━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━

 02 / 04 / 19  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━

 

∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *किसी के नाम रूप में तो नहीं फंसे ?*

 

➢➢ *पाप आत्माओं से कोई भी लेन देन तो नहीं की ?*

 

➢➢ *परिस्थितयों को शिक्षक समझ उनसे पाठ पड़ा ?*

 

➢➢ *भूल से भी किसी को दुःख तो नहीं दिया ?*

────────────────────────

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

✧  *योग की शक्ति जमा करने के लिए कर्म और योग का बैलेंस और बढ़ाओ।* कर्म करते योग की पॉवरफुल स्टेज रहे-इसका अभ्यास बढ़ाओ। *जैसे सेवा के लिए इन्वेंशन करते वैसे इन विशेष अनुभवों के अभ्यास के लिए समय निकालो और नवीनता लाकर के सबके आगे एक्जाम्पुल बनो।*

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

────────────────────────

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

✺   *"मैं डबल लाइट फरिश्ता हूँ"*

 

  सदा स्वयं को डबल लाइट फरिश्ता अनुभव करते हो। *फरिश्ता अर्थात् जिसकी दुनिया ही 'एक बाप' हो। ऐसे फरिश्ते सदा बाप के प्यारे हैं। फरिश्ता अर्थात् देह और देह के सम्बन्धों से आकर्षण का रिश्ता नहीं। निमित्त मात्र देह में हैं और देह के सम्बन्धियों से कार्य में आते हैं लेकिन लगाव नहीं। क्योंकि फरिश्तों के और कोई से रिश्ते नहीं होते। फरिश्ते के रिश्ते एक बाप के साथ हैं।* ऐसे फरिश्ते हो ना।

 

  *अभी-अभी देह में कर्म करने के लिए आते और अभी-अभी देह से न्यारे! फरिश्ते सेकण्ड में यहाँ, सेकण्ड में वहाँ। क्योंकि उड़ाने वाले हैं। कर्म करने के लिए देह का आधार लिया और फिर ऊपर।* ऐसे अनुभव करते हो? अगर कहाँ भी लगाव है, बन्धन है तो बन्धन वाला ऊपर नहीं उड़ सकता। वह नीचे आ जायेगा।

 

  *फरिश्ते अर्थात् सदा उड़ती कला वाले। नीचे ऊपर होने वाले नहीं। सदा ऊपर की स्थिति में रहने वाले। फरिश्तों के संसार में रहने वाले। तो फरिश्ता स्मृति स्वरूप बने तो सब रिश्ते खत्म। ऐसे अभ्यासी हो ना। कर्म किया और फिर न्यारे।* लिफ्ट में क्या करते हैं? अभी-अभी नीचे अभी-अभी ऊपर। नीचे आये कर्म किया और फिर स्विच दबाया और ऊपर। ऐसे अभ्यासी।

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

────────────────────────

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

✧  जैसे  बापदादा व्यक्त में आते भी है तो भी अव्यक्त रुप में अव्यक्त देश की अव्यक्त प्रभाव में रहते हैं। वही बच्चों को अनुभव कराने लिए आते हैं। ऐसे आप सभी भी अपने अव्यक्त स्थिती का अनुभव औरों को कराओ। *जब अव्यक्त स्थिती की स्टेज सम्पूर्ण होंगी तब ही अपने राज्य में साथ चलना होंगा*।

 

✧  *एक आँख में अव्यक्त सम्पूर्ण स्थिती दूसरी आँख में राज्य पद*। ऐसे ही स्पष्ठ देखने में आयेंगे जैसे साकार रूप में दिखाई पडता है। बचपन रूप भी और सम्पूर्ण रूप भी। बस यह बनकर फिर यह बनेंगे। यह स्मृती रहती है।

 

✧  भविष्य की रूपरेखा भी जैसे सम्पूर्ण देखने में आती है। *जितना - जितना फरिश्ते लाइफ के नजदीक होंगे उतना - उतना राजपद को भी सामने देखेंगे*। दोनों ही सामने। आजकल कई ऐसे होते है जिनको अपने पास्ट की पूरी स्मृती रहती है। तो यह भविष्य भी ऐसे ही स्मृती में रहे यह बनना हैं। वह भविष्य के संस्कार इमर्ज होते रहेंगे।मर्ज नहीं। इमर्ज होंगे।अच्छा

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

────────────────────────

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

〰✧  आकार में निराकार देखने की बात पहला पाठ पूछ रहे हैं। अभी आकार को देखते निराकार को देखते हो? बातचीत किस से करते हो? (निराकार से) *आकार में निराकार देखने आये - इसमें अन्त तक भी अगर अभ्यासी रहेंगे तो देही-अभिमानी का अथवा अपने असली स्वरूप का जो आनन्द व सुख है वह संगमयुग पर नहीं करेंगे।*

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

────────────────────────

 

∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  कोई विकर्म ना करना"*

 

➳ _ ➳  ईश्वरीय यादो में प्यारे से हो गए अपने मन... और बुद्धि से बाते करती हुई मै आत्मा... अपने खुबसूरत भाग्य के नशे में डूबी हुई सोच रही हूँ... *संगम के वरदानी समय में कैसे मुझ आत्मा ने भगवान को साक्षात् पा लिया है... आज बाबा की गोद में पल रही हूँ कि... देखती हूँ मुस्कराते हुए... मीठे बाबा मेरे सम्मुख खड़े बड़े ही स्नेह से निहार रहे... और अपनी बाहें फैलाकर मुझे पुकार रहे है...*

 

❉   *मीठे बाबा मुझ आत्मा को ज्ञान और योग के बाँहों में भरते हुए बोले :-* " मीठे प्यारे फूल बच्चे... संगम के वरदानी समय पर हर साँस और संकल्प को शिप पिता की यादो में लगा कर...  दुखो के जंजालों से मुक्त हो जाओ... *ईश्वर पिता सम्मुख होने के खुबसूरत समय पर कोई भी पाप कर्म कर.पुनः विकर्मो का खाता नही बनाओ... दिल से मीठे बाबा को याद करो..."*

 

➳ _ ➳  *आत्मा बड़े ही दिल से बाबा के महावचन सुनकर कहने लगी :-* " मीठे प्यारे बाबा मेरे... *आपने यूँ अचानक से जीवन में आकर जीवन को पुण्यो की बहार बना दिया है... इसके पहले तो सच्चे पुण्य को मै आत्मा जानती तक न थी... अब आपके साथ भरे यह मीठे पल मै आत्मा सदा आपकी यादो में ही बिताउंगी...* यह दिलबर को दिल से मेरा वादा है..."

 

❉   *प्यारे बाबा मुझे स्नेह के आँचल में समाते हुए बोले :-* " मेरे सिकीलधे लाडले बच्चे... जनमो की बिछुड़न के बाद अपने पिता से पुनः मिले हो... तो उनकी श्रेष्ठ मत पर चलकर इस मिलन को अमूल्य बना दो... *परमात्म मिलन् के सुंदर समय पर अब विकर्मो का सन्यास कर जीवन को पुण्यो से सजा दो... और देवताओ सा सुंदर जीवन सहज ही पा लो..."*

 

➳ _ ➳  *मै आत्मा भगवान पिता को अपने जीवन को यूँ खुबसूरत सजाते देख बोली :-* " मेरे प्यारे मीठे बाबा... मै आत्मा *आपकी फूलो सी गोद में बैठकर गुणो की खुशबु से भरती जा रही हूँ... मीठे बाबा... मुझ आत्मा को जिन सच्ची पुण्यो की राहो का... आपने राही बनाया है, उसपर आप चलकर सबको यह पुण्यो का खुबसूरत रास्ता बताती जा रही हूँ..."*

 

❉   *ज्ञान सागर बाबा मुझ आत्मा के कल्याण अर्थ कहने लगे :-* "मीठे मीठे बच्चे... *देह की दुनियावी आकर्षण में उलझकर ही तो जीवन दुखो का पहाड़ बन गया है... अब ईश्वरीय यादो में रह इस आकर्षण से मुक्त होकर... सुख, शांति और प्रेम से भरपूर जीवन का आनन्द लो...* मीठे बाबा से अनन्त शक्तियाँ लेकर... विकारो से परे रह, पुण्यो से दामन भर लो..."

 

➳ _ ➳  *मै आत्मा अपने मीठे बाबा को बड़े ही प्यार से निहारते हुए कह रही हूँ :-* "प्यारे *बाबा आपके बिना यह जीवन कितना बेनूर और सूना सूना सा था..*. श्रीमत के बिना कितना उजड़ा सा था... *आपने आकर ज्ञान की खनक और योग की रौनक से इसे कितना प्यारा बना दिया है... पाप की ढेरी पर बैठी मुझ आत्मा को उठाकर पुण्यो के सिहांसन पर बिठा दिया है..."* इन प्यार भरी बातो से स्वयं को तृप्त कर मै आत्मा अपने कर्म क्षेत्र पर आ गयी...

 

────────────────────────

 

∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- सदा हर्षित रहने के संस्कार यहाँ से ही भरने हैं*"

 

➳ _ ➳  स्वयं भगवान को बाप, टीचर, गुरु के रूप में पा कर, खुशी में गदगद होती हुई, मैं मन ही मन विचार करती हूँ कि यह बात तो मैंने कभी स्वपन में भी नही सोची थी। *कभी मन मे ये ख्याल भी नही आया था कि भगवान बाप बन पालना कर सकता है, टीचर बन पढ़ा सकता है और गुरु बन मुझे सत्य मार्ग दिखा सकता है!*

 

➳ _ ➳  "वाह रे मैं आत्मा" जो आठ सौ करोड़ आत्माओं में से भगवान ने आ कर ना केवल मुझे चुन कर अपना बनाया बल्कि बाप का स्नेह, टीचर का मार्गदर्शन और गुरु का सहारा दे कर इस दुनिया की भीड़ में मुझेे खचित होने से बचा लिया। *इस पतित विकारी दुनिया मे फंस कर मैं कितनी गन्दी, छी - छी बन गई थी किन्तु भगवान बाप ने आकर मुझे इस पतित विकारी दुनिया से निकाल कर अपने मस्तक की चमकती हुई मणि बना लिया*। इस विकारी दुनिया के विकारी सम्बन्धों के बन्धन से मुझे मुक्त कर जीवन मुक्ति का अनुभव करवा दिया। अपने ऐसे मीठे बाप, टीचर, गुरु पर मुझे कितना ना बलिहार जाना चाहिए!

 

➳ _ ➳  मेरा यह अनमोल ब्राह्मण जीवन मेरे भगवान बाप, टीचर, गुरु की ही तो देन है। इसलिए अब मुझे अपने इस ब्राह्मण जीवन को अपने भगवान बाप पर सम्पूर्ण रीति समर्पित कर देना है। मन ही मन स्वयं से यह प्रतिज्ञा करते हुए मैं अपने भगवान बाप की मीठी स्नेह भरी याद में खो जाती हूँ। *अपने मन की तार को अपने भगवान बाप के साथ जोड़, बुद्धि के विमान पर मैं सवार होती हूँ और उस विमान को ऊपर आकाश की ओर ले कर चल पड़ती हूँ*। बुद्धि के विमान पर बैठ रूहानी यात्रा का आनन्द लेते - लेते आकाश को पार कर, सूक्ष्म लोक से परे मैं पहुंच जाती हूँ अपने निराकार भगवान बाप, टीचर, गुरु के पास उनके धाम।

 

➳ _ ➳  आत्माओं की इस अति सुन्दर निराकारी दुनिया में मैं देख रही हूँ मणियों के समान चमकते अपने आत्मा भाइयों को जो परमात्म शक्तियों की छत्रछाया में बैठ अतीन्द्रिय सुख ले रहे हैं। अब मैं भी स्वयं को परमात्म छत्रछाया के नीचे देख रही हूँ। *बाबा से आ रही सर्वशक्तियों की शीतल छाया के नीचे बैठ मैं असीम आनन्द की अनुभूति में सहज ही स्थित हो रही हूँ*। सर्वशक्तियों की किरणों का झरना मुझ आत्मा पर बरसता हुआ मुझे अतींद्रिय सुख का अनुभव करवा रहा है। *ऐसा लग रहा है जैसे ऊर्जा के भंडार मेरे शिव पिता अपनी समस्त ऊर्जा मुझ में प्रवाहित कर मुझे बलशाली बना रहे हैं*। स्वयं को मैं बहुत ही ऊर्जावान अनुभव कर रही हूँ।

 

➳ _ ➳  समस्त शक्तियों को स्वयं में समाकर शक्तिशाली बन कर अब मैं आत्मा परमधाम से नीचे सूक्ष्म लोक में प्रवेश कर रही हूँ। *अपने भगवान बाप को अब मैं ब्रह्मा बाबा की भृकुटि में टीचर के रूप में देख रही हूँ*। बापदादा मेरे सम्मुख आ कर ज्ञान के अविनाशी खजाने से मुझे भरपूर कर रहें हैं। उनकी अनमोल शिक्षाओं को जीवन मे धारण करने की दृढ़ प्रतिज्ञा कर, अब मैं सूक्ष्म लोक से नीचे साकार लोक की ओर आ रही हूँ।

 

➳ _ ➳  यहां मैं अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित हूँ और अपने भगवान बाप को गुरु के रूप में निरन्तर अपने साथ अनुभव कर रही हूँ। *उनके वरदानों से स्वयं को हर समय भरपूर अनुभव करते हुए मैं उनके दिखाए हुए सत्य मार्ग पर निरन्तर आगे बढ़ रही हूँ*। स्वयं भगवान बाप, टीचर, गुरु के रूप में मुझे मिला है, इस बात को स्मृति में रख, सदा हर्षित रहते हुए मैं संगमयुग की मौजों का आनन्द ले रही हूँ।

 

────────────────────────

 

∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

✺   *मैं परिस्थितियों को शिक्षक समझ उनसे पाठ पढ़ने वाली अनुभवी मूर्त आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

────────────────────────

 

∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

✺   *मैं मिजाज़ को मीठा रखकर भूल से भी किसी को दु:ख देने से मुक्त होने वाली सुखस्वरूप आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

────────────────────────

 

∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  जमा के खाते को चेक करने की निशानी क्या है? *मन्सा, वाचा, कर्म द्वारा सेवा तो की लेकिन जमा की निशानी है - सेवा करते हुए पहले स्वयं की संतुष्टता।* साथ-साथ जिन्हों की सेवा करते, उन आत्माओं में खुशी की संतुष्टता आई? *अगर दोनों तरफ सन्तुष्टता नहीं तो समझो सेवा के खाते में आपकी सेवा का फल जमा नहीं हुआ।*

 

 _ ➳  *सहज जमा का खाता भरपूर करने की गोल्डन चाबी है - कोई भी मन्सा-वाचा-कर्म, किसी में भी सेवा करने के समय एक तो अपने अन्दर निमित्त भाव की स्मृति।* निमित्त भाव, निर्माण भाव, शुभ भाव, आत्मिक स्नेह का भाव, अगर इस भाव की स्थिति में स्थित होकर सेवा करते हो तो सहज आपके इस भाव से आत्माओं की भावना पूर्ण हो जाती है। आज के लोग हर एक का भाव क्या है, वह नोट करते हैं। क्या निमित्त भाव से कर रहे हैं, वा अभिमान के भाव से! *जहाँ निमित्त भाव है वहाँ निर्मान भाव आटोमेटिकली आ जाता है।* तो चेक करो - क्या जमा हुआ? कितना जमा हुआ? क्योंकि *इस समय संगमयुग ही जमा करने का युग है। फिर तो सारा कल्प जमा की प्रलब्ध है।*

 

✺   *ड्रिल :-  "निमित्त भाव की स्मृति से सहज जमा का खाता बढ़ाने का अनुभव"*

 

 _ ➳  मैं आत्मा अपने प्यारे बापदादा से मीठी मीठी रूह रिहान करते हुए सुबह सैर कर रही हूँ... *प्रकृति के मोहक दृश्यों का आनंद ले रही हूँ... प्रकृति हमारी कितनी बड़ी टीचर है...* फलों से लदी हुई वृक्षों की झुकती डालियाँ विनम्र, सहनशील बनने का पाठ पढ़ा रही हैं... जगमगाता हुआ सूरज अपनी आभा से सारे विश्व को प्रकाशित करने की प्रेरणा दे रहा है... झरनों की शीतल जल धारा प्यासी, तड़पती आत्माओं की सुख शांति की प्यास बुझाने की सीख दे रहा है...

 

 _ ➳  यह सब देख कर मैं आत्मा चिंतन करती हूँ... कि प्रकृति में सब परिवर्तन नियमित रूप से होते हैं... प्रकृति कभी भी हमसे बदले की कामना नहीं करती... उसका स्वधर्म है देना... किस तरह से वह निर्माण बन देती जाती है... *मैं आत्मा अपनी सूक्ष्म चेकिंग कर रही हूँ... कि बाबा ने मुझे सेवाओं के निमित्त तो बनाया है... लेकिन क्या इतना निमित्त और निर्माण भाव मेरी सेवा में है..* मीठे बाबा ने अपनी सहस्त्र भुजाएं मेरे सिर पर छत्रछाया के रूप में फैला दी हैं... अपने बाबा से अनवरत आती हुई किरणों से मैं स्वयं को संपन्न बना रही हूँ...

 

 _ ➳  ईश्वरीय सेवाओं में स्वयं भगवान ने मुझे अपना सहयोगी बनाया है... कितना श्रेष्ठ भाग्य है मुझ आत्मा का... *मैं सर्व प्रकार से संतुष्टमणि आत्मा हूँ... सेवा करते हुए स्वयं संतुष्ट स्थिति में स्थित हूँ... साथ ही जिन आत्माओं की सेवा करती हूँ... उनमें भी खुशी और संतुष्टि देख रही हूँ... क्योंकि दोनों तरफ जब संतुष्टि होगी तभी तो मुझ आत्मा के सेवा के खाते में सेवा का फल जमा होगा...* मैं स्वयं संतुष्ट हूँ... साथ ही सर्व को संतुष्ट रखने वाली बाबा की संतुष्टमणि आत्मा हूँ...

 

 _ ➳  बाबा ने मुझे जमा का खाता बढ़ाने की बहुत ही सुंदर, सहज युक्ति बताई है... *मैं निमित्त भाव से सेवा कर रही हूँ... मनसा वाचा कर्मणा कैसी भी सेवा हो हर सेवा में बाबा शब्द की स्मृति से सेवा कर रही हूँ...* मैं निमित्त हूँ, लेकिन मुझे निमित्त बनाने वाला कौन... सेवा किसकी है, इस सेवा के लिए शक्तियां, सहयोग देने वाला कौन है... *उस करावनहार बाबा को हर क्षण आगे रखती हूँ... मैं आत्मा हर प्रकार के मान शान की कामना से मुक्त हूँ... सर्व के प्रति आत्मिक स्नेह और शुभ भावना से युक्त हूँ...*

 

 _ ➳  इस श्रेष्ठ भाव में स्थित होकर सेवा करने से आत्माओं की कामना पूर्ण करने के निमित्त बन रही हूँ... मैं आत्मा *मैंने किया, मैं ही कर सकती हूँ... इस अभिमान से ही पूरी तरह मुक्त हो रही हूँ... हर विशेषता बाबा की देन है, उस दाता पिता की स्मृति से मैं सेवा कर रही हूँ...* इस निमित्त भाव से निर्माण स्थिति स्वतः ही बन रही है... अब मुझ आत्मा का जमा का खाता बढ़ रहा है... यह संगम युग सारे कल्प की प्रालब्ध जमा करने का अमूल्य समय है... *इस श्रेष्ठ संगम के समय में मैं निमित्त और निर्माण भाव से अपनी कल्प कल्प की प्रारब्ध बना रही हूँ...*

 

━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━

 

_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━