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 02 / 01 / 19  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *एक सत बाप का संग किया ?*

 

➢➢ *बाप की मदद से सूली को काँटा बनाया ?*

 

➢➢ *शुभ भावना के स्टॉक द्वारा नेगेटिव को पॉजिटिव में परिवर्तित किया ?*

 

➢➢ *अंतर्मुखी स्थिति द्वारा हर एक के दिल के राज़ को जानकार उन्हें राज़ी किया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  अभ्यास करो - देह और देह के देश को भूल अशरीरी *परमधाम निवासी बन जाओ, फिर परमधाम निवासी से अव्यक्त स्थिति में स्थित हो जाओ, फिर सेवा के प्रति आवाज में आओ, सेवा करते हुए भी अपने स्वरूप की स्मृति में रहो, अपनी बुद्धि को जहाँ चाहो वहाँ एक सेकेण्ड से भी कम समय में लगा लो तब पास विद आनर बनेंगे।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं हर कदम में चढ़ती कला का अनुभव करने वाली विशेष आत्मा हूँ"*

 

✧  सदा चढ़ती कला में जा रहे हो? *हर कदम में चढ़ती कला के अनुभवी। संकल्प, बोल, कर्म सम्पर्क और सम्बन्ध सबमें सदा चढ़ती कला। क्योंकि समय ही है चढ़ती कला का और कोई भी युग चढ़ती कला का नहीं है।*

 

✧  *संगमयुग ही चढ़ती कला का युग है, तो जैसा समय वैसा ही अनुभव होना चाहिए। जो सेकण्ड बीता उसके आगे का सेकण्ड आया, तो चढ़ती कला।*

 

  ऐसे नहीं दो मास पहले जैसे थे वैसे ही अभी हो। हर समय परिवर्तन। लेकिन परिवर्तन भी चढ़ती कला का। *किसी भी बात में रुकने वाले नहीं। चढ़ती कला वाले रुकते नहीं हैं, वे सदा औरों को भी चढ़ती कला में ले जाते हैं।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  तो कर्मातीत बनना है ना? बापदादा भी कहते हैं आप को ही बनना है। और कोई नहीं आयेंगे, आप ही हो। आपको ही साथ में ले जायेंगे लेकिन कर्मातीत को ले जायेंगे ना। *साथ चलेंगे या पीछे-पीछे आयेंगे? (साथ चलेगे)*

 

✧  यह तो बहुत अच्छा बोला। साथ चलेंगे, हिसाब चुक्त करेंगे? इसमें हाँ जी नहीं बोला। कर्मातीत बनके साथ चलेंगे ना। *साथ चलना अर्थात साथी बनकर चलना।* जोडी तो अच्छी चाहिए या लम्बी और छोटी? समान चाहिए ना!

 

✧  तो कर्मातीत बनना ही है। तो क्या करेंगे? अभी अपना राज्य अच्छी तरह से सम्भालो। रोज अपनी दरबार लगाओ। राज्य अधिकारी तो हो ना! तो *अपनी दरबार लगाओ, कर्मचारियों से हालचाल पूछो।* चेक करो ऑर्डर में हैं?

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧  *फ़रिश्ते अर्थात् अपने फ्युचर द्वारा अन्य आत्माओं के फ्युचर बनाने वाले सदा अपना फ्युचर सामने रहता है?* जितना निमित्त बनी हुई आत्मायें अपने फ्युचर को सदा सामने रखेंगी उतना अन्य आत्माओं को भी अपना फ्युचर बनाने की प्रेरणा दे सकेंगी। *अपना फ्युचर स्पष्ट नहीं तो दूसरों को भी स्पष्ट बनाने का रास्ता नहीं बता सकेंगी।* अपना फ्युचर स्पष्ट है? महाराजा या महारानी- जो भी बने, लेकिन उससे पहले अपना भविष्य फ़रिश्तेपन का, कर्मातीत अवस्था का- वह सामने स्पष्ट आता है? ऐसा अनुभव होता है कि मैं हर कल्प में फ़रिश्ते स्वरूप में ये पार्ट बजा चुकी हूँ और अभी बजाना है? वो झलक सामने आती है? जैसे दर्पण में अपने स्वरूप की झलक देखते हो ऐसे नॉलेज के दर्पण में अपने पुरुषार्थ से फ़रिश्तेपन की झलक स्पष्ट दिखाई देती है? *जब तक फ़रिश्तेपन की झलक स्पष्ट दिखाई नहीं देगी तब तक भविष्य भी स्पष्ट नहीं होगा।* यह संकल्प आता ही रहेगा कि शायद मैं ये बनूँ या वो बनूँ? लेकिन फ़रिश्तेपन की झलक स्पष्ट दिखाई देगी तो वह भी स्पष्ट दिखाई देगी। तो वह दिखाई देता है या अभी घूंघट में है? जैसे चित्र का अनावरण कराते हो तो अपने फ़रिश्ते स्वरूप का अनावरण कब करेंगे? आपे ही करेंगे या चीफ़ गेस्ट को बुलायेंगे? *यह पुरुषार्थ की कमज़ोरी का पद हटाओ तो स्पष्ट फ़रिश्ता रूप हो जायेगा।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- याद और पढाई पर अटेंशन देना"*

 

_ ➳  *मैं आत्मा अपने मन-बुद्धि को बाह्य सभी बातों से हटाकर भृकुटी के मध्य केन्द्रित करती हूँ... इस देह रूपी ड्रेस से मैं आत्मा बाहर निकल फ़रिश्ता ड्रेस धारण करती हूँ... और इस धरा से ऊपर उड़ते हुए, सागर, नदियों, जंगलों, पहाड़ों को पार करती हुई आसमान में बादलों के ऊपर बैठ जाती हूँ...* आसमान में चाँद, सितारों से मिलकर और ऊपर उड़कर सूक्ष्म वतन में बापदादा के सम्मुख जाकर बैठ जाती हूँ राजयोग की पढाई पढने...

 

  *मुझे डबल सिरताज बनाकर विश्व की राजाई मेरे नाम करने के लिए अमूल्य ज्ञान देते हुए प्यारे बाबा कहते हैं:-* मेरे मीठे फूल बच्चे... यह ईश्वरीय पढ़ाई वह जागीर, वह दौलत है जो विश्व का राज्य भाग्य दिलायेगी... *इसलिये इस महान पढ़ाई में रग रग से जुट जाओ... ईश्वर पिता की गोद में बैठ पढ़ते हो और यादो से विश्व अधिकारी सहज ही बन जाते हो... कितना प्यारा और मीठा सा यह भाग्य है... इसके नशे में डूब जाओ...*

 

_ ➳  *बाबा के मोहब्बत की रोशनी में सच्ची कमाई कर हीरे समान चमकते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे प्यारे बाबा... मै आत्मा आपके प्यार भरी छाँव में, *सुखो भरी गोद में बैठ राजाई भाग्य पा रही हूँ... देवताई संस्कारो से सजकर मीठा सा मुस्करा रही हूँ, और सुनहरे सुखो की ओर कदम बढ़ाती जा रही हूँ...*

 

  *अपने पलकों में बिठाकर यादों के समुन्दर की गहराईयों में डुबोते हुए मीठे बाबा कहते हैं:-* मीठे प्यारे लाडले बच्चे... *सच्ची पढ़ाई को दिल जान से पढ़कर अधिकारी बन जाओ... अमूल्य खजानो को और अथाह सुखो की दौलत से मालामाल बन जाओ...* ईश्वर पिता से सब कुछ लेकर देवताओ सा खुबसूरत जीवन बाँहों में भरकर खिलखिलाओ... डबल सिरताज बन सदा की मुस्कान से सज जाओ...

 

_ ➳  *रूहानी नशे में खोकर बाबा को अपने नैनों में बसाकर मैं आत्मा कहती हूँ:-* मेरे प्राणप्रिय बाबा... *मै आत्मा आपकी मीठी यादो और अमूल्य ज्ञान रत्नों से अथाह सुखो की मालकिन और देवताओ सा रूप रंग पा रही हूँ...* कभी दुखो में गरीब सी... मै आत्मा आज शिव बाबा आपकी बाँहों में पूरे विश्व धरा का अधिकार पा रही हूँ...

 

  *अमूल्य ज्ञान रत्नों की निधियों से मुझे मालामाल करते हुए मेरे रत्नाकर बाबा कहते हैं:-* प्यारे सिकीलधे मीठे बच्चे... *ईश्वरीय पढ़ाई ही सारे सच्चे सुखो का आधार है... सारा मदार इस पढ़ाई पर ही है... जितना ज्ञान रत्नों को मन और बुद्धि में समाओगे उतना ही प्यारा सतयुगी सुखो में इठलाओगे... इसलिए इस पढ़ाई में जीजान से जुट जाओ...* और डबल ताज धारी बन विश्वधरा पर राजाई का लुत्फ़ उठाओ...

 

_ ➳  *इस एक जन्म की पढाई से 21 जन्मों की ऊँची तकदीर बनाते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... *मै आत्मा ईश्वरीय पढ़ाई से अथाह अमीरी का खजाना पा रही हूँ... राजयोगी बनकर किस कदर धनवान् होती जा रही हूँ...* दुखो की मोहताज से मुक्त होकर ईश्वरीय बाँहों में अमीर और अमीर होती जा रही हूँ...

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- पढ़ाई पर पूरा ध्यान देना है*"

 

_ ➳  आज के इस तमोप्रधान माहौल में तमोप्रधान बन चुकी हर चीज को और इस तमोप्रधान दुनिया को फिर से सतोप्रधान बनाने के लिए ही भगवान इस धरा पर आयें है और इस श्रेष्ठ कर्तव्य को सम्पन्न करने के लिए तथा सभी आत्माओं की बुद्धि को स्वच्छ, सतोप्रधान  बनाने के लिए परमपिता परमात्मा स्वयं परमशिक्षक बन जीवन को परिवर्तन करने वाली पढ़ाई हर रोज हमे पढ़ा रहें हैं। *तो कितनी महान सौभाग्यशाली हूँ मैं आत्मा जो गॉडली स्टूडेंट बन भगवान से पढ़ रही हूँ। मन ही मन अपने भाग्य की सराहना करते, मैं स्वयं से प्रतिज्ञा करती हूँ कि अपने परमशिक्षक भगवान बाप द्वारा मिलने वाले ज्ञान को अच्छी रीति बुद्धि में धारण कर, अपनी बुद्धि को सतोप्रधान बनाने का मैं पूरा पुरुषार्थ करूँगी*।

 

_ ➳  अपने परमशिक्षक शिव बाबा द्वारा मिलने वाले ज्ञान के अखुट खजानों को बुद्धि में धारण कर बुद्धि को स्वच्छ और पावन बनाने के लिए अब मैं अपने गॉडली स्टूडेंट स्वरूप में स्थित हो जाती हूँ और अपने बाबा द्वारा मुरली के माध्यम से हर रोज मिलने वाले मधुर महावाक्यों पर विचार सागर मंथन करने बैठ जाती हूँ। *एकांत में बैठ मुरली की गुह्य प्वाइंट्स पर विचार सागर मन्थन करते हुए मैं महसूस करती हूँ कि जितना इस पढ़ाई पर मैं मन्थन कर रही हूँ मेरी बुद्धि उतनी ही खुल रही है और इस पढ़ाई को जीवन मे धारण करना बिल्कुल सहज लगने लगा है*। नर से नारायण और नारी से लक्ष्मी बनाने वाली ये पढ़ाई ही परिवर्तन का आधार है जिसे मैं अपने जीवन मे स्पष्ट महसूस कर रही हूँ। *जैसे - जैसे इस पढ़ाई को मैं अपने जीवन मे धारण करती जा रही हूँ वैसे - वैसे मेरी बुद्धि सतोप्रधान बनती जा रही है*।

 

_ ➳  इस ईश्वरीय पढ़ाई से अपने जीवन मे आये परिवर्तन के बारे में विचार कर मन ही मन हर्षित होते हुए अपने परमशिक्षक शिव बाबा का मैं दिल से कोटि - कोटि शुक्रिया अदा करती हूँ और उनकी मीठी याद में खो जाती हूँ *जो मुझे सेकण्ड में अशरीरी स्थिति में स्थित कर देती है और मन बुद्धि के विमान पर बिठा कर मुझे मधुबन की उस पावन धरनी पर ले जाती है जहाँ भगवान स्वयं परमशिक्षक बन साकार में बच्चों को आकर ईश्वरीय पढ़ाई पढ़ाते हैं*।

 

_ ➳  देख रही हूँ मैं स्वयं को अपने गॉडली स्टूडेंट ब्राह्मण स्वरूप में डायमंड हाल में, जहाँ भगवान अपने साकार रथ पर विराजमान होकर मधुर महावाक्य उच्चारण कर रहें हैं। *एकटक अपने परमशिक्षक भगवान बाप को निहारते हुए उनके मुख कमल से निकलने वाले अनमोल ज्ञान को सुनकर उसे बुद्धि में धारण करके मैं वापिस लौट आती हूँ और इस पढ़ाई से अपनी बुद्धि को सतोप्रधान बनाने वाले अपने परमशिक्षक निराकार शिव बाबा से उनके ही समान बन उनसे मिलने मनाने की इच्छा से अब अपने मन और बुद्धि को सब बातों से हटाकर मन बुद्धि को पूरी तरह एकाग्र कर लेती हूँ*। एकाग्रता की शक्ति धीरे - धीरे देह भान से मुक्त कर, मेरे निराकारी सत्य स्वरूप में मुझे स्थित कर देती है और अपने सत्य स्वरूप में स्थित होते ही स्वयं को मैं देह से पूरी तरह अलग विदेही आत्मा महसूस करने लगती हूँ।

 

_ ➳  देह के भान से मुक्त होकर अपने प्वाइंट ऑफ लाइट स्वरूप में स्थित होकर मैं बड़ी आसानी से अपने शरीर रूपी रथ को छोड़ उससे बाहर आ जाती हूँ और हर बन्धन से मुक्त एक अद्भुत हल्केपन का अनुभव करते हुए, देह और देह की दुनिया से किनारा कर ऊपर आकाश की ओर उड़ जाती हूँ। *मन बुद्धि से दुनिया के खूबसूरत नजारो को देखती, अपनी यात्रा पर चलते हुए, मैं आकाश को पार कर, उससे ऊपर सूक्ष्म वतन से परें आत्माओं की उस खूबसूरत निराकारी दुनिया मे प्रवेश करती हूँ जहाँ मेरे शिव पिता रहते हैं*।

 

_ ➳  अपने इस शान्तिधाम, निर्वाणधाम घर मे आकर, गहन शांति की अनुभूति करते हुए इस अंतहीन ब्रह्मांड में विचरण करते - करते मैं पहुँच गई हूँ अपने प्यारे पिता के समीप जो अपनी सर्वशक्तियो की किरणों रूपी बाहों को फैलाये मेरा आह्वान कर रहें हैं। *अपने पिता परमात्मा के प्रेम की प्यासी मैं आत्मा स्वयं को तृप्त करने के लिए अपने पिता के पास पहुँच  कर उनकी किरणों रूपी बाहों में समा जाती हूँ। अपनी किरणों रूपी बाहों में मुझे भरकर मेरे मीठे दिलाराम बाबा अपना असीम स्नेह मुझ पर लुटा रहें हैं*। अपने अंदर निहित गुणों और  शक्तियों को जिन्हें मैं देह भान में आकर भूल गई थी, उन्हें बाबा अपने गुणों और सर्वशक्तियों की अनन्त धाराओं के रूप में मुझ पर बरसाते हुए पुनः जागृत कर रहे हैं।

 

_ ➳  अपनी खोई हुई शक्तियों को पुनः प्राप्त कर मैं आत्मा बहुत ही शक्तिशाली स्थिति का अनुभव करवा रही हैं। सर्वगुण और सर्वशक्तिसम्पन्न बनकर मैं वापिस साकारी दुनिया में लौट आई हूँ। *अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित होकर, अपने परमशिक्षक शिव बाबा द्वारा मुरली के माध्यम से हर रोज पढ़ाई जाने वाली पढ़ाई को अच्छी रीति पढ़कर, और अच्छी रीति धारण करके अपने बुद्धि रूपी बर्तन को मैं धीरे - धीरे साफ, स्वच्छ और सतोप्रधान बनाती जा रही हूँ*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

✺   *मैं बाप की मदद से सूली को काटा बनाने वाली सदा निश्चिन्त और ट्रस्टी आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

✺  *मैं शुभ भावना के स्टॉक द्वारा निगेटिव को पॉजिटिव में परिवर्तन करने वाली शक्तिशाली आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  अभी समय अनुसार जैसे कहाँ-कहाँ पानी के प्यासी हैंऐसे वर्तमान समय शुद्ध, शान्तिमयसुखमय वायब्रेशन के प्यासी हैं। *फरिश्ते रूप से ही वायब्रेशन फैला सकते हो।* *फरिश्ता अर्थात् सदा ऊँच स्थिति में रहने वाले।* फरिश्ता अर्थात् *पुराने संसार और पुराने संस्कार से नाता नहीं।* अभी *संसार परिवर्तन आप सबके संस्कार परिवर्तन के लिए रुका हुआ है।* इस नये वर्ष में लक्ष्य रखो - संस्कार परिवर्तन, स्वयं का भी और सहयोग द्वारा औरों का भी। *कोई कमजोर है तो सहयोग दोन वर्णन करोन वातावरण बनाओ। सहयोग दो।*

 

 _ ➳  इस वर्ष की टापिक 'संस्कार परिवर्तन' फरिश्ता संस्कार, *ब्रह्मा बाप समान संस्कार।* तो सहज पुरुषार्थ है या मुश्किल हैथोड़ा-थोड़ा मुश्किल हैकभी भी कोई बात मुश्किल होती नहीं हैअपनी *कमजोरी मुश्किल बनाती है।* इसीलिए बापदादा कहते हैं 'हे *मास्टरसर्वशक्तिवान बच्चे,* अभी शक्तियों का वायुमण्डल फैलाओ'। अभी *वायुमण्डल को आपकी बहुत-बहुत-बहुत आवश्यकता है।* जैसे आजकल विश्व में पोल्यूशन की प्राब्लम हैऐसे विश्व में *एक घड़ी मन में शान्ति सुख के वायुमण्डल की आवश्यकता है* *क्योंकि मन का पोल्यूशन बहुत हैहवा की पोल्यूशन से भी ज्यादा है। अच्छा।*

 

✺   *ड्रिल :-  "संस्कार परिवर्तन से मन का पोल्यूशन हटाकर, शक्तियों का वायुमण्डल फैलाना"*

 

 _ ➳  मैं आत्मा बाबा के प्यार की वर्सा के नीचें उनकीं याद में खोई हुईं हूँ... बाबा बड़े प्यार से ज्ञान स्नान करा रहे हैं... *चारों ओर प्रकृति भी मुझ आत्मा को देख हर्षित हो रही हैं...* मैं आत्मा प्रकृति और सर्व आत्माओ को शुद्ध, शांतिमय और सुखमय वायब्रेशन दे रही हूँ... *बाबा की याद से मुझ आत्मा से शक्तिशाली वायब्रेशन निकल रहे हैं...* जिससे सर्व आत्माओं को सुख की अनुभूति हो रही हैं... सर्व आत्माओं को लग रहा हैं कि कोई उन्हें शांति की अनुभूति करा रहा है... *उनके विचलित और अशांत मन शांत हो रहे हैं... मैं आत्मा फ़रिश्ता बन सारे ग्लोब में सुख, शांति का वायब्रेशन दे रही हूँ...* जिससे सारे विश्व में शांति और सुख की किरणें फ़ैल रही हैं... मै आत्मा देख रही हूँ... *कि प्रकृति के पाचों तत्व शांत हो गये हैं...*

 

 _ ➳  फ़रिश्ता पन की स्थिति से मै आत्मा अपने ऊचें ते ऊचें स्वमान में अपने ऊचें ते ऊचें *बाप की याद से सर्व आत्माओं को सुख और शांति का वायब्रेशन दे रही हूँ...* और ना ही *इस पुरानीं दुनियाँ से कोई रिश्ता हैं...* मैं फ़रिश्ता सारे विश्व की सेवा में बिजी हूँ... *मुझ आत्मा के सारे पुराने और कड़े संस्कार परिवर्तित हो चुके है...* और मुझ आत्मा में दैवीय संस्कार आ चुके हैं... *स्व के सहयोग और सर्व के सहयोग से मुझ आत्मा के सारे पुरानें संस्कार ख़त्म हो चुकें हैं...*  

 

 _ ➳  *मै आत्मा मास्टर सर्व शक्तिमान की स्टेज से सर्व कमज़ोर आत्माओं को सकाश दे रही हूँ...* और उन्हें सहयोग की शक्ति दे रही हूँ... *मै आत्मा किसी और आत्माओं की कमी कमज़ोरी ना देख, ना ही उनका वर्णन कर उन आत्माओं को सहयोग दे रही हूँ...* और उन्हें आगे बढ़ा रही हूँ...

 

 _ ➳  बाबा ने मुझ आत्मा को संस्कार परिवर्तन का वरदान दिया हैं... *बाबा के साथ और सर्व शक्तियों से मैं आत्मा अपने सारे पुरानें संस्कार परिवर्तन कर चुकी हूँ... जैसे ब्रह्मा बाप ने सेकंड में अपने सारे संस्कार परिवर्तित कर के फ़रिश्ता बन गए...* वैसे मै आत्मा भी अपने सारे संस्कार परिवर्तन कर चुकी हूँ... *कोई भी बात अब मुझ आत्मा के लिए मुश्किल नहीं हैं...* और ना ही कोई कमज़ोरी मुझ आत्मा में हैं... *मै आत्मा सर्व कमज़ोरियो को समाप्त कर आगे बढ़ चुकी हूँ...* 

 

 _ ➳  बाबा की दी हुई शक्तियों से *चारों ओर दिव्य वायुमंडल बन गया हैं... जिससे सर्व आत्माओ को सुख, शांति का अनुभव हो रहा है...* चारों तरफ़ दिव्य और पवित्र वायुमंडल बन चुका हैं... *सारी प्रकृति और सर्व आत्माओं को सुख और शांति की अनुभूति हो रही हैं...* सारे विश्व में शांति का वायुमंडल बन गया हैं... कितना सुखद अनुभव हैं... कि *चारों ओर शांति का वायुमंडल हैं... सबके मन से अशुद्ध संकल्प, विकल्प सब ख़त्म हो चुकें हैं...* और सर्व का सर्व शक्तियों से भर चूका हैं... *मुझ फ़रिश्ता आत्मा के साथ सारा विश्व बाबा का दिल से धन्यवाद कर रहे हैं... कि पाना था जो वो पा लिया...*

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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