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 02 / 09 / 21  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *किसी को दुःख तो नहीं दिया ?*

 

➢➢ *ज्ञान को धारण कर दूसरों को धारण करवाया ?*

 

➢➢ *लाइट हाउस की स्थिति द्वारा पाप कर्मों को समाप्त किया ?*

 

➢➢ *हर दृश्य को साक्षी होकर देखा ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *जैसे वृक्ष का रचयिता बीज, जब वृक्ष की अन्तिम स्टेज आती है तो वह फिर से ऊपर आ जाता है। ऐसे बेहद के मास्टर रचयिता सदा अपने को इस कल्प वृक्ष के ऊपर खड़ा हुआ अनुभव करो, बाप के साथ-साथ वृक्ष के ऊपर मास्टर बीजरूप बन शक्तियों की, गुणों की, शुभ भावना-शुभ कामना की, स्नेह की, सहयोग की किरणें फैलाओ।* जैसे सूर्य ऊंचा रहता है तो सारे विश्व में स्वत: ही किरणें फैलती हैं। ऐसे मास्टर रचयिता वा मास्टर बीजरूप बन सारे वृक्ष को किरणें वा पानी दे सकते हो।

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं सफलता का सितारा हूँ"*

 

✧  सदा अपने को चमकता हुआ सितारा अनुभव करते हो? जैसे आकाश के सितारे सभी को रोशनी देते हैं ऐसे आप दिव्य सितारे विश्व को रोशनी देने वाले हो ना! सितारे कितने प्यारे लगते हैं! तो आप दिव्य सितारे भी कितने प्यारे हो! सितारों में भी भिन्न-भिन्न प्रकार के सितारे गाये जाते हैं। *एक हैं साधारण सितारे और दूसरे हैं लक्की सितारे और तीसरे हैं सफलता के सितारे। तो आप कौन-से सितारे हो? सभी सफलता के सितारे हो! सफलता मिलती है कि मेहनत करनी पड़ती है? कम्बाइन्ड कम रहते हो इसलिए सफलता भी कम मिलती है।*

 

✧  क्योंकि जब सर्वशक्तिमान् कम्बाइण्ड है तो शक्तियां कहाँ जायेंगी? साथ ही होगी ना। *और जहाँ सर्व शक्तियां हैं वहाँ सफलता न हो, यह असम्भव है। तो सदा बाप से कम्बाइन्ड रहने में कमी है इस कारण सफलता कम होती है या मेहनत करने के बाद सफलता होती है। क्योंकि जब बाप मिला तो बाप मिलना अर्थात् सफलता जन्म सिद्ध अधिकार है।* नाम ही अधिकार है तो अधिकार कम मिले, यह हो नहीं सकता। तो सफलता के सितारे, विश्व को ज्ञान की रोशनी देने वाले हैं। मास्टर सर्वशक्तिमान् के आगे सफलता तो आगे-पीछे घूमती है। तो कम्बाइन्ड रहते हो या कभी कम्बाइन्ड रहते हो, कभी माया अलग कर देती है। जब बाप कम्बाइन्ड बन गये तो ऐसे कम्बाइन्ड रूप को छोड़ना हो सकता है क्या? कोई अच्छा साथी लौकिक में भी मिल जाता है तो उसको छोड़ सकते हैं? ये तो अविनाशी साथी है। कभी धोखा देने वाला साथी नहीं है। सदा ही साथ निभाने वाला साथी है। तो ये नशा, खुशी है ना, जितना नशा होगा कि स्वयं बाप मेरा साथी है उतनी खुशी रहेगी। तो खुशी रहती है? (बहुत रहती है) बढ़ती रहती है या कम और ज्यादा होती रहती है? कोई बात आती है तो कम होती है? थोड़ा तो कम होती है! फिर सोचते हैं क्या करें, वैसे तो ठीक है, लेकिन बात ही ऐसी हो गई ना।

 

✧  कितनी भी बड़ी बात हो लेकिन आप तो मास्टर रचता हो, बात तो रचना हैं। तो रचता बड़ा होता है या रचना बड़ी होती है? कभी कोई बात में घबराने वाले तो नहीं हो? वहाँ जाकर कोई बात आ जाये तो घबरायेंगे नहीं? देखना, वहाँ जायेंगे तो माया आयेगी। फिर ऐसे तो नहीं कहेंगे कि मैंने तो समझा नहीं था, ऐसे भी हो सकता है! *नये-नये रूप में आयेगी, पुराने रूप में नहीं आयेगी। फिर भी बहादुर हो। निश्चय है कि अनेक बार बने हैं, अब भी हैं और आगे भी बनते रहेंगे। निश्चय की विजय है ही। मास्टर सर्वशक्तिमान् की स्मृति में रहने वाले कभी घबरा नहीं सकते।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  हर कर्म करते कर्मयोगी आत्मा' अनुभव करते हो? कर्म और योग सदा साथ-साथ रहता है? *कर्मयोगी हर कर्म में स्वतः ही सफलता को प्राप्त करता है।* कर्मयोगी आत्मा कर्म का प्रत्यक्ष फल उसी समय भी अनुभव करता और भविष्य भी जमा करता, तो डबल फायदा हो गया ना।

 

✧  ऐसे डबल फल लेने वाली आत्मायें हो। *कर्मयोगी आत्मा कभी कर्म के बंधन में नहीं फंसेगी।* सदा न्यारे और सदा बाप के प्यारे। *कर्म के बंधन से मुक्त - इसको ही कर्मातीत कहते हैं।* कर्मातीत का अर्थ यह नहीं है कि कर्म से अतीत हो जाओ। *कर्म से न्यारे नहीं, कर्म के बंधन में फँसने से न्यारे,* इसको कहते हैं - कर्मातीत।

 

✧  *कर्मयोगी स्थिति कर्मातीत स्थिति का अनुभव कराती है।* तो किसी बंधन में बंधने वाले तो नहीं हो ना? औरों को भी बंधन से छुडाने वाले। *जैसे बाप ने छुडाया, ऐसे बच्चों का भी काम है छुडाना,* स्वयं कैसे बंधन में बंधेगे?

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ सेवा का विस्तार भल कितना भी बढ़ाओ लेकिन विस्तार में जाते सार की स्थिति का अभ्यास कम न हो, *विस्तार में सार भूल न जाये। खाओ-पियो, सेवा करो लेकिन न्यारेपन को नही भूलो। वाणी द्वारा भी कहां तक सेवा करेंगे, कितने की करेंगे! अब तो रूहानी वायब्रेशन, अशरीरीपन की स्थिति के वायब्रेशन, न्यारे और प्यारेपन के शक्तिशाली वायब्रेशन वायुमण्डल में फैलाओ। सेवा की तीव्रगति का साधन भी यही है।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- अपनी तकदीर भविष्य नई दुनिया के लिए बनाना"*

 

_ ➳  *मैं आत्मा अपना ऊँचा भाग्य बनाने, सतयुग में देवी-देवता पद प्राप्त करने के लिए पहुँच जाती हूँ मधुबन गॉडली यूनिवर्सिटी... जहाँ परमप्रिय परमपिता परमात्मा परमधाम से आकर सुप्रीम शिक्षक बन पढ़ाते हैं... राजयोग सिखाकर राजाओं का राजा बनाते हैं...* कोटों में से चुनकर स्वयं भगवान ने मुझे इस यूनिवर्सिटी में एडमिशन दिया... मैं आत्मा हिस्ट्री हाल में गॉडली स्टूडेंट बन बैठ जाती हूँ... सुप्रीम शिक्षक स्वयं बैठकर मुझे नई दुनिया के लिए नया ज्ञान दे रहे हैं...

 

  *बेहद के प्यारे बाबा बेहद का ज्ञान देकर मेरी तकदीर बनाते हुए कहते हैं:-* मेरे मीठे बच्चे... *इस पुरानी दुनिया में अपनी बिगड़ी सी तकदीर को जीने के गहरे अनुभवी हो... अब अपनी तकदीर नई सुंदर सुखो से भरी दुनिया के लिए बना रहे हो... यह राजयोग है ही सुन्दरतम दुनिया के लिए...* राजयोग की परिणीति ही अथाह सुख और आनन्द है...

 

_ ➳  *स्वयं भगवान् को मेरा भाग्य खुशियों से महकाते हुए देख मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा कितनी भाग्यशाली हूँ कि स्वयं भगवान मुझे राजयोग सिखा कर निखार रहा है... मेरा जीवन उज्ज्वल बना फूलो सा महका रहा है... *राजयोग सिखाकर अपनी मखमली गोद में बिठा रहा है... कैसे शुक्रिया करूँ प्यारे बाबा का...*

 

  *संगमयुग में राजयोग के ज्ञान रत्नों से नई दुनिया में सोने-हीरों के महलों का मालिक बनाते हुए मीठे बाबा कहते हैं:-* मीठे प्यारे फूल बच्चे... *इस धरा पर जब फूल बन खिले थे तो सुगन्ध से परिपूर्ण थे... पर देह के भान ने उस खुशबु को रहने न दिया... अब विश्व पिता फिर से वही भाग्य जगाने आया है...* बच्चों की तकदीर बदलने राजयोग सिखाने आया है... सुखो की दुनिया में महकते फूल खिलाने आया है...

 

_ ➳  *मैं आत्मा असत्य अज्ञानता से निकल अपने सत्य स्वरुप में चमकते हुए कहती हूँ:-* मेरे प्राणप्रिय बाबा... *मै आत्मा प्यारे बाबा से मिलकर अपनी खोयी हुई वही चमक... वही सुनहरी रंगत... वही सतयुगी अदा को पा रही हूँ...* सुनहरा भाग्य बाबा से पा रही हूँ... और नई दुनिया को अपने नाम लिखवा रही हूँ...

 

  *मेरे बाबा अपने जादुई कलम से मेरे भाग्य की लकीर को रंगीन बनाते हुए कहते हैं:-* प्यारे सिकीलधे मीठे बच्चे... *इस देह की दुनिया में देह समझकर जीने लगे और खिलते हुए भाग्य को कुम्हला से बैठे...मिटटी के नातो में ऐसे खोये की भाग्य को दुखो की लकीर बना बैठे... अब प्यारा बाबा फिर से उन्ही सुखो में बसाने आया है...* राजयोग सिखाकर सोया सा भाग्य फिर जगाने आया है...

 

_ ➳  *मैं आत्मा राजयोग के सभी राजों को जान विश्व की राजाई अपने नाम लिखवाते हुए कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... *मै आत्मा आपकी यादो में अपनी तकदीर को फूल सा खिला रही हूँ... नई दुनिया में अथाह सुखो से भरा जीवन अपने नाम लिखवा रही हूँ...* फिर से महासौभाग्यशाली बन रही हूँ...

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- इस पुरानी दुनिया से ममत्व मिटा देना है*"

 

_ ➳  *देहभान में आने से विकारों का जो कखपन मुझ आत्मा में भर गया है उस कखपन को करनीघोर मेरे परमपिता परमात्मा स्वयं मुझसे मांग कर बदले में मुझे जन्म जन्मांतर के लिए प्योर और निरोगी बनाने का मेरे साथ सौदा कर रहें हैं तो ऐसे भगवान बाप पर मुझे कितना ना बलिहार जाना चाहिए* जो मेरा कखपन लेकर मुझे विश्व की बादशाही दे रहें हैं। कितने रहमदिल दया के सागर हैं मेरे प्रभु जो सभी आत्माओं के ऊपर अपनी दयादृष्टि रखते हैं। सबको दुखों से लिबरेट कर सुख के संसार में ले जाते हैं। 

 

_ ➳  विकारो ने आज जिस भारत को कौड़ी तुल्य बना दिया है उसे फिर से स्वर्ग बनाने का कर्तव्य करने वाले *अपने प्यारे बाबा का मैं दिल की गहराइयों से शुक्रिया अदा करते हुए अब अपने आप से वायदा करती हूँ कि जिन विकारो ने मुझे कौड़ी तुल्य बनाया है वह कखपन अपने पिता को सौंप, इस विकारी देह और देह से जुड़े विकारी सम्बन्धो से ममत्व  मिटा कर केवल उन पर ही बलिहार जाना है*। उनकी शिक्षाओं को अपने जीवन मे धारण कर उनके समान बनना ही अब मेरे इस जीवन का लक्ष्य है।

 

_ ➳  इस लक्ष्य को पाने का दृढ़ संकल्प लेकर अपने प्यारे प्रभु की याद में बैठ स्वयं को परमात्म शक्तियों से भरपूर करने और अपने ऊपर चढ़ी विकारो की कट को जलाकर भस्म करने के लिए अपने बीज रूप पिता के पास चलने की आंतरिक यात्रा को अब मैं शुरू करती हूँ। *अपने मन और बुद्धि को देह और देह से जुड़ी हर बात से हटाकर, हर संकल्प विकल्प से किनारा कर मन को एक ही शक्तिशाली संकल्प में मैं स्थित करती हूँ कि मैं परमपवित्र आत्मा हूँ, नष्टोमोहा हूँ*। इस संकल्प में स्थित होते ही मैं महसूस करती हूँ जैसे मैं देह से स्वत: ही डिटैच हो रही हूँ और देह को भूलती जा रही हूँ। देह में होते भी स्वयं को मैं देह से न्यारी एक चमकती हुई ज्योति के रूप में देख रही हूँ। 

 

_ ➳  एक चैतन्य शक्ति जो इस देह में विराजमान होकर इस देह को चला रही है किन्तु देह से पूरी तरह अलग है, अपने इस स्वरूप में स्थित होकर अब मैं देख रही हूँ सितारे के समान चमक रहें अपने इस अद्भुत निराले स्वरूप को जिसमे पवित्रता की अनन्त शक्ति है। *इस सत्य स्वरूप में स्थित होते ही मैं महसूस कर रही हूँ जैसे पवित्रता के शक्तिशाली वायब्रेशन मुझ आत्मा से निकल रहें हैं और मुझे विदेही बना कर पवित्रता के सागर मेरे प्यारे पिता की ओर ले जाने का मुझमे बल भर रहें हैं*। बाबा की पवित्रता की शक्ति एक मेग्नेटिक पॉवर की तरह मुझे अपनी ओर खींच रही है। बाबा मुझे कशिश कर रहें हैं। धीरे - धीरे देह से बाहर आकर अब मैं ऊपर की ओर उड़ रही हूँ।

 

_ ➳  मन को गहन सुकून दे रही है ये यात्रा। बहुत ही हल्केपन का मैं आत्मा अनुभव कर रही हूँ। *देह और देह के सम्बन्धो की जंजीरों में जकड़ी मैं आत्मा आज उन जंजीरो को तोड़ स्वयं को पूरी तरह आजाद महसूस कर रही हूँ और उन्मुक्त होकर इस आजादी का भरपूर आनन्द लेते हुए सारे विश्व की सैर करते हुए ऊपर आकाश की ओर जा रही हूँ*। प्रकृति के हर दृश्य को देखते हुए आकाश को पार कर मैं उससे भी ऊपर जा रही हूँ। सफेद प्रकाश की खूबसूरत फरिश्तो की दुनिया से होकर अब मैं पहुँच गई हूँ अपने मूलवतन परमधाम घर मे अपने प्यारे पिता के पास। यहाँ पहुँच कर मैं आत्मा शन्ति के गहन अनुभवों का आनन्द ले रही हूँ।

 

_ ➳  कुछ क्षण शान्ति की गहन अनुभूति करने के बाद अब मैं अपने ऊपर चढ़ी विकारों की मैल को धोकर स्वयं को पावन बनाने के लिए पवित्रता के सागर अपने पिता के पास पहुँच गई हूँ जो महाज्योति के रूप में मेरे सामने उपस्थित हैं। *उनके बिल्कुल समीप जाकर मैं आत्मा बैठ गई हूँ। उनसे निकल रही पवित्रता की किरणों की मीठी - मीठी फुहारें मुझ पर बरस रही है और मेरे ऊपर चढ़ी विकारों की मैल को धोकर मुझे शुद्ध और पावन बना रही हैं*। उन किरणों का स्वरूप - धीरे - धीरे बदलकर योग अग्नि में परिवर्तित हो रहा है ऐसे लग रहा है जैसे मेरे चारों तरफ कोई ज्वाला दधक रही है जिसकी तपश मेरे विकर्मों को दग्ध कर रही है। *जैसे - जैसे मेरे विकर्म विनाश हो रहें हैं मैं सच्चे सोने के समान चमकदार बन रही हूँ*।

 

_ ➳  शुद्व, पवित्र, शक्तिशाली बन कर मैं आत्मा अब वापिस फिर से सृष्टि रंगमंच पर अपना पार्ट बजाने के लिए लौट रही हूँ। अपने शरीर रूपी रथ पर विराजमान होकर, बाबा को विकारों रूपी कखपन दे, विकारों के ग्रहण से मैं धीरे - धीरे मुक्त होती जा रही हूँ। *एक बाबा को ही अपना संसार बना कर, देह और देह के सम्बन्धो, देह की दुनिया से मैं धीरे - धीरे ममत्व मिटाती जा रही हूँ। अपने जीवन को सुख शांति से सम्पन्न बनाने वाले अपने सुखदाता, शांतिदाता बाबा के साथ सर्व सम्बन्धों का सुख लेते हुए, उन पर बलिहार जाकर, मैं हर समय उनकी सुखदाई यादों में समा कर अपने लक्ष्य को पाने का पुरुषार्थ निर्विघ्न हो कर बिल्कुल सहज रीति कर रही हूँ*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं लाइट हाउस की स्थिति द्वारा पाप कर्मों को समाप्त करने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं पुण्य आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा हर दृश्य को सदा साक्षी होकर देखती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा सदैव हर्षित रहती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा साक्षी दृष्टा और हर्षित मुख हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  १. अभी भी समय और संकल्प - ना अच्छे मेंना बुरे में होते हैं। *तो बुरे में नहीं हुआ ये तो बच गये लेकिन अच्छे में जमा हुआ? समझा?* समय कोसंकल्प को बचाओजितना अभी बचत करेंगेजमा करेंगे तो सारा कल्प उसी प्रमाण राज्य भी करेंगे और पूज्य भी बनेंगे।

 

 _ ➳  २. लेकिन एक अटेन्शन रखना - अगर मानो आपका आज के दिन जमा का खाता बहुत कम हुआ तो कम देख करके दिलशिकस्त नहीं होना। और ही समझो कि अभी भी हमको चांस है जमा करने का। अपने को उमंग- उत्साह में लाओ। *अपने आपसे रेस करोदूसरे से नहीं। अपने आपसे रेस करो कि आज अगर ८ घण्टे जमा हुए तो कल १० घण्टे हो। दिलशिकस्त नहीं होना*। क्योंकि अभी फिर भी जमा करने का समय है। अभी टू लेट का बोर्ड नहीं लगा है। फाइनल रिजल्ट का टाइम अभी एनाउन्स नहीं हुआ है। जैसे लौकिक में पेपर की डेट फाइनल हो जाती है तो अच्छे पुरुषार्थी क्या करते हैं? दिलशिकस्त होते हैं या पुरुषार्थ में आगे बढ़ते हैंतो आप भी दिलशिकस्त नहीं बनना। और ही उमंग-उत्साह में आकरके दृढ़ संकल्प करो कि मुझे अपने जमा का खाता बढ़ाना ही है। समझा?दिलशिकस्त तो नहीं होंगेफिर बाप को मेहनत करनी पड़े! फिर बड़े-बड़े पत्र लिखना शुरु कर देंगे - बाबा क्या हो गया... ऐसा हो गया... ! बाबा बचाओबचाओ - ऐसे नहीं कहना। *देखो आपके जड़ चित्रों से जाकर मांगनी करते हैं कि हमको बचाओ। तो आप बचाने वाले होबचाओ-बचाओ कहने वाले नहीं*।

 

 _ ➳  ३.  ये अपने आप चेक करो और चेक करके चेंज करो। *दिलशिकस्त नहीं बनोचेंज करो। जब बाप साथ है तो बाप को यूज करो ना*! यूज कम करते होसिर्फ कहते हो बाबा साथ हैबाबा साथ है। यूज करो। *जब सर्वशक्तिमान साथ है तो सफलता तो आपके चरणों में दौड़नी है*। 

 

✺   *ड्रिल :-  "समय और संकल्प जमा करने में बापदादा को यूज करना"*

 

 _ ➳  अपने लाइट के सूक्ष्म आकारी स्वरूप में मैं नन्हा सा फ़रिशता अपनी शिव माँ की किरणों रूपी गोद मे बैठा उनकी ममतामयी गोद का अनुपम सुख प्राप्त कर रहा हूँ। मेरी शिव माँ अपनी सर्वशक्तियों रूपी किरणों की बाहों के झूले में मुझे झुला रही है। उनकी किरणों रूपी बाहों का कोमल स्पर्श मेरे मन को आनन्दित कर रहा है। *अपनी बाहों के झूले में झुलाते - झुलाते मेरी शिव माँ अब मुझे अपनी गोद मे उठाये कहीं दूर ले कर चल पड़ती है*। एक बहुत खूबसूरत प्रकृतिक सौंदर्य से भरपूर, दुनिया की भीड़ से अलग बहुत खुले स्थान पर मेरी शिव माँ मुझे ले आती है और अपनी किरणों रूपी बाहों की गोद से मुझे नीचे उतार कर मेरे साथ खेलने लगती है।

 

 _ ➳  कभी मैं नन्हा फ़रिशता उड़ कर अपनी शिव माँ को पकड़ता हूँ और कभी मेरी शिव मां मुझे पकड़ती है। *अपनी शिव माँ के साथ अनेक प्रकार के खेल खेलने के बाद मैं उनकी गोद मे सिर रख कर सो जाता हूँ* और जब नींद से जागता हूँ तो स्वयं को परियों की एक बहुत सुंदर दुनिया मे देखता हूँ। जहां अथाह खजानों के ढेर लगे हुए हैं।

 

 _ ➳  तभी मेरी शिव माँ अव्यक्त ब्रह्मा माँ के आकारी रथ में विराजमान हो कर मेरे पास आती है और मेरे हाथ मे सर्व खजानों की चाबी रख देती है और मुझ से कहती है मेरे बच्चे इन सर्व खजानों के आप मालिक हो। जितना चाहे इन खजानों को यूज़ करो। जितना यूज़ करेंगे उतने यह खजाने बढ़ते जायेंगे। *अपनी शिव माँ से सर्व खजानों की चाबी ले कर मैं फ़रिशता सर्व खजानों को बढ़ाने का जो मुख्य आधार है "समय और संकल्प" उसे जमा करने के तीव्र पुरुषार्थ में लग जाता हूँ*।

 

 _ ➳  अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित हो कर, *बापदादा को यूज़ करते हुए अब मैं शुद्ध संकल्पो की रूहानी लिफ्ट पर सवार हो कर कभी निराकारी स्थिति में, कभी आकारी स्थिति में और कभी साकारी स्थिति में स्थित हो कर स्वयं को शक्तिशाली बना रही हूँ*। समय के वरदानों को स्वयं प्रति और सर्व प्रति कार्य मे लगा कर मैं हर सेकण्ड को सफल कर रही हूं।

 

 _ ➳  मनबुध्दि को शुद्ध और श्रेष्ठ संकल्पो में बिजी रख अपनी स्वस्थिति को शक्तिशाली बना कर मैं मायाजीत बनती जा रही हूं। *सर्वशक्तिवान बाप की छत्रछाया के नीचे स्वयं को सदा अनुभव करने से, बापदादा की सर्वशक्तियों की अधिकारी बन मैं उचित समय पर उचित शक्ति का प्रयोग कर हर प्रकार की मेहनत से स्वयं को मुक्त अनुभव कर रही हूं*। कोई भी परिस्थिति अब मुझे दिलशिकस्त नही बना सकती।

 

 _ ➳  कदम कदम पर बापदादा को अपने साथ अनुभव करने और बाबा की शिक्षाओं पर बार - बार मनन करने से मेरी बुद्धि समर्थ बनती जा रही है। *ज्ञान रत्नों को धारण कर अपनी बुद्धि को समर्थ बना कर, ज्ञान रत्नों की व्यापारी बन अब मैं अपने सम्बन्ध सम्पर्क में आने वाली सर्व आत्माओं को ज्ञान रत्न दे कर सर्व खजानों के जमा का आधार "समय" और "संकल्प" के श्रेष्ठ खजाने को सफल करते हुए सदा और सहज सफ़लतामूर्त बनती जा रही हूं*।

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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