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 01 / 11 / 19  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ ध्यान दीदार की इच्छा तो नहीं रखी ?

 

➢➢ एक दुसरे का परचिन्तन तो नहीं किया ?

 

➢➢ बिंदी रूप में स्थित रह औरों को भी ड्रामा की बिंदी की स्मृति दिलाई ?

 

➢➢ दुआएं दी और दुआएं ली ?

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  ✰ अव्यक्त पालना का रिटर्न

         ❂ तपस्वी जीवन

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〰✧  अपने हर संकल्प को हर कार्य को अव्यक्त बल से अव्यक्त रुप द्वारा वेरीफाय कराना है। बापदादा को अव्यक्त रुप से सदा सम्मुख और साथ रखकर हर संकल्प, हर कार्य करना है। साथी और साथ के अनुभव से बाप समान साक्षी अर्थात् न्यारा और प्यारा बनना है।

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?

 

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अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए

             ❂ श्रेष्ठ स्वमान

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   "मैं ऊंच ते ऊंच ब्राह्मण आत्मा हूँ"

 

  अपने को ऊंचे ते ऊंचे बाप की ऊंचे ते ऊंची ब्राह्मण आत्मायें समझते हो? ब्राह्मण सबसे ऊंचे गाये जाते हैं, ऊंचे की निशानी सदा ब्राह्मणों को चोटी पर दिखाते हैं। दुनिया वालों ने नामधारी ब्राह्मणों की निशानी दिखा दी है। तो चोटी रखने वाले नहीं लेकिन चोटी की स्थिति में रहने वाले। उन्होंने स्थूल निशानी दिखा दी है, वास्तव में हैं ऊंची स्थिति में रहने वाले।

 

  ब्राह्मणों को ही पुरुषोत्तम कहा जाता है। पुरुषोत्तम अर्थात् पुरुषों से उत्तम, साधारण मनुष्य आत्माओं से उत्तम। ऐसे पुरुषोत्तम हो ना! पुरुष आत्मा को भी कहते हैं श्रेष्ठ आत्मा बनने वाले अर्थात् पुरुषों से उत्तम पुरुष बनने वाले। देवताओंको भी पुरुषोत्तम कहते हैं क्योंकि देव-आत्मायें हैं। आप देव-आत्माओंसे भी ऊंचे ब्राह्मण हो - यह नशा सदा रहे। दूसरे नशे के लिए कहेंगे - कम करो, रुहानी नशे के लिए बाप कहते हैं - बढ़ाते चलो।

 

  क्योंकि यह नशा नुकसान वाला नहीं है, और सभी नशे नुकसान वाले हैं। यह चढ़ाने वाला है, वह गिराने वाले हैं। अगर रुहानी नशा उतर गया तो पुरानी दुनिया की स्मृति आ जायेगी। नशा चढ़ा हुआ होगा तो नई दुनिया की स्मृति रहेगी। यह ब्राह्मण संसार भी नया संसार है। सतयुग से भी यह संसार अति श्रेष्ठ है! तो सदा इस स्मृति से आगे बढ़ते चलो।

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?

 

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         रूहानी ड्रिल प्रति

अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं

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✧  तखत पर रहना अर्थात राज्य अधिकारी बनना। तो तख्त नशीन हो या कभी उतर आते हो? सदा स्मृति रखो कि - मैं आत्मा तो हूँ लेकिन कौन-सी आत्मा? राजा आत्मा, राज्य अधिकारी आत्मा हूँ, साधारण आत्मा नहीं हूँ।'

 

✧  राज्य अधिकारी आत्मा का नशा और साधारण आत्मा का नशा - इसमें कितना फर्क होगा ! तो राजा बन अपनी राज्य कारोवार को चेक करो - कौन-सी कर्मेन्द्रिय वार-वार धोखा देती है? अगर धोखा देती है तो उसको चेक करके अपने ऑर्डर में रखो।

 

✧  अगर अलबेले होकर छोड देंगे तो उसकी धोखा देने की आदत और पक्की हो जायेगी और नुकसान किसको होगा? अपने को होगा ना। इसलिए क्या करना है? अकालतखा-नशीन बन चेक करो। (पार्टियों के साथ)

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?

 

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         ❂ अशरीरी स्थिति प्रति

अव्यक्त बापदादा के इशारे

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〰✧  इस परिवर्तन के संकल्प को, जैसे बीज को पानी देते रहते हैं ना, तो फल निकलता है। पानी भी चाहिए, धूप भी चाहिए तो इस संकल्प को, बीज को स्मृति का पानी और धूप देते रहना। बार-बार रिवाइज करो- मेरा बापदादा से वायदा क्या है!

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   "ड्रिल :- सदा श्रीमत पर चलते रहना"

➳ _ ➳  मैं आत्मा बगीचे में बागवानी करते हुए पौधों के आसपास के खरपतवार को निकाल रही हूँ... जो पौधों के पोषक तत्वों को शोषित कर उनके विकास की गति को धीमी कर रहे हैं... खरपतवार को निकालने के बाद फूल-पौधे बहुत ही सुन्दर दिख रहे हैं... मुस्कुरा रहे हैं... ऐसे ही परम बागबान ने मुझ आत्मा के अन्दर के विकारों रूपी खरपतवार को निकालकर मुझे रूहानी फूल बना दिया है... मेरे जीवन के आंगन को खुशियों से खिला दिया है... मैं आत्मा उड़ चलती हूँ मेरे जीवन को श्रेष्ठ बनाने वाले प्यारे बागबान बाबा के पास...

❉  पावन दुनिया की राजाई के लिए श्रेष्ठ श्रीमत देते हुए पतित पावन प्यारे बाबा कहते हैं:- मेरे मीठे बच्चे... मीठे बाबा की श्रीमत पर चलकर पावन बनते हो इसलिए पावन दुनिया के सारे सुखो के अधिकारी बनते हो... मनुष्य की मत सम्पूर्ण पावन न बन सकते हो न ही सतयुगी दुनिया के मालिक बन सकते हो... यह कार्य ईश्वर पिता के सिवाय कोई कर ही न सके...

➳ _ ➳  श्रीमत की बाँहों में झूलते हुए सतयुगी सुखों के आसमान को छूते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:- हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा अपनी मत और दूसरो की मत से अपनी गिरती अवस्था की बेहतर अनुभवी हूँ... अब श्रीमत का हाथ थाम खुशियो के संसार में बसेरा हुआ है... प्यारा बाबा मुझे पावन बनाने आ गया है...

❉  प्यार भरी नज़रों से मुझे निहाल कर लक्ष्मी नारायण समान श्रेष्ठ बनाते हुए मीठे-मीठे बाबा कहते हैं:- मीठे प्यारे फूल बच्चे... पतित पावन सिर्फ बाबा है जो स्वयं पावन है वही पावन बना भी सकता है... मनुष्य खुद इस चक्र में आता है वह दूसरो को पावनता से कैसे सजाएगा भला... ईश्वर की मत ही सर्व प्राप्तियों का आधार है... श्रीमत ही मनुष्य को देवता श्रृंगार देकर सजाती है...

➳ _ ➳  अपने जीवन की गाड़ी को श्रीमत रूपी पटरी पर चलाते हुए मंजिल के करीब पहुँचते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:- मेरे प्राणप्रिय बाबा... मै आत्मा इतनी भाग्यशाली हूँ कि श्रीमत मेरे भाग्य में है... श्रीमत की ऊँगली पकड़ मै आत्मा पावनता की सुंदरता से दमक रही हूँ... और श्रीमत पर सम्पूर्ण पावन बन सतयुग की राजाई की अधिकारी बन रही हूँ...

❉  पवित्रता की खुशबू से महकाकर खुशियों के झूले में झुलाते हुए मेरे बाबा कहते हैं:- प्यारे सिकीलधे मीठे बच्चे... ईश्वर पिता धरती पर उतरा है प्रेम की सुगन्ध को बाँहों में समाये हुए... तो फूल बच्चे इस खुशबु को अपने रोम रोम में सुवासित कर लो... यादो को सांसो सा जीवन में भर लो... और यही प्रेम नाद सबको सुनाकर आह्लादित रहो... हर साँस पर नाम खुदाया हो... ऐसा जुनूनी बन जाओ...

➳ _ ➳  मैं आत्मा ज्ञान कलश को सिर पर धारण कर हीरे समान चमकते हुए कहती हूँ:- हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा अपनी मत पर चलकर और परमत का अनुसरण कर निराश मायूस हो गई थी... दुखो को ही अपनी नियति मान बैठी थी... प्यारे बाबा आपकी श्रीमत ने दुखो से निकाल... मीठे सुखो से दामन सजा दिया है... प्यारी सी श्रीमत ने मुझे पावन बनाकर महका दिया है...

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺ "ड्रिल :- बाबा की आज्ञा अनुसार हर कार्य करना है, कभी भी श्रीमत का उल्लंघन नहीं करना"

➳ _ ➳ अपने गॉडली स्टूडेंट स्वरूप की स्मृति में बैठ अपने परम शिक्षक शिव बाबा के मधुर महावाक्य रिवाइज करके मैं स्वयं से प्रतिज्ञा करती हूँ कि जीवन को श्रेष्ठ बनाने वाली श्रीमत जो मेरे परम शिक्षक शिव पिता परमात्मा हर रोज परमधाम से आकर मुरली के माध्यम से मुझे देते हैं। उस श्रीमत को अपने जीवन मे धारण कर मुझे नारी से लक्ष्मी बनने का पुरुषार्थ अवश्य करना है। कभी भी श्रीमत पर चलने में गफलत वा बहाना नही करना है। मेरे शिव पिता परमात्मा की श्रेष्ठ मत ही मेरे इस ब्राह्मण जीवन की सेफ्टी का आधार है। माया के हर वार का सामना करने का अचूक मन्त्र मेरे शिव पिता की श्रीमत है।

➳ _ ➳ अपने श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ बाप, टीचर, सतगुरु की श्रेष्ठ मत पर सदा चलने की स्वयं से प्रतिज्ञा करते - करते मैं उन प्राप्तियों की सुखद अनुभूति में खो जाती हूँ जो ब्राह्मण बनने के बाद मेरे प्यारे बाबा से मुझे प्राप्त हुई है। उन प्राप्तियों की मीठी मधुर स्मृति में खोई मैं अपने सर्वश्रेष्ठ भाग्य की सराहना करती हूँ कि कितनी पदमापदम सौभाग्य शाली हूँ मैं आत्मा। कोटो में कोई, कोई में भी कोई हूँ मै, जिसे स्वयं भगवान ने चुना है। बड़े बड़े महा मण्डलेशवर, साधू सन्यासी जिस भगवान की महिमा के गीत गाते हैं वो भगवान रोज मेरे सम्मुख आकर मेरी महिमा के गीत गाता है। रोज मुझे स्मृति दिलाता है कि मैं महान आत्मा हूँ। मैं विशेष आत्मा हूँ। मैं इस दुनिया की पूर्वज आत्मा हूँ।

➳ _ ➳ अपने सर्वश्रेष्ठ भाग्य को याद करते - करते अपने परम शिक्षक, परम सतगुरु, अपने प्यारे बाबा की मीठी - मीठी यादों में मैं खो जाती हूँ। मन जैसे बिल्कुल शांत और स्थिर हो जाता है और बुद्धि पूरी तरह से परमधाम में बाबा के सुंदर स्वरूप पर एकाग्र हो जाती है। मन बुद्धि की तार परमधाम निवासी मेरे प्यारे मीठे बाबा के साथ जुड़ते ही ऐसा अनुभव होता है जैसे कोई चीज मुझे ऊपर की ओर अपनी तरफ खींच रही है। मैं आत्मा सेकेण्ड में निराधार बन, देह से न्यारी हो कर ऊपर की ओर चल पड़ती हूँ। परमात्म शक्ति रूपी मैग्नेटिक पॉवर मुझे सहज ही अपनी ओर खींचती चली जा रही है।

➳ _ ➳ इस अति आनन्दमयी रूहानी यात्रा पर चलते हुए मैं सूर्य, चाँद, तारागणों को पार कर, फरिश्तों की दुनिया से भी पार, पहुँच जाती हूँ परमधाम, उस परम ज्योति पुंज के सामने जिनकी अनन्त शक्तियों की मैग्नेटिक पावर मुझे अपनी ओर खींच रही थी। वो परम ज्योति पुंज मेरे प्यारे परम पिता परमात्मा मेरे सम्मुख हैं। उनसे निकल रही अनन्त शक्तियां मुझे दिव्य अलौकिक आनन्द से भरपूर कर रही हैं। उनकी किरणों की शीतल छाया मुझे गहन शांति का अनुभव करवा रही हैं।

➳ _ ➳ सर्वशक्तिवान अपने शिव पिता की सर्वशक्तियों रूपी किरणों की छत्रछाया के नीचे बैठ, स्वयं को उनकी सर्वशक्तियों से भरपूर कर, शक्तिशाली बन मैं परमधाम से नीचे आ जाती हूँ और फरिश्तों की जगमग करती हुई दुनिया में प्रवेश कर जाती हूँ। यहां आकर अपनी सफेद चमकीली फरिश्ता ड्रेस को मैं धारण करती हूँ और अव्यक्त बापदादा के पास पहुँचती हूँ। बड़े प्यार से बापदादा अपनी बाहों को फैला कर मुझे अपनी बाहों में भर लेते हैं और असीम स्नेह लुटाने के बाद अपनी शक्तिशाली दृष्टि से मुझे निहारते हुए अपना समस्त बल मेरे अंदर भरकर मुझे शक्तिशाली बना देते हैं और वरदानो से मुझे भरपूर कर देते हैं।

➳ _ ➳ परमात्म शक्तियों से भरपूर होकर, वरदानो से अपनी झोली भरकर प्यारे बापदादा की श्रेष्ठ मत पर चल, अपने ब्राह्मण जीवन को सर्वश्रेष्ठ बनाने के लिए, मैं अपने निराकारी स्वरूप में वापिस लौटती हूँ और साकार सृष्टि पर आकर अपने ब्राह्मण तन में प्रवेश कर जाती हूँ। परमात्म शक्तियों का बल मुझे मेरे इस ब्राह्मण जीवन में हर कदम श्रीमत पर चलने की प्रेरणा दे रहा है। श्रीमत पर चलने में कभी भी गफलत वा बहाना ना करने की प्रतिज्ञा कर, अपने प्यारे बाबा की याद में रह, उनकी मदद से अब मैं इस प्रतिज्ञा को दृढ़ता के साथ पूरा करते हुए अपने जीवन को श्रेष्ठ बना रही हूँ।

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

✺  मैं बिंदी रूप में स्थित रह औरों को भी ड्रामा के बिंदी की स्मृति दिलाने वाली विघ्न-विनाशक आत्मा हूँ।

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

✺   मैं दुआएं लेकर, दुआएं देकर बहुत जल्दी मायाजीत बनने वाली आत्मा हूँ  ।

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  बापदादा एक-एक बच्चे के मस्तक में सम्पूर्ण पवित्रता की चमकती हुई मणी देखना चाहते हैं। नयनों में पवित्रता की झलक, पवित्रता के दो नयनों के तारे, रूहानियत से चमकते हुए देखने चाहते हैं। बोल में मधुरता, विशेषता, अमूल्य बोल सुनने चाहते हैं। कर्म में सन्तुष्टता, निर्माणता सदा देखना चाहते हैं। भावना में - सदा शुभ भावना और भाव में सदा आत्मिक भाव, भाई-भाई का भाव। सदा आपके मस्तक से लाइट काफरिश्ते पन का ताज दिखाई दे। दिखाई देने का मतलब है अनुभव हो। ऐसे सजे सजाये मूर्त देखने चाहते हैं। और ऐसी मूर्त ही श्रेष्ठ पूज्य बनेगी। वह तो आपके जड़ चित्र बनायेंगे लेकिन बाप चैतन्य चित्र देखने चाहते हैं। 

 

✺   ड्रिल :-  "बापदादा के सामने सजे सजाये चैतन्य मूर्त बनने का अनुभव"

 

 _ ➳  तारक जडित गगन की नीली चुनरिया... चुनरियाँ ओढे मधुबन की पावन सी ये धरनी... और उस पर लहराता पावनता का अनन्त सागर... सागर में छिपे एक से एक बहुमूल्य रत्न... और शान्ति स्तम्भ रूपी वो लाईट हाऊस... जो तूफानों से घिरी कश्तियों का मार्ग दर्शक बन गया है... मैं आत्मा बैठ गयी हूँ देह रूपी कश्ती सहित, इस लाईट हाऊस के सामने... और भरपूर होती जा रही हूँ... पावनता से, मधुरता से, सन्तुष्टता से... मैं आत्मा फरिश्तें रूप में तैर रही हूँ पावनता के इस सागर में... सामने से हाऊसबोट की तरह तैरकर आती हुई कुटिया और उसमें हाथ पकडकर, मुझे बिठाते हुए बापदादा आनन्द से विभोर होता हुआ मैं... 

 

 _ ➳  देख रहा हूँ हाऊस बोट पर मैं दैवीय श्रृंगार की सारी सामग्री बडे करीने से सजाकर रखी है एक बडे से थाल में... और बापदादा श्रृंगार कर रहे है किसी दिव्य मूरत का बडी तल्लीनता से... नयनों मे जडे है पावनता के दो तारें... पावनता की उस कशिश में बंधकर मैं मानो पलके ही झपकाना भूल गया हूँ... और देखे जा रहा हूँ अपलक उस दिव्य से चैतन्य श्रृंगार की एक एक बारीकी को... वाणी में वीणा की सरगम भरी जा रही है... वो मिश्री सी मिठास और जादुई सी प्रेरणा से भरते रूहानी बोल... अचानक दिव्य मूरत के शालीनता से हिलते हाथ... कर्म में सन्तुष्टता और निर्माणता का परिचय देते हुए...

 

 _ ➳  और अब एकाएक भावों की एक दिलकश सी धारा भिगो जाती है मुझे... शुभ भावना का ज्वार सा फूट रहा है मेरे रोम रोम से... उस शुभ भाव की धारा के मुझे छूते ही... और अब केवल आत्मीयता का गहरा भाव शेष है वहाँ... मैं भूल गया हूँ निज रूप को भी पलभर के लिए और बेहद आत्मीयता महसूस कर रहा हूँ उस दिव्य मूरत में... और अब अन्तिम श्रृंगार के इन्तजार में... मै श्वाँस रोके देख रहा हूँ उत्सुकता से...  बापदादा ने फरिश्ते पन का ताज थमा दिया है मेरे हाथों में... इशारा पाकर मैं ताज पहनाने आगे बढ रहा हूँ आहिस्ता आहिस्ता... और हैरान हो गया हूँ अपनी ही हमशक्ल चैतन्य मूरत को देखकर... बापदादा की हसरतों का परचम लहराने का वादा मन ही मन करता हुआ... पहन लेता हूँ वो ताज स्वयं ही अधिकार पूर्वक...

 

 _ ➳  कुछ देर पहले तक मन में चल रही सभी जिज्ञासाओं का समाधान पा लिया है मैने... वो मैं ही हूँ जिसे बापदादा अकेले में और मेले में हर समय श्रृंगारते हैं... और मूरत की जगह चैतन्य मूरत बनकर खडा हो गया हूँ मैं... अपनी वरदानी दृष्टि से मुझे भरपूर करते बापदादा... और सजी सजायी चैतन्य मूरत का गहराई से अनुभव करता मैं... देर तक बापदादा से दृष्टि लेकर मैं लौट आया हूँ अपनी देह रूपी कश्ती में... पावनता के उस सागर को कश्ती में समेटने का मजबूत संकल्प लिए हुए...

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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