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 02 / 06 / 22  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *सच्चे बाप से कुछ भी छिपाया तो नहीं ?*

 

➢➢ *सबको बाप का सत्य परिचय दिया ?*

 

➢➢ *ईश्वरीय संस्कारों को कार्य में लगाकर सफल किया ?*

 

➢➢ *"बाप और मैं" - सदा इसी छत्रछाया में रहे ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *योग को ज्वाला रूप बनाने के लिए सेकण्ड में बिन्दी स्वरूप बन मन-बुद्धि को एकाग्र करने का अभ्यास बार-बार करो। स्टॉप कहा और सेकण्ड में व्यर्थ देह-भान से मन-बुद्धि एकाग्र हो जाए। ऐसी कंट्रोलिंग पावर सारे दिन में यूज करो।* पावरफुल ब्रेक द्वारा मन-बुद्धि को कण्ट्रोल करो, जहाँ मन-बुद्धि को लगाना चाहो वहाँ सेकण्ड में लग जाए।

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं होली हँस हूँ"*

 

  सदा अपने को होलीहंस समझते हो? होलीहंस का कर्तव्य क्या होता है? *होलीहंस अर्थात् जो सदा सत्य और असत्य का निर्णय कर सके। हंस में निर्णय शक्ति तीव्र होती है। जिस निर्णय शक्ति के आधार पर कंकड़ और रतन को अलग कर सकते हैं। रतन को ग्रहण करेगा और कंकड़ को छोड़ देगा। तो होलीहंस अर्थात् जो सदा निर्णय शक्ति में नम्बरवन हो। निगेटिव को छोड़ दे और पाजिटिव को धारण करे। देखते हुए सुनते हुए न देखे न सुने। यह है होलीहंस की विशेषता।* तो ऐसे हो या कभी नगेटिव भी देख लेते हो? निगेटिव अर्थात् व्यर्थ बातें, व्यर्थ कर्म न सुने न करें और न बोलें । तो ऐसी शक्ति है जो व्यर्थ को समर्थ में चेंज कर दो। या व्यर्थ चलता है? चाहते नहीं हैं लेकिन चल पड़ता है ,ऐसे तो नहीं है? यदि व्यर्थ को समर्थ में परिवर्तन करने की शक्ति नहीं होगी तो अन्त में व्यर्थ का संस्कार धोखा दे देगा। इसलिए होलीहंस अर्थात् परिवर्तन करना।

 

  व्यर्थ को समर्थ में चेंज करने के लिए विशेष क्या अभ्यास चाहिए? कैसे चेंज करेंगे? संकल्प पावरफुल कैसे बनेगा? हर आत्मा के प्रति शुभ भावना और शुभ कामना अगर ऐसी विधि होगी तो परिवर्तन कर लेंगे। *अगर किसी के प्रति शुभ भावना होती है तो उसकी उल्टी बात भी सुल्टी लगती है और शुभ भावना नहीं होगी तो सुल्टी बात भी उल्टी लगेगी। इसलिए हर आत्मा के प्रति शुभ भावना और शुभ कामना सदा आवश्यक है।* तो यह रहती है या कभी कभी व्यर्थ भावना भी हो जाती है? अपनी शुभ भावना व्यर्थ वाले को भी चेंज कर देती है। वैसे भी गाया हुआ है कि भावना का फल मिलता है। जब भक्तों को भावना का फल मिलता है तो आपको शुभ भावना का फल नहीं मिलेगा? तो व्यर्थ को समर्थ में परिवर्तन करने का आधार है शुभ भावना, शुभ कामना। कैसा भी हो लेकिन आप शुभ भावना दो। कितना भी गंदा पानी इक्क्ठा हो लेकिन अच्छा डालते जायेंगे तो गंदा निकलता जायेगा।

 

  *अगर कोई आत्मा में व्यर्थ को निकालने की समर्थी नहीं है तो आप अपनी शुभ भावना की समर्थी से उसके व्यर्थ को समर्थ कर दो। परिवर्तन कर दो।* इतनी शक्ति है या कभी असर हो जाता है? जैसे बापदादा ने आपके व्यर्थ कर्म को देखकर परिवर्तन कर लिया ना। कैसे किया? शुभ भावना से मेरे बच्चे हैं। तो आपकी शुभ भावना कि मेरा परिवार है, ईश्वरीय परिवार है। कैसा भी है चाहे वह पत्थर है लेकिन आप पत्थर को भी पानी कर दो। ऐसी शुभ भावना और शुभ कामना वाले होलीहंस हो? हंस को सदा स्वच्छ दिखाते हैं। तो स्वच्छ बुद्धि हंस के समान परिवर्तन करेंगे। अपने में धारण नहीं करेंगे। तो संगमयुगी होलीहंस हैं यह स्मृति सदा रखनी है।

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧    *ऐसा अभ्यास करो जो जहाँ बुद्धि को लगाना चाहे वहाँ स्थित हो जायें।* संकल्प किया और स्थित हुआ। यह रूहानी ड्रिल सदैव बुद्धि द्वारा करते रहो।

 

✧  अभी - अभी परमधाम निवासी, अभी - अभी सूक्ष्म अव्यक्त फरिश्ता बन जायें और अभी - अभी साकार कर्मेन्द्रियों का आधार लेकर कर्मयोगी बन जायें। इसको कहा जाता है - संकल्प शक्ति को कन्ट्रोल करना। *संकल्प को रचना कहेंगे और आप उसके रचयिता हो।*

 

✧  जितना समय जो संकल्प चाहिए उतना ही समय वह चलो। जहाँ बुद्धि लगाना चाहे, वहाँ ही लगे। इसको कहा जाता है - अधिकारी। यह प्रैक्टीस अभी कम है। इसलिए यह अभ्यास करो, *अपने आप ही अपना प्रोग्राम बनाओ और अपने को चेक करो कि जितना समय निश्चित किया, क्या उतना ही समय वह स्टेज रही?*

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ बाप-दादा एक सेकेण्ड का सहज साधन वा किसी भी विघ्न से मुक्त होने की युक्ति जो समय-प्रति-समय सुनाते रहते हैं वह भूल जाते हैं। *सेकण्ड में स्वयं का स्वरूप अर्थात् आत्मिक ज्योति स्वरूप और कर्म में निमित भाव का स्वरूप - यह डबल लाइट स्वरूप सेकण्ड में हाई जम्प दिलाने वाला है।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  सच्चे बाप से सदा सच्चे रहना"*

 

_ ➳  मै आत्मा सच की रौशनी में जगमगाती हुई... अपने शानदार भाग्य पर मुस्कराती हुई... *सत्य पिता के साये में सत्य से रौशन हुए चमकते,उज्ज्वल, धवल जीवन को निहार रही हूँ.*.. प्यारे बाबा पर अपने दिल समन्दर को उंडेलने, मै आत्मा सूक्ष्म शरीर में उड़ चलती हूँ वतन की ओर... मुझे अपने दिल के पास आता देख बापदादा भी पुलकित है और बाँहों में समाने को आतुर मेरी बाट ले रहे है... मै आत्मा सत्यपिता की बाँहों में समाकर अतीन्द्रिय सुख की अनुभूतियों से सराबोर हो रही हूँ...

 

   *मीठे बाबा मुझ भाग्यवान आत्मा को... अपनी बाँहों में भरकर... मेरे कानो में अपनी मधुर रश्मियाँ बिखरते हुए कहते है...* जहान के नूर बच्चे... सत्य पिता की ऊँगली पकड़ सत्य राहो पर सदा के निश्चिन्त होकर, सतयुगी दुनिया के हकदार बनो... *सत्यता के नशे में रह ब्रह्माण्ड को बाँहों में भरो.*.. यही सत्यता की चमक देवताई चमक से सदा का नूरानी बनाएगी...

 

_ ➳  *प्यारे बाबा की प्यार भरी समझाइश पाकर मै आत्मा अपने सत्य प्रकाश से आलोकित जीवन को देख मुस्करा उठती हूँ...* प्यारे बाबा... आपके बिना सत्य से कितना विमुख सी थी... असत्य को हर पल जीती हुई दुखो के दलदल में लिप्त थी... मीठे बाबा कब सोचा था मेने कि *सच्चाई मेरे रोम रोम में समाकर जीवन में यूँ चार चाँद सजाएगी*.."

 

   *प्यारे से लाडले मेरे बाबा मुझ पर अनन्त प्रेममयी किरणे बिखेर रहे और कह् रहे...* रूहे गुलाब बच्चे... सच की ताकत से भरकर विश्व धरा पर शान से अपना अधिकार ले लो... *मीठे बाबा को जो अपने दिल का हमराज बनाया है तो हर पल हर बात में राजदार करो.*.. मनमीत को हालेदिल बयाँ करो... सच्चाई से ईश्वर पिता का दिल यूँ चुटकियो में जीत लो..."

 

_ ➳  *मीठे बाबा को अपने सम्मुख बैठ यूँ प्यार से समझाते हुए देख देख मै आत्मा ख़ुशी में चहक रही हूँ...* और प्यारे बाबा से कह रही... और सच्चे दिलबर बाबा श्रीमत की जादूगरी से, जीवन सत्य की खनक से भर दिया है... मेरा हर कर्म सत्य की झनकार लिए ब्रह्माण्ड में गूंज रहा है... ईश्वरीय ज्ञान रत्नों से आपने मेरा जीवन... *सत्य और श्रेष्ठ कर्मो से सजाकर मुझे देवताओ सा खुबसूरत बना दिया है.*.."

 

   *प्यारे बाबा मुझे अपनी अनन्त शक्तियो से भरपूर कर रहे और कह रहे...* सत्यता के सूर्य बनकर इस धरा पर अपनी किरणे इस कदर फैलाओ कि... हर दिल इन किरणों के प्रकाश में आने को मचल उठे... सच्चे पिता के साथ रोम रोम से सच्चे होकर रहो.. ईश्वरीय यादो में बीते यह सुनहरे पल.... *सच्ची दिल पर साहिब को राजी कर जायेंगे.*..ईश्वर पिता से स्वर्ग राज्य तिलक दिलाएंगे..."

 

_ ➳  *मनमीत बाबा की प्रेम अल्फाज सुनकर मै आत्मा खुशियो के आसमाँ में उड़ने लगी...* और बाबा से कहा... मीठे बाबा... मेरे तन मन धन सब आपको सौंप दिया है...मेरा सब कुछ आपका और आपके सारे खजाने मेरे है... बस आप मेरा हाथ और साथ कभी न छोड़ना... *आपके साये में, मै आत्मा सच का सूरज बन दमक रही हूँ.*.. ऐसी मीठी रुहरिहान को दिल में समाये, मै आत्मा अपने स्थूल जगत की ओर रुख करती हूँ..."

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं ईश्वरीय संस्कारों को कार्य मे लगाकर सफल करने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं सफलतामूर्त आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा "बाप और मैं" की छत्रछाया सदा साथ रखती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा कोई भी विघ्न के ठहरने से सदैव मुक्त हूँ  ।*

   *मैं विघ्न विनाशक आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

✺ अव्यक्त बापदादा :-

➳ _ ➳ त्याग मुश्किल तो नहीं लगता? सबको छोड़ना पड़ेगा। *अगर पुराने के बदले नया मिल जाए तो मुश्किल है क्या!* अभी-अभी मिलता है। भविष्य मिलना तो कोई बड़ी बात नहीं लेकिन अभी-अभी पुराना भान छोड़ो, फरिश्ता स्वरूप लो। जब पुरानी दुनिया के देह का भान छोड़ देते हो तो क्या बन जाते हो? डबल लाइट। अभी ही बनते हो। परन्तु अगर न यहाँ के न वहाँ के रहते हो तो मुश्किल लगता है। न पूरा छोड़ते हो, न पूरा लेते हो तो अधमरे हो जाते हो, इसलिए बार-बार लम्बा श्वांस उठाते हो। कोई भी बात मुश्किल होती तो लम्बा श्वांस उठता है। मरने में जो मजा है - लेकिन पूरा मरो तो। लेने में कहते हो पूरा लेंगे और छोड़ने में मिट्टी के बर्तन भी नहीं छोड़ेंगे। इसलिए मुश्किल हो जाता है। वैसे तो अगर कोई मिट्टी का बर्तन रखता है तो बापदादा रखने भी दें, बाप को क्या परवाह है! भल रखो। लेकिन स्वयं ही परेशान होते हो। इसलिए बापदादा कहते हैं छोड़ो। *अगर कोई भी पुरानी चीज रखते हो तो रिजल्ट क्या होती है? बार-बार बुद्धि भी उन्हों की ही भटकती है। फरिश्ता बन नहीं सकते।* इसलिए बापदादा तो और भी हजारों मिट्टी के बर्तन दे सकते हैं - कितना इकट्ठे कर लो। लेकिन जहाँ किचड़ा होगा वहाँ क्या पैदा होंगे? मच्छर! और मच्छर किसको काटेंगे? तो बापदादा बच्चों के कल्याण के लिए ही कहते हैं - पुराना छोड़ दो। अधमरे नहीं बनो। मरना है तो पूरा मरो, नहीं तो भले ही जिंदा रहो।

✺ *"ड्रिल :- मिट्टी के बर्तनों में ममत्व न रख इस पुरानी दुनिया से पूरा पूरा मरने का अनुभव करना"*

➳ _ ➳ मैं आत्मा मन बुद्धि से उड़न खटोले पर बैठकर इस सॄष्टि का भ्रमण कर रही हूँ... *तेज हवाओं को चीरते हुए तेजी से इस प्रकृति की सॄष्टि की सुंदरता का आनंद ले रही हूँ... पेड़-पौधे की टहनियों को छूते हुए मैं पेड़ों से फूल तोड़ते हुए जा रही हूँ... हाथों में बहुत सारे फूल पत्तियाँ लेकर उड़ाती जा रही हूँ...* उड़न खटोले से जब मैं नीचे की ओर देखती हूँ तो बहुत ही मनमोहक दृश्य लगता है... मैं थोड़ा नीचे आती हूँ और अपने उड़न खटोले की रफ़्तार को कम करती हूँ और नीचे देखती हूँ... जहाँ एक व्यक्ति अपने हाथों से मिट्टी के बर्तन बना रहा है... मैं ये देखकर रुक जाती हूँ... और नीचे उतर जाती हूँ... नीचे उतरकर मैं उन मिट्टी के बर्तनों को अपने हाथ में उठा लेती हूँ... और गहराई से निहारती हूँ...

➳ _ ➳ कुछ समय बाद मैं उस बर्तन को लेकर तेज चलती हूँ... तभी वो बर्तन बनाने वाला वो व्यक्ति मेरे पास आकर कहता है... ये बर्तन बहुत ही नाजुक है... छोटी सी गलती से ये बर्तन टूट जायेगा... ये सुनकर मेरे कदम वहीँ रुक जाते हैं... और मैं उस व्यक्ति से कहती हूँ... आप मुझे इस बर्तन के बारे में और गहराई से बताइये... और फिर वो व्यक्ति मुझसे कहता है... जितना इसमे पानी शीतल होता है उतना ही ये कच्चा भी होता है... *इसे ये पता होते भी की एक दिन इसे मिट्टी में ही मिल जाना है... ये अपना कर्तव्य नहीं भूलता... वो ना ही इस मिट्टी से लगाव रखता है... चाहे ये कितने भी सुंदर और मनमोहक हो एक दिन इनकी मिट्टी ही हो जानी है...*

➳ _ ➳ और फिर वो व्यक्ति मुझे कहता है... मनुष्य भी इस मिट्टी के बर्तन की तरह ही है... चाहे वो कितना भी मनमोहक, कितना ही पद में ऊंच हो और कितना ही महान हो... अंत में वो पंचतत्व में विलीन ही हो जाता है... इसलिए हर व्यक्ति को इस देह रूपी मिट्टी के बर्तन से लगाव नहीं रखना चाहिए... *जब हम अपने असली स्वरूप को भूलते हैं तो देहभान में आ जाते है... और इससे जुड़े हर रिश्ते, हर बातें, दुःख, दर्द में हम फंस कर रह जाएंगे... अगर इंसान किसी भी पुरानी चीज को अपने पास रखता है तो उसे ये पुरानी चीज कभी बेफ़िक्र फ़रिश्ते के रुप में आगे बढ़ने नहीं देगी... जब भी फ़रिश्ता बनकर उड़ना चाहेंगे... ये पुरानी विनाशी चीज अपनी तरफ खींचेगी और तुरन्त नीचे उतार देगी...*

➳ _ ➳ कुछ देर बाद मैं उस व्यक्ति की बातें सुनकर वापिस अपने उड़न खटोले पर पहुँच जाती हूँ... और अपने बाबा को अपने सामने इमर्ज करती हूँ... और फिर उड़ने लगती हूँ... उसी समय मैं बाबा से ये वादा करती हूँ... बाबा... *आज से मैं आत्मा इस मिट्टी रूपी देह से कोई लगाव नहीं रखूँगी... और ना ही इससे संबंधित कोई बातें भी याद रखूँगी... क्योंकि अगर मैं इन विनाशी चीजों को याद रखूँगी तो इससे मेरा पुरुषार्थ रुक जाएगा... और ना ही मैं फरिश्ता बनकर आपके साथ उड़ पाऊंगी*... इसलिए अब मैं हमेशा अपने आपको आत्मिक स्थिति में अनुभव करुँगी... और अपने आसपास रहने वाले सभी शरीर धारियों को सिर्फ और सिर्फ आत्मा के रूप में ही देखूंगी... ये वचन सुनकर बाबा मुझ आत्मा से बहुत प्रसन्न होते हैं... और मुस्कुराने लगते हैं... और हम तेज रफ्तार से उड़ने लगते हैं...

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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