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 02 / 11 / 20  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *सर्विस के लिए कोई बहाना तो नहीं दिया ?*

 

➢➢ *किसी भी देहधारी को याद तो नहीं किया ?*

 

➢➢ *परिस्थितियों को गुड लक समझ अपने निश्चय के फाउंडेशन को मज़बूत बनाया ?*

 

➢➢ *हर कर्म श्रेष्ठ और सफल रहा ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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〰✧  *ब्रह्मा बाप से प्यार है तो प्यार की निशानियां प्रैक्टिकल में दिखानी है।* जैसे ब्रह्मा बाप का नम्बरवन प्यार मुरली से रहा जिससे मुरलीधर बना। तो जिससे ब्रह्मा बाप का प्यार था और अभी भी है उससे सदा प्यार दिखाई दे। *हर मुरली को बहुत प्यार से पढ़कर उसका स्वरूप बनना है।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं विश्व रचता बाप की श्रेष्ठ रचना हूँ"*

 

  सदा अपने को विश्व-रचता बाप की श्रेष्ठ रचना अनुभव करते हो?  जीवन अर्थात् विश्व-रचता की श्रेष्ठ रचना। हर डायरेक्ट बाप की रचना हैं - यह नशा है? दुनिया वाले तो सिर्फ अन्जान बनके कहते हैं कि हमको भगवान ने पैदा किया है। *आप सभी भी पहले अन्जान होकर कहते थे लेकिन अभी जानते हो कि हम शिववंशी ब्रह्माकुमार-कुमारी हैं। तो अभी ज्ञान के आधार से, समझ से कहते हो कि हमको भगवान ने पैदा किया है, हम मुख वंशावली हैं।* 

 

  *डायरेक्ट बाप ने ब्रह्मा द्वारा रचना रची है। तो बापदादा वा मात-पिता की रचना हो। डायरेक्ट भगवान की रचना - यह अभी अनुभव से कह सकते हो। तो भगवान की रचना कितनी श्रेष्ठ होगी! जैसा रचयिता वैसी रचना होगी ना। यह नशा और खुशी सदा रहती है?* अपने को साधारण तो नहीं समझते हो? यह राज जब बुद्धि में आ जाता है तो सदा ही रुहानी नशा और खुशी चेहरे पर वा चलन में स्वत: ही रहती है।

 

  *आपका चेहरा देखकर के किसको अनुभव हो कि सचमुच यह श्रेष्ठ रचता की रचना हैं। जैसे राजा की राजकुमारी होगी तो उसकी चलन से पता चलेगा कि यह रायल घर की है। यह साहूकार घर की या यह साधारण घर की है। ऐसे आपके चलन से, चेहरे से अनुभव हो कि यह ऊंची रचना है, ऊंचे बाप के बच्चे हैं!*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  सदा अपने को जैसे बाप न्यारा और प्यारा है, ऐसे न्यारे और प्यारे अनुभव करते हो? बाप सबका प्यारा क्यों है? क्योंकि न्यारा है। *जितना न्यारा बनते हैं उतना सर्व का प्यारा बनते हैं।* न्यारा किससे? पहले अपनी देह की स्मृति से न्यारा।

 

✧  जितना देह की स्मृति से न्यारा होगे उतने बाप के भी प्यारे और सर्व के भी प्यारे होंगे। क्योंकि न्यारा अर्थात आत्मा-अभिमानी। जब बीच में देह का भान आता है तो प्यारा-पन खत्म हो जाता है।

 इसलिए *बाप समान सदा न्यारे और सर्व के प्यारे बनो, आत्मा रूप में किसको भी देखेंगे तो रूहानी प्यार पैदा होगा ना।*

 

✧  और देहभान से देखेंगे तो व्यक्त भाव होने के कारण अनेक भाव उत्पन्न होंगे - कभी अच्छा होगा, कभी बुरा होगा। लेकिन *आत्मिक भाव में, आत्मिक दृष्टि में, आत्मिक वृति में रहने वाला जिसके भी सम्बन्ध में आयेगा अति प्यारा लगेगा।*

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧  जब हरेक की नेचर बदले तब आप लोगों के अव्यक्ति पिक्चर्स बनेंगे। *संगमयुग की सम्पूर्ण स्टेज की पिक्चर क्या है? (फ़रिश्ते)* फ़रिश्ते में क्या विशेषता होती है? एक तो बिल्कुल हल्कापन होता है। हल्कापन होने के कारण जैसी भी परिस्थिति हो वैसी अपनी स्थिति बना सकेंगे। जो भारी होते हैं वह कैसी भी परिस्थिति में अपने को सेट नहीं कर सकेंगे।

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  पुरुषोत्तम संगमयुग में पुरुषार्थ कर देव पद पाना"*

 

_ ➳  आँगन में कौड़ी खेलते बच्चों को देख मै आत्मा... मुस्कराती हूँ... और मुझे भी कौड़ी से हीरे जैसा बनाने वाले... मीठे बाबा की यादो में डूब जाती हूँ... अपने प्यारे बाबा से मीठी मीठी बाते करने... मीठे वतन में पहुंचती हूँ... प्यारे बाबा रत्नागर को देख ख़ुशी से खिल जाती हूँ... और मीठे बाबा के प्यार में डूबकर... अपनी ओज भरी चमक, मीठे बाबा को दिखा दिखाकर लुभाती हूँ... *देखो मीठे बाबा... मै आत्मा आपके साये में कितनी प्यारी, चमकदार और हीरे जेसी अमूल्य हो गयी हूँ.*.."

 

   *मीठे बाबा ने मुझ आत्मा को अपने महान भाग्य का नशा दिलाते हुए कहा :-* "मीठे प्यारे फूल बच्चे... *ईश्वर पिता धरती पर अपने फूल बच्चों के लिए अमूल्य खजानो और शक्तियो को हथेली पर सजा कर आये है.*.. इस वरदानी समय पर कौड़ी से हीरो जैसा सज जाते हो... और यादो की अमीरी से, देवताई सुखो की बहारो भरा जीवन सहज ही पाते हो...

 

_ ➳  *मै आत्मा मीठे बाबा के ज्ञान खजाने से स्वयं को लबालब करते हुए कहती हूँ :-* "मीठे मीठे बाबा मेरे... आपको पाकर तो मुझ आत्मा ने जहान पा लिया है... देह और दुखो की दुनिया में कितनी निस्तेज और मायूस थी... *आपने आत्मा सितारा बताकर मुझे नूरानी बना दिया है... फर्श उठाकर अर्श पर सजा दिया है*.."

 

   *प्यारे बाबा मुझ आत्मा को अपने नेह की धारा में भिगोते हुए कहते है :-* "मीठे लाडले प्यारे बच्चे... अपने प्यारे से भाग्य को सदा स्मर्तियो में रख खुशियो में मुस्कराओ... ईश्वर पिता का साथ मिल गया... भगवान स्वयं गोद में बिठाकर पढ़ा रहा... सतगुरु बनकर सदगति दे रहा... *एक पिता को पाकर सब कुछ पा किया है... निकृष्ट जीवन से श्रेष्ठतम देवताई भाग्य पा रहे हो*..."

 

_ ➳  *मै आत्मा प्यारे बाबा की अमीरी को अपनी बाँहों में भरकर मुस्कराते हुए कहती हूँ :-* "मेरे सच्चे साथी बाबा... आपने आकर मेरा सच्चा साथ निभाया है... दुखो के दलदल से मुझे हाथ देकर सुखो के फूलो पर बिठाया है... *सच्चे स्नेह की धारा में मेरे कालेपन को धोकर... मुझे निर्मल, धवल बनाया है.*.. मुझे गुणवान बनाकर हीरे जैसा चमकाया है..."

 

   *मीठे बाबा ने मुझ आत्मा को काँटों से फूल बनाते हुए कहा :-* " मीठे प्यारे सिकीलधे बच्चे... भगवान के धरती पर उतर आने का पूरा फायदा उठाओ... ईश्वरीय सम्पत्ति को अपना अधिकार बनाकर, सदा की अमीरी से भर जाओ... *ईश्वर पिता के साये में गुणवान, शक्तिवान बनकर, हीरे जैसा भाग्य सजा लो..*. और सतयुगी दुनिया में अथाह सुख लुटने कीे सुंदर तकदीर को पाओ...

 

_ ➳  *मै आत्मा अपने दुलारे बाबा को दिल से शुक्रिया करते हुए कहती हूँ :-* "मनमीत बाबा मेरे... विकारो के संग में, मै आत्मा जो कौड़ी तुल्य हो गयी थी... *आपने उस कौड़ी को अपने गले से लगाकर, हीरे में बदल दिया है.*.. मै आत्मा आपके प्यार की रौशनी में, कितनी प्यारी चमकदार बन गयी हूँ... अपनी खोयी चमक को पुनः पाकर निखर गयी हूँ..."मुझे हीरे सा सजाने वाले खुबसूरत बनाने वाले रत्नागर बाबा... को दिल से धन्यवाद देकर मै आत्मा.. स्थूल वतन में आ गयी...

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- किसी भी देहधारी को याद नही करना है*"
 

_ ➳  इस नश्वर देह और इस देह से जुड़ी हर वस्तु के चिंतन से मैं जैसे ही अपने मन बुद्धि को हटा कर अपने वस्तविक सत्य स्वरूप के बारे में विचार करती हूँ तो मन बुद्धि स्वत: ही मेरे उस सत्य स्वरूप पर एकाग्र होने लगते है और मैं मन बुद्धि के दिव्य नेत्रों से अपने उस अति सुंदर स्वरूप को देख कर आनन्द विभोर हो उठती है। *आहा! कितना सुंदर, चमकता हुआ, जगमग करता हुआ, दिव्य ज्योतिर्मय स्वरूप है मेरा*। अपने इस अति सुन्दर सलौने स्वरूप को मैं ज्ञान के दिव्य चक्षु से देख रही हूँ और इसमें समाये अपने सातों गुणों और अष्ट शक्तियों का गहराई तक अनुभव कर रही हूँ।

 

_ ➳  मैं देख रही हूँ मुझ आत्मा के सातों गुण सतरंगी किरणों के रूप में चारों ओर फैल कर अपनी अद्भुत छटा बिखरते हुए आस पास के वायुमण्डल को भी सतोगुणी बना रहे हैं। *किरणों का प्रवाह मुझ आत्मा से मेरे पूरे शरीर मे होता हुआ अब धीरे - धीरे बाहर तक फैलने लगा है*। एक दिव्य आलौकिक रूहानी मस्ती चारों और फैलती जा रही है। *चारों और अपने गुणों की किरणें फैलाता हुआ मुझे मेरा यह सतोगुणी स्वरूप एक सतरंगी खिले हुए रूहे गुलाब की तरह दिखाई दे रहा है जिसमे से निकल रही रूहानियत की खुशबू पूरे वायुमण्डल को रूहानी सुगन्ध से भर रही है*।

 

_ ➳  ऐसा अनुभव हो रहा है जैसे मैं किसी सुगन्धित फूंलो के खिले हुए उपवन में पहुँच गई हूँ जहां चारों ओर फैली दिव्यता मन बुद्धि को दिव्य बना कर, *देह और देह की दुनिया से किनारा कराए, उस दिव्य लोक की ओर ले कर जा रही है जो मुझ आत्मा का वास्तविक घर है, मेरे पिता परमात्मा का घर है*। जहां से मैं आत्मा अपने सत्य स्वरूप के साथ सृष्टि रूपी रंगमंच पर पार्ट बजाने के लिए आई थी और पार्ट बजाते - बजाते अपने सत्य स्वरूप को ही भूल गई थी। किन्तु मेरे शिव पिता परमात्मा ने आ कर मुझे मेरा वास्तविक परिचय दे कर मुझे मेरे उस सत्य स्वरूप का अनुभव करवा दिया।

 

_ ➳  अपने उस सत्य स्वरूप का अनुभव अपने घर में, अपने शिव पिता परमात्मा के सम्मुख करने के लिए मैं आत्मा अब अपने घर परमधाम की ओर चल पड़ती हूँ। मन बुद्धि के विमान पर सवार हो कर सेकण्ड में मैं आकाश को पार कर जाती हूँ और उससे भी परें अपने परमधाम घर में पहुँच जाती हूँ अपने शिव परम पिता परमात्मा के पास। *बीजरूप शिव पिता की मास्टर बीजरूप सन्तान मैं आत्मा स्वयं को देख रही हूँ आत्माओं की अति सुंदर निराकारी दुनिया में*। मेरे सामने बिंदु रूप में मेरे शिव पिता परमात्मा और उनके सामने मैं बिंदु आत्मा। कितना सुखद दृश्य हैं। बिंदु बाप और बिंदु बच्चे का यह मंगल मिलन चित को चैन और मन को आराम दे रहा है ।

 

_ ➳  5 तत्वों के पार लाल सुनहरी प्रकाश से प्रकाशित यह दुनिया कितनी निराली और असीम शांति से भरपूर करने वाली है। चारों और गहन शांति ही शांति का अनुभव हो रहा है। संकल्पो की हलचल मात्र भी यहां नही है। *इस बीजरूप अवस्था में अपने ओरिजनल स्वरूप में स्थित हो कर अपने बीज रूप परमात्मा बाप के सानिध्य में मैं अतीन्द्रिय सुख का अनुभव कर रही हूँ* । बीजरूप बाबा से आती सर्वशक्तियों रूपी किरणों की बौछारें मुझे असीम बल प्रदान कर रही हैं। बाबा से आती सर्वशक्तियों को स्वयं में समाकर मैं शक्तियों का पुंज बन गई हूँ और बहुत ही शक्तिशाली स्थिति का अनुभव कर रही हूँ।

 

_ ➳  शक्ति स्वरूप स्थिति में स्थित हो कर अब मैं पुनः लौट रही हूँ जीवात्माओं की साकारी दुनिया में। फिर से अपने साकार तन में, साकार दुनिया मे, साकार सम्बन्धो के बीच अपने ब्राह्मण स्वरुप में मैं स्थित हूँ। *देह और देह की दुनिया मे रह कर मैं अपना पार्ट बजा रही हूँ*। किन्तु देह और देहधारियों के बीच में रहते हुए भी अपने सत्य स्वरूप में टिक कर अपनी दिव्यता और रूहानियत का अनुभव मुझे इस नश्वर दुनिया से वैराग्य दिला रहा है। स्वयं को मैं इस दुनिया से उपराम अनुभव कर रही हूँ। *बुद्धि को देहधारियों से निकाल, अपने सत्य स्वरूप में अपने सत्य बाप के साथ सर्व सम्बन्धों का सुख लेते हुए मैं हर पल अतीन्द्रिय सुख का अनुभव कर रही हूँ*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

✺   *मैं परिस्थितियों को गुडलक समझने वाली आत्मा हूँ।*

✺   *मैं निश्चय के फॉउन्डेशन को मजबूत बनाने वाली आत्मा हूँ।*

✺   *मैं अचल अडोल आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

✺   *मैं आत्मा हर कर्म को सदैव श्रेष्ठ और सफल बनाती हूँ  ।*

✺   *मैं नॉलेजफुल आत्मा हूँ  ।*

✺   *मैं आत्मा कर्मयोगी हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳ *कुछ भी होबाप साथ हैमूंझने की क्या बात है। कनफ्यूज़ होने की क्या बात है। बाप के साथ का सहयोग लो, अकेले समझते हो तो मौज के बजाए मूंझ जाते हो।* तो मूंझना नहीं। ठीक है ना? अभी भी मूंझेंगे। (नहीं) अभी नहीं मूंझ रहे होमौज में हो इसलिए कहते हो कि नहीं मूंझेंगे! *कुछ भी हो जाए लेकिन मौज नहीं जाए।* ठीक है ना या मौज चली जायेगी? मौज नहीं जानी चाहिए। *सेवा का बल है तो उस बल को कार्य में लगाओ। सिर्फ सेवा नहीं करो लेकिन सेवा का बल जो बाप से मिलता हैउसको काम में लगाओ।* सिर्फ सेवा कर रहे हैंसेवा कर रहे हैं तो थक जाते होमूंझ भी जाते हो लेकिन बाप के साथ का अनुभव *जहाँ बाप है वहाँ मौज ही मौज है। तो साथ को इमर्ज करो, सुनाया ना - याद करते हो लेकिन साथ को यूज नहीं करते, इसीलिए मूंझ जाते हो*।

 

 _ ➳  संगमयुग मौजों का युग है या मूंझने का युग हैमौज का है तो फिर मूंझते क्यों हो? *अभी अपने जीवन की डिक्शनरी से मूंझना शब्द निकाल दो।* निकाल लियापक्का। या थोड़ा-थोड़ा दिखाई देगाएकदम मिटा दो। *परमात्मा के बच्चे और मौज में नहीं रहे तो और कौन रहेगा* और कोई है क्यातो सदा मौज ही मौज है। सभी अपनी ड्युटी पर खुश होया थोड़ा-थोड़ा ड्युटी में खिटखिट है? *कुछ भी हो जाएयह पेपर पास करना है। बात नहीं हैपेपर है। तो पेपर पास करने में खुशी होती है ना। क्लास आगे बढ़ते हैं ना! तो बात हो गईसमस्या आ गई यह नहीं सोचो। पेपर आया पास हुआ, मौज मनाओ।* जब बच्चे पेपर पास करके आते हैं तो कितने मौज में होते हैंमूंझते हैं क्या! *यह पेपर तो आयेंगे। पेपर ही अनुभव में आगे बढ़ाते हैंइसलिए सदा मौज में रहने वाले। सेवाधारी नहीं लेकिन मौज में रहने वाले। सदा यह अपना टाइटल याद करो।*

 

✺   *ड्रिल :-  "बाप के साथ से मूंझना शब्द डिक्शनरी से निकाल देना"*

 

 _ ➳  संगमयुग पर मैं ब्राह्मण आत्मा... अपने भाग्य को देख देख हर्षित हो रही हूं... *वाह वाह रे आत्मा* इसी नशे इसी मस्ती में अपने मन मंदिर में बाबा को देखती हूं... *मन मग्न अवस्था में दिलाराम बाबा के हाथों में हाथ दे रूहानी मस्ती में हूं और गा रही हूं:- "मेरे बाबा हैं साथ मेरे बाबा हैं साथ..."*

 

 _ ➳  *तभी देखती हूं कि कुछ ब्राह्मण आत्मायें कन्फ्यूज हैं... "ये ऐसा क्यों, कैसे" से झूझ रही हैं... इसीलिए उदास हैं... माया के द्वारा बार बार कई तरह के पेपर आ रहे हैं...* परिस्थितियों के पहाड़ सामने खड़े हैं, वो उन्हें पार करने की कोशिश कर रही हैं, पर उन्हें पार नहीं कर पा रही... अपने ही बुने तानेबाने में उलझती जा रही हैं, मूँझ रही हैं... उनका यह हाल देख *मैं आत्मा उनके पास जाती हूं... और बाबा के महावाक्यों का गुँजन कर उन्हें समझाती हूँ:- "सब को ड्रामा समझ कर देखो तो पार हो जाएंगे, क्यों मूँझते हो...? ये तो पेपर हैं... जिन्हें पास करना बाबा के बच्चों के बाएं हाथ का खेल है... परमात्मा के बच्चे और उदास...? ये तो मौज में रहने के दिन है..."* पर मेरा गुंजन किसी को सुनाई नहीं दे रहा...

 

 _ ➳  *मैं आत्मा अपनी पूरी कोशिश कर रही हूं... ये क्या हो रहा है ? इनकी तकलीफ दूर क्यों नहीं हो रही...* ये सब मुझे सुन क्यों नहीं पा रहे...? तभी एकाएक एक लाइट सी कौंधती है... मुझमें जैसे एक स्पार्क सा होता है... ये मैं क्या कर रही हूं ! बाबा को बिना साथ लिए मैं सेवा करने चली थी... ना बाबा को साथ लिया, ना याद का, ना सेवा का बल भरा... *दिल से अपने दिलाराम बाबा को याद कर उनसे अपनी इस भूल के लिये माफ़ी मांगती हूं और देखती हूँ अब सबको मेरा रूहानी गुँजन सुनाई दे रहा है... बाबा को साथ ले मैं उड़ती पतंग बन उड़ने लगती हूं... अब मैं आत्मा नाचती, गाती, झूमती आकाश में उड़ सबको हिम्मत की, आशा की किरणें दे बल भर रही हूं... बाबा- अब से हम सब आत्माओं की डिक्शनरी में ये मूँझना शब्द नहीं होगा...* कभी नहीं होगा... कभी भी नहीं होगा...

 

 _ ➳  *अब सब आत्मायें बाबा को अंग संग ले खुशी खुशी मौज मस्ती में, ऊंची नीची बातों को खिटपिट को हँसते हँसते सहन कर रही हैं... और साथ साथ गुनगुना भी रही हैं:- "मेरे बाबा हैं साथ मेरे बाबा हैं साथ"* मुझ आत्मा संग सभी मेरे आत्मा भाई भी इस रूहानी मस्ती में रंग गए हैं... अब सभी आत्मायें किसी भी पेपर में मूँझ नहीं रहीं हैं... *परमात्म बल से स्वयं को भर अपने अगले पेपर की तैयारी कर रही हैं... और गा रही हैं:- "हंसते हंसते कट जाएं रस्ते, खुशी मिले या ग़म बदलेंगे ना हम दुनिया चाहे बदलती रहे...*"

 

 _ ➳  *कितना प्यारा है ये अनुभव... सभी आत्मायें अपने को चढ़ती कला में अनुभव कर रही हैं...* सबके मुख मंडल रूहानी मौज मस्ती से सरोबार हैं... *"बारम्बार शुक्रिया मेरे बाबा, मीठे बाबा"- यह कहते कहते सभी आत्मायें अपनी रूहानी ड्यूटी पर पहुँच रही हैं...*

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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