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 02 / 10 / 21  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *श्रेष्ठ कर्म किये ?*

 

➢➢ *किसी भी देहधारी को याद तो नहीं किया ?*

 

➢➢ *निमितपन की स्मृति द्वारा अपने हर संकल्प पर अटेंशन रखा ?*

 

➢➢ *अपने गुण व विशेषताओं का अभिमान तो नहीं रहा ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *कर्मातीत बनने के लिए अशरीरी बनने का अभ्यास बढ़ाओ।* शरीर का बंधन, कर्म का बंधन, व्यक्तियों का बंधन, वैभवों का बंधन, स्वभाव-संस्कारों का बंधन.... कोई भी बंधन अपने तरफ आकर्षित न करे। *यह बंधन ही आत्मा को टाइट कर देता है। इसके लिए सदा निर्लिप्त अर्थात् न्यारे और अति प्यारे बनने का अभ्यास करो |*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं हर कल्प की अधिकारी आत्मा हूँ"*

 

✧  हम हर कल्प के अधिकारी आत्मायें हैं, सिर्फ अब के नहीं, अनेक बार के अधिकारी हैं - यह खुशी रहती है? *आधाकल्प बाप के आगे भिखारी बन मांगते रहे लेकिन बाप ने अब अपना बना लिया, बच्चे बन गये। बच्चा अर्थात् अधिकारी। अधिकारी समझने से बाप को जो भी वर्सा है, वह स्वत: याद रहता है।*

 

✧  कितना बड़ा खजाना है! इतना खजाना है जो खाते खुटता नहीं है और जितना ओरों को बांटो उतना बढ़ता जाता है! ऐसा अनुभव है? परमात्म-वर्से के अधिकारी हैं इससे बड़ा नशा और कोई हो सकता है? *तो यह अविनाशी गीत सदा गाते रहो और खुशी में नाचते रहो कि हम परमात्मा के बच्चे परमात्म-वर्से के अधिकारी हैं। यह गीत गाते रहो तो माया सामने आ नहीं सकती, मायाजीत बन जायेंगे। यही विशेष वरदान याद रखना कि परमात्म-वर्से के अधिकारी आत्मायें हैं।* इसी अधिकार से भविष्य में विश्व के राज्य का अधिकार स्वत: मिलता है।

 

✧  शक्तियाँ सदा खुश रहने वाली हो ना? कभी कोई दु:ख की लहर तो नहीं आती? *दु:ख की दुनिया छोड़ दी, सुख के संसार में पहुँच गये। दु:ख के संसार में सिर्फ सेवा के लिए रहते, बाकी सुख के संसार में। बाप के अधिकार से सब सहज हो जाता है।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  बाप की प्रापर्टी है 'सर्वशक्तियाँ' इसलिए बाप की महिमा ही है सर्वशक्तिवान आलमाइटी अथार्टी'। सर्व शक्तियों का स्टॉक जमा हैं? *या इतना ही है - कमाया और खाया, बस!* बापदादा ने सुनाया है कि आगे चलकर आप मास्टर सर्वशक्तिवान के पास सब भिखारी बनकर आयेंगे।

 

✧  पैसे या अनाज के भिखारी नहीं लेकिन *शक्तियों' के भिखारी आयेंगे।* तो जब स्टॉक होगा तब तो देंगे ना! दान वही दे सकता जिसके पास अपने से ज्यादा है। अगर अपने जितना ही होगा तो दान क्या करेंगे? तो इतना जमा करो। संगम पर और काम ही क्या है?

 

✧  जमा करने का ही काम मिला है। सारे कल्प में और कोई युग नहीं है जिसमें जमा कर सको। फिर तो खर्च करना पडेगा, जमा नहीं कर सकेंगे। तो *जमा के समय अगर जमा नहीं किया तो अंत में क्या कहना पडेगा* - 'अब नहीं तो कब नहीं" *फिर टू लेट का बोर्ड लग जायेगा।* अभी तो लेट का बोर्ड है, टू लेट का नहीं। (पार्टियों के साथ)

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ *वह राज़े तो कभी तख्त पर बैठते, कभी नहीं बैठते लेकिन साक्षीपन का तख्त ऐसा है जिसमें हर कार्य करते भी तख्तनशीन, उतरना नहीं पड़ता है।* सोते भी तख्तनशीन, उठते-चलते, सम्बन्ध-सम्पर्क में आते तख्तनशीन। तख्त पर बैठना आता है कि बैठना नहीं आता है, खिसक जाते हो? *साक्षीपन के तख्तनशीन आत्म कभी भी कोई समस्या में परेशान नहीं हो सकती। समस्या तख्त के नीचे रह जायेगी और आप ऊपर तख्तनशीन होंगे। समस्या आपके लिए सिर नहीं उठा सकेगी, नीचे दबी रहेगी। आपको परेशान नहीं करेगी और कोई को भी दबा दो तो अन्दर ही अन्दर खत्म हो जायेगा।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- मृत्युलोक वालों को याद नहीं करना"*

 

_ ➳  *मैं आत्मा रूपी चिड़िया इस संसार रूपी चिड़ियाघर में कैद थी... इसी चिड़ियाघर को अपना सबकुछ समझ बैठी थी...* चिड़ियाघर में बैठ आसमान को निहारती मुझ चिड़िया को आसमान से उतरता एक ज्योतिपुंज दिखाई दिया... उस प्रकाश की ज्योति से मेरे जीवन की ज्योति जग गई... मेरा भाग्य ही बदल गया... *उसने आकर ज्ञान, योग के पंखों से मुझे सजाकर खुले आसमान में उड़ना सिखा दिया... अब मैं आत्मा रूपी चिड़िया संसार रुपी चिड़ियाघर से आजाद होकर ऊपर उड़ते हुए अपने बाबा के पास पहुंच जाती हूँ...*

 

  *नई दुनिया के ख्वाबों को सजाकर पुरानी दुनिया की बातों को भूलने की समझानी देते हुए प्यारे बाबा कहते हैं:-* "मेरे मीठे बच्चे... अब यह दुःख भरा सफर पूरा हुआ अब दुःख की बाते भूल जाओ... *अब खूबसूरत दुनिया में चलने के दिन आ गए है... बस पावन हो घर चलना और फिर सुखो में उतरना है... इन दुखो से अब कोई नाता नही... खुशियो भरा जहान सामने खड़ा है..."*

 

_ ➳  *इस पुरानी विनाशी दुनिया को भूल नष्टोमोहा बन एक मीठे बाबा की यादों में डूबकर मैं आत्मा कहती हूँ:-* "हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा... आपकी मीठी यादो में बैठकर सारे कष्टो को ही भूल रही हूँ... *मीठे याद के झरने में सारी कड़वी यादो को बहा रही हूँ.... और नयी दुनिया को यादो में भर रही हूँ..."*

 

  *मेरी तकदीर की तस्वीर को सतयुगी सुखों के बहारों में सजाते हुए मेरे प्यारे मनमीत बाबा कहते हैं:-* "मीठे प्यारे फूल बच्चे.... कितने खूबसूरत खिले फूलो से घर से निकले थे... चलते चलते दुखो के धाम में फस गए... मीठा बाबा अपने फूलो की दशा देख धरा पर ही आ गया है... *अब ये दर्द भरी दास्ताँ को सदा का भूलो... और उन सच्चे सुखो को याद करो...*

 

_ ➳  *प्रभु प्यार की किरणों में अपने सारे गमों को भूलकर प्रभु का शुक्रिया करते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* "मेरे प्राणप्रिय बाबा... मुझ आत्मा की वेदनाएं और दर्द भरा जीवन ही मेरी हकीकत हो गए थे... आपने आकर मुझे मेरे सत्य का अहसास दिया है... *देह की मिटटी से मै आत्मा अब निकल गई हूँ... सब कुछ भुला कर सुन्दरतम यादो सुखो में खोती जा रही हूँ...*

 

  *बड़े प्यार से अपनी पलकों में बिठाकर मेरे जीवन में खुशहाली बिखेरते हुए मेरे बाबा कहते हैं:-* "प्यारे सिकीलधे बच्चे... सारे भोगे गए कष्टो को काले दुख भरे सायो को स्वप्न की तरहा विस्मृत कर दो... *खुशियो और सुखो से भरी दुनिया पर आप बच्चों का अधिकार है... अब यहाँ और रहना नही... मीठा बाबा दुखो से निकाल हाथ पकड़ कर सुखो के महलो में बिठाने आ गया है...*

 

_ ➳  *अपने जीवन के पलों को प्यारे बाबा की यादों के बाहों में सफल करते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* "हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा गमो से निकल गयी हूँ.... आपकी सुखद यादो में सुखी हो गयी हूँ... *पुरानी बाते नाते और दुखो के भम्र से मुक्त हो गयी हूँ... और नई खूबसूरत दुनिया के ख्वाबो में डूब गई हूँ...*

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- कोई भी देहधारी को याद नही करना है*"

 

_ ➳  इस नश्वर देह और इस देह से जुड़ी हर वस्तु के चिंतन से मैं जैसे ही अपने मन बुद्धि को हटा कर अपने वस्तविक सत्य स्वरूप के बारे में विचार करती हूँ तो मन बुद्धि स्वत: ही मेरे उस सत्य स्वरूप पर एकाग्र होने लगते है और मैं मन बुद्धि के दिव्य नेत्रों से अपने उस अति सुंदर स्वरूप को देख कर आनन्द विभोर हो उठती है। *आहा! कितना सुंदर, चमकता हुआ, जगमग करता हुआ, दिव्य ज्योतिर्मय स्वरूप है मेरा*। अपने इस अति सुन्दर सलौने स्वरूप को मैं ज्ञान के दिव्य चक्षु से देख रही हूँ और इसमें समाये अपने सातों गुणों और अष्ट शक्तियों का गहराई तक अनुभव कर रही हूँ।

 

_ ➳  मैं देख रही हूँ मुझ आत्मा के सातों गुण सतरंगी किरणों के रूप में चारों ओर फैल कर अपनी अद्भुत छटा बिखरते हुए आस पास के वायुमण्डल को भी सतोगुणी बना रहे हैं। *किरणों का प्रवाह मुझ आत्मा से मेरे पूरे शरीर मे होता हुआ अब धीरे - धीरे बाहर तक फैलने लगा है*। एक दिव्य आलौकिक रूहानी मस्ती चारों और फैलती जा रही है। *चारों और अपने गुणों की किरणें फैलाता हुआ मुझे मेरा यह सतोगुणी स्वरूप एक सतरंगी खिले हुए रूहे गुलाब की तरह दिखाई दे रहा है जिसमे से निकल रही रूहानियत की खुशबू पूरे वायुमण्डल को रूहानी सुगन्ध से भर रही है*।

 

_ ➳  ऐसा अनुभव हो रहा है जैसे मैं किसी सुगन्धित फूंलो के खिले हुए उपवन में पहुँच गई हूँ जहां चारों ओर फैली दिव्यता मन बुद्धि को दिव्य बना कर, *देह और देह की दुनिया से किनारा कराए, उस दिव्य लोक की ओर ले कर जा रही है जो मुझ आत्मा का वास्तविक घर है, मेरे पिता परमात्मा का घर है*। जहां से मैं आत्मा अपने सत्य स्वरूप के साथ सृष्टि रूपी रंगमंच पर पार्ट बजाने के लिए आई थी और पार्ट बजाते - बजाते अपने सत्य स्वरूप को ही भूल गई थी। किन्तु मेरे शिव पिता परमात्मा ने आ कर मुझे मेरा वास्तविक परिचय दे कर मुझे मेरे उस सत्य स्वरूप का अनुभव करवा दिया।

 

_ ➳  अपने उस सत्य स्वरूप का अनुभव अपने घर में, अपने शिव पिता परमात्मा के सम्मुख करने के लिए मैं आत्मा अब अपने घर परमधाम की ओर चल पड़ती हूँ। मन बुद्धि के विमान पर सवार हो कर सेकण्ड में मैं आकाश को पार कर जाती हूँ और उससे भी परें अपने परमधाम घर में पहुँच जाती हूँ अपने शिव परम पिता परमात्मा के पास। *बीजरूप शिव पिता की मास्टर बीजरूप सन्तान मैं आत्मा स्वयं को देख रही हूँ आत्माओं की अति सुंदर निराकारी दुनिया में*। मेरे सामने बिंदु रूप में मेरे शिव पिता परमात्मा और उनके सामने मैं बिंदु आत्मा। कितना सुखद दृश्य हैं। बिंदु बाप और बिंदु बच्चे का यह मंगल मिलन चित को चैन और मन को आराम दे रहा है ।

 

_ ➳  5 तत्वों के पार लाल सुनहरी प्रकाश से प्रकाशित यह दुनिया कितनी निराली और असीम शांति से भरपूर करने वाली है। चारों और गहन शांति ही शांति का अनुभव हो रहा है। संकल्पो की हलचल मात्र भी यहां नही है। *इस बीजरूप अवस्था में अपने ओरिजनल स्वरूप में स्थित हो कर अपने बीज रूप परमात्मा बाप के सानिध्य में मैं अतीन्द्रिय सुख का अनुभव कर रही हूँ* । बीजरूप बाबा से आती सर्वशक्तियों रूपी किरणों की बौछारें मुझे असीम बल प्रदान कर रही हैं। बाबा से आती सर्वशक्तियों को स्वयं में समाकर मैं शक्तियों का पुंज बन गई हूँ और बहुत ही शक्तिशाली स्थिति का अनुभव कर रही हूँ।

 

_ ➳  शक्ति स्वरूप स्थिति में स्थित हो कर अब मैं पुनः लौट रही हूँ जीवात्माओं की साकारी दुनिया में। फिर से अपने साकार तन में, साकार दुनिया मे, साकार सम्बन्धो के बीच अपने ब्राह्मण स्वरुप में मैं स्थित हूँ। *देह और देह की दुनिया मे रह कर मैं अपना पार्ट बजा रही हूँ*। किन्तु देह और देहधारियों के बीच में रहते हुए भी अपने सत्य स्वरूप में टिक कर अपनी दिव्यता और रूहानियत का अनुभव मुझे इस नश्वर दुनिया से वैराग्य दिला रहा है। स्वयं को मैं इस दुनिया से उपराम अनुभव कर रही हूँ। *बुद्धि को देहधारियों से निकाल, अपने सत्य स्वरूप में अपने सत्य बाप के साथ सर्व सम्बन्धों का सुख लेते हुए मैं हर पल अतीन्द्रिय सुख का अनुभव कर रही हूँ*।

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं निमित्तपन की स्मृति द्वारा अपने हर संकल्प पर अटेंशन रखने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं निवारण स्वरूप आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा अपने गुणों वा विशेषताओं के अभिमान से सदा मुक्त हूँ  ।*

   *मैं ज्ञानी तू आत्मा हूँ  ।*

   *मैं आत्मा सदैव निर्मानचित्त हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  *ब्राह्मण जीवन की नेचुरल नेचर है ही गुण स्वरूपसर्व शक्ति स्वरूप और जो भी पुरानी नेचर्स हैं वह ब्राह्मण जीवन की नेचर्स नहीं हैं।* कहते ऐसे हो कि मेरी नेचर ऐसी है लेकिन कौन बोलता है मेरी नेचरब्राह्मण वा क्षत्रियवा पास्ट जन्म के स्मृति स्वरूप आत्मा बोलती है? *ब्राह्मणों की नेचर - जो ब्रह्मा बाप की नेचर वह ब्राह्मणों की नेचर।* तो सोचो जिस समय कहते हो मेरी नेचरमेरा स्वभाव ऐसा हैक्या ब्राह्मण जीवन में ऐसा शब्द - मेरी नेचरमेरा स्वभाव... हो सकता हैअगर अब तक मिटा रहे हो और पास्ट की नेचर इमर्ज हो जाती है तो समझना चाहिए इस समय मैं ब्राह्मण नहीं हूँक्षत्रिय हूँयुद्ध कर रहा हूँ मिटाने की।

 

 _ ➳  तो क्या कभी ब्राह्मणकभी क्षत्रिय बन जाते होकहलाते क्या होक्षत्रिय कुमार या ब्रह्माकुमारकौन होक्षत्रिय कुमार हो क्याब्रह्माकुमारब्रह्माकुमारियां। दूसरा नाम तो है ही नहीं। कोई को ऐसे बुलाते हो क्या कि हे क्षत्रिय कुमार आओऐसा बोलते हो या अपने को कहते हो कि मैं ब्रह्माकुमार नहीं हूँमैं क्षत्रिय कुमार हूँतो ब्राह्मण अर्थात् जो ब्रह्मा बाप की नेचर वह ब्राह्मणों की नेचर। *यह शब्द अभी कभी नहीं बोलनागलती से भी नहीं बोलनान सोचना,क्या करूं मेरी नेचर है! यह बहानेबाजी है। यह कहना भी अपने को छुड़ाने का बहाना है।* नया जन्म हुआनये जन्म में पुरानी नेचर,पुराना स्वभाव कहाँ से इमर्ज होता हैतो पूरे मरे नहीं हैंथोड़ा जिंदा हैंथोड़ा मरे हैं क्या? *ब्राह्मण जीवन अर्थात् जो ब्रह्मा बाप का हर कदम हैं वह ब्राह्मणों का कदम हो।*

 

✺   *ड्रिल :-  "नाजुक नेचर को छोड़ ब्राह्मण जीवन की नेचुरल नेचर, ब्रह्मा बाप की नेचर को धारण करने का अनुभव"*

 

 _ ➳  मैं संगमयुगी ब्राह्मण आत्मा स्वयं को सर्व बंधनों से मुक्त कर, इस देह के बंधन को छोड़ अपना सूक्ष्म फरिश्ता रूप धारण करती हूँ... और इस साकारी दुनिया से ऊपर की ओर उड़ती हूँ... आकर अपने बाबा के पास सूक्ष्म वतन में ठहरी हूँ... अत्यंत सुंदर नज़ारा मुझे दिख रहा है... हर तरफ सफेद रंग का प्रकाश ही प्रकाश है... थोड़ा आगे जाती हूँ तो बाबा मुझे दिखाई देते हैं... *उनके दिव्य तेज से ये सारा सूक्ष्म वतन जगमगा रहा है और उनकी किरणें मुझ पर पड़ने से मैं फरिश्ता भी जगमगाने लगता हूँ...*

 

 _ ➳  मैं ब्राह्मण आत्मा अब इस कलयुगी दुनिया को बहुत पीछे छोड़ आयी हूँ और संगमयुग में अपना श्रेष्ठ पार्ट प्ले कर रही हूँ... मेरे बाबा ने मुझे इस पुरानी दुनिया से निकाल सारे कल्प का गुह्य राज़ मुझे समझाया है... *इस ब्राह्मण जन्म के मिलते ही बाबा ने मुझे इस दिव्य अलौकिक जन्म की गुण और शक्तियों से भी मेरा परिचय कराया...* जो शक्तियां मेरे अपने अंदर ही समाहित हैं परंतु इस पूरे कल्प में भिन्न भिन्न पार्ट बजाते मैं उन्हें विस्मृत कर चुकी थी... अब बाबा की मदद से मैं आत्मा फिर से अपनी शक्तियों को इमर्ज कर रही हूँ...

 

 _ ➳  मैं उस पुरानी दुनिया से निकल आयी हूँ और इस संगमयुग में अपने सभी मूल गुणों को स्वयं में धारण कर रही हूँ... उस पुरानी दुनिया से अब मेरा कोई नाता नहीं रहा और उस जीवन के संस्कार, और अपनी पुरानी नेचर को भी मैं पीछे छोड़ आयी हूँ... *अब मैं संगमयुग में ब्राह्मण आत्मा हूँ और ब्राह्मण जीवन के जो संस्कार हैं वो अब मेरे भी संस्कार बन गए हैं... मैं गुण स्वरुप हूँ, सर्व शक्ति स्वरूप हूँ और यही अब मेरी नेचुरल नेचर है...*

 

 _ ➳  पास्ट के जन्म की कोई भी स्मृति अब मुझे नहीं है... मेरे शिवबाबा ने मुझे ब्रह्मा बाप द्वारा एडॉप्ट किया और ये हीरे तुल्य ब्राह्मण जन्म मुझे दिया... और मेरे सभी पुराने स्वभाव संस्कार मिट गए... *बाबा ने मुझे ब्राह्मण जीवन दिया मुझे क्षत्रिय नहीं बनना है युद्ध नहीं करना है... मैं ब्रह्मा बाप की संतान ब्रह्माकुमार ब्रह्माकुमारी हूँ और  ब्राह्मण जीवन के संस्कार मेरी नेचुरल नेचर बन गयी है...*

 

 _ ➳  मैं आत्मा अपने पुराने जीवन से पूरी तरह मर गयी हूँ... *ब्रह्मा बाप के कदम पर कदम रखकर मुझे अपने इस नए ब्राह्मण जन्म में आगे बढ़ना है...* जो ब्रह्मा बाबा की नेचर वही मुझ ब्राह्मण आत्मा की भी नेचर है... कोई भी पुराना संस्कार अब मुझे इमर्ज नहीं करना है... मुझे इस ब्राह्मण जीवन की स्मृति में रहना है...

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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