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 02 / 05 / 22  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *श्वास को बाप की याद में सफल किया ?*

 

➢➢ *"मेरा स्वधर्म ही शांति है" - यह अनुभव किया ?*

 

➢➢ *निर्माणता की विशेषता द्वारा सहज सफलता प्राप्त की ?*

 

➢➢ *नॉलेज की शक्ति से विघनो को हराया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *वह आत्म-ज्ञानी भी जिस्मानी, अल्पकाल की तपस्या से अल्पकाल की सिद्धि प्राप्त कर लेते हैं। आप रूहानी तपस्वी परमात्म ज्ञानी हो, तो आपका संकल्प आपको विजयी रत्न बना देगा।* अनेक प्रकार के विघ्न ऐसे समाप्त हो जायेंगे जैसे कुछ था ही नहीं। माया के विघ्नों का नाम-निशान भी नहीं रहेगा।

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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✺   *"मैं राजऋषि हूँ"*

 

〰✧  अपने को राजऋषि, श्रेष्ठ आत्मायें अनुभव करते हो? *राजऋषि अर्थात् राज्य होते हुए भी ऋषि अर्थात् सदा बेहद के वैरागी। स्थूल देश का राज्य नहीं है लेकिन स्व का राज्य है। स्व-राज्य करते हुए बेहद के वैरागी भी हो, तपस्वी भी हो क्योंकि जानते हो पुरानी दुनिया में है ही क्या।*

 

  *वैराग अर्थात् लगाव न हो। अगर लगाव होता है तो बुद्धि का झुकाव होता है। जिस तरफ लगाव होगा, बुद्धि उसी तरफ जायेगी। इसलिए राजऋषि हो, राजे भी हो और साथ-साथ बेहद के वैरागी भी हो। ऋषि तपस्वी होते हैं। किसी भी आकर्षण में आकर्षित नहीं होने वाले।* स्वराज्य के आगे यह हद की आकर्षण क्या है? कुछ भी नहीं। तो अपनेको क्या समझते हो? राजऋषि। किसी भी प्रकार का लगाव ऋषि बनने नहीं देगा, तपस्वी बन नहीं सकेंगे। तपस्या में लगाव ही विघ्न-रूप बन कर आता है। तपस्या भंग हो जाती है।

 

  लेकिन जो बाप की लग्न में रहते हैं, वह लगाव में नहीं रहते, उसको सब सहज प्राप्त होता है। ब्राह्मण जीवन में 10 रूपया भी 100 बन जाता है। इतना धन में वृद्धि हो जाती है! प्रगति पड़ने से 10,100 का काम करता है, वहाँ 100,10 का काम करेगा। *क्योंकि अभी एकानामी के अवतार हो गये ना। व्यर्थ बच गया और समर्थ पैसा, ताकत वाला पैसा है। काला पैसा नहीं है, सफेद है, इसलिए शक्ति है। तो राजऋषि आत्मायें हैं - इस वरदान को सदा याद रखना। कहा लगाव में नहीं फँस जाना। न फँसो, न निकलने की मेहनत करो।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  लास्ट पढाई का कौन -सा पाठ है और फर्स्ट पाठ कौन - सा है? फर्स्ट पाठ और लास्ट पाठ यही अभ्यास है। जैसे बच्चे का लौकिक जन्म होता है तो पहले - पहले उनको एक शब्द दिलाया जाता है वा सिखलाया जाता है ना। यहाँ भी अलौकिक जन्म लेते पहला शब्द क्या सीखा? बाप को याद करो। *तो जन्म का पहला शब्द लौकिक का भी, अलौकिक का भी वही याद रखना है।* यह मुश्किल हो सकता है क्या?

 

✧  अपने आपको ड्रिल करने का अभ्यास नहीं डालते हो। यह है बुद्धि की ड्रिल। *ड्रिल के अभ्यासी जो होते हैं तो पहले - पहले दर्द भी बहुत महसूस होता है और मुश्किल लगता है लेकिन जो अभ्यासी बन जाते हैं वह फिर ड्रिल करने के सिवाए रह नहीं सकते।* तो यह भी बुद्धि की ड्रिल करने का अभ्यास कम होने कारण पहले मुश्किल लगता है। फिर माथा भारी रहने का वा कोई न कोई विघ्न सामने बन आने का अनुभव होता रहता है।

 

✧  तो ऐसे अभ्यासी बनना ही है। इसके सिवाए राज्य - भाग्य के प्राप्ति होना मुश्किल है। जिन्हों को यह अभ्यास मुश्किल लगता है तो प्राप्ति भी मुश्किल है। इसलिए इस मुख्य अभ्यास को सहज और निरंतर बनाओ। *ऐसे अभ्यासी अनेक आत्माओं को साक्षात्कार कराने वाले साक्षात बापदादा दिखाई दे।* जैसे वाणी में आना कितना सहज है। वैसे यह वाणी से परे जान भी इतना सहज होना है। अच्छा।

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ ऐसी महीनता और महानता की स्टेज अपनाई हैं? हलचल थी या अचल थे? *फाईनल पेपर में चारों ओर की हलचल होगी। एक तरफ वायुमण्डल व वातावरण की हलचल। दूसरी तरफ व्यक्तियों की हलचल। तीसरी तरफ सर्व सम्बन्धों में हलचल और चौथी तरफ आवश्यक साधनों की अप्राप्ति की हलचल ऐसे चारों तरफ की हलचल के बीच अचल रहना, यही फाईनल पेपर होना है।* किसी भी आधार द्वारा अधिकारीपन की स्टेज पर स्थित रहना - ऐसा पुरुषार्थ फाइनल पेपर के समय सफलता-मूर्त बनने नही देगा।

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- अपने स्वधर्म में स्थित हो जाना"*

 

_ ➳  *मैं आत्मा बाबा के कमरे में एकाग्रचित्त होकर बैठ जाती हूँ... अपने शरीर के सभी आरगन्स से धीरे-धीरे डिटैच होती जाती हूँ... और अपने मस्तक सिंहासन पर विराजमान हो जाती हूँ... मैं आत्मा मस्तक के बीचों-बीच मणि समान चमक रही हूँ...* भृकुटी के बीच चमकती हुई मैं आत्मा मणि भृकुटी के द्वार से बाहर निकल जाती हूँ और उड़ते हुए पहुँच जाती हूँ शांति के सागर के पास शांतिधाम... निराकार बाबा से आती हुई शांति की किरणों को अपने में समेटती हुई नीचे आ जाती हूँ सूक्ष्म वतन में...

 

  *स्वधर्म और स्वदेश का ज्ञान देकर सत्यता के प्रकाश से मुझ आत्मा को प्रकाशित करते हुए प्यारे बाबा कहते हैं:-* मेरे मीठे बच्चे... *सत्य पिता ने आकर सत्य स्वरूप का अहसास कराया है... इस सत्य के नशे में आओ... अपने स्वधर्म में स्थित हो प्यार से दूसरी आत्मा को सम्मान दो...* ओम शांति कह आत्मा का अभिवादन करना ही सच्चा सम्मान देना है...

 

_ ➳  *इस शरीर को भूलकर अपने सुन्दर मणि रूप को देखते हुए उसकी चमक में खोकर मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... *मै आत्मा आत्मिक स्मृतियों से भर गई हूँ... अपने खूबसूरत स्वरूप के नशे में खो गई हूँ... इसी स्वधर्म के नशे में गहरे उतर रही हूँ...* और सबको आत्मिक भाव से रिगार्ड दे रही हूँ...

 

  *मुझ आत्मा पर सुख-शांति की वर्षा करते हुए सुख शान्ति के सागर प्यारे बाबा कहते हैं:-* मीठे प्यारे बच्चे... *आत्मा के सच्चे नशे से भर जाओ... इन्ही यादो में डूब कर दूसरों को भी इसी आत्मिकता का नशा चढ़ाओ...* ओम शांति के सच्चे भाव में डूब जाओ... इन्ही यादो में भरो और औरो को भी भर आओ...

 

_ ➳  *सत्यता के सुन्दर नजारों में डूबकर अपने श्रेष्ठ ईश्वरीय भाग्य के नशे में झूमती हुई मैं आत्मा कहती हूँ:-* मेरे प्राणप्रिय बाबा... *मै आत्मा ओमशन्ति के स्वरूप में समा रही हूँ... इन सुंदर अहसासो में भीग रही हूँ... आत्मा देख आत्मा से बात कर रही हूँ...* सबको सच्चा रिगार्ड देकर ईश्वरीय नजरो में सज रही हूँ...

 

  *मेरे निज स्वरुप के दर्शन कराकर मेरे मन मंदिर में शांति की बरसात करते हुए मेरे बाबा कहते हैं:-* प्यारे बच्चे... *सारा मदार स्मृतियों पर टिका है... स्वयं को आत्मा निश्चित कर इस भाव से स्वयं को भर लो...* और ओम शांति के भाव में डूबकर अन्य आत्माओ का भी सम्मान करो... यही दिली रिगार्ड है... जो एक दूसरे को देना है...

 

_ ➳  *अपने स्वधर्म में टिककर सत्यता के बादलों के झूले में झूलते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा सबको सच्चा रिगार्ड दे रही हूँ... *सदा अपने स्वधर्म में स्थित होकर मुस्करा रही हूँ... सच्चा सम्मान दे रही हूँ और पा भी रही हूँ.... यह स्वरूप बहुत ही लुभावना मीठा और प्यारा है...*

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- अपने शान्त स्वधर्म में स्थित रह पवित्र बनना है*"

 

_ ➳  अपने शांत स्वधर्म में स्थित हो शांति की गहन अनुभूति करने के लिए शांति के सागर अपने शिव पिता की याद में मैं आत्मा अशरीरी होकर बैठ जाती हूं और पहुंच जाती हूँ अंतर्मुखता एक ऐसी गुफा में जहां किसी भी प्रकार की कोई आवाज, शोरगुल यहां तक की संकल्पों की भी हलचल नहीं। *अंतर्मुखता की गुफा में बैठ एकांतवासी बन एक के अंत में खो जाने की यह अवस्था मन को गहन शांति की अनुभूति करवा रही है*। इस गहन शांति की अवस्था में मुझे आत्मा से निकल रहे शांति के प्रकंपन चारों ओर वायुमंडल में फैल कर वायुमंडल को भी शांत बना रहे हैं। *शांति की शक्तिशाली किरणों का एक ऐसा औरा मेरे चारों तरफ बन गया है कि बाहर की स्थूल आवाजों का प्रभाव भी अब मुझे प्रभावित नही कर रहा*।

 

_ ➳  शांति की गहन अनुभूति करते हुए अब मैं अपने मन बुद्धि का कनेक्शन शांति धाम में रहने वाले अपने शिव पिता परमात्मा के साथ जोड़ती हूं और मन बुद्धि से पहुंच जाती हूँ शांति धाम, शांति के सागर अपने शिव पिता परमात्मा के पास। *शांति के बहुत ही शक्तिशाली वायब्रेशन इस शांति धाम में फैले हुए हैं। जो मुझे असीम शांति से भरपूर कर रहे हैं*। इस असीम शांति का अनुभव करते-करते मैं आत्मा पहुंच जाती हूं अपने शांति दाता मीठे शिव बाबा के पास। जिनसे सर्वशक्तियों की शक्तिशाली किरणे निकल रही हैं। *इन शक्तिशाली किरणों के फव्वारे के नीचे बैठ मैं स्वयं को सर्वशक्तियों से भरपूर कर रही हूं*।

 

_ ➳  भरपूर हो कर अब मैं आत्मा लौट आती हूँ वापिस साकारी दुनिया में और अपने साकारी ब्राह्मण तन में विराजमान हो जाती हूं। *साकार देह में होते हुए भी अब मैं स्वयं को शांति से भरपूर अनुभव कर रही हूं*। और मन में विचार करती हूं कि काश संसार की हर आत्मा जो आज स्वयं को न जानने के कारण दुखी और अशांत हो चुकी है और शांति की तलाश में भटक रही है। वह भी इस गहन शांति का अनुभव कर पाती। जैसे ही यह संकल्प मन में उत्पन्न होता है तभी जैसे बाबा के महावाक्य कानों में गूंजने लगते हैं। *ऐसे लगता है जैसे बाबा निर्देश दे रहे हैं:- "अपने शांत स्वधर्म में स्थित होकर शांति के लिए भटक रही आत्माओं को भटकने से छुड़ाओ"।*

 

_ ➳  बाबा के फरमान का पालन करने के लिए अब मैं अपने लाइट के फ़रिश्ता स्वरूप को धारण कर कल्प वृक्ष की जड़ों में जाकर बैठ जाता हूं और शांति के सागर अपने प्यारे परम पिता परमात्मा शिव बाबा का आहवाहन करता हूं। *मेरा आहवाहन सुनते ही परमधाम से बाबा की शक्तिशाली सतरंगी किरणे सीधी मुझ फ़रिश्ते पर पड़ने लगी हैं और मुझ से निकल कर कल्पवृक्ष की टाल टालियों और पत्ते-पत्ते तक पहुंच कर सर्व आत्माओं रुपी पत्तों को शांति का अनुभव करा रही है*। मैं देख रहा हूँ कि मम्मा, बाबा, वरिष्ठ दादियां और समस्त ब्राह्मण परिवार की आत्माएं भी अब कल्पवृक्ष की जड़ों में आ कर बैठ गई हैं और बाबा से सर्वशक्तियाँ लेकर पूरे कल्प वृक्ष को साकाश दे रही हैं। धीरे-धीरे शक्तियों का प्रवाह निरंतर बढ़ता जा रहा है। कल्पवृक्ष की सभी आत्माएं अब स्वयं को शांति, शक्ति और सर्व गुणों से संपन्न अनुभव कर रही हैं।

 

_ ➳  कल्प वृक्ष से अब मैं फ़रिशता बापदादा के साथ कम्बाइंड हो कर विश्व ग्लोब पर आ गया हूँ और बाबा से शांति की शक्तिशाली किरणे ले कर विश्व की सभी अशांत और दुखी आत्माओं में प्रवाहित कर रहा हूँ। *मैं स्पष्ट देख रहा हूं कि सभी मनुष्य आत्माएं गहन शांति का आनंद ले रही है। अब मैं उन्हें उनका और परमात्मा का वास्तविक परिचय देकर, अपने शांत स्वधर्म में स्थित रहने और सच्ची शांति पाने का सहज रास्ता बता रहा हूं*। सच्ची शांति को पाने का सहज और सत्य रास्ता जानकर सभी आत्माएं प्रसन्नचित्त मुद्रा में दिखाई दे रही है।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं निर्माणता की विशेषता द्वारा सहज सफलता प्राप्त करने वली आत्मा हूँ।*

   *मैं सर्व माननीय आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा सदैव नॉलेज की शक्ति धारण कर लेती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा विघ्नों के वार से सदा मुक्त हूँ  ।*

   *मैं आत्मा विघ्नों को हरा देती हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

अव्यक्त बापदादा :-

 

_ ➳  वर्तमान समय के प्रमाण फरिश्ते-पन की सम्पन्न स्टेज के वा बाप समान स्टेज के समीप आ रहे हो, उसी प्रमाण पवित्रता की परिभाषा भी अति सूक्ष्म समझो। सिर्फ *ब्रह्मचारी बनना भविष्य पवित्रता नहीं लेकिन ब्रह्मचारी के साथ ब्रह्मा आचार्य' भी चाहिए। शिव आचार्य भी चाहिए। अर्थात् ब्रह्मा बाप के आचरण पर चलने वाला। शिव बाप के उच्चारण किये हुए बोल पर चलनेवाला।* फुट स्टैप अर्थात् ब्रह्मा बाप के हर कर्म रूपी कदम पर कदम रखने वाले। इसको कहा जाता है - ब्रह्मा आचार्य'। तो ऐसी सूक्ष्म रूप से चैंकिग करो कि सदा पवित्रता की प्राप्ति, सुख-शांति की अनुभूति हो रही है? सदा सुख की शैय्या पर आराम से अर्थात् शांति स्वरूप में विराजमान रहते हो? यह ब्रह्मा आचार्य का चित्र है।

 

✺  *"ड्रिल :- ब्रह्मचारी के साथ साथ ब्रह्मा आचारी और शिव आचारी बनकर रहना*"

 

_ ➳  *मैं आत्मा याद और सेवा की रस्सियों में झूलते हुए सूक्ष्म वतन पहुँच जाती हूँ...* वतन में बापदादा संग बैठ जाती हूँ... पारलौकिक बाप अलौकिक बाप के मस्तक पर विराजमान होकर मुझे भी अलौकिक बना रहे हैं... बापदादा मुझ आत्मा को अपनी शक्तियों से भरपूर कर रहे हैं... *मैं आत्मा अपनी साधारणता को छोड़ विशेष आत्मा होने का अनुभव कर रही हूँ...*

 

_ ➳  *शिव बाबा ब्रह्मा बाबा के तन में विराजमान होकर अनमोल वाक्यों का उच्चारण कर रहे हैं...* आदि, मध्य, अंत का सत्य ज्ञान सुना रहे हैं... प्यारे बाबा आत्मा, परमात्मा और ड्रामा का नालेज देकर मुझे नालेजफुल बना रहे हैं... मैं आत्मा अपने असली स्वरुप को जान अपने निज गुणों को धारण कर रही हूँ... मैं आत्मा पवित्र फरिश्ते का स्वरूप धारण कर रही हूँ...

 

_ ➳  *अब मैं आत्मा सदा प्यूरिटी की पर्सनालिटी धारण कर सुख, शांति का अनुभव कर रही हूँ...* मैं आत्मा कैसी भी परिस्थितियां आयें कभी दुःख, अशांति का अनुभव नहीं करती हूँ... सदा सुख की शैय्या पर आराम से विराजमान रहती हूँ... सदा अपने शांत स्वरुप के स्टेज में स्थित रहती हूँ... *मैं आत्मा पवित्रता की शक्ति से दुःख को सुख में परिवर्तित कर रही हूँ...*

 

_ ➳  *मैं आत्मा दृष्टि, वृत्ति, चलन, संकल्प, वाणी में ब्रह्मा बाप समान पवित्रता को धारण कर रही हूँ...* मैं आत्मा ब्रह्मचारी बनने के साथ-साथ ब्रह्मा आचार्य' भी बन रही हूँ... *ब्रह्मा बाप के हर कर्म रूपी कदम पर कदम रख फालो फादर कर रही हूँ...* ब्रह्मा बाप के आदर्शों पर चल बाप समान बन रही हूँ... *शिव बाप के उच्चारण किये हुए बोल पर चलकर शिव आचार्य बन रही हूँ...*

 

_ ➳  मैं आत्मा ब्राह्मण जीवन की सभी नियम, मर्यादाओं का पालन करती हूँ... अब मैं आत्मा हर कर्म को चेक करती हूँ कि ये ब्रह्मा बाप समान है या नहीं... शिव बाबा द्वारा उच्चारित अमृत वाणी को धारण कर हर प्वाइंट का स्वरुप बन रही हूँ... *अब मैं आत्मा ब्रह्मचारी के साथ-साथ ब्रह्मा आचारी और शिव आचारी होने का अनुभव कर रही हूँ...*

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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