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 02 / 11 / 19  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ जो दिया, ऊसे वापिस लेने का संकल्प तो नहीं आया ?

 

➢➢ निश्चयबुधी बन दैवीगुण धारण किये ?

 

➢➢ विघ्नो को मनोरंजन का खेल समझा ?

 

➢➢ मर्यादापूर्वक दिल से सबको सुख दिया ?

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  ✰ अव्यक्त पालना का रिटर्न

         ❂ तपस्वी जीवन

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〰✧  ब्रह्मा बाप से प्यार है तो प्यार की निशानियां प्रैक्टिकल में दिखानी है। जैसे ब्रह्मा बाप का नम्बरवन प्यार मुरली से रहा जिससे मुरलीधर बना। तो जिससे ब्रह्मा बाप का प्यार था और अभी भी है उससे सदा प्यार दिखाई दे। हर मुरली को बहुत प्यार से पढ़कर उसका स्वरूप बनना है।

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?

 

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अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए

             ❂ श्रेष्ठ स्वमान

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   "मैं विश्व रचता बाप की श्रेष्ठ रचना हूँ"

 

  सदा अपने को विश्व-रचता बाप की श्रेष्ठ रचना अनुभव करते हो?  जीवन अर्थात् विश्व-रचता की श्रेष्ठ रचना। हर डायरेक्ट बाप की रचना हैं - यह नशा है? दुनिया वाले तो सिर्फ अन्जान बनके कहते हैं कि हमको भगवान ने पैदा किया है। आप सभी भी पहले अन्जान होकर कहते थे लेकिन अभी जानते हो कि हम शिववंशी ब्रह्माकुमार-कुमारी हैं। तो अभी ज्ञान के आधार से, समझ से कहते हो कि हमको भगवान ने पैदा किया है, हम मुख वंशावली हैं। 

 

  डायरेक्ट बाप ने ब्रह्मा द्वारा रचना रची है। तो बापदादा वा मात-पिता की रचना हो। डायरेक्ट भगवान की रचना - यह अभी अनुभव से कह सकते हो। तो भगवान की रचना कितनी श्रेष्ठ होगी! जैसा रचयिता वैसी रचना होगी ना। यह नशा और खुशी सदा रहती है? अपने को साधारण तो नहीं समझते हो? यह राज जब बुद्धि में आ जाता है तो सदा ही रुहानी नशा और खुशी चेहरे पर वा चलन में स्वत: ही रहती है।

 

  आपका चेहरा देखकर के किसको अनुभव हो कि सचमुच यह श्रेष्ठ रचता की रचना हैं। जैसे राजा की राजकुमारी होगी तो उसकी चलन से पता चलेगा कि यह रायल घर की है। यह साहूकार घर की या यह साधारण घर की है। ऐसे आपके चलन से, चेहरे से अनुभव हो कि यह ऊंची रचना है, ऊंचे बाप के बच्चे हैं!

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?

 

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         रूहानी ड्रिल प्रति

अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं

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✧  सदा अपने को जैसे बाप न्यारा और प्यारा है, ऐसे न्यारे और प्यारे अनुभव करते हो? बाप सबका प्यारा क्यों है? क्योंकि न्यारा है। जितना न्यारा बनते हैं उतना सर्व का प्यारा बनते हैं। न्यारा किससे? पहले अपनी देह की स्मृति से न्यारा।

 

✧  जितना देह की स्मृति से न्यारा होगे उतने बाप के भी प्यारे और सर्व के भी प्यारे होंगे। क्योंकि न्यारा अर्थात आत्मा-अभिमानी। जब बीच में देह का भान आता है तो प्यारा-पन खत्म हो जाता है।

 इसलिए बाप समान सदा न्यारे और सर्व के प्यारे बनो, आत्मा रूप में किसको भी देखेंगे तो रूहानी प्यार पैदा होगा ना।

 

✧  और देहभान से देखेंगे तो व्यक्त भाव होने के कारण अनेक भाव उत्पन्न होंगे - कभी अच्छा होगा, कभी बुरा होगा। लेकिन आत्मिक भाव में, आत्मिक दृष्टि में, आत्मिक वृति में रहने वाला जिसके भी सम्बन्ध में आयेगा अति प्यारा लगेगा।

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?

 

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         ❂ अशरीरी स्थिति प्रति

अव्यक्त बापदादा के इशारे

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〰✧  जब हरेक की नेचर बदले तब आप लोगों के अव्यक्ति पिक्चर्स बनेंगे। संगमयुग की सम्पूर्ण स्टेज की पिक्चर क्या है? (फ़रिश्ते) फ़रिश्ते में क्या विशेषता होती है? एक तो बिल्कुल हल्कापन होता है। हल्कापन होने के कारण जैसी भी परिस्थिति हो वैसी अपनी स्थिति बना सकेंगे। जो भारी होते हैं वह कैसी भी परिस्थिति में अपने को सेट नहीं कर सकेंगे।

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   "ड्रिल :-  पवित्रता का श्रृंगार करना"
 
➳ _ ➳  आज मै आत्मा मा त्रिलोकीनाथ के नशे में डूबी हुई... तीनो लोको को स्म्रति पटल पर देख रही हूँ... और देखते देखते मै आत्मा अपने सूक्ष्म शरीर को लिए... इस स्थूल धरा के आवरण से निकल कर... सूक्ष्म वतन में अपने प्यारे बाबा से मिलने को उड़ चली हूँ... सूक्ष्म वतन में पहुंच कर मै आत्मा मीठे बाबा की बाँहों में समा जाती हूँ... और दीवानी आत्मा और माशूक परमात्मा के सच्चे प्रेम की धारा से सूक्ष्म वतन तरंगित हो रहा है...
 
❉   मीठे बाबा सामने खड़े ज्ञान की अमूल्य मणियो को मेरी झोली में छलकाते हुए कहने लगे :- "मीठे प्यारे फूल बच्चे... देह और देह की दुनिया के आकर्षणों से निकल सम्पूर्ण पवित्रता को धारण करो... यह पवित्रता ही स्वर्गिक सुखो का आधार है... पवित्रता का कंगन बांध पावन बनने की द्रढ़ प्रतिज्ञा करो..."
 
➳ _ ➳  मै आत्मा प्यारे बाबा को रोम रोम से शुकिया कहते हुए बोली :- "मेरे मीठे बाबा,.. आपने जीवन में आकर जीवन को पवित्रता की खूबसूरती से सजाया है... इसके पहले तो मै आत्मा अपवित्रता की दुर्गन्ध में डूबी हुई थी... आपने मुझे पावनता से सजाकर, महान भाग्यशाली बना दिया है..."
 
❉   मीठे बाबा मुझ आत्मा को पावनता के श्रंगार से खुबसूरत बनाते पुनः बोले :- "मीठे प्यारे सिकीलधे बच्चे... हर साँस और संकल्प को पवित्रता के रंग में रंगकर देवताई राजतिलक के अधिकारी बनो... पवित्रता ही देवताओ का सौंदर्य है... इसलिए दिल जान से इस पावनता की प्रतिज्ञा को निभाओ..."
 
➳ _ ➳  मै आत्मा प्यारे बाबा की अनमोल शिक्षाओ को दिल में समाते हुए कह रही हूँ :- "ओ मीठे बाबा मेरे... आपने मुझ आत्मा को देह के दलदल से निकाल, दिव्यता से सजाकर, कितना प्यारा और खुशबूदार बना दिया है... मै आत्मा पावनता की सुगन्ध लिए स्वर्ग धरा पर विचरण कर रही हूँ..."
 
❉   प्यारे बाबा मुझ आत्मा को अपने वरदानी हाथो में थाम प्रेम किरणों से भरपूर करते हुए बोले :- " मीठे लाडले बच्चे... पवित्रता ही देवताओ सा सुखमय और अथाह खुशियो और आनन्द से भरपूर जीवन की आधारशिला है... विश्व का राज्य भाग्य इस पवित्रता की धारणा पर ही पा सकते हो... इसलिए पावनता से सजधज कर देवताई खुशियो में झूम जाओ..."
 
➳ _ ➳  मै आत्मा प्यारे बाबा को परम् शिक्षक रूप में पाकर अपने मीठे भाग्य पर नाज करते हुए कह रही हूँ :- "मीठे प्यारे बाबा... देह की मिटटी ने मुझ आत्मा को जो मैला कर दिया... आपने पावनता से उसे धो दिया है... और वही तेज और ओज देकर मुझ आत्मा को दिव्यता के रंग से निखार दिया है...अपने बाबा से ऐसी मीठी रुहरिहानं कर मै आत्मा स्थूल जगत मे लौट आयी...

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺ "ड्रिल :- विजय माला में पिरोने के लिए निश्चय बुद्धि बन दैवी गुण धारण करने हैं"

➳ _ ➳ अपने लाइट के सूक्ष्म आकारी शरीर को धारण किये मैं फ़रिश्ता अपने शिव पिता की आज्ञानुसार, ईश्वरीय सेवा अर्थ सारे विश्व मे भ्रमण कर रहा हूँ। भगवान की तलाश में भटक रही भक्त आत्मायें जो कि मन्दिरो में देवी देवताओं के जड़ चित्रों के सामने खड़ी होकर भगवान को पाने के लिए आराधना कर रही हैं। केवल उनके एक दर्शन मात्र के लिए तरस रही हैं। उन भक्त आत्माओं को परमात्मा के अवतरण का संदेश देने की सूक्ष्म सेवा करने के लिए मैं फ़रिश्ता अब एक मंदिर के ऊपर पहुँचता हूँ। मंदिर में भक्त आत्माओं द्वारा की जाने वाली अनेक गतिविधियों को मैं फ़रिश्ता देख रहा हूँ।

➳ _ ➳ हाथ मे माला सिमरण करती भक्त आत्माओं को देख मैं फ़रिश्ता अपने सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण जीवन के बारे में विचार करता हूँ कि इस समय संगमयुग पर, परमात्मा की श्रेष्ठ मत पर चल कर, हम ब्राह्मण बच्चो द्वारा किया हुआ हर कर्म कैसे भक्ति में पूजन और गायन योग्य बन जाता है! ब्राह्मणों के श्रेष्ठ कर्म का यादगार माला के रूप में आज भी भक्तो द्वारा अपनी मनोकामनाओं को पूर्ण करने के लिए सिमरण किया जा रहा है।

➳ _ ➳ यही विचार करते - करते अब मैं फ़रिश्ता ईश्वरीय सेवा के अपने कर्तव्य को स्मृति में लाकर, मन बुद्धि का कनेक्शन अपने पिता परमात्मा के साथ जोड़, मनसा साकाश द्वारा उन आत्माओं को परमात्म परिचय देकर और उन्हें परमात्मा प्रेम का अनुभव करवा कर, दूसरे स्थान की सेवा करने अर्थ अब उस स्थान को छोड़ ऊपर की ओर उड़ चलता हूँ। सारे विश्व की आत्माओं को अपनी श्रेष्ठ मनसा वृति द्वारा परमात्म सन्देश देता हुआ मैं फ़रिश्ता ऊपर आकाश की ओर उड़ता जा रहा हूँ।

➳ _ ➳ सूर्य, चांद, तारागणों से परे समस्त सौरमण्डल को पार कर अब मैं फ़रिश्ता श्वेत प्रकाश से प्रकाशित फ़रिशतो की एक बहुत ही प्यारी दुनिया में प्रवेश करता हूँ। अपने सम्पूर्ण फ़रिश्ता स्वरूप में स्थित अव्यक्त ब्रह्मा बाबा के इस अव्यक्त वतन में, चारों और चमकते श्वेत सूक्ष्म आकारी फ़रिशतो के बीच अब मैं स्वयं को देख रहा हूँ। सामने अव्यक्त ब्रह्मा बाबा और उनकी भृकुटि में विराजमान शिव बाबा। प्रकाश की अनन्त धारायें ब्रह्मा बाबा की भृकुटि से निकल रही हैं जो बारिश की बूंदों के समान मुझ फ़रिश्ते पर पड़ रही हैं और मुझे शक्तिशाली बना रही हैं। बापदादा की समस्त शक्तियों को मैं स्वयं में समाता हुआ अनुभव कर रहा हूँ।

➳ _ ➳ अपनी शक्तियों का बल मुझ फ़रिश्ते में भरकर अब बाबा अपना वरदानी हाथ ऊपर उठाते हैं। बाबा के एक हाथ को मैं अपने सिर के ऊपर अनुभव कर रहा हूँ और बाबा के दूसरे हाथ में मैं एक माला देख रहा हूँ। बाबा उस माला के ऊपर जैसे ही दृष्टि डालते है माला के हर मणके में एक अलग ब्राह्मण आत्मा का दिव्य आभा से दमकता हुआ चेहरा दिखाई देने लगता है। उस माला में स्वयं को तलाश करती मेरी निगाहों को देख बाबा बड़ी गुह्य मुस्कराहट के साथ, उस विजयमाला में आने का पुरुषार्थ करने का मुझे संकेत देते हैं।

➳ _ ➳ बाबा के अव्यक्त इशारे को समझ, बाबा से वरदान लेकर, विजयमाला में आने के अपने लक्ष्य को पूरा करने का पुरुषार्थ करने के लिये अब मैं अपने पुरुषार्थी ब्राह्मण स्वरूप में लौट आती हूँ। "विजयमाला में आने के लिए अथक हो सर्विस करनी है" बाबा के इस फरमान को सदैव स्मृति में रख अब मैं हर समय ऑन गॉडली सर्विस पर तत्पर रहती हूँ। ईश्वरीय यज्ञ में मिली हर सेवा को अथक हो कर करते हुए अपने इस लक्षय को पाने का पुरुषार्थ अब मैं पूरी लग्न से कर रही हूँ।

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

✺  मैं विघ्नों को मनोरंजन का खेल समझ पार करने वाली निर्विघ्न, विजयी आत्मा हूँ।

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

✺   मैं मर्यादा-पूर्वक दिल से सबको सुख देकर सुख के खाते को जमा करने वाली आत्मा हूँ  ।

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳ कुछ भी होबाप साथ हैमूंझने की क्या बात है। कनफ्यूज़ होने की क्या बात है। बाप के साथ का सहयोग लो, अकेले समझते हो तो मौज के बजाए मूंझ जाते हो। तो मूंझना नहीं। ठीक है ना? अभी भी मूंझेंगे। (नहीं) अभी नहीं मूंझ रहे होमौज में हो इसलिए कहते हो कि नहीं मूंझेंगे! कुछ भी हो जाए लेकिन मौज नहीं जाए। ठीक है ना या मौज चली जायेगी? मौज नहीं जानी चाहिए। सेवा का बल है तो उस बल को कार्य में लगाओ। सिर्फ सेवा नहीं करो लेकिन सेवा का बल जो बाप से मिलता हैउसको काम में लगाओ। सिर्फ सेवा कर रहे हैंसेवा कर रहे हैं तो थक जाते होमूंझ भी जाते हो लेकिन बाप के साथ का अनुभव जहाँ बाप है वहाँ मौज ही मौज है। तो साथ को इमर्ज करो, सुनाया ना - याद करते हो लेकिन साथ को यूज नहीं करते, इसीलिए मूंझ जाते हो।

 

 _ ➳  संगमयुग मौजों का युग है या मूंझने का युग हैमौज का है तो फिर मूंझते क्यों हो? अभी अपने जीवन की डिक्शनरी से मूंझना शब्द निकाल दो। निकाल लियापक्का। या थोड़ा-थोड़ा दिखाई देगाएकदम मिटा दो। परमात्मा के बच्चे और मौज में नहीं रहे तो और कौन रहेगा और कोई है क्यातो सदा मौज ही मौज है। सभी अपनी ड्युटी पर खुश होया थोड़ा-थोड़ा ड्युटी में खिटखिट है? कुछ भी हो जाएयह पेपर पास करना है। बात नहीं हैपेपर है। तो पेपर पास करने में खुशी होती है ना। क्लास आगे बढ़ते हैं ना! तो बात हो गईसमस्या आ गई यह नहीं सोचो। पेपर आया पास हुआ, मौज मनाओ। जब बच्चे पेपर पास करके आते हैं तो कितने मौज में होते हैंमूंझते हैं क्या! यह पेपर तो आयेंगे। पेपर ही अनुभव में आगे बढ़ाते हैंइसलिए सदा मौज में रहने वाले। सेवाधारी नहीं लेकिन मौज में रहने वाले। सदा यह अपना टाइटल याद करो।

 

✺   ड्रिल :-  "बाप के साथ से मूंझना शब्द डिक्शनरी से निकाल देना"

 

 _ ➳  संगमयुग पर मैं ब्राह्मण आत्मा... अपने भाग्य को देख देख हर्षित हो रही हूं... वाह वाह रे आत्मा इसी नशे इसी मस्ती में अपने मन मंदिर में बाबा को देखती हूं... मन मग्न अवस्था में दिलाराम बाबा के हाथों में हाथ दे रूहानी मस्ती में हूं और गा रही हूं:- "मेरे बाबा हैं साथ मेरे बाबा हैं साथ..."

 

 _ ➳  तभी देखती हूं कि कुछ ब्राह्मण आत्मायें कन्फ्यूज हैं... "ये ऐसा क्यों, कैसे" से झूझ रही हैं... इसीलिए उदास हैं... माया के द्वारा बार बार कई तरह के पेपर आ रहे हैं... परिस्थितियों के पहाड़ सामने खड़े हैं, वो उन्हें पार करने की कोशिश कर रही हैं, पर उन्हें पार नहीं कर पा रही... अपने ही बुने तानेबाने में उलझती जा रही हैं, मूँझ रही हैं... उनका यह हाल देख मैं आत्मा उनके पास जाती हूं... और बाबा के महावाक्यों का गुँजन कर उन्हें समझाती हूँ:- "सब को ड्रामा समझ कर देखो तो पार हो जाएंगे, क्यों मूँझते हो...? ये तो पेपर हैं... जिन्हें पास करना बाबा के बच्चों के बाएं हाथ का खेल है... परमात्मा के बच्चे और उदास...? ये तो मौज में रहने के दिन है..." पर मेरा गुंजन किसी को सुनाई नहीं दे रहा...

 

 _ ➳  मैं आत्मा अपनी पूरी कोशिश कर रही हूं... ये क्या हो रहा है ? इनकी तकलीफ दूर क्यों नहीं हो रही... ये सब मुझे सुन क्यों नहीं पा रहे...? तभी एकाएक एक लाइट सी कौंधती है... मुझमें जैसे एक स्पार्क सा होता है... ये मैं क्या कर रही हूं ! बाबा को बिना साथ लिए मैं सेवा करने चली थी... ना बाबा को साथ लिया, ना याद का, ना सेवा का बल भरा... दिल से अपने दिलाराम बाबा को याद कर उनसे अपनी इस भूल के लिये माफ़ी मांगती हूं और देखती हूँ अब सबको मेरा रूहानी गुँजन सुनाई दे रहा है... बाबा को साथ ले मैं उड़ती पतंग बन उड़ने लगती हूं... अब मैं आत्मा नाचती, गाती, झूमती आकाश में उड़ सबको हिम्मत की, आशा की किरणें दे बल भर रही हूं... बाबा- अब से हम सब आत्माओं की डिक्शनरी में ये मूँझना शब्द नहीं होगा... कभी नहीं होगा... कभी भी नहीं होगा...

 

 _ ➳  अब सब आत्मायें बाबा को अंग संग ले खुशी खुशी मौज मस्ती में, ऊंची नीची बातों को खिटपिट को हँसते हँसते सहन कर रही हैं... और साथ साथ गुनगुना भी रही हैं:- "मेरे बाबा हैं साथ मेरे बाबा हैं साथ" मुझ आत्मा संग सभी मेरे आत्मा भाई भी इस रूहानी मस्ती में रंग गए हैं... अब सभी आत्मायें किसी भी पेपर में मूँझ नहीं रहीं हैं... परमात्म बल से स्वयं को भर अपने अगले पेपर की तैयारी कर रही हैं... और गा रही हैं:- "हंसते हंसते कट जाएं रस्ते, खुशी मिले या ग़म बदलेंगे ना हम दुनिया चाहे बदलती रहे..."

 

 _ ➳  कितना प्यारा है ये अनुभव... सभी आत्मायें अपने को चढ़ती कला में अनुभव कर रही हैं... सबके मुख मंडल रूहानी मौज मस्ती से सरोबार हैं... "बारम्बार शुक्रिया मेरे बाबा, मीठे बाबा"- यह कहते कहते सभी आत्मायें अपनी रूहानी ड्यूटी पर पहुँच रही हैं...

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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