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 02 / 04 / 21  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *:अभी हमारे सुख के दिन आये की आये" - सदा इसी ख़ुशी में रहे ?*

 

➢➢ *ज्ञान का सिमरन किया ?*

 

➢➢ *ईश्वरीय भाग्य में लाइट का क्राउन प्राप्त किया ?*

 

➢➢ *अपने रूहानी स्थिति में स्थित रहे ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *योग की शक्ति जमा करने के लिए कर्म और योग का बैलेंस और बढ़ाओ।* कर्म करते योग की पॉवरफुल स्टेज रहे-इसका अभ्यास बढ़ाओ। *जैसे सेवा के लिए इन्वेंशन करते वैसे इन विशेष अनुभवों के अभ्यास के लिए समय निकालो और नवीनता लाकर के सबके आगे एक्जाम्पुल बनो।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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✺   *"मैं डबल लाइट फरिश्ता हूँ"*

 

  सदा स्वयं को डबल लाइट फरिश्ता अनुभव करते हो। *फरिश्ता अर्थात् जिसकी दुनिया ही 'एक बाप' हो। ऐसे फरिश्ते सदा बाप के प्यारे हैं। फरिश्ता अर्थात् देह और देह के सम्बन्धों से आकर्षण का रिश्ता नहीं। निमित्त मात्र देह में हैं और देह के सम्बन्धियों से कार्य में आते हैं लेकिन लगाव नहीं। क्योंकि फरिश्तों के और कोई से रिश्ते नहीं होते। फरिश्ते के रिश्ते एक बाप के साथ हैं।* ऐसे फरिश्ते हो ना।

 

  *अभी-अभी देह में कर्म करने के लिए आते और अभी-अभी देह से न्यारे! फरिश्ते सेकण्ड में यहाँ, सेकण्ड में वहाँ। क्योंकि उड़ाने वाले हैं। कर्म करने के लिए देह का आधार लिया और फिर ऊपर।* ऐसे अनुभव करते हो? अगर कहाँ भी लगाव है, बन्धन है तो बन्धन वाला ऊपर नहीं उड़ सकता। वह नीचे आ जायेगा।

 

  *फरिश्ते अर्थात् सदा उड़ती कला वाले। नीचे ऊपर होने वाले नहीं। सदा ऊपर की स्थिति में रहने वाले। फरिश्तों के संसार में रहने वाले। तो फरिश्ता स्मृति स्वरूप बने तो सब रिश्ते खत्म। ऐसे अभ्यासी हो ना। कर्म किया और फिर न्यारे।* लिफ्ट में क्या करते हैं? अभी-अभी नीचे अभी-अभी ऊपर। नीचे आये कर्म किया और फिर स्विच दबाया और ऊपर। ऐसे अभ्यासी।

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  जैसे  बापदादा व्यक्त में आते भी है तो भी अव्यक्त रुप में अव्यक्त देश की अव्यक्त प्रभाव में रहते हैं। वही बच्चों को अनुभव कराने लिए आते हैं। ऐसे आप सभी भी अपने अव्यक्त स्थिती का अनुभव औरों को कराओ। *जब अव्यक्त स्थिती की स्टेज सम्पूर्ण होंगी तब ही अपने राज्य में साथ चलना होंगा*।

 

✧  *एक आँख में अव्यक्त सम्पूर्ण स्थिती दूसरी आँख में राज्य पद*। ऐसे ही स्पष्ठ देखने में आयेंगे जैसे साकार रूप में दिखाई पडता है। बचपन रूप भी और सम्पूर्ण रूप भी। बस यह बनकर फिर यह बनेंगे। यह स्मृती रहती है।

 

✧  भविष्य की रूपरेखा भी जैसे सम्पूर्ण देखने में आती है। *जितना - जितना फरिश्ते लाइफ के नजदीक होंगे उतना - उतना राजपद को भी सामने देखेंगे*। दोनों ही सामने। आजकल कई ऐसे होते है जिनको अपने पास्ट की पूरी स्मृती रहती है। तो यह भविष्य भी ऐसे ही स्मृती में रहे यह बनना हैं। वह भविष्य के संस्कार इमर्ज होते रहेंगे।मर्ज नहीं। इमर्ज होंगे।अच्छा

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧  आकार में निराकार देखने की बात पहला पाठ पूछ रहे हैं। अभी आकार को देखते निराकार को देखते हो? बातचीत किस से करते हो? (निराकार से) *आकार में निराकार देखने आये - इसमें अन्त तक भी अगर अभ्यासी रहेंगे तो देही-अभिमानी का अथवा अपने असली स्वरूप का जो आनन्द व सुख है वह संगमयुग पर नहीं करेंगे।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- होशियार सर्विसएबुल बनना"*

 

_ ➳  *जन्मते ही बाबा से मैं आत्मा 3 तिलक की अधिकारी बनी, स्वराज्य तिलक... सर्विसएबुल का तिलक...  सर्व ब्राह्मण परिवार, बापदादा के स्नेही सहयोगी पन का तिलक...* जैसे ही मुझ आत्मा को स्मृति आई, कि मैं कौन... और किसकी... तन मन धन सब बाबा को अर्पित हो गया *बाबा ने बताया बच्ची यह सब तुम्हें सेवा निमित मिला है, इसे सेवा अर्थ यूज करो...* अपना सर्वस्व सफल कर भाग्य को उच्च बनाओ... *बाबा की शिक्षाओं पर अटेंशन रखते बापदादा और सर्व ब्राह्मण परिवार के सहयोग द्वारा मैं आत्मा स्वयं को विश्व परिवर्तन करने की सेवा में बाबा का मददगार देख रही हूं...* 

 

  *सूक्ष्म वतन में मीठे बाबा मुझ आत्मा का हाथ थामे मुझ डबल लाइट फरिश्ते से बोले:-* "मीठी बच्ची... जिस प्रकार गोप गोपियों के सहयोग द्वारा श्री कृष्ण को गोवर्धन पर्वत उठाते दिखाया है, अभी उसी सहयोग की आवश्यकता मुझ गोपी वल्लभ को आप गोप गोपिकाओं से है... *दुखों के पहाड़ को प्रभु परिवार द्वारा उठाने का यह अभी समय है..."*

 

_ ➳  *पतित पावन बाबा की शिक्षाओं को स्वयं में उतारते मैं आत्मा बाबा से बोली:-* "हां बाबा... स्वदर्शन चक्रधारी बन मुझ आत्मा का भाग्य जाग उठा है... अभी मैं सर्विसएबुल आत्मा बन... सर्व को पावन बनाने की सेवा में तत्पर हूं... *निशदिन निशपल आप समान सेवा कर मैं आत्मा अपने भाग्य को उच्च बना रही हूं..."*

 

  *मीठे बाबा मुझ आत्मा को समझानी देते हुए बोले:- "मीठी बच्ची... सेवा में सफलता का मुख्य साधन निमित्त भाव है, मैं और मेरा अशुद्ध अहंकार हैं...* इसलिए जब मैं पन की स्मृति आये, तो खुद से पूछना मैं कौन?... और जब मेरा याद आये तो... तो बस मुझे याद कर लेना... इन्ही स्मृतियों से निरन्तर सहजयोगी और निरन्तर सेवाधारी रहोगे..."

 

_ ➳  *मीठे बाबा की मीठी समझानी को स्वयं में उतारते हुए मैं आत्मा बाबा से बोली:- "हां मीठे बाबा... "मेरा बाबा" ये चाबी मुझ आत्मा को सभी हदों से पार किए हुए हैं,* बेहद में रह मैं आत्मा निर्विघ्न तन मन धन से सेवाएं देने में तत्पर हूं... *मुझ आत्मा का खुशनुमा चेहरा चलते-फिरते सेवा केंद्र का कार्य कर रहा हैं... हर किसी से आवाज आ रही है बाबा- तुम्हें बनाने वाला कौन?..."*

 

  *मीठे बाबा प्यार भरी फुहार मुझ आत्मा पर बरसाते हुए बोले:- "प्यारी बच्ची... यह वही रूद्र ज्ञान यज्ञ है जिसमें असुर विघ्न डालते हैं... लेकिन एक कर्म योगी सेवाधारी के लिए यह माना जैसे खेल है...* जैसे जैसे तुम इसमे पहलवान बनते जा रहे हो, माया भी अपना वार जोरों से कर रही है... लेकिन यदि *सदा सेवा में बिजी हो तो माया का वार हो नहीं सकता..."*

 

_ ➳  *मीठे बाबा से सुहानी प्यारी दृष्टि लेते मैं आत्मा बाबा से बोली:- "हां मीठे बाबा... मनसा वाचा कर्मणा तन मन धन संकल्प श्वांस सभी से मैं आत्मा सहयोगी हो हर पल हर दिन मैं आत्मा इन सभी खजानों को सफल कर रही हूं...* स्वर्णिम भारत का वह दृश्य जिसमें सभी जीव आत्माएं, प्रकृति पूरी सृष्टि सतोप्रधान है... दृश्य मुझ आत्मा की नजरों में घूम रहा है..."

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- सदा इसी खुशी में रहना है कि अब हमारे सुख के दिन आये कि आये*"

 

_ ➳  अपने लाइट माइट स्वरुप में मैं फ़रिश्ता धरती के आकर्षण से मुक्त होकर, ऊपर की और उड़ता जा रहा हूँ। *सारे विश्व की सैर करने की इच्छा से मैं फ़रिश्ता अब पूरे विश्व का चक्कर लगाते हुए ऊपर आकाश में पहुँच नीचे धरती के खूबसूरत नजारों को देखता जा रहा हूँ*। ऊँचे - ऊँचे पहाड़ों के बीच से होता हुआ, कल - कल करती नदियों, झर - झर बहते झरनों के मधुर स्वर सुनता हुआ प्रकृति के सुन्दर नजारों का मैं आनन्द ले रहा हूँ। धरती आकाश में उन्मुक्त होकर विचरण करते - करते अचानक मेरी निगाह उन सभी बॉर्डर लाइन्स पर चली जाती है जो एक देश को दूसरे देश से अलग कर रही हैं।

 

_ ➳  इस दृश्य को देख मैं फ़रिश्ता मन ही मन विचार करता हूँ कि आज देह अभिमान में आ कर मनुष्यों ने इस धरती आकाश का भी बटवारा कर दिया है। एक देश दूसरे देश की सीमा में प्रवेश नही कर सकता। धर्म, जाति के नाम पर कितने लड़ाई झगड़े होते हैं। किन्तु ये सब अब समाप्त होने वाला है। *इस कलयुगी दुनिया की घनघोर अंधेरी रात समाप्त हो, सतयुगी सवेरा बस अब आने ही वाला है। और कितना खूबसूरत होगा वो सवेरा जब धरती आसमान सब पर हमारा अधिकार होगा*। एक धर्म, एक राज्य, एक भाषा, एक मत होगा। सब आपस मे मिलजुल कर रहेंगे। कोई ईर्ष्या द्वेष, नफरत की भावना नही होगी। आपस मे भाईचारा होगा।

 

_ ➳  इन्ही शुद्ध और श्रेष्ठ संकल्पो के साथ मन ही मन उस दैवी दुनिया की कल्पना करता हुआ मैं फ़रिश्ता अनुभव करता हूँ जैसे विश्व का मालिक बनाने वाले, स्वर्ग के रचयिता मेरे शिव पिता अव्यक्त ब्रह्मा बाबा के आकारी तन में विराजमान हो कर मेरे सम्मुख उपस्थित हो गए हैं और मेरा हाथ पकड़ कर मुझे अपने साथ ले कर जा रहें हैं। *बापदादा के साथ अब मैं फिर से सारी दुनिया की सैर कर रहा हूँ और देख रहा हूँ बापदादा की दृष्टि पड़ते ही सारी बॉर्डर लाइन्स समाप्त हो गई है*। पूरी धरती और आकाश एक दिखाई दे रहें हैं। किसी चीज का कोई बटवारा नही। सारा विश्व एक बहुत खूबसूरत दुनिया में परिवर्तित हो चुका है।

 

_ ➳  इस अति खूबसूरत दुनिया में मुझे छोड़, बापदादा मेरी आँखों के सामने से ओझल हो जाते हैं और मैं इस अति सुंदर मनभावन दुनिया मे प्रवेश कर जाता हूँ। *इस दुनिया मे प्रवेश करते ही मैं अनुभव करता हूँ जैसे मेरी काया एक दम कंचन के समान चमकने लगी है। और मैं विश्व महाराजन की पोशाक पहन इस दुनिया पर राज कर रहा हूँ*। डबल ताज धारण किये दैवी गुणों वाले मनुष्यों की इस खूबसूरत दुनिया में सुख, शांति, सम्पन्नता भरपूर है। सभी के चेहरे एक दिव्य आभा से दमक रहें हैं। *राजा, प्रजा सभी खुशहाल है और बड़े प्रेम से सभी आनन्द और खुशी से अपना जीवन यापन कर रहें हैं*।

 

_ ➳  इस खूबसूरत मनभावन स्वर्ग के अपने भविष्य जीवन का भरपूर आनन्द लेकर अब मैं अपने लाइट माइट स्वरूप के साथ वापिस अपनी कर्मभूमि पर आती हूँ और अपने सूक्ष्म शरीर के साथ 5 तत्वों के बने अपने स्थूल शरीर मे प्रवेश कर फिर से अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित हो जाती हूँ। *अपने वर्तमान ब्राह्मण जीवन की सर्वश्रेष्ठ प्राप्तियों का भरपूर आनन्द लेते हुए अपने भविष्य जीवन की अनन्त प्राप्तियों को सदैव स्मृति में रख अब मैं सदा उमंग उत्साह के पंखों पर सवार होकर उड़ती रहती हूँ। धरती आसमान सब पर हमारा अधिकार होगा इस नशे और खुशी में रहते हुए, बेफिक्र बादशाह बन, संगमयुग के हर पल का मैं भरपूर आनन्द ले रही हूँ*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं ईश्वरीय भाग्य में लाइट का क्राउन प्राप्त करने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं सर्व प्राप्ति स्वरूप आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा सदैव अपनी रूहानी स्थिति में स्थित रहती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा मन्सा महादानी हूँ  ।*

   *मैं श्रेष्ठ पार्टधारी आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  जमा के खाते को चेक करने की निशानी क्या है? *मन्सा, वाचा, कर्म द्वारा सेवा तो की लेकिन जमा की निशानी है - सेवा करते हुए पहले स्वयं की संतुष्टता।* साथ-साथ जिन्हों की सेवा करते, उन आत्माओं में खुशी की संतुष्टता आई? *अगर दोनों तरफ सन्तुष्टता नहीं तो समझो सेवा के खाते में आपकी सेवा का फल जमा नहीं हुआ।*

 

 _ ➳  *सहज जमा का खाता भरपूर करने की गोल्डन चाबी है - कोई भी मन्सा-वाचा-कर्म, किसी में भी सेवा करने के समय एक तो अपने अन्दर निमित्त भाव की स्मृति।* निमित्त भाव, निर्माण भाव, शुभ भाव, आत्मिक स्नेह का भाव, अगर इस भाव की स्थिति में स्थित होकर सेवा करते हो तो सहज आपके इस भाव से आत्माओं की भावना पूर्ण हो जाती है। आज के लोग हर एक का भाव क्या है, वह नोट करते हैं। क्या निमित्त भाव से कर रहे हैं, वा अभिमान के भाव से! *जहाँ निमित्त भाव है वहाँ निर्मान भाव आटोमेटिकली आ जाता है।* तो चेक करो - क्या जमा हुआ? कितना जमा हुआ? क्योंकि *इस समय संगमयुग ही जमा करने का युग है। फिर तो सारा कल्प जमा की प्रलब्ध है।*

 

✺   *ड्रिल :-  "निमित्त भाव की स्मृति से सहज जमा का खाता बढ़ाने का अनुभव"*

 

 _ ➳  मैं आत्मा अपने प्यारे बापदादा से मीठी मीठी रूह रिहान करते हुए सुबह सैर कर रही हूँ... *प्रकृति के मोहक दृश्यों का आनंद ले रही हूँ... प्रकृति हमारी कितनी बड़ी टीचर है...* फलों से लदी हुई वृक्षों की झुकती डालियाँ विनम्र, सहनशील बनने का पाठ पढ़ा रही हैं... जगमगाता हुआ सूरज अपनी आभा से सारे विश्व को प्रकाशित करने की प्रेरणा दे रहा है... झरनों की शीतल जल धारा प्यासी, तड़पती आत्माओं की सुख शांति की प्यास बुझाने की सीख दे रहा है...

 

 _ ➳  यह सब देख कर मैं आत्मा चिंतन करती हूँ... कि प्रकृति में सब परिवर्तन नियमित रूप से होते हैं... प्रकृति कभी भी हमसे बदले की कामना नहीं करती... उसका स्वधर्म है देना... किस तरह से वह निर्माण बन देती जाती है... *मैं आत्मा अपनी सूक्ष्म चेकिंग कर रही हूँ... कि बाबा ने मुझे सेवाओं के निमित्त तो बनाया है... लेकिन क्या इतना निमित्त और निर्माण भाव मेरी सेवा में है..* मीठे बाबा ने अपनी सहस्त्र भुजाएं मेरे सिर पर छत्रछाया के रूप में फैला दी हैं... अपने बाबा से अनवरत आती हुई किरणों से मैं स्वयं को संपन्न बना रही हूँ...

 

 _ ➳  ईश्वरीय सेवाओं में स्वयं भगवान ने मुझे अपना सहयोगी बनाया है... कितना श्रेष्ठ भाग्य है मुझ आत्मा का... *मैं सर्व प्रकार से संतुष्टमणि आत्मा हूँ... सेवा करते हुए स्वयं संतुष्ट स्थिति में स्थित हूँ... साथ ही जिन आत्माओं की सेवा करती हूँ... उनमें भी खुशी और संतुष्टि देख रही हूँ... क्योंकि दोनों तरफ जब संतुष्टि होगी तभी तो मुझ आत्मा के सेवा के खाते में सेवा का फल जमा होगा...* मैं स्वयं संतुष्ट हूँ... साथ ही सर्व को संतुष्ट रखने वाली बाबा की संतुष्टमणि आत्मा हूँ...

 

 _ ➳  बाबा ने मुझे जमा का खाता बढ़ाने की बहुत ही सुंदर, सहज युक्ति बताई है... *मैं निमित्त भाव से सेवा कर रही हूँ... मनसा वाचा कर्मणा कैसी भी सेवा हो हर सेवा में बाबा शब्द की स्मृति से सेवा कर रही हूँ...* मैं निमित्त हूँ, लेकिन मुझे निमित्त बनाने वाला कौन... सेवा किसकी है, इस सेवा के लिए शक्तियां, सहयोग देने वाला कौन है... *उस करावनहार बाबा को हर क्षण आगे रखती हूँ... मैं आत्मा हर प्रकार के मान शान की कामना से मुक्त हूँ... सर्व के प्रति आत्मिक स्नेह और शुभ भावना से युक्त हूँ...*

 

 _ ➳  इस श्रेष्ठ भाव में स्थित होकर सेवा करने से आत्माओं की कामना पूर्ण करने के निमित्त बन रही हूँ... मैं आत्मा *मैंने किया, मैं ही कर सकती हूँ... इस अभिमान से ही पूरी तरह मुक्त हो रही हूँ... हर विशेषता बाबा की देन है, उस दाता पिता की स्मृति से मैं सेवा कर रही हूँ...* इस निमित्त भाव से निर्माण स्थिति स्वतः ही बन रही है... अब मुझ आत्मा का जमा का खाता बढ़ रहा है... यह संगम युग सारे कल्प की प्रालब्ध जमा करने का अमूल्य समय है... *इस श्रेष्ठ संगम के समय में मैं निमित्त और निर्माण भाव से अपनी कल्प कल्प की प्रारब्ध बना रही हूँ...*

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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