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 01 / 09 / 20  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *बुधी क्रिमिनल तरफ तो नही गयी ?*

 

➢➢ *किसी भी बात में संशय तो नहीं उठाया ?*

 

➢➢ *सर्व प्राप्तियों के अनुभव द्वारा पावरफुल स्थिति का अनुभव किया ?*

 

➢➢ *ब्राह्मण जीवन की मर्यादाओं का पालन किया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *कोई भी हिसाब-चाहे इस जन्म का, चाहे पिछले जन्म का, लग्न की अग्नि-स्वरूप स्थिति के बिना भस्म नहीं होता।* सदा अग्नि-स्वरूप स्थिति अर्थात् शक्तिशाली याद की स्थिति, बीजरूप लाइट हाउस, माइट हाउस स्थिति इस पर अब विशेष अटेंशन दो तब रहे हुए सब हिसाब-किताब पूरे होंगे।

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं कमल पुष्प समान न्यारा और बाप का प्यारा हूँ"*

 

✧  सदा अपने को कमल पुष्प समान न्यारे और बाप के प्यारे अनुभव करते हो? *क्योंकि जितना न्यारापन होगा उतना ही बाप का प्यारा होगा। चाहे कैसी भी परिस्थितियां हो, समस्यायें हों लेकिन समस्याओंके अधीन नहीं, अधिकारी बन समस्याओ को ऐसे पार करें, जैसे खेल-खेल में पार कर रहे हैं। खेल में सदा खुशी रहती है।* चाहे कैसा भी खेल हो, लेकिन खेल है तो कैसा भी पार्ट बजाते हुए अन्दर खुशी में रहते हो? चाहे बाहर से रोने का भी पार्ट हो लेकिन अन्दर हो कि यह सब खेल है। तो ऐसे ही जो भी बातें सामने आती हैं-ये बेहद का खेल है, जिसको कहते हो ड्रामा और ड्रामा के आप सभी हीरो एक्टर हो, साधारण एक्टर तो नहीं हो ना।

 

✧  तो हीरो एक्टर अर्थात् एक्यूरेट पार्ट बजाने वाले। तब तो उसको हीरो कहा जाता है। तो सदा ये बेहद का खेल है-ऐसे अनुभव करते हो? कि कभी-कभी खेल भूल जाता है और समस्या, समस्या लगती है। कैसी भी कड़ी परिस्थिति हो लेकिन खेल समझने से कड़ी समस्या भी हल्की बन जाती है। *तो जो न्यारा और प्यारा होगा वो सदा हल्का अनुभव करने के कारण डबल लाइट होगा। कोई बोझ नहीं। क्योंकि बाप का बनना अर्थात् सब बोझ बाप को दे दिया।* तो सब बोझ दे दिया है या थोड़ा-थोड़ा अपने पास रख लिया है? थोड़ा बोझ उठाना अच्छा लगता है। सब कुछ बाप के हवाले कर दिया या थोड़ा-थोड़ा जेबखर्च रख लिया है? छोटे बच्चे जेबखर्च नहीं रखते हैं। रोज उनको जेब खर्च देते हैं, खाओ, पीयो, मौज करो। कोई भी चीज रखी होती है तो डाकू आता है।

 

  जब पता होता है कि ये मालदार है, कुछ मिलेगा तब डाका लगाते हैं। यदि पता हो कि कुछ नहीं मिलेगा तो डाका लगाकर क्या करेंगे। अगर थोड़ा भी रखते हैं तो डाकू माया जरूर आती है और वह अपनी चीज तो ले ही जाती है लेकिन जो बाप द्वारा शक्तियां मिली हैं वो भी साथ में ले जाती है। इसीलिये कुछ भी रखना नहीं है। सब दे दिया। *डबल लाइट का अर्थ ही है सब-कुछ बाप-हवाले करना। तन भी मेरा नहीं। ये तन तो सेवा अर्थ बाप ने दिया है। आप सबने तो वायदा कर लिया ना कि तन भी तेरा, मन भी तेरा, धन भी तेरा।* ये वायदा किया है कि तन तेरा है बाकी आपका है? जब तन ही नहीं तो बाकी क्या। तो सदा कमल पुष्प का दृष्टान्त स्मृति में रहे कि मैं कमल पुष्प समान न्यारी और प्यारी हूँ।

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  अपने ही दर्पण में अपने तकदीर की सूरत को देखो। यह ज्ञान अर्थात नॉलेज दर्पण है। तो सबके पास दर्पण है ना तो अपनी सूरत देख सकते हो ना। *अभी बहुत समय के अधिकारी बनने का अभ्यास करो।* ऐसे नहीं अंत में तो बन ही जायेंगे। *अगर अंत में बनेंगे तो अंत का एक जन्म थोडा-सा राज्य कर लेंगे।*

 

✧  लेकिन यह भी याद रखना कि अगर बहुत समय का अब से अभ्यास नहीं होगा वा आदि से अभ्यासी नहीं बने हो, आदि से अब तक यह विशेष कार्यकर्ता आपको अपने अधिकार में चलाते हैं वा डगमग स्थिति करते रहते हैं अर्थात धोखा देते रहते हैं, *दु:ख की लहर का अनुभव कराते रहते हैं तो अंत में भी धोखा मिल जायेगा।*

 

✧  धोखा अर्थात दु:ख की लहर जरूर आयेगी। तो अंत में भी पचाताप के दु:ख की लहर आयेगी। इसलिए बापदादा सभी बच्चों को फिर से स्मृति दिलाते हैं कि *राजा बनो* और अपने विशेष सहयोगी कर्मचारी वा *राज्य कारोबारी साथियों को अपने अधिकार से चलाओ।* समझा।

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ जैसे ब्रह्मा बाप ने साकार जीवन में कर्मातीत होने के पहले न्यारे और प्यारे रहने के अभ्यास का प्रत्यक्ष अनुभव कराया। जो सभी बच्चे अनुभव सुनाते हो - सुनते हुए न्यारे, कार्य करते हुए न्यारे, बोलते हुए न्यारे रहते थे। सेवा को वा कोई कर्म को छोड़ा नहीं लेकिन न्यारे हो लास्ट दिन भी बच्चों की सेवा समाप्त की। *न्यारापन हर कर्म में सफलता सहज अनुभव कराता है। करके देखो। एक घंटा किसको समझाने की भी मेहनत करके देखो और उसके अंतर में 15 मिनट में सुनते हुए, बोलते हुए न्यारेपन की स्थिति में स्थित होके दूसरी आत्मा को भी न्यारेपन की स्थिति का वायब्रेशन देकर देखो। जो 15 मिनट में सफलता होगी वह एक घंटे में नहीं होगी। यही प्रेक्टिस ब्रह्मा बाप ने करके दिखाई। तो समझा। कया करना है!*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- बाप से कर्म, अकर्म, विकर्म की गुह्य गति को जानना"*

 

_ ➳  *मैं आत्मा सेण्टर में बाबा के कमरे में बैठ बाबा का आह्वान करती हूँ... बाहरी सभी बातों से अपने मन को हटाकर एक बाबा में लगाने की कोशिश करती हूँ... धीरे-धीरे सभी कर्मेन्द्रियाँ शांत होती जा रही हैं... भटकता हुआ मन स्थिर होने लगा है... मैं आत्मा अपना बुद्धि योग एक बाबा से कनेक्ट करती हूँ...* इस शरीर को भी भूल एक बाबा की लगन में मगन होने लगती हूँ... बाबा मेरे सम्मुख आकर बैठ जाते हैं... मैं आत्मा गहन शांति की अनुभूति कर रही हूँ... मैं और मेरा बाबा बस और कोई भी नहीं...

 

  *कदम-कदम पर बाप की श्रीमत लेकर कर्म में आने की शिक्षा देते हुए प्यारे बाबा कहते हैं:-* "मेरे मीठे फूल बच्चे... मीठे से भाग्य ने जो ईश्वर पिता का साथ दिलवाया है... उस महान भाग्य को सदा का सुखो भरा सौभाग्य बना लो... *हर पल मीठे बाबा की श्रीमत का हाथ पकड़कर सुखी और निश्चिन्त हो जाओ... जिन विकारो ने हर कर्म को विकर्म बनाकर जीवन को गर्त बना डाला... श्रीमत के साये में उनसे हर पल सुरक्षित रहो...*

 

_ ➳  *प्यारे बाबा को विकारों का दान देकर माया के ग्रहण से मुक्त होकर मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे प्यारे बाबा... मै आत्मा सच्चे ज्ञान को पाकर कर्मो की गुह्य गति जान गई हूँ... *आपकी श्रीमत पर चलकर जीवन पुण्य कर्मो से सजा रही हूँ... आपके मीठे साथ ने जीवन को फूलो सा महका दिया है... सुकर्मो से दामन सजता जा रहा है...*

 

  *हर कदम में मेरा साथ देकर मेरे भाग्य को श्रेष्ठ बनाते हुए खुदा दोस्त बन मीठे बाबा कहते हैं:-* "मीठे प्यारे लाडले बच्चे... श्रीमत ही वह सच्चा आधार है जो जीवन को खुशियो का पर्याय बनाता है... *स्वयं भगवान साथी बन हर कर्म में सलाह और साथ दे रहा है... तो इस महाभाग्य से रोम रोम सजा लो... सच्चे साथी की श्रीमत पर चलकर सुखदायी जीवन का भाग्य अपने नाम करालो...*

 

_ ➳  *सदा श्रेष्ठ संकल्प और कर्मों से अपने जीवन को सदा के लिए खुशहाल बनाते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* मेरे प्राणप्रिय बाबा... *मै आत्मा मनुष्य मत के पीछे लटककर कितनी दुखी हो गई थी... अब आपकी छत्रछाया में कितनी सुखी कितनी बेफिक्र जिंदगी को पा रही हूँ... आपका साथ पाकर मै आत्मा सतयुगी सुखो की मालकिन बनती जा रही हूँ...* मेरे जीवन की बागडोर को थाम आपने मुझे सच्चा सहारा दिया है...

 

  *अपने मीठे वरदानों की बारिश कर मुझे अपने दिल तख़्त पर बिठाते हुए मेरे बाबा कहते हैं:-* "प्यारे सिकीलधे मीठे बच्चे... यह वरदानी संगम सुकर्मो से दामन सजाने वाला खुबसूरत समय है कि मीठा बाबा बच्चों के सम्मुख है... *इसलिए हर कर्म को श्रीमत प्रमाण कर बाबा का दिल सदा का जीत लो... जब बाबा साथ है तो जीवन के पथ पर अकेले न चलो... सच्चे साथ का हाथ पकड़कर अनन्त खुशियो में उड़ जाओ...*

 

_ ➳  *ईश्वरीय प्रेम के साये में श्रेष्ठ कर्मों से व्यर्थ से मुक्त होकर समर्थ बनकर मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा आपकी मीठी यादो में कितनी खुशनुमा हो गई हूँ... *हर कदम पर श्रीमत के साथ अपने जीवन में खुशियो के फूल खिला रही हूँ... ईश्वर पिता के सच्चे साथ को पाकर, मै आत्मा हर कर्म को सुकर्म बनाती जा रही हूँ... और बेफिक्र बादशाह बनकर मुस्करा रही हूँ...*

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- योग की अग्नि से विकारों की कट को उतारना है*"

 

_ ➳  जैसे सूर्य की ज्वलन्त किरणे हर प्रकार के किचड़े को जला कर भस्म कर देती है ऐसे *ज्ञानसूर्य अपने शिव पिता के साथ योग लगाकर उनकी शक्तिशाली किरणो से अपने ऊपर चढ़े विकारों के किचड़े को समाप्त करने के लिए मैं आत्मा सर्वशक्तिवान, ज्ञान सूर्य अपने शिव पिता के पास उनके धाम पहुँचती हूँ* और उनकी सर्वशक्तियों की ज्वालास्वरूप किरणों की योगअग्नि में अपने 63 जन्मो के विकर्मों को दग्ध करने के लिए उनके बिल्कुल समीप जा कर बैठ जाती हूँ।

 

_ ➳  निरसंकल्प स्थिति में स्थित होकर, शक्तियों के सागर अपने शिव पिता की सर्वशक्तियों की एक - एक किरण को निहारते हुए मैं स्पष्ट महसूस करती हूँ कि हर किरण में से बहुत तेज अग्नि निकल रही है। *इस अग्नि की तपन को मैं आत्मा स्पष्ट महसूस कर रही हूँ और इस तपन के प्रभाव से अपने रूप को परिवर्तित होते हुए देख रही हूँ*। विकारों की अग्नि में जलने के कारण मेरा स्वरूप जो आयरन जैसा हो गया था वो अब इस योग की अग्नि में निखर कर कुंदन जैसा बन रहा है।

 

_ ➳  ज्ञान सूर्य बाबा से आ रही इन सर्वशक्तियों का स्वरूप प्रतिपल बदल रहा है और इनकी तीव्रता भी बढ़ती जा रही है। *ऐसा लग रहा है जैसे शक्तियों का एक चक्र मेरे चारों और निर्मित हो गया है जिसमे से अग्नि की लपटें निकल रही हैं और इन लपटों की तेज गर्माहट से मुझ आत्मा द्वारा किये हुए विकर्मों की मैल पिघल रही है*। मेरे पुराने आसुरी स्वभाव, संस्कार इस योग अग्नि में जल कर भस्म हो रहें हैं। जैसे - जैसे विकारों की कट उतर रही है वैसे - वैसे मैं आत्मा लाइट होती जा रही हूँ। *मेरी चमक बढ़ती जा रही हैं। सच्चे सोने के समान मैं एक दम शुद्ध और प्योर होती जा रही हूँ*।

 

_ ➳  देह भान में आने और अपने निज स्वरूप की विस्मृति के कारण मुझ आत्मा में निहित वो सर्व गुण और सर्व शक्तियाँ जो मर्ज हो गए थे वो मेरे शिव पिता के सहयोग से पुनः जागृत हो रहें हैं। *अपने खोये हुए सातों गुणों और अष्ट शक्तियों को पुनः प्राप्त कर मैं स्वयं को गुण स्वरूप और शक्ति स्वरूप अनुभव कर रही हूँ*। अपने सतोगुण और शक्तिसम्पन्न स्वरूप को पुनः प्राप्त कर मैं आत्मा अब ईश्वरीय सेवा अर्थ वापिस साकार लोक की और प्रस्थान करती हूँ। *साकार सृष्टि रूपी कर्मभूमि पर आकर अपने साकार तन में मैं आत्मा प्रवेश करती हूँ और भृकुटि पर विराजमान हो कर अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित हो जाती हूँ*।

 

_ ➳  अपने ब्राह्मण स्वरूप में रहते अब मैं सदैव इस बात को स्मृति में रखती हूँ कि मेरा यह ब्राह्मण जन्म ईश्वरीय देन है। *खुद ईश्वर बाप ने ईश्वरीय सेवा अर्थ मुझे यह अनमोल संगमयुगी ब्राह्मण जन्म गिफ्ट किया है*। इसलिए मेरे इस ब्राह्मण जीवन का लक्ष्य और कर्तव्य सर्विसएबुल बन विश्व की सर्व आत्माओ का कल्याण करना है। *अपने इस कर्तव्य को पूरा करने और सर्विसएबुल बनने के लिए अब मैं स्वयं पर पूरा अटेंशन देते हुए इस बात का पूरा ध्यान रखती हूँ कि मनसा, वाचा, कर्मणा मुझ से ऐसा कोई कर्म ना हो जो विकर्म बनें*।

 

_ ➳  विकारों का अंशमात्र भी मुझ आत्मा में ना रहे इसके लिए योगबल से आत्मा को तपाकर विकारों को भस्म करने का पुरुषार्थ मैं निरन्तर कर रही हूँ। *पुराने विकारी स्वभाव संस्कारों को योग अग्नि में जलाकर भस्म करने के साथ - साथ नये दैवी संस्कारो को अपने जीवन में धारण कर, सर्विसएबुल बन अपने संकल्प, बोल और कर्म से अब मैं सबको आप समान बनाने की सेवा कर रही हूँ*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं पावरफुल आत्मा हूँ।*

   *मैं सर्व प्राप्तियों के अनुभवी आत्मा हूँ।*

   *मैं सफलतामूर्त आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा मर्यादाओं को ही अपने ब्राह्मण जीवन के कदम बनाती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा सदैव कदम पर कदम रखती हूँ  ।*

   *मैं अपनी मंजिल के समीप पहुंचने वाली ब्राह्मण आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  *कई बच्चे कहते हैं हम तो बहुत सेवा करते हैंबहुत मेहनत करते हैं लेकिन प्राप्ति इतनी नहीं होती है। उसका कारण क्या? वरदान सबको एक है६० साल वालों को भी एक तो एक मास वाले को भी एक है। खजाने सभी को एक जैसे हैं। पालना सबको एक जैसी हैदिनचर्यामर्यादा सबके लिए एक जैसी है।* दूसरी-दूसरी तो नहीं है ना! ऐसे तो नहींविदेश की मर्यादायें और हैंइण्डिया की और हैंऐसे तो नहींथोड़ा-थोड़ा फर्क हैनहीं हैतो जब सब एक है फिर किसको सफलता मिलती हैकिसको कम मिलती है - क्यों?कारणबाप मदद कम देता है क्याकिसको ज्यादा देता हो, किसको कम, ऐसे हैनहीं है।

 

 _ ➳  फिर क्यों होता हैमतलब क्या हुआअपनी गलती है। *या तो बाडी-कान्सेस वाला मैं-पन आ जाता हैया कभी-कभी जो साथी हैं उन्हों की सफलता को देख ईर्ष्या भी आ जाती है। उस ईर्ष्या के कारण जो दिल से सेवा करनी चाहियेवो दिमाग से करते हैं लेकिन दिल से नहीं।* और फल मिलता है दिल से सेवा करने का। कई बार बच्चे दिमाग यूज करते हैं लेकिन दिल और दिमाग दोनों मिलाके नहीं करते। दिमाग मिला है उसको कार्य में लगाना अच्छा है लेकिन सिर्फ दिमाग नहीं। जो दिल से करते हैं तो दिल से करने के दिल में बाप की याद भी सदा रहती है। सिर्फ दिमाग से करते हैं तो थोड़ा टाइम दिमाग में याद रहेगा-हाँबाबा ही कराने वाला हैहाँ बाबा ही कराने वाला है लेकिन कुछ समय के बाद फिर वो ही मैं-पन आ जायेगा। *इसलिए दिमाग और दिल दोनों का बैलेन्स रखो।*

 

✺   *ड्रिल :-  "सेवा में दिमाग और दिल दोनों का बैलेन्स रखना"*

 

 _ ➳  मैं आत्मा चांदनी रात में एकांत में बैठी हुई हूँ... *ब्रह्मा बाबा की भृकुटि में विराजमान शिव बाबा के पास मैं सफेद प्रकाश का आकारी शरीर धारण किये धीरे-धीरे सूक्ष्मवतन में पहुँचती हूँ...* वहाँ चारों तरफ फूलों से सजावट है... जैसे ही मैं वहां पहुँचती हूँ, बाबा मुझ फ़रिश्ते पर फूलों की बरसात करना शुरू कर देते है...

 

 _ ➳  बाबा की दृष्टि से, मस्तक से निकलता लाल रंग की ठंडी किरणों का फव्वारा मुझ फ़रिश्ते पर पड़ रहा है... मैं किरणों से भीग चुकी हूँ...अनेक जन्मों के विकारों भरे संस्कार जलकर राख बन रहे है... *मैं अब सर्व गुणों का अनुभव कर रही हूँ...* विकार के वशीभूत देहअभिमान, ईर्ष्या, मेरापन सब समाप्त हो रहा है...

 

 _ ➳  बाबा मुझे लाल रंग का तिलक लगा रहे हैं... बाबा मुझे हीरों का बना ताज पहना रहे है... *मैं अब भूल चुकी हूँ कि देहअभिमान क्या होता है, मैं भूल चुकी हूँ ईर्ष्या क्या होती हैं... मैं भूल चुकी हूँ मेरापन क्या होता है...*

 

 _ ➳  अब मैं विकारों के वशीभूत देहअभिमान में नही आती हूँ... *जैसे ही मैं स्थूल या मन्सा सेवा करने लगती हूँ तो बाबा का लगाया हुआ लाल तिलक ही याद आता है... सब बाबा करा रहे हैं... मैं अब निमित्त भाव से हर कर्म कर रही हूँ... केवल सेवा के लिए निमित्त हूँ...* मेरे जो साथी है उनकी सफलता देख मैं खुशी से झूम उठती हूँ... हर कर्म करते मुझे बाबा ही याद आ रहे हैं...

 

_  ➳  *अब मैं दिल और दिमाग दोनों का बैलेंस रखकर देहीअभिमानी का अनुभव कर रही हूँ...* दिल से सेवा करने पर मैं दिलाराम बाप की सबसे स्नेही बच्ची बन चुकी हूँ... सभी आत्माएं मेरे इस अनुभव से बाबा की ओर आकर्षित हो रही है... मैं अब चढ़ती कला का अनुभव कर रही हूँ और सर्व को करा रही हूँ...

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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