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 02 / 07 / 20  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *"मैं आत्मा मास्टर सागर हूँ" - इसी नशे में रहे ?*

 

➢➢ *ड्रामा कह पुरुषार्थ को तो नहीं छोड़ा ?*

 

➢➢ *सदा बाप के अविनाशी और निस्वार्थ प्रेम में लवलीन रहे ?*

 

➢➢ *न्यारे प्यारे होकर हर कर्म किया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *अन्त:वाहक अर्थात् अन्तिम स्थिति, पावरफुल स्थिति ही आपका अन्तिम वाहन है। अपना यह रूप सामने इमर्ज कर फरिश्ते रूप में चक्कर लगाओ,* सकाश दो, तब गीत गायेंगे कि शक्तियां आ गई..... *फिर शक्तियों द्वारा सर्वशक्तिवान स्वत: ही सिद्ध हो जायेगा।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं ड्रामा में श्रेष्ठ पार्टधारी हूँ"*

 

  सभी अपने को इस ड्रामा के अन्दर पार्ट बजाने वाली श्रेष्ठ पार्टधारी आत्मायें अनुभव करते हो? *जैसे बाप ऊंचे ते ऊंचा है, ऐसे ऊंचे ते ऊंचा पार्ट बजाने वाली आप श्रेष्ठ आत्माएं हो। डबल हीरो हो। हीरे तुल्य जीवन भी है और हीरो पार्टधारी भी हो। तो कितना नशा हर कर्म में होना चाहिए!*

 

  अगर स्मृति में यह श्रेष्ठ पार्ट है, तो जैसी स्मृति होती है वैसी स्थिति होती है और जैसी स्थिति होगी वैसे कर्म होंगे। तो सदा यह स्मृति रहती है? *जैसे शरीर रूप में जो भी हो, जैसा भी हो-वह सदा याद रहता है ना। तो आत्मा का आक्यूपेशन, आत्मा का स्वरूप जो है, जैसा है-वह भी याद रहना चाहिए ना। शरीर विनाशी है लेकिन उसकी याद अविनाशी रहती है।* आत्मा अविनाशी है, तो उसकी याद भी अविनाशी रहती है? जैसे यह आदत पड़ गई है कि मैं शरीर हूँ। है उल्टा, रांग है। लेकिन आदत तो पक्की हो गई। तो भूलने चाहते भी नहीं भूलता। वैसे यथार्थ अपना स्वरूप भी ऐसे पक्का होना चाहिए।

 

  शरीर का आक्यूपेशन स्वप्न में भी याद रहता है। कोई क्लर्क है, कोई वकील है, बिजनेस करने वाला है-तो भूलता नहीं। *ऐसे यह ब्राह्मण जीवन का आक्यूपेशन कि मैं हीरो पार्टधारी हूँ-यह पक्का होना चाहिए और नेचुरल होना चाहिए। तो चेक करो कि ऐसे नेचुरल जीवन है? जो नेचुरल चीज होती है वह सदा होती है और जो अननेचुरल (अस्वाभाविक) होती है वह कभी-कभी होती है। तो यह स्मृति सदा रहनी चाहिये कि हम डबल हीरो हैं।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  *माया का रॉयल रूप और उस पर विजय प्राप्त करने की विधि* :- 'कर्मभोग है, कर्मबन्धन है, संस्कारों का बन्धन है, संगठन का बन्धन है' - इस व्यर्थ संकल्प रूपी जाल को अपने आप ही इमर्ज करते हो और अपने ही जाल में स्वयं फंस जाते हो, फिर कहते हैं कि अभी छुडवाओ।

 

✧  *बाप कहते हैं कि तुम हो ही छूटे हुए छोडो तो छूटे।* अब निर्बन्धनी हो या बन्धनी हो। पहले ही शरीर छोड चुके हो, मरजीवा बन चुके हो। यह तो सिर्फ विश्व की सेवा के लिए शरीर रहा हुआ है, पुराने शरीर में बाप शक्ति भर कर चला रहे हैं।

 

✧  जिम्मेवारी बाप की है, फिर आप क्यों ले लेते हो। जिम्मेवारी सम्भाल भी नहीं सकते हो लेकिन छोडते भी नहीं हो। *जिम्मेवारी छोड दो अर्थात मेरा-पन छोड दो।*

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ *अशरीरी बनने के लिए विशेष ४ बातों का अटेन्शन रखो।* १. कभी भी अपने आपको भुलाना होता है तो दुनिया में भी एक सच्ची प्रीत में खो जाते हैं। तो सच्ची प्रीत ही भूलने का सहज साधन है। *प्रीत दुनिया को भुलाने का साधन है, देह को भुलाने का साधन है।* २. *दूसरी बात - सच्चा मीत भी दुनिया को भुलाने का साधन है।* अगर दो मीत आपस में मिल जाएँ तो उन्हें न स्वयं की, न समय की स्मृति रहती है। ३. *तीसरी बात दिल के गीत- अगर दिल से कोई गीत गाते हैं तो उस समय के लिए वह स्वयं और समय को भूला हुआ होता है।* ४. चौथी बात - यथार्थ रीत। *अगर यथार्थ रीत है तो अशरीरी बनना बहुत सहज है। रीत नहीं आती तब मुश्किल होता है। तो एक हुआ प्रीत २- मीत ३गीत ४- रीत।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- भविष्य 21 जन्मों के लिए पढाई पढनी"*

 

_ ➳  मैं आत्मा कितनी ही तकदीरवान हूँ जो की स्वयं परमपिता परमात्मा, भाग्यविधाता बन मेरी सोई हुई तकदीर को जगाने परमधाम से आये हैं... *अविनाशी बेहद बाबा अविनाशी ज्ञान देकर इस एक जन्म में मुझे पढ़ाकर, 21 जन्मों के लिए मेरी ऊँची तकदीर बना रहे हैं...* यह पढ़ाई ही सोर्स ऑफ़ इनकम है... *मैं रूहानी आत्मा, रूहानी बाबा से, रूहानी पढ़ाई पढने चल पड़ती हूँ रूहानी कालेज सेंटर में...*  

 

 *पुरुषोत्तम संगम युग की पढाई से उत्तम ते उत्तम पुरुष बनने की शिक्षा देते हुए प्यारे बाबा कहते हैं:-* मेरे मीठे फूल बच्चे... *ईश्वर पिता की बाँहो में झूलने वाला खुबसूरत समय जो हाथ आया है तो इस वरदानी युग में पिता से अथाह खजाने लूट लो... 21 जनमो के मीठे सुखो से अपना दामन सजा लो...* ईश्वरीय पढ़ाई से उत्तम पुरुष बन विश्व धरा के मालिक हो मुस्करा उठो...

 

_ ➳  *बाबा की मीठी मुरली की मधुर तान पर फिदा होते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे प्यारे बाबा... मै आत्मा अपने महान भाग्य को देख देख निहाल हो गई हूँ... *मेरा मीठा भाग्य मुझे ईश्वर पिता की फूलो सी गोद लिए वरदानी संगम पर ले आया है... ईश्वरीय पढ़ाई से मै आत्मा मालामाल होती जा रही हूँ...*

 

  *ज्ञान रत्नों के सरगम से मेरे मन मधुबन को सुरीला बनाकर मीठे बाबा कहते हैं:-* मीठे प्यारे लाडले बच्चे... इस महान मीठे समय का भरपूर फायदा उठाओ... *ईश्वरीय ज्ञान रत्नों से जीवन में खुशियो की फुलवारी सी लगाओ... जिस ईश्वर को दर दर खोजते थे कभी... आज सम्मुख पाकर ज्ञान खजाने से भरपूर हो जाओ... और 21 जनमो के सुखो की तकदीर बनाओ...*

 

_ ➳  *दिव्यता से सजधज कर सतयुगी सुखों की अधिकारी बन मैं आत्मा कहती हूँ:-* मेरे प्राणप्रिय बाबा... मै आत्मा मीठे बाबा संग ज्ञान और योग के पंख लिए असीम आनन्द में खो गयी हूँ... *ईश्वर पिता के सारे खजाने को बुद्धि तिजोरी में भरकर और दिव्य गुणो की धारणा से उत्तम पुरुष आत्मा सी सज रही हूँ...*

 

  *इस संगमयुग में मेरे संग-संग चलते हुए सत्य ज्ञान की राह दिखाते हुए मेरे बाबा कहते हैं:-* प्यारे सिकीलधे मीठे बच्चे... *मीठे बाबा के साथ का संगम कितना मीठा प्यारा और सुहावना है...* सत्य के बिना असत्य गलियो में किस कदर भटके हुए थे... आज पिता की गोद में बैठे फूल से खिल रहे हो... *ईश्वरीय मिलन के इन मीठे पलों की सुनहरी यादो को रोम रोम में प्रवाहित कर देवता से सज जाओ...*

 

_ ➳  *ईश्वरीय राहों पर चलकर ओजस्वी बन दमकते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... *मै आत्मा मीठे बाबा की गोद में ईश्वरीय पढ़ाई पढ़कर श्रेष्ठ भाग्य को पा रही हूँ... इस वरदानी संगम युग में ईश्वर को शिक्षक रूप में पाकर अपने मीठे से भाग्य पर बलिहार हूँ...* और प्यारा सा देवताई भाग्य सजा रही हूँ...

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  कर्म-अकर्म-विकर्म की गति को समझ सदा श्रेष्ठ कर्म ही करने है*

 

_ ➳ कर्मो की जिस गुह्य गति का ज्ञान भगवान से मुझे मिला है उस कर्म - अकर्म - विकर्म की गति को बुद्धि में रख अब मुझे अपने हर कर्म पर अटेंशन देते हुए इस बात का पूरा ध्यान रखना है कि अनजाने में भी मुझ से ऐसा कोई कर्म ना हो जो विकर्म बने। *अपने हर कर्म को श्रेष्ठ बनाने के लिए सबसे पहले मुझे अपने हर संकल्प को शुद्ध और श्रेष्ठ बनाना है। और इसके लिये अपने प्यारे पिता की आज्ञाओं को अपने जीवन मे धारण कर कदम - कदम श्रीमत पर चलने का मुझे पूरा अटेंशन रखना है*। मन ही मन स्वयं से बातें करती मैं अपने आप से और अपने प्यारे बाबा से प्रोमिस करती हूँ कि बिना सोचे समझे कोई भी कर्म अब मैं कभी नही करूँगी। हर कर्म करने से पहले चेक करूँगी कि वो श्रीमत प्रमाण है या नही!

 

_ ➳  कर्म - अकर्म - विकर्म की गति को बुद्धि में रख अपने हर कर्म को श्रेष्ठ बनाने की प्रतिज्ञा अपने प्यारे पिता से करके अब मैं कर्मो की अति गुह्य गति का ज्ञान देने वाले ज्ञानसागर अपने शिव बाबा की अति मीठी याद में मन बुद्धि को स्थिर करके बैठ जाती हूँ और अपने मन बुद्धि का कनेक्शन परमधाम में रहने वाले अपने पिता से जोड़ लेती हूँ। *जैसे बिजली का स्विच ऑन करते ही सारे घर मे प्रकाश फैल जाता है ऐसे ही स्मृति का स्विच ऑन करते ही परमधाम से परमात्म शक्तियों की लाइट सीधी मुझ आत्मा के ऊपर पड़नी शुरू हो जाती है और मेरे चारों तरफ एक अद्भुत दिव्य अलौकिक प्रकाश फैल जाता है*। इस सतरंगी प्रकाश के खूबसूरत झरने के नीचे बैठी मैं महसूस करती हूँ जैसे धीरे - धीरे मैं शरीर के भान से मुक्त होकर एक बहुत ही न्यारी लाइट स्थिति में स्थित होती जा रही हैं। स्वयं को मैं बहुत ही हल्का अनुभव कर रही हूँ।

 

_ ➳  ये हल्केपन का निराला अनुभव मुझे देह के हर बंधन से मुक्त कर रहा है। देह रूपी डाली का आधार छोड़ मैं आत्मा पँछी बड़ी आसानी से ऊपर की ओर उड़ान भर रही हूँ और देह से निकल कर चमकती हुई अति सूक्ष्म ज्योति बन अपनी किरणों को बिखेरती हुई आकाश की ओर उड़ती जा रही हूँ। *देह और देह की इस साकारी दुनिया को पार कर, मैं आकाश से ऊपर अब फरिश्तों की आकारी दुनिया से होकर अपनी निराकारी दुनिया में पहुँच गई हूँ*। आत्माओं की इस निराकारी दुनिया अपने इस शान्तिधाम घर मे आकर मैं गहन शांति का अनुभव कर रही हूँ। *कुछ क्षणों के लिए गहन शांति के गहरे अनुभवों में खोकर, अब मैं शांति के सागर, सुख के सागर, प्रेम और पवित्रता के सागर अपने पिता के पास पहुँच कर, मन बुद्धि के नेत्रों से उन्हें निहार रही हूँ*।

 

_ ➳  अपने पिता के अति सुन्दर मनभावन स्वरूप को मैं देख रही हूँ जो मेरे ही समान एक प्वाइंट ऑफ लाइट, एक अति सूक्ष्म बिंदु हैं किंतु गुणों में वो सिंधु हैं। उनके सानिध्य में, उनसे आ रही सर्वशक्तियों की किरणों के फव्वारे के नीचे बैठ मैं स्वयं को उनकी शक्तियों से भरपूर कर रही हूँ। *अपने परमधाम घर में अपने परमपिता परमात्मा शिव बाबा के सामने निराकारी, निर्विकारी और निर्संकल्प स्थिति में स्थित हो कर मैं गहन शांति का अनुभव कर रही हूँ*। बाबा से सर्वगुणों और सर्वशक्तियों की अनन्त सतरंगी किरणे निकल कर मुझ आत्मा में समा रही हैं और मैं स्वयं में इन गुणों और शक्तियों को भरकर स्वयं को सर्वगुण और सर्वशक्तिसम्पन्न बना रही हूँ। *बीज रूप अवस्था की मैं गहन अनुभूति कर रही हूँ जो मुझे अतीन्द्रिय सुख प्रदान कर रही है*।

 

_ ➳  अतीन्द्रिय सुख के झूले में झूलने का भरपूर आनन्द लेकर और शक्ति स्वरूप स्थिति में स्थित हो कर अब मैं पुनः लौट रही हूँ फिर से देहधारियों की साकारी दुनिया में। फिर से अपने साकार तन में, साकार दुनिया मे, साकार सम्बन्धो के बीच अपने ब्राह्मण स्वरुप में मैं स्थित होकर देह और देह की दुनिया मे फिर से अपना पार्ट बजा रही हूँ।*किन्तु देह और देहधारियों के बीच में रहते हुए भी अपने सत्य स्वरूप में टिक कर अपनी दिव्यता और रूहानियत का अनुभव करते हुए अब मैं उपराम स्थिति में स्थित होकर, कर्म - अकर्म - विकर्म की गुह्य गति को बुद्धि में रख कर ही हर कर्म कर रही हूँ*। कर्म - अकर्म - विकर्म की गति बुद्धि में रहने से अब हर कर्म मैं सोल कॉन्शियस होकर कर रही हूँ इसलिये मेरा हर कर्म स्वत: ही श्रेष्ठ बनता जा रहा है।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं सदा बाप के अविनाशी और निःस्वार्थ प्रेम में लवलीन रहने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं मायाप्रूफ आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा सदैव न्यारे-प्यारे होकर कर्म करती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा सेकंड में फुलस्टाप लगा सकती हूँ  ।*

   *मैं समर्थ आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

✺ अव्यक्त बापदादा :-

 

➳ _ ➳  कोई शास्त्रार्थ करते शास्त्र में ही रह गये। कोई महात्मायें बन आत्मा और परमात्मा की छोटी सी भ्रान्ति में अपने भाग्य से रह गये। बच्चे बन बाप के अधिकार से वंचित रह गये। *बड़े-बड़े वैज्ञानिक खोजना करते उसी में खो गये। राजनीतिज्ञ योजनायें बनाते-बनाते रह गये। भोले भक्त कण-कण में ढूँढते ही रह गये। लेकिन पाया किन्हों ने? भोलेनाथ के भोले बच्चों ने।* बड़े दिमाग वालों ने नहीं पाया लेकिन सच्ची दिल वालों ने पाया। इसलिए कहावत है - सच्ची दिल पर साहब राजी।

 

➳ _ ➳  तो सभी सच्ची दिल से दिलतख्तनशीन बन सकते। सच्ची दिल से दिलाराम बाप को अपना बना सकते। दिलाराम बाप सच्ची दिल के सिवाए सेकण्ड भी याद के रूप में ठहर नहीं सकते। सच्ची दिल वाले की सर्वश्रेष्ठ संकल्प रूपी आशायें सहज सम्पन्न होती हैं। *सच्ची दिल वाले सदा बाप के साथ का साकार, आकार, निराकार तीनों रूपों में सदा साथ का अनुभव करते हैं।*

 

✺  *"ड्रिल :- सच्ची दिल से दिलाराम को अपना बनाना।*

 

➳ _ ➳  *मैं आत्मा उद्यान में खडी सूरजमुखी के पुष्पों को देख रही हूँ... देखने में कितने आकर्षक लग रहे हैं... सारे उद्यान की शोभा बढ़ा रहे हैं...* सूरजमुखी पुष्प दिनभर सूर्य के चारों ओर घूमता रहता है... जिस दिशा में सूर्य होता हैसूरजमुखी का फूल उसी दिशा में अपना मुँह कर लेता है... सूरजमुखी के फूल सूर्यादय पर खिलते हैं, तथा सूर्यास्त के समय बन्द हो जाते हैं... जैसे सूर्य ही उनके लिए सबकुछ हो... *मैं आत्मा भी सूरजमुखी पुष्प बन परमधाम ज्ञान सूर्य बाबा के सम्मुख पहुँच जाती हूँ...* 

 

➳ _ ➳  ज्ञान सूर्य बाबा से आती सुनहरी लाल प्रकाश की तेज रश्मियाँ मुझ आत्मा पर पड़ रही हैं... मुझ आत्मा के जन्म-जन्मान्तर के विकर्म इन तेज रश्मियों में दग्ध हो रहे हैं... *देह रूपी तितली, देह के सम्बन्ध, देह के पदार्थ रूपी तितलियाँ मुझ आत्मा रूपी फूल को घेरे हुए थी, जिससे मैं आत्मा नीचे दबकर नीचे गिरती चली गई थी...* पुराना देह, देह के सम्बन्ध, देह के पदार्थ रूपी सभी तितलियाँ बाहर उड़ते जा रहे हैं... अब बची सिर्फ मैं बीजरूप आत्मा जो सब बोझों से मुक्त होकर सूरजमुखी पुष्प बन खिल रही हूँ... *मैं आत्मा सूरजमुखी पुष्प समान ज्ञान सूर्य को ही निहार रही हूँ...* ज्ञान सूर्य के सिवा सब कुछ भूल गई हूँ...

 

➳ _ ➳  मैं आत्मा ज्ञान सूर्य बाबा के साथ धीरे-धीरे निराकारी वतन से नीचे आती हूँ आकारी वतन में... जहाँ आकारी रूप में ब्रह्मा बाबा बैठे हुए हैं... निराकारी बाबा आकारी बाबा के मस्तक पर विराजमान होकर मुस्कुरा रहे हैं... *परमात्मा के इस अवतरण को प्रत्यक्ष देख मुझ आत्मा के नैनों से परमात्म प्रेम की अश्रुधारा बहने लगती है... भक्तिमार्ग में भोले भक्त कण-कण में ढूँढते ही रह गये... बड़े-बड़े वेदांती, शास्त्री भी शास्त्र में ही रह गये...* साधू, सन्यासी, महात्मा भी भगवान के असली स्वरूप को नहीं पहचान पाए... बड़े-बड़े वैज्ञानिक, राजनीतिज्ञ भी भगवान् को खोज नहीं पाये... किन्तु भोलेनाथ बाबा मिले भोले-भाले, सच्ची दिल वाले बच्चों को...     

 

➳ _ ➳  मैं कितनी ही भाग्यशाली आत्मा हूँ जो परमात्मा ने मुझे अपना बनाया... भक्तिमार्ग के आडम्बरों से बचा लिया, दर-दर भटकने से मुक्त कर दिया... मैं आत्मा अपने भाग्य पर नाज करती बाबा को ही एकटक देखती जा रही हूँ... *मुझ आत्मा के नैनों से निकली अश्रुधारा में मेरे दिल की सारी गंदगी बाहर निकल रही है... सारा मैल खत्म होकर मुझ आत्मा का दिल का कोना-कोना बिल्कुल साफ़ और स्वच्छ हो गया है... मैं आत्मा सच्ची दिल वाली बन गई हूँ...* जिसके दिल में सिर्फ और सिर्फ एक दिलाराम बाबा है...  

 

➳ _ ➳  मैं आत्मा दिलाराम बाबा को अपने दिल में बिठाकर दिल भर-भर के मिलन मनाती रहती हूँ... मुझे अलग से बाबा को याद नहीं करना पड़ता क्योंकि बाबा सदैव मेरे दिल में ही रहते हैं... सहज याद से मुझ आत्मा के सभी सर्वश्रेष्ठ संकल्प सहज सम्पन्न हो रहे हैं... अमृतवेले से लेकर हर कर्म में बाबा मेरे साथ ही रहते हैं... हर पल मुझे साकार पालना का अनुभव कराते रहते हैं... मैं आत्मा हर कर्म बाबा की राय लेकर श्रीमत अनुसार कर रही हूँ... *मैं आत्मा साकार, आकारनिराकार तीनों रूपों में सदा बाबा के साथ का अनुभव कर रही हूँ... मैं आत्मा सच्ची दिल से दिलाराम बाप को अपना बनाकर बाबा की दिलतख्तनशीन बन गई हूँ...*

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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