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 02 / 08 / 22  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *एक की ही अव्यभिचारी याद में रहे ?*

 

➢➢ *विनाशी धन का नशा तो नहीं रखा ?*

 

➢➢ *बाप की मदद द्वारा उमंग उत्साह और अथकपन का अनुभव किया ?*

 

➢➢ *मेरे को तेरे में परिवर्तित किया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *अभी तीव्र पुरुषार्थ का यही लक्ष्य रखो कि मैं डबल लाइट फरिश्ता हूँ, चलते-फिरते फरिश्ता स्वरूप की अनुभूति को बढ़ाओ। अशरीरीपन का अभ्यास करो।* सेकण्ड में कोई भी संकल्पों को समाप्त करने में, संस्कार स्वभाव में डबल लाइट रहो।

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं 'एक बल, एक भरोसा' के अनुभवी आत्मा हूँ"*

 

✧  सदा एक बल एक भरोसा-यह अनुभव करते रहते हो? जितना एक बाप में भरोसा अर्थात् निश्चय है तो बल भी मिलता है। *क्योंकि एक बाप पर निश्चय रखने से बुद्धि एकाग्र हो जाती है, भटकने से छूट जाते हैं। एकाग्रता की शक्ति से जो भी कार्य करते हो उसमें सहज सफलता मिलती है। जहाँ एकाग्रता होती है वहाँ निर्णय बहुत सहज होता है।* जहाँ हलचल होगी तो निर्णय यथार्थ नहीं होता है। तो 'एक बल, एक भरोसा' अर्थात् हर कार्य में सहज सफलता का अनुभव करना। कितना भी मुश्किल कार्य हो लेकिन 'एक बल, एक भरोसे' वाले को हर कार्य एक खेल लगता है। काम नहीं लगता है, खेल लगता है। तो खेल करने में खुशी होती है ना!

 

✧  चाहे कितनी भी मेहनत करने का खेल हो लेकिन खेल अर्थात् खुशी। देखो, मल्ल-युद्ध करते हैं तो उसमें भी कितनी मेहनत करनी पड़ती! लेकिन खेल समझ के करते हैं तो खुश होते हैं, मेहनत नहीं लगती। खुशी-खुशी से कार्य सहज सफल भी हो जाता है। अगर कोई कार्य करते भी हैं, लेकिन खुश नहीं, चिंता वा फिक्र में हैं-तो मुश्किल लगेगा ना! *'एक बल, एक भरोसा'-इसकी निशानी है कि खुश रहेंगे, मेहनत नहीं लगेगी। 'एक भरोसा, एक बल' द्वारा कितना भी असम्भव काम होगा तो वो सम्भव दिखाई देगा। ब्राह्मण जीवन में कोई भी-चाहे स्थूल काम, चाहे आत्मिक पुरुषार्थ का, लेकिन कोई भी असम्भव नहीं हो सकता।*

 

  ब्राह्मण का अर्थ ही है-असम्भव को भी सम्भव करने वाले। ब्राह्मणों की डिक्शनरी में 'असम्भव' शब्द है नहीं, मुश्किल शब्द है नहीं, मेहनत शब्द है नहीं। ऐसे ब्राह्मण हो ना। या कभी-कभी असम्भव लगता है? यह बहुत मुश्किल है, यह बदलता नहीं, गाली ही देता रहता है, यह काम होता ही नहीं, पता नहीं मेरा क्या भाग्य है-ऐसे नहीं समझते हो ना। या कोई काम मुश्किल लगता है? *जब बाप का साथ छोड़ देते हो, अकेले करते हो तो बोझ भी लगेगा, मेहनत भी लगेगी, मुश्किल और असम्भव भी लगेगा और बाप को साथ रखा तो पहाड़ भी राई बन जायेगी। इसको कहा जाता है-एक बल, एक भरोसे में रहने वाले।* 'एक बल, एक भरोसे' में जो रहता वो कभी भी संकल्प-मात्र भी नहीं सोच सकता कि क्या होगा, कैसे होगा? क्योंकि अगर क्वेश्चन-मार्क है तो बुद्धि ठीक निर्णय नहीं करेगी। क्लीयर नहीं है!

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  *उडती कला का उडन आसन सदा तैयार हो।* जैसे आजकल के संसार में भी जब लडाई शुरू हो जाती है तो वहाँ के राजा हो वा प्रेजीडेन्ट हो उन्हों के लिए पहले से ही देश से निकलने के साधन तैयार होते हैं। उस समय यह तैयार करो, यह आर्डर करने की भी मार्जिन नहीं होती। लडाई का इशारा मिला और भागा। नहीं तो क्या हो जाए? प्रजीडेन्ट वा राजा के बदले जेल बर्ड बन जायेगा।

 

✧  आजकल की निमित बनी हुई अल्पकाल की अधिकारी आत्मायें भी पहले से अपनी तैयारी रखती हैं। तो अपना कौन हो? इस संगमयुग के हिरो पार्टधारी अर्थात विशेष आत्मायें, तो आप सबकी भी पहले से तैयारी चाहिए ना कि उस समय करेंगे? मार्जिन ही सेकण्ड की मिलनी है फिर क्या करेंगे? सोचने की भी मार्जिन नहीं मिलनी है। *कहूँ, न कहूँ, यह कहूँ, वह कहूँ, ऐसे सोचने वाले साथी' के बजाए बाराती' बन जायेंगे।*

 

✧  इसलिए *अन्त:वाहक स्थिति अर्थात कर्म बन्धन मुक्त कर्मातीत - ऐसे कर्मातीत स्थिति का वाहन अर्थात अन्तिम वाहन, जिस द्वारा ही सेकण्ड में साथ में उडेगे।* वाहन तैयार है? वा समय को गिनती कर रहे हो? अभी यह होना है, यह होना है, उसके बाद यह होगा, ऐसे तो नहीं सोचते हो? *तैयारी सब करो। सेवा के साधन भी भल अपनाओ।* नये-नये प्लैन भी भले बनाओ। लेकिन किनारों में रस्सी बांधकर छोड नहीं देना।

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ *संकल्प शक्ति हर कदम में कमाई का आधार है। याद की यात्रा किस आधार से करते हो? संकल्प शक्ति के आधार से बाबा के पास पहुँचते हो ना। अशरीरी बन जाते हो। तो मन की शक्ति विशेष है।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  पढ़ाई का सिमरन कर, सदा नशा रहे कि हमे पढ़ाने वाला स्वयं भगवान है"*

 

_ ➳  मीठे बाबा को पाकर मुझ आत्मा का जीवन कितना प्यारा और खुशनुमा हो गया है... *सदा भगवान को पुकारता मेरा मन... आज उसकी मीठी यादो में, बातो में, ज्ञान रत्नों की बहारो में खिल रहा है.*.. भाग्य की यह जादूगरी देख देख मै आत्मा रोमांचित हूँ... प्यारे बाबा को दिल से पुकारती भर हूँ... कि भगवान पलक झपकते सम्मुख हाजिर हो जाता है... कितना शानदार भाग्य है कि भगवान मेरी बाँहों में है... इसी मीठे चिंतन में खोई हुई मै आत्मा... अपने प्यारे बाबा से मिलने... मीठे बाबा के कमरे की ओर रुख करती हूँ...

 

   *प्यारे बाबा ने मुझ आत्मा को मेरे ज्ञान धन की अमीरी का नशा दिलाते हुए कहा :-* "मीठे प्यारे फूल बच्चे... *ईश्वर पिता ही शिक्षक बनकर, जीवन को सवांरने और देवता पद दिलाने आ गया है.*.. अपने इस मीठे भाग्य का, ईश्वरीय ज्ञान का, सदा सिमरन कर आनन्द में रहो... कितना ऊँचा भाग्य सज रहा है... भगवान बेठ निखार रहा है... सजा और संवार रहा है...

 

_ ➳  *मै आत्मा प्यारे बाबा के ज्ञान अमृत को पीती हुई कहती हूँ :-* "मीठे प्यारे बाबा... *आपकी प्यार भरी गोद में बैठकर मै आत्मा मा नॉलेजफुल बन रही हूँ..*. स्वयं को भी भूली हुई कभी मै आत्मा... आज बेहद की जानकारी से भरपूर हो गयी हूँ... यह सारा जादु आपने किया है मीठे बाबा... मुझे क्या से क्या बना दिया है..."

 

   *मीठे बाबा मुझ आत्मा को अपने प्यार के नशे में भिगोते हुए कहते है :-* "मीठे प्यारे लाडले बच्चे... सदा ज्ञान रत्नों की झनकार में खोये रहो... मीठे बाबा की अमूल्य शिक्षाओ का स्वरूप बनकर विश्व को प्रकाशित करो... *ईश्वर पिता पढ़ाकर भाग्य को खुशियो का पर्याय बनाने आ गया है... इन मीठी खुशियो से सदा छलकते रहो..*."

 

_ ➳  *मै आत्मा मीठे बाबा की ज्ञान मणियो को दिल में आत्मसात करते हुए कहती हूँ :-* "मीठे प्यारे बाबा मेरे... आपने जीवन में आकर जीवन को सोने सा दमकता हुआ बना दिया है... *सच्चे ज्ञान के घुंघुरू पहनकर मै आत्मा... पूरे विश्व में खुशियो की थाप दे रही हूँ..*. कि भगवान को पाकर मेने सारा जहान पा लिया है..."

 

   *प्यारे बाबा ने मुझ आत्मा को अपने ज्ञान खजानो से सम्पन्न बनाते हुए कहा :-* "मीठे सिकीलधे बच्चे...  *सदा ईश्वरीय ज्ञान की मौजो में डूबे रहो... जितना इन रत्नों को स्वयं में समाओगे, उतना ही सुखो में मुस्कराओगे.*.. ईश्वर पिता से पढ़कर त्रिकालदर्शी बन रहे हो यह कितने श्रेष्ठ भाग्य की निशानी है...

 

_ ➳  *मै आत्मा आनंद के सागर में खोकर प्यारे बाबा से कहती हूँ :-* "मीठे मीठे बाबा मेरे... *आपने सत्य ज्ञान से मुझ आत्मा को सदा का नूरानी बनाया है..*. अंधेरो से निकाल कर ज्ञान की उजली राहों पर चलाया है... मै आत्मा आपको पाने के अपने मीठे भाग्य पर बलिहार हूँ... आपने कितना सुंदर मेरा भाग्य सजाया है..." मीठे बाबा से अपने दिल की सारी बाते कह मै आत्मा साकार जगत में आ गयी...

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- एक की ही अव्यभिचारी याद में रहना है*"

 

_ ➳  अपनी सम्पूर्ण सतोप्रधान स्टेज को स्मृति में लाते ही मैं आत्मा स्वयं को अपने अनादि स्वरूप में परमधाम में देख रही हूँ। यहां मैं अपनी सम्पूर्ण सतोप्रधान अवस्था में अपने शिव पिता के सम्मुख हूँ। *सातों गुणों और सर्वशक्तियों से मैं आत्मा सम्पन्न हूँ। हर प्रकार के कर्म के बंधन से मुक्त हूँ*। अपनी इसी अशरीरी स्थिति में अपने स्वीट साइलेन्स होम परमधाम को छोड़, साकारी लोक में आ कर, शरीर धारण कर इस सृष्टि रूपी कर्म क्षेत्र पर कर्म करने के लिए मैं अवतरित होती हूँ।

 

_ ➳  एक - एक करके मुझे अपनी सारी अवस्थाओं की स्मृति आ रही है। मैं देख रही हूँ स्वयं को पहले - पहले नई सतोप्रधान दुनिया सतयुग में। यहां मैं आत्मा सम्पूर्ण सतोप्रधान हूँ। *मेरा निर्विकारी सम्पूर्ण देवताई स्वरूप बहुत ही आकर्षणमय है। धीरे - धीरे त्रेता युग मे मैं आत्मा सम्पूर्ण सतोप्रधान अवस्था से सतो में आ गई इसलिए मुझ आत्मा की आकर्षण शक्ति में थोड़ी सी गिरावट आ गई*। मुझ आत्मा की चमक थोड़ी फीकी पड़ गई। द्वापर युग में आ कर, विकारों की प्रवेशता ने मुझ आत्मा को रजो अवस्था मे पहुंचा दिया। यहां आ कर मुझ आत्मा की चमक बिल्कुल ही फीकी पड़ गई। कलयुग तक आते - आते मैं आत्मा तमो और कलयुग अंत तक आते - आते बिल्कुल ही तमोप्रधान हो गई।

 

_ ➳  सम्पूर्ण सतोप्रधान अवस्था मे सोने के समान चमकने वाली मैं आत्मा तमोप्रधान हो जाने से लोहे के समान काली हो गई। किन्तु अब संगमयुग पर मेरे शिव पिता परमात्मा ने आ कर ज्ञान और योग सिखलाकर मुझे तमोप्रधान से दोबारा सतोप्रधान बनने का सहज उपाय बता दिया। *अब मैं जान गई हूँ कि मेरे शिव पिता परमात्मा की अव्यभिचारी याद ही मुझे तमोप्रधान से सतोप्रधान बना सकती है। इसलिए आत्मा के ऊपर चड़ी विकारों की कट को उतारने और स्वयं को सतोप्रधान बनाने के लिए मैं अपने शिव पिता परमात्मा की अव्यभिचारी याद में अपने मन बुद्धि को एकाग्र कर, अशरीरी हो कर बैठ जाती हूँ* और अगले ही पल इस नश्वर देह का त्याग कर निराकारी ज्योति बिंदु आत्मा बन उड़ चलती हूँ अपने शिव पिता परमात्मा के पास।

 

_ ➳  अब मैं देख रही हूं स्वयं को परमधाम में अपने निराकार शिव पिता परमात्मा के बिल्कुल पास। यहां मैं अपने प्यारे, मीठे शिव बाबा से आ रही सातों गुणों की सतरंगी किरणों और सर्वशक्तियों को स्वयं में भरपूर कर रही हूँ। *साथ ही साथ योग अग्नि में अपने विकर्मों को भी दग्ध कर रही हूं। बाबा से आ रही सर्वशक्तियों की ज्वाला स्वरूप किरणें जैसे - जैसे मुझ आत्मा पर पड़ रही हैं वैसे - वैसे मुझ आत्मा पर चढ़ी विकारों की कट जल कर भस्म हो रही है और मेरा स्वरूप फिर से सच्चे सोने के समान चमकदार हो रहा है*। विकारों की खाद निकल रही है और मैं आत्मा तमोप्रधान से दोबारा अपनी सतोप्रधान अवस्था को प्राप्त कर रही हूँ।

 

_ ➳  स्वयं को योग अग्नि में तपाकर, रीयल गोल्ड समान चमकदार बन कर अब मै आत्मा वापिस साकारी लोक में लौट रही हूँ और अपने साकारी तन में आ कर अब मैं *ब्राह्मण स्वरुप में स्थित हो कर एक बाप की अव्यभिचारी याद में रह, स्वयं को सतोप्रधान बनाने का पुरुषार्थ कर रही हूँ*। पिछले अनेक जन्मों के आसुरी स्वभाव संस्कार जो आत्मा  को तमोप्रधान बना रहे थे वे सभी आसुरी स्वभाव संस्कार बाबा की अव्यभिचारी याद में रहने से परिवर्तन हो रहें हैं। क्योकि *बाबा की याद मेरे अंदर बल रही है जिससे पुराने स्वभाव संस्कारों को बदलना सहज हो रहा है*।

 

_ ➳  इस बात को अब मैं सदैव स्मृति में रखती हूँ कि मैं आत्मा जिस सम्पूर्ण सतोप्रधान अवस्था मे आई थी अब उसी सम्पूर्ण सतोप्रधान अवस्था मे मुझे वापिस अपने धाम लौटना है। *इसलिए अब केवल एक बाप की अव्यभिचारी याद में ही मुझे रहना है क्योंकि मेरे शिव पिता परमात्मा की अव्यभिचारी याद ही मुझे उसी सम्पूर्ण सतोप्रधान अवस्था तक ले जाएगी*। इसी स्मृति में निरन्तर रह कर अब मैं आत्मा किसी भी देहधारी के नाम रूप में ना फंस कर, केवल पतित पावन अपने परम पिता परमात्मा की अव्यभिचारी याद में रह स्वयं को सतोप्रधान बना रही हूं।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं बाप की मदद द्वारा उमंग - उत्साह और अथकपन का अनुभव करने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं कर्मयोगी आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा सदैव मेरे के आकर्षण से मुक्त हूँ  ।*

   *मैं आत्मा मेरे को तेरे में परिवर्तन करती हूँ  ।*

   *मैं ट्रस्टी आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

✺ अव्यक्त बापदादा :-

➳ _ ➳  समय प्रमाण बापदादा डायरेक्शन दे कि सेकण्ड में अब साथ चलो तो सेकण्ड मेंविस्तार को समा सकेंगे? शरीर की प्रवृत्ति, लौकिक प्रवृत्तिसेवा की प्रवृत्ति, अपने रहे हुए कमज़ोरी के संकल्प की और संस्कार प्रवृत्ति, सर्व प्रकार की प्रवृत्तियों से न्यारे और बाप के साथ चलने वाले प्यारे बन सकते होवा कोई प्रवृत्ति अपने तरफ आकर्षित करेगीसब तरफ से सर्व प्रवृत्तियों का किनारा छोड़ चुके हो वा कोई भी किनारा अल्पकाल का सहारा बन बाप के सहारे वा साथ से दूर कर देंगे? *संकल्प किया कि जाना हैडायरेक्शन मिला अब चलना है तो डबल लाइट के उड़न आसन पर स्थित हो उड़ जायेंगेऐसी तैयारी हैवा सोचेंगे कि अभी यह करना हैवह करना हैसमेटने की शक्ति अभी कार्य में ला सकते हो वा मेरी सेवामेरा सेन्टरमेरा जिज्ञासुमेरा लौकिक परिवार या लौकिक कार्य - यह विस्तार तो याद नहीं आयेगायह संकल्प तो नहीं आयेगा?*

✺   *"ड्रिल :- सेकंड में विस्तार को सार में समाना"*

➳ _ ➳  परम प्यारे शिवबाबा की सुनहरी यादों मे खोई हुई मैं मन बुद्धि को एकाग्र कर पहुँच जाती हूँ उस पावन तीर्थ स्थल पर... जहाँ आत्मा परमात्मा का सच्चा मिलन होता है... जहाँ स्वयं भगवान साकार में आकर अपने बच्चों से रुबरु मिलन मनाते हैं... उन्हें प्यार भरी दृष्टि देकर निहाल करते हैं... सम्मुख बैठ कर उनसे बातें करते हैं... *प्रभु मिलन की मीठी मीठी यादों में खोई हुई मैं स्वयं को देख रही हूँ डायमण्ड हॉल में... हज़ारों की संख्या में ब्राह्मण बच्चे अपने परम प्यारे पिता से मिलन मनाने आये हैं... उन सभी के मुख मण्डल से रूहानियत स्पष्ट झलक रही है...*

➳ _ ➳  सभी आत्माएं एकटक नज़र लगाये आतुर अवस्था में मिलन मनाने के लिये लालायित से हो रहे हैं... *मीठे बापदादा महावाक्य उच्चारने से पहले बहुत देर तक सभी को स्नेह भरी दृष्टि से निहाल करने लगते हैं...* आत्मिक स्थिति में स्थित होकर... बाबा की शक्तिशाली दृष्टि से स्वयं को भरपूर करती हुई मैं अतीन्द्रिय सुख की अनुभूति कर रही हूँ...

➳ _ ➳  सभी ब्राह्मण बच्चों को सम्बोधित करते बहुत ही मीठे स्वर में बापदादा महावाक्य उच्चारण करने लगते हैं... *अब समय बहुत कम रह गया है, अचानक कुछ भी हो सकता है... अब किसी भी बात के विस्तार में नही जाओ... अपितु विस्तार को सार में समेटने का अभ्यास करो... फुलस्टॉप लगाने का अभ्यास करो... एक सेकंड में परिवर्तन कर फुलस्टॉप लगाना... इसकी कमी है, अब इसका अभ्यास कर पक्का करो...*

➳ _ ➳  वहाँ बैठी सभी आत्माएं बाबा द्वारा उच्चारित महावाक्यों को बहुत ध्यान से सुन रहे हैं... फिर बाबा कहने लगते हैं... मेरे सिकीलधे प्यारे बच्चों... *सर्व प्रकार की प्रवृतियों से, चाहे शरीर की प्रवृति हो... लौकिक प्रवृति हो... सेवा की प्रवृति हो... सब तरफ से न्यारे और प्यारे बन जाओ...* कोई भी आकर्षण तुम्हें आकर्षित न कर सके... अब तुम्हें बाप समान न्यारे और सबके प्यारे बनना ही है...

➳ _ ➳  पूरे डायमण्ड हॉल में चारों ओर एक अलौकिक दिव्यता छा गई है... सभी की नज़र बाबा पर है... बाबा की शक्तिशाली किरणें चारों ओर फैल कर हम सभी बच्चों पर पड़ रही है.. *प्यार के सागर शिवबाबा कहने लगे... मीठे बच्चों... अब मैं और मेरा खत्म करो... मेरी सेवा... मेरा सेंटर... मेरा जिज्ञासु... नहीं, अब तो बस "मैं बाबा की बाबा मेरा" यह याद रहे...* जैसे ही डायरेक्शन मिले... अब चलना है, उसी समय फ़रिश्ता बन उड़ती कला के आसन पर स्थित हो जाओ... *सभी बाबा के लव में लीन होकर असीम आनंद का अनुभव कर रहे हैं...*

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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