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 01 / 08 / 22  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *सदा देवताओं जैस मुस्कुराते रहे ?*

 

➢➢ *आत्मा अमें जो खाद पडी है, वह याद की अग्नि से निकाली ?*

 

➢➢ *सदा कर्मेन्द्रियो को लॉ एंड आर्डर प्रमाण चलाया ?*

 

➢➢ *समय पर सर्व शक्तियों को कार्य में लगाया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *फरिश्ता उड़ता है, चलता नहीं है। आप सभी भी उड़ती कला में उड़ते रहो इसके लिए डबल लाइट बनो।* जो किसी भी प्रकार का बोझ मन में, बुद्धि में है वह बाप को दे दो।

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं मायाजीत, प्रकृतिजीत आत्मा हूँ"*

 

✧  सभी अपने को सदा मायाजीत, प्रकृतिजीत अनुभव करते हो? जितना-जितना सर्व शक्तियों को अपने र्डर पर रखेंगे और समय पर कार्य में लगायेंगे तो सहज मायाजीत हो जायेंगे*अगर सर्व शक्तियां अपने कन्ट्रोल में नहीं हैं तो कहाँ न कहाँ हार खानी पड़ेगी। मास्टर सर्वशक्तिवान अर्थात् कन्ट्रोलिंग पावर हो। जिस समय, जिस शक्ति को आह्वान करें वो हाजिर हो जाए, सहयोगी बने।* ऐसे र्डर में हैं?

 

  सर्व शक्तियां र्डर में हैं या आगे-पीछे होती हैं? र्डर करो अभी और आये घण्टे के बाद-तो उसको मास्टर सर्वशक्तिवान कहेंगे? *जब आप सभी का टाइटल है मास्टर सर्व शक्तिवान, तो जैसा टाइटल है वैसा ही कर्म होना चाहिए ना। है मास्टर और शक्ति समय पर काम में नहीं आये-तो कमजोर कहेंगे या मास्टर कहेंगे?* तो सदा चेक करो और फिर चेन्ज (परिवर्तन) करो- कौनसी-कौनसी शक्ति समय पर कार्य में लग सकती है और कौनसी शक्ति समय पर धोखा देती है?

 

  अगर सर्व शक्तियां अपने र्डर पर नहीं चल सकतीं तो क्या विश्व-राज्य अधिकारी बनेंगे? *विश्व-राज्य अधिकारी वही बन सकता है जिसमें कन्ट्रोलिंग पावर, रूलिंग पावर हो। पहले स्व पर राज्य, फिर विश्व पर राज्य। स्वराज्य अधिकारी जब चाहें, जैसे चाहें वैसे कन्ट्रोल कर सकते हैं।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  *सब तरफ से सर्व प्रवृत्तियों का किनारा छोड चुके हो* वा कोई भी किनारा अल्पकाल का सहारा बन बाप के सहारे वा साथ से दूर कर देंगे? संकल्प किया कि जाना है, *डायरेक्शन मिला अब चलना है तो डबल लाइट के उडन आसन पर स्थित हो उड जायेंगे?* ऐसी तैयारी है? वा सोचेंगे कि अभी यह करना है, वह करना है? समेटने की शक्ति अभी कार्य में ला सकते हो वा *मेरी सेवा, मेरा सेन्टर, मेरा जिज्ञासु, मेरा लौकिक परिवार या लौकिक कार्य - यह विस्तार तो याद नहीं आयेगा?*

 

✧  यह संकल्प तो नहीं आयेगा? जैसे आप लोग एक ड्रामा दिखाते हो, ऐसे प्रकार के संकल्प - अभी यह करना है, फिर वापस जायेंगे - ऐसे ड्रामा के मुआफिक साथ चलने की सीट को पाने के अधिकार से वंचित तो नहीं रह जायेंगे - अभी तो खूब विस्तार में जा रहे हो, लेकिन विस्तार की निशानी क्या होती है? वृक्ष भी जब अति विस्तार को पा लेता तो विस्तार के बाद बीज में समा जाता है।

 

✧  तो अभी भी सेवा का विस्तार बहुत तेजी से बढ़ रहा है और बढ़ना ही है लेकिन *जितना विस्तार वृद्धि को पा रहा है उतना विस्तार से न्यारे और साथ चलने वाले प्यारे, यह बात नहीं भूल जाना।* कोई भी किनारे

में लगाव की रस्सी न रह जाए। किनारे की रस्सियाँ सदा छूटी हुई हो। अर्थात सबसे छूट्टी लेकर रखो। जैसे आजकल यहाँ पहले से ही अपना मरण मना लेते है ना - तो छूट्टी ले ली ना। ऐसे सब प्रवृत्तियों के बन्धनों से पहले से ही विदाई ले लो। *समाप्ति समारोह मना ली।*

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ मेहनत करना ठीक लगता या मालिक बनना ठीक लगता? क्या अच्छा लगता है? सुनाया ना - इसके लिए सिर्फ यह एक अभ्यास सदा करते रहो - 'निराकार सो साकार के आधार से यह कार्य कर रहा हूँ' करावनहार बन कर्मेन्द्रियों से कराओ। अपने निराकारी वास्तविक स्वरूप को स्मृति में रखेंगे तो वास्तविक स्वरूप के गुण शक्तियाँ स्वत: इमर्ज होंगे। *जैसा स्वरूप होता है वैसे गुण और शक्तियाँ स्वत: ही कर्म में आते हैं। जैसे कन्या जब माँ बन जाती है तो माँ के स्वरूप में सेवा भाव, त्याग, स्नेह, अथक सेवा आदि गुण और शक्तियां स्वत: ही इमर्ज होती हैं ना।* तो अनादि-अविनाशी स्वरूप याद रहने से स्वत: ही यह गुण और शक्तियाँ इमर्ज होंगे। *स्वरूप स्मृति स्थिति को स्वतः ही बनाता है। समझा क्या करना है।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- बहुत मीठा क्षीरखंड बनकर रहना"*

 

_ ➳  स्वयं शिवबाबा मेरे प्यारे पिता परमधाम से आकर, मेरे चमन में सुखों के फूल बिखेरेंगे... मुझे अपनी गोद में पालेंगे... श्रेष्ठ कर्म कराने सिखलायेंगे... और अपना श्रीमत रूपी हाथ मेरे हाथ में रख... इस पुरानी भयावान दुनिया से... दुःखों भरी उलझनों से... छुटकारा दिला... मुझे रूहे गुलाब जैसा खिलाएंगे... मुझे क्षीरखंड होकर रहना सिखलायेंगे... ऐसे ख्वाब तो कभी न संजोये थे... *इस मीठे चिंतन ने आँखों को भिगो दिया... और भीगी पलकें लिये प्यार के सागर बाबा को निहारने मैं आत्मा वतन में उड़ चली...*

 

   *मीठे बाबा ने मुझ आत्मा को श्रीमत देते हुए अपने हाथों में सुरक्षित करते हुए कहते हैं:-* "मीठे प्यारे रूहानी बच्चे... सच्चे बाप से सच्चे ज्ञान को पाकर सच्ची राह के राही बनो... बुरा न देखो... बुरा न बोलो... बुरा न सुनो... बुरा न सोचो... सभी के साथ क्षीरखंड हो कर चलो... सदा श्रीमत रूपी हाथ... हाथ में पकड़े... *निश्चिन्त होकर, इस जीवन पथ पर यादों की छत्रछाया में आगे बढ़ो... मीठे बाबा के साथ के खूबसूरत समय में अब किसी भी प्रकार के मतभेद में नहीं आना..."*

 

_ ➳  *मैं आत्मा मीठे बाबा से ईश्वरीय मत पाकर, खुशनुमा जीवन की मालिक बनकर कहती हूँ:-* "मेरे मीठे मीठे बाबा... मैं सदा आपके बताये गये मार्ग पर... आप द्वारा दी गई शिक्षाओं पर चल कर खुशी से झूम रही हूँ... अनेक मतभेदों से छूटकर पवित्रता से सज संवर रही हूँ... *आप सच्चे साथी को सदा साथ रख... सभी आत्माओं के साथ क्षीरखंड होकर... हर कर्म श्रेष्ठ बनाती जा रही हूँ..."*

 

  *मीठे बाबा ने मुझ आत्मा को अपने निराकारी रूप के नशे से भरते हुए कहते हैं:-* "मीठे प्यारे सिकीलधे बच्चे... सदा क्षीरखंड होकर एक बाप की श्रेष्ठ मत पर चलकर हर कर्म करो... *कभी किसी से लूनपानी होकर अपने कर्म  खोटे नही करना...* जो बाबा ने सिखलाया है... उन्ही श्रेष्ठ कर्मो और दिव्य गुणों की धारणा से, आपने जीवन को क्षीरखंड रह शानदार बनाओ..."

 

_ ➳  *मैं आत्मा प्यारे बाबा की श्रीमत को दिल में समाते हुए कहती हूँ:-* "मेरे प्यारे मीठे सिकीलधे बाबा... मैं आपको पाकर सच्चे सोने के समान निखर गई हूँ... आपने मेरे जीवन को रूहानियत से भर दिया है... *मैं आत्मा आपकी यादों में... सदा हर कर्म को श्रेष्ठ और सुकर्म बनाती जा रही हूँ..."*

 

  *मीठे बाबा मुझ आत्मा को सही और गलत की समझानी देते हुए कहते हैं:-* "यह दुनिया तुम्हें सत्य के मार्ग पर चलने में परेशान करेगी... पर तुम सदा श्रीमत रूपी सच की खूबसूरत राह पर चलते चलना... *कभी आपसी मतभेद में नहीं आना... सदा क्षीरखंड होकर रहना..."*

 

_ ➳  *मैं आत्मा मीठे बाबा की श्रीमत को गले लगाते हुए कहती हूँ:-* "मेरे जीवन के सहारे बाबा... आपने मुझ आत्मा का हाथ पकड़ कर... मुझे कितना प्यारा जीवन दे दिया... *आपकी श्रीमत को पाकर मैं आत्मा धन्य धन्य हो गयी हूँ...* हर कर्म आपके द्वारा दी गयी श्रीमत पर चल... सच्चे आनंद में झूम रही हूँ... मीठे बाबा को दिल से धन्यवाद देकर मैं आत्मा... अपनी स्थूल देह में लौट आई..."

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- सदा देवताओं जैसा मुस्कराते रहना है*"

 

_ ➳  स्वदर्शन चक्रधारी बन स्व का दर्शन करते हुए अपने आदि और पूज्य स्वरूप में खोई अपने उस अति सुन्दर मन को मोहने वाले स्वरूप का भरपूर आनन्द लेते हुए *मैं विचार करती हूँ कि मंदिर में स्थापित मेरे जड़ चित्रों की दिव्य मुस्कराहट और चेहरे की हर्षितमुखता आज भी मेरे भगतों को नवजीवन दे रही है*। मेरी जड़ प्रतिमा के सामने आज भी मेरे भगत खड़े होकर एक गहन सुकून पाकर तृप्त हो जाते हैं। तो अपने उस स्वरूप को यादगार बनाने का पुरुषार्थ मुझे इस समय संगम युग पर अवश्य करना है तभी मेरे एक - एक कर्म का यादगार भक्ति में पूजन और गायन योग्य बनेगा।

 

_ ➳  यही विचार करते, अपने अंदर दैवी गुणों को धारण करने की मन ही मन स्वयं से दृढ़ प्रतिज्ञा कर मैं आत्मिक स्मृति में स्थित हो कर बैठ जाती हूँ और *अपने मन, बुद्धि को  मनुष्य से देवता बनाने वाले अपने परमपिता परमात्मा शिव बाबा पर पूरी तरह एकाग्र करते हुए, बड़े प्यार से उनका आह्वान करती हूँ*। उनसे मिलने की मेरी इच्छा संकल्प के रूप में उन तक पहुँच रही है। मन बुद्धि रूपी नेत्रों से मैं स्पष्ट देख रही हूँ कि मेरे एक बुलावे पर भगवान कैसे अपना धाम छोड़, मेरे प्यार में बंध कर, मेरे पास दौड़े चले आ रहें हैं।

 

_ ➳  अपनी सर्वशक्तियों की किरणों रूपी बाहों को फैलाये मेरे मन के सच्चे मीत, मेरे दिलाराम बाबा मेरे पास आ रहें हैं। उनके प्यार की शीतल फ़ुहारों का मीठा मधुर एहसास मुझे उनकी समीपता का स्पष्ट अनुभव करवा रहा है। *प्यार के सागर अपने प्यारे बाबा को अब मैं अपने सामने देख रही हूँ। ऐसा लग रहा है जैसे एक विशाल सागर स्वयं चल कर मेरे पास आ गया है और अपनी शीतल लहरों की शीतलता को गहराई तक मुझ आत्मा में समाता चला जा रहा है*। सर्व गुणों, सर्वशक्तियों के सागर मेरे शिव पिता परमात्मा से निकल रहे शक्तिशाली वायब्रेशन मुझे टच कर रहें है और गहन शांति का अनुभव करवा रहें हैं।

 

_ ➳  अपनी सर्वशक्तियों की किरणों रूपी बाहों में भरकर अब मेरे शिव पिता मुझ आत्मा को देह के हर बन्धन से मुक्त कराकर, अपने साथ ले जा रहें हैं। देह से बाहर आकर मैं स्वयं को एकदम हल्का अनुभव कर रही हूँ। *बन्धन मुक्त हो कर, आजाद पंछी की भांति उन्मुक्त हो कर, उड़ने का आनन्द लेती हुई मैं आत्मा अपने दिलाराम बाबा की किरणों की बाहों के झूले में झूलती, मन ही मन अपने सर्वश्रेष्ठ भाग्य की सराहना करती उनके साथ उनके धाम जा रही हूँ*। देह और देह की झूठी दुनिया के झूठे रिश्तों के मोह की जंजीरो की कैद से मैं आजाद हो चुकी हूँ, यह एहसास मुझे एक गहन सुकून दे रहा है।

 

_ ➳  अपने शिव पिता के साथ एक अति सुखद सुखमय रूहानी यात्रा करके अब मैं उनके साथ उनके धाम पहुँच चुकी हूँ। स्वयं को मैं आत्माओं की एक ऐसी निराकारी दुनिया में देख रही हूँ जहाँ चारों और शांति के शक्तिशाली वायब्रेशन फैले हुए हैं। *शांति के सागर अपने शिव पिता के पास जाकर, उनके प्यार की किरणो की शीतल छाया के नीचे बैठ, उन्हें निहारती हुई अब मैं स्वयं को तृप्त कर रही हूँ*। मेरे शिव पिता के प्यार की शीतल फुहारे बारिश की रिम झिम बूंदों की तरह मुझ पर बरस रही हैं। मास्टर बीज रूप बन अपने बीज रूप शिव पिता परमात्मा के साथ मंगल मिलन मनाते हुए गहन अतीन्द्रिय सुख का मैं अनुभव कर रही हूँ।

 

_ ➳  गहन अतीन्द्रिय सुख और अपने शिव पिता परमात्मा के असीम प्रेम का अनुभव करके, अपने ब्राह्मण स्वरूप में लौट कर अपने शिव पिता के निष्काम और निस्वार्थ प्रेम के खूबसूरत सुखद एहसास को स्मृति में रख, अब मैं अपने शिव पिता की श्रेष्ठ शिक्षायों को स्वयं में धारण कर, अपने जीवन को देवताओ जैसा खुशमिजाज बनाने का पुरुषार्थ अति सहजता से कर रही हूँ। *मेरे मीठे प्यारे बाबा का प्यार और उनकी याद मुझे आसुरी अवगुणों का त्याग कर, दैवी गुणों को धारण करने का बल दे रही है। योग बल से अपने पुराने अभी आसुरी स्वभाव संस्कारो को भस्म कर, भविष्य देवताई संस्कारो को धारण कर अब मैं अपने जीवन को देवताओं जैसा खुशमिजाज बना रही हूँ*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं सर्व कर्मेन्द्रियों को लॉ और आर्डर प्रमाण चलाने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं मास्टर सर्वशक्तिमान आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा सदैव समय पर सर्व शक्तियों को कार्य में लगाती हूँ  ।*

   *मैं मास्टर सर्वशक्तिमान् हूँ  ।*

   *मैं शक्तिशाली आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

✺ अव्यक्त बापदादा :-

➳ _ ➳  बापदादा इस साकारी देह और दुनिया में आते हैंसभी को इस देह और दुनिया से दूर ले जाने के लिए। दूर-देश वासी सभी को दूर-देश निवासी बनाने के लिए आते हैं। दूर-देश में यह देह नहीं चलेगी। पावन आत्मा अपने देश में बाप के साथ-साथ चलेगी। तो चलने के लिए तैयार हो गये हो वा अभी तक कुछ समेटने के लिए रह गया है? *जब एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते हो तो विस्तार को समेट परिवर्तन करते हो। तो दूर-देश वा अपने स्वीट होम में जाने के लिए तैयारी करनी पड़ेगीसर्व विस्तार को बिन्दी में समाना पड़े। इतनी समाने की शक्तिसमेटने की शक्ति धारण करली है?*

✺   *"ड्रिल :- समाने की शक्ति और समेटने की शक्ति का अनुभव करना।*

➳ _ ➳  एकांत स्थान पर बैठकर मैं प्यारे बाबा से मीठी मीठी बातें कर रही हूं... बाबा से अपने दिल की बातें और अपने अनुभव शेयर कर रही हूं... बाबा से बातें करते हुए मैं आत्मा एकांत स्थान पर अपने आप को अन्य आत्माओं से दूर एक ऐसे स्थान पर अनुभव करती हूं... जहां प्रकृति के पांचो तत्व मुझे अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं... और इस खुशनुमा मौसम में बाबा के साथ दूर बैठकर मैं आत्मा अपने लौकिक परिवार की आत्माओं को निहार रही हूं... और *उनके साथ बिताए हुए हर एक लम्हों को याद कर रही हूं... मुझे उनकी कही हुई हर छोटी बड़ी बात याद आने लगती है... और उनके द्वारा किए हुए हर कर्म मुझे प्रभावित करते हैं... और साथ ही कुछ ऐसे उनके कर्म जो मुझे दुख की अनुभूति कराते हैं...* जैसे जैसे मैं उन आत्माओं को निहारती हूं... वैसे वैसे ही मेरी मन बुद्धि उनके अंदर समाने लगती है...

➳ _ ➳  कुछ समय के बाद मैं अपने आप को उन आत्माओं मैं इतना डुबो देती हूं... कि मुझे उन के अलावा कुछ ना तो सुनाई देता है... और ना ही दिखाई देता है... तभी अचानक मुझे अनुभव होता है... कि मैं यह क्या कर रही हूं... मेरे साथ मेरे परम पिता परमात्मा बैठे हुए हैं और मैं अपनी मन बुद्धि इन आत्माओं में समाकर यह अमूल्य समय गंवा रही हूं... और मैं आत्मा यह सोचते हुए *अपने मन बुद्धि को उन आत्माओं से हटाने का पूरा प्रयत्न करती हूं... और इसके लिए मैं सर्वप्रथम निर्णय लेती हूं... कि मुझे इस संगम के शुभ अवसर पर सिर्फ और सिर्फ अपनी मन बुद्धि अपने परमपिता परमात्मा में ही लगानी है... और उनके द्वारा दी हुई श्रीमत का मुझे पूरा पूरा पालन करना है... मैं आत्मा जैसे ही यह निर्णय लेती हूं... तो मैं अपने अंदर एक अद्भुत परिवर्तन अनुभव करती हूँ...*

➳ _ ➳  और धीरे-धीरे मैं इस निर्णय शक्ति के आधार पर अपनी मन बुद्धि इन आत्माओं से हटाने में पूर्णतया सफल हो जाती हूं... और पहुंच जाती हूं अपने प्यारे बाबा को साथ लिए मूल वतन में... जहां चारों तरफ लाल सुनहरा प्रकाश ही प्रकाश है... और वह प्रकाश जैसे ही मुझ आत्मा को स्पर्श करता है... मुझे अपने अंदर गहन शांति का अनुभव होता है... और *जैसे-जैसे मैं मूलवतन की शांति को अनुभव करती हूं... वैसे ही मैं उस चमत्कारिक शांति को अपने अंदर समाने लगती हूं... और इस शांति को अपने अंदर समाए हुए मुझे अपने सामने अपने रंग बिरंगी किरणें बिखेरते हुए मेरे परम पिता नजर आते हैं...* जैसे ही मैं उनको अपने सामने अनुभव करती हूं... मेरा यह ज्योति रूप और भी चमकीला हो जाता है...

➳ _ ➳  और अपने इस चमकते हुए रूप को मैं बाबा की अद्भुत किरणों से अपने अंदर समाकर और भी चमकदार और शक्तिशाली बना लेती हूं... कुछ समय इस स्थिति में रहने के बाद मैं अपने साथ बाबा को लेकर सूक्ष्म वतन में पहुंच जाती हूं... यहां का सफेद प्रकाश मेरे अंदर अति शीतलता का अनुभव करा रहा है... *मेरा यह फरिश्ता स्वरूप एकदम शीतल और शांत प्रतीत हो रहा है... और सामने बापदादा मुझे फरिश्ता रूप में बैठे हुए निहार रहे हैं... मैं दौड़कर बाबा की बाहों में समा जाती हूं... जैसे ही मैं बाबा को स्पर्श करती हूं... मुझे उनकी बाहें झूले के समान प्रतीत होती है... और मेरा मन यह महसूस करता है... कि बाबा मुझे अपनी मीठी मीठी बाहों में लेकर झूला झुला रहे हैं...* और मैं डूब जाती हूं... कुछ देर के लिए इस सुखद अनुभूति में...

➳ _ ➳  अब मैं आत्मा फरिश्ता रूप में बाबा की बाहों के झूले झूलते हुए बाबा से कहती हूं... बाबा यह संगम का जो महत्वपूर्ण समय है... उसमें मैंने अपनी मन बुद्धि इस संसार के रिश्ते नातों में कुछ समय के लिए फंसा रखी थी... जिसके कारण मुझे आज तक सिर्फ और सिर्फ दुख दर्द ही मिला है... *मैंने अपने आप को अब परमात्मा को सौंपने का दृढ़ संकल्प किया है... और अपने इस निर्णय से मुझे गहन शांति की अनुभूति हो रही है... और मैं बाबा से कहती हूं... मेरे मीठे बाबा अब मैंने आपकी श्रीमत के अनुसार यह निर्णय शक्ति का प्रयोग कर अपनी मन बुद्धि इन झूठे रिश्ते नातों से निकालकर आप में पूरी तरह से लगा दी है... अब मैं आत्मा स्थूल वतन में जो भी कर्म करूंगी... सिर्फ और सिर्फ फरिश्ता बनकर और निमित्त भाव से ही करूंगी...* और इतना कहकर मैं अपने मन बुद्धि इन सांसारिक रिश्ते-नातों से समेट कर और अपनी निर्णय शक्ति को अपने अंदर समाकर... सब बाबा को सौंप देती हूं... और चली आती हूँ मैं अपनी इन कर्मेंद्रियों पर राज करने के लिए... और फरिश्ता बनकर निमित्त भाव से सेवा करने लगती हूं... बाबा की याद में...

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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