्मबन्धन मुक्त रहता है। ऐसे अनुभव होगा जैसे काम नहीं कर रहे हैं लेकिन खेल कर रहे हैं। किसी भी प्रकार का बोझ वा थकावट महसूस नहीं होगी।* तो कर्मयोगी अर्थात् कर्म को खेल की रीति से न्यारे होकर करने वाला। ऐसे न्यारे बच्चे कर्मेंन्द्रियों द्वारा कार्य करते बाप के प्यार में लवलीन रहने के कारण बन्धनमुक्त बन जाते हैं।

 

 ✺   *"ड्रिल :- याद में रह हर कर्म करते हुए कर्म को एक खेल बनाना"*

 

 _ ➳. दूर एकांत स्थान पर बैठकर *मैं आत्मा एक ऐसी आत्मा को देखती हूं... जो अपने सिर पर एक भारी सी गठरी लिए हुए चल रही है... वह अपने शरीर से और उस गठरी से अपने आपको इतना थका हुआ अनुभव कर रही है कि वह एक कदम भी सही तरह चल नहीं पा रही है...* उसे देख कर मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि मानो वह बहुत ही थकान से भरी हुई है... और एक तरफ मैं देखती हूं कि एक आत्मा अपने आनंद से चली जा रही है वह बहुत ही तेजी से और अपने ही धुन में चली जा रही है... जब मैं दूर बैठी उन दोनों आत्माओं को ध्यान से देखती हूं तो मुझे दोनों ही आत्माओं में अलग-अलग भाव दिखाई देता है...

 

 _ ➳  मैं उन आत्माओं के पास जाती हूं और जिस आत्मा ने अपने ऊपर एक भारी गठरी रखी हुई थी उससे पूछती हूं ? तुम इतनी थकान में और इस गठरी के बोझ से  प्रभावित होकर कहां जा रही हो? तो वह आत्मा कहती है कि मैं अपने कर्म-क्षेत्र पर  अपना कर्म कर रही हूं जिससे मुझे थकान का अनुभव हो रहा है... *मेरे कर्तव्य का बोझ और सेवा का बोझ मुझ पर इतना हो गया है कि मैं चल भी नहीं पा रही हूं और कहती हूँ परंतु मैं कितना भी थकान का अनुभव करूँ मुझे चलते जाना है... मुझे सेवा करते रहनी है* और मैं उस आत्मा को उसी स्थान पर रुकने के लिए कहती हूं और वह आत्मा अपने गठरी को नीचे रखती है और बैठ जाती है... 

 

 _ ➳  और मैं दूसरी आत्मा को जो मगन अवस्था में तेजी से चल रही थी उसे अपने पास बुलाती हूँ और पूछती हूं... तुम इतनी तेजी से और मगन अवस्था में कहां जा रहे हो ? तो वह आत्मा मुझे कहती है कि मैं परमात्मा की याद में अपना कर्तव्य और सेवा करती हुई जा रही हूं... फिर मैं उन दोनों आत्माओं को एक स्थान पर बैठा कर उनका अनुभव सुनकर उन्हें एहसास दिलाती हूं कि *अगर हम किसी भी सेवा को परमात्मा की याद में रहकर करते हैं तो हमें उस सेवा को करते समय कोई भी थकावट नहीं होगी... वह सेवा कब पूरी हो जाएगी हमें एहसास भी नहीं होगा और वह सेवा हम खेल खेल में ही पूर्ण कर देंगे...*

 

 _ ➳   इतना कहकर मैं आत्मा रॉकेट बनकर अंतरिक्ष में पहुंच जाती हूं... जहां पर एक ग्रह के ऊपर मैं बाबा को अपने सामने इमर्ज करती हूँ... यह नजारा देख कर मेरी आंखें बहुत ही सुख का अनुभव कर रही है... और बाबा मुझे कह रहे हैं, *बच्चे तुम्हे भी हर कर्म को परमात्मा की याद मे रहकर ही करना चाहिए... और हर कर्म को खेल समझकर करना चाहिए... जिससे तुम कब, कितना काम कर जाओगे तुम्हे अहसास भी नहीं होगा...* और साथ ही उन दोनों आत्माओं का उदाहरण भी देते हैं कि अगर हम हमारा सारा बोझ परमात्मा को दे देते हैं तो हमें उसकी याद में थकावट का अनुभव नहीं होगा...

 

 _ ➳  और बाबा की बातों को सुनकर मैं बाबा का धन्यवाद करती हूँ... और मन बुद्धि से रॉकेट में बैठकर वापिस मैं उसी स्थान पर आ जाती हूँ और उन दोनों आत्माओं को कहती हूँ... जो आत्मा गठरी उठाये थी उसे कहती हूँ, आप इस अपनी गठरी को एक खेल की प्रक्रिया समझते हुए उठाये और बाबा की याद में रहिये... जैसे *आप समझो की इस पोटली में बाबा के दिए हुए अनमोल खजाने है... जिसको स्वयं बाबा उठा रहे हैं आप तो सिर्फ निमित्त मात्र है... और साथ ही मैने कहा कि तुम इस खजानों की पोटली को लेकर भागते हुए ये अनुभव करो की तुम्हें पुरुषार्थ की दौड़ में इन खजानों से नंबर वन आना है... वह आत्मा फिर तेजी से और याद में मगन होकर चलने लगती है...*

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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