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 03 / 01 / 19  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *बाप की याद के सिवाए और कोई भी चीज़ में ममत्व तो नहीं रहा ?*

 

➢➢ *ब्राह्मण जीवन की नेचुरल नेचर द्वारा पत्थर को भी पानी किया ?*

 

➢➢ *अपनी विशेषताओं को सेवा में लगा उडती कला का अनुभव किया ?*

 

➢➢ *अंतर्मुखी स्थिति द्वारा फिर बाह्यमुखता में आने का अभ्यास किया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  जैसे एक सेकेण्ड में स्वीच आन और आफ किया जाता है, ऐसे ही एक सेकेण्ड में शरीर का आधार लिया और एक सेकेण्ड में शरीर से परे अशरीरी स्थिति में स्थित हो गये। *अभी-अभी शरीर में आये, अभी-अभी अशरीरी बन गये, आवश्यकता हुई तो शरीर रूपी वस्त्र धारण किया, आवश्यकता न हुई तो शरीर से अलग हो गये। यह प्रैक्टिस करनी है, इसी को ही कर्मातीत अवस्था कहा जाता है।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं साइलेन्स की शक्ति द्वारा विश्व सेवा करने वाली महान आत्मा हु"*

 

✧  आवाज से परे जाने की युक्ति जानते हो? अशरीरी बनना अर्थात् आवाज से परे हो जाना। शरीर है तो आवाज है। शरीर से परे हो जाओ तो साइलेंस। साइलेंस की शक्ति कितनी महान है, इसके अनुभवी हो ना? साइलेंस की शक्ति द्वारा सृष्टि की स्थापना कर रहे हो। साइंस की शक्ति से विनाश, साइलेंस की शक्ति से स्थापना। तो ऐसे समझते हो कि *हम अपनी साइलेंस की शक्ति द्वारा स्थापना का कार्य कर रहे हैं। हम ही स्थापना के कार्य के निमित हैं तो स्वयं साइलेंस रुप में स्थित रहेंगे तब स्थापना का कार्य कर सकेगे। अगर स्वयं हलचल में आते तो स्थापना का कार्य सफल नहीं हो सकता।*

 

✧  विश्व में सबसे प्यारे से प्यारी चीज है- 'शान्ति अर्थात् साइलेंस'। इसके लिए ही बड़ी-बड़ी कॉन्फरन्स करते हैं। शान्ति प्राप्त करना ही सबका लक्ष्य है। यही सबसे प्रिय और शक्तिशाली वस्तु है। *और आप समझते हो साइलेंस तो हमारा 'स्वधर्म' है। आवाज में आना जितना सहज लगता है उतना सेकंड में आवाज से परे जाना- यह अभ्यास है? साइलेंस की शक्ति के अनुभवी हो?*

 

  कैसी भी अशान्त आत्मा को शान्त स्वरुप होकर शान्ति की किरणें दो तो अशान्त भी शान्त हो जाए। शान्ति स्वरुप रहना अर्थात् शान्ति की किरणें सबको देना। यही काम है। विशेष शान्ति की शक्ति को बढ़ाओ। स्वयं के लिए भी औरों के लिए भी शान्ति के दाता बनो। भक्त लोग शान्ति देवा कहकर याद करते हैं ना? देव यानी देने वाले। *जैसे बाप की महिमा है शान्ति दाता, वैसे आप भी शान्तिदेवा हो। यही सबसे बड़े ते बड़ा महादान है। जहाँ शान्ति होगी वहाँ सब बातें होंगी। तो सभी शान्ति देवा हो, अशान्त के वातावरण में रहते स्वयं भी शान्त स्वरुप और सबको शान्त बनाने वाले, जो बापदादा का काम है, वही बच्चों का काम है।* बापदादा अशान्त आत्माओंको शान्ति देते हैं तो बच्चों को भी फालों फादर करना है। ब्राह्मणों का धन्धा ही यह है।

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  ब्रह्माबाप ने भी रोज दरबार लगाई है। कॉपी है ना। इन्हों को बताना, दिखाना। ब्रह्मा बाप ने भी मेहनत की, रोज दरबार लगाई तब कर्मातीत बनें। तो अभी कितना टाइम चाहिए? या एवररेडी हो? इस अवस्था से सेवा भी फास्ट होगी। क्यों? *एक ही समय पर मन्सा शक्तिशाली, वाचा शक्तिशाली, संबंध-सम्पर्क में चाल और चेहरा शक्तिशाली।*

 

 

 

✧  *एक ही समय पर तीनों सेवा बहुत फास्ट रिजल्ट निकालेगी।* ऐसे नहीं समझो कि इस साधना में सेवा कम होगी, नहीं। सफलता सहज अनुभव होगी। और सभी जो भी सेवा के निमित हैं अगर संगठित रूप में ऐसी स्टेज बनाते हैं तो मेहनत कम और सफलता ज्यादा होगी। तो विशेष अटेन्शन कन्ट्रोलिंग पॉवर को बढ़ाओ। संकल्प, समय, संस्कार सब पर कन्ट्रोल हो।

 

✧  बहुत बार बापदादा ने कहा है - आप सब राजे हो। जब चाहे, जैसे चाहो, जहाँ चाहो, जितना समय चाहो ऐसा मन-बुद्धि लाँ और ऑर्डर मे हो। आप कहो नहीं करना है, और फिर भी हो रहा है, कर रहे हैं तो यह लाँ और ऑर्डर नहीं है। तो *स्वराज्य अधिकारी अपने राज्य को प्रत्यक्ष स्वरूप मे लाओ।* लाना है ना? ला भी रहे हैं लेकिन बापदादा ने कहा ना - *'सदा' शब्द एड करो।*

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧  *फ़रिश्ते अर्थात् अथक और सबकुछ बाप के हवाले करने वाले।* सबसे सहज बात कौन-सी है, जिसको समझने से सदा के लिए सहज मार्ग अनुभव होगा? वह सहज बात है सदा अपनी ज़िम्मेदारी बाप को दे दो। ज़िम्मेवारी देना सहज है ना? *स्वयं को हल्का करो तो कभी भी मार्ग मुश्किल नहीं लगेगा।* मुश्किल तब लगता है जब थकना होता या उलझते हैं। *जब सब ज़िम्मेवारी बाप को दे दी तो फ़रिश्ते हो गये।* फ़रिश्ते कब थकते हैं क्या? लेकिन यह सहज बात नहीं कर पाते तब मुश्किल हो जाता। ग़लती से छोटी-छोटी ज़िम्मेवारियों का बोझ अपने ऊपर ले लेते इसलिए मुश्किल हो जाता। भक्ति में कहते थे- सब कर दो राम हवाले। अब जब करने का समय आया तब अपने हवाले क्यों करते? मेरा स्वभाव, मेरा संस्कार- यह मेरा कहाँ से आया? अगर मेरा खत्म तो नष्टोमोह हो गये। *जब मोह नष्ट हो गया तो सदा स्मृति स्वरूप हो जायेंगे।* सब कुछ बाप के हवाले करने से सदा खुश और हल्के रहेंगे। देने में फिराक दिल बनो। अगर पुरानी कीचड़पट्टी रख लेंगे तो बीमारी हो जायेगी।

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- बाप और वर्से को याद कर ख़ुशी में रहना"*

 

_ ➳  *मैं आत्मा बगीचे में पेड़ के नीचे बैठ मीठे बाबा को याद करती हूँ... प्यारे बाबा तुरंत मेरे सामने आ जाते हैं और अपनी गोदी में बिठाकर मेरे सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए गुणों और शक्तियों से मुझ आत्मा को भरपूर करते हैं...* मैं आत्मा एक-एक गुण और शक्ति को स्वयं में धारण करती जा रही हूँ... एक-एक वरदान को अपने में समाती जा रही हूँ... फिर मीठे बाबा दृष्टि देते हुए मुझ आत्मा से मीठी-मीठी रूह-रिहान करते हैं...

 

  *स्वीट बाबा अपनी स्वीट शिक्षाओं से मुझ आत्मा को अपने समान स्वीट बनाते हुए कहते हैं:-* मेरे मीठे फूल बच्चे... फूल बनाने वाले प्यारे पिता की यादो में डूब जाओ, मीठे बाबा को हर साँस के तार में पिरो दो... *ईश्वरीय यादो से प्राप्त सतयुगी सुखो को याद करो तो... मीठे संस्कारो से सज जायेंगे... और मीठे बाबा समान मीठे हो जायेंगे... हर लम्हा मिठास लुटाने वाले बन जायेंगे..."*

 

_ ➳  *स्वीट फादर और स्वीट राजधानी को याद कर बहुत बहुत स्वीट बनते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे प्यारे बाबा... *मै आत्मा अपने मीठे बाबा की बाँहों में झूल रही हूँ... यादो में डूबी अतीन्द्रिय सुख में खोयी हूँ... मीठे बाबा की यादो में प्रेम की नदिया बन गई हूँ...* ईश्वरीय प्रेम की लहरे पूरे विश्व में फैला रही हूँ... अपने मीठे सुखो की यादो में मुस्करा रही हूँ..."

 

  *मुझ आत्मा को रूहानियत के रंगों से सजाते हुए मीठा बाबा कहते हैं:-* मीठे प्यारे लाडले बच्चे... *ईश्वर पिता जो धरा पर उतर आया है तो उसकी यादो में डूब अथाह खजानो को लूटकर मालामाल हो जाओ... यादो में दिव्य गुणो और शक्तियो से सजकर देवताई श्रृंगार कर लो...* यह यादे मीठेपन से खिला देंगी और पवित्रता से संवार कर विश्व का मालिक सा सजायेंगी..."

 

_ ➳  *खुशियों के अम्बर में उड़ान भरकर खुशी के गीत गुनगुनाती हुई मैं आत्मा कहती हूँ:-* मेरे प्राणप्रिय बाबा... मै आत्मा देहधारियों की यादो में कितनी कड़वी हो गई थी... दुखो में कितनी कलुषित हो गई थी... *अब आपकी मीठी मीठी यादो में कितनी प्यारी मीठी और खुशनुमा होती जा रही हूँ... अपने सुखमय संसार को यादकर ख़ुशी से पुलकित होती जा रही हूँ..."*

 

  *अपनी मधुर वाणी से मेरे जीवन को मधुबन बनाकर मेरे बाबा कहते हैं:-* प्यारे सिकीलधे मीठे बच्चे... अब अपने दुखो के सारे बोझ मीठे पिता को सौंप हल्के मीठे होकर मुस्कराओ... पिता के प्यार में खो जाओ... *अपने सत्य स्वरूप के नशे में इतराओ... और अथाह सुखो की राजधानी को यादकर प्रेम और मीठेपन से महक उठो... और पूरे विश्व को इन मीठी तरंगो से भर दो..."*

 

_ ➳  *मीठे बाबा के हाथों मधुरस का पान कर मिठास से भरपूर होकर मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा मीठे बाबा की यादो में डूबकर कितनी मीठी प्यारी सतोगुणी होकर खिलखिला रही हूँ... *प्यारे बाबा ने अपनी खुशनुमा यादो में मुझे कितना मीठा खुबसूरत बना दिया है... पवित्रता से महकाकर बेशकीमती बना दिया है..."*

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- ज्ञान को धारण करने के लिए बुद्धि को गोल्डन एज बनाना*

 

_ ➳  ज्ञान के सागर अपने शिव पिता से मुरली के माध्यम से हर रोज मिलने वाले ज्ञान के पोष्टिक भोजन को खाकर अपनी बुद्धि को स्वच्छ और शक्तिशाली बनाती जा रही मैं ब्राह्मण आत्मा एकान्त में बैठ उस ज्ञान रूपी भोजन को पचाने के लिए ज्ञान की प्वाइंट्स को स्मृति में लाकर, विचार सागर मंथन कर रही हूँ और साथ ही साथ अपने सर्वक्षेष्ठ भाग्य की भी सराहना कर रही हूँ। *मन ही मन अपने भगय का मैं गुणगान कर रही हूँ कि कितनी विशेष, कितनी महान और कितनी सौभागशाली हूँ मैं आत्मा जो मेरी बुद्धि को शक्तिशाली बनाने के लिए स्वयं भगवान हर रोज मुझे ज्ञान का शक्तिशाली भोजन खिलाते हैं*। सवेरे आंख खुलते ही ज्ञान रत्नों की थालियां लेकर बाबा मेरे पास पहुँच जाते है और ज्ञान का वो भोजन सारा दिन मेरी बुद्धि को शक्तिशाली रखता है और माया के हर वार से मुझे बचा कर रखता है।

 

_ ➳  मन ही मन यह विचार करते हुए अपने भाग्य की स्मृति में मैं खो जाती हूँ और महसूस करती हूँ जैसे ज्ञान सागर मेरे शिव पिता अपने आकारी रथ पर विराजमान होकर ज्ञान रत्नों के अखुट ख़ज़ाने लेकर मेरे सामने खड़े हैं और मुस्कराते हुए उन ज्ञान रत्नों से मेरी बुद्धि रूपी झोली को भरने के लिए मेरा आह्वान कर रहें हैं। *ज्ञान सूर्य अपने शिव पिता को अपने सामने पाकर मन ही मन मैं आत्म विभोर हो रही हूँ। उनकी लाइट माइट को मैं अपने ऊपर स्पष्ट अनुभव कर रही हूँ। बापदादा से आ रही लाइट माइट मुझे भी लाइट और माइट बना रही है*। स्वयं को मैं पूरी तरह रिलेक्स महसूस कर रही हूँ। ऐसा लग रहा है जैसे कोई सवेंदना मेरी देह में नही हो रही और मैं देह से बिल्कुल न्यारी हो चुकी हूँ। अपनी लाइट की सूक्ष्म देह को मैं अपनी स्थूल देह से पूरी तरह अलग महसूस कर रही हूँ।

 

_ ➳  लाइट के बहुत ही सुंदर फ़रिशता स्वरूप में मैं अब स्वयं को देख रही हूँ जिसमे से रंग बिरंगी श्वेत रश्मियां निकल रही है जो चारों और फैल कर सारे वायुमंडल को शुद्ध, दिव्य और अलौकिक बना रही हैं। *अपनी लाइट माइट चारो और बिखेरता हुआ, अपनी रंग बिरंगी किरणो से वायुमण्डल को शुद्ध और पवित्र बनाता हुआ मैं फ़रिशता अब धरनी के आकर्षण से मुक्त होकर, अपने प्यारे बापदादा का हाथ थामे उनके साथ उनके अव्यक्त वतन की ओर जा रहा हूँ*। सारे विश्व का चक्कर लगाकर, आकाश को पार कर, उससे ऊपर अब मैं पहुँच गया बापदादा के साथ एक ऐसी दुनिया में जहां चारों और सफेद चांदनी सा प्रकाश फैला हुआ है।

 

_ ➳  लाइट के सूक्ष्म शरीर को धारण किये फ़रिश्ते ही फ़रिश्ते इस लोक में मुझे दिखाई दे रहें हैं जिनसे निकल रही प्रकाश की रश्मियां पूरे वतन में फैल रही हैं। इस अति सुन्दर दिव्य अलौकिक दुनिया में मैं फ़रिशता अब बापदादा के सम्मुख बैठ , स्वयं को बापदादा से आ रही सर्वशक्तियों से भरपूर कर रहा हूँ। *बाबा की भृकुटि से निकल रहे ज्ञान के प्रकाश की तेज धारायें मुझ फ़रिश्ते पर पड़ रही हैं और ज्ञान की शक्ति से मुझे भरपूर कर रही हैं। अपना वरदानी हाथ मेरे सिर पर रखकर बाबा अपनी हजारों भुजायें मेरे ऊपर फैला कर ज्ञान के अखुट खजाने मुझ पर लुटा रहें हैं* और मैं फ़रिश्ता इन खजानो को अपने अंदर समाता जा रहा हूँ। ज्ञान की शक्तिशाली खुराक खाकर, ज्ञान की शक्ति से भरपूर होकर अपने लाइट माइट स्वरूप के साथ अब मैं वापिस लौट रही हूँ।

 

_ ➳  अपने लाइट की सूक्ष्म देह के साथ, अपनी स्थूल देह में प्रवेश कर अब मैं फिर से अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित हूँ और ज्ञान की शक्तिशाली खुराक हर रोज अपनी बुद्धि को खिलाकर उससे प्राप्त होने वाली परमात्म शक्ति को मैं अपने कर्मक्षेत्र व कार्य व्यवहार में प्रयोग करके अपने हर संकल्प, बोल और कर्म को सहज ही व्यर्थ से मुक्त कर, उन्हें समर्थ बना कर समर्थ आत्मा बनती जा रही हूँ। *बुद्धि में सदा ज्ञान का ही चिंतन करते, ज्ञान के सागर अपने शिव पिता के ज्ञान की लहरों में शीतलता, खुशी व आनन्द  का अनुभव करते, बुद्धि को रोज ज्ञान का शक्तिशाली भोजन देकर उसे शक्तिशाली बना उस शक्ति के प्रयोग से माया पर भी मैं सहज ही विजय प्राप्त करती जा रही हूँ।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

✺   *मैं ब्राह्मण जीवन की नेचरल नेचर द्वारा पत्थर को भी पानी बनाने वाली मास्टर प्रेम के सागर आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

✺  *मैं अपनी विशेषताओं को स्मृति में रख उन्हें सेवा में लगाकर उड़ती कला में उड़ते रहने वाला डबल लाइट फरिश्ता हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  याद की स्टेज में कई बच्चों का लक्ष्य भी अच्छा हैपुरुषार्थ भी अच्छा हैफिर जमा का खाता जितना होना चाहिए उतना कम क्योंबातेंरूह-रूहान चलते-चलते यही रिजल्ट निकली कि *योग का अभ्यास तो कर ही रहे हैं लेकिन योग के स्टेज की परसेन्टेज साधारण होने कारण जमा का खाता साधारण ही है*। *योग का लक्ष्य अच्छी तरह से है लेकिन योग की रिजल्ट है - योगयुक्त, युक्तियुक्त बोल और चलन। उसमें कमी होने के कारण योग लगाने के समय योग में अच्छे हैंलेकिन योगी अर्थात् योगी का जीवन में प्रभाव। इसलिए जमा का खाता कोई कोई समय का जमा होता हैलेकिन सारा समय जमा नहीं होता। चलते-चलते याद की परसेन्टेज साधारण हो जाती है। उसमें बहुत कम जमा खाता बनता है।*  

 

✺   *ड्रिल :-  "योग द्वारा जमा का खाता बढ़ाने का अनुभव"*

 

 _ ➳  देह रूपी घट में पारस मणि मैं आत्मा... इस देह को अपने प्रकाश से आलोकित करती हुई... मस्तिष्क में फैलता ये गहरा लाल प्रकाश... सम्पूर्ण देह में फैलता हुआ... वापस फिर से मस्तिष्क के मध्य भृकुटी में एकत्र हो रहा है... *प्रकाश का एक विशाल घेरा बनता जा रहा है मेरे मस्तिष्क के चारों ओर... शरीर जैसे कही लुप्त हो गया है... अब शेष है केवल रूहानी प्रकाश का एक विशाल बिन्दु*... मै देख रहा हूँ इस बिन्दु को श्वेत प्रकाश के शरीर में बदलते हुए... ये मेरा फरिश्ता स्वरूप... *कुछ क्षण के लिए स्थिर होकर मैं देख रहा हूँ... अपनी देह को, आस- पास के वातावरण को, जो योग की ऊर्जा से भरपूर है*...

 

 _ ➳  मैं आत्म फरिश्ता स्वरूप में उडकर पहुँच गया हूँ सूक्ष्म वतन में... *एक विशाल श्वेत पारदर्शी आवरण... स्वर्ण अक्षरों से जिस पर लिखा है, जमा खाता* थोडा और आगे चलता हूँ... *सूक्ष्म वतन में देख रहा हूँ जगमगाते रत्नो की अनेक बडी-बड़ी पहाडियाँ*... कोई एक दूसरे से आकार में बडी तो कोई चमक में ज्यादा... कुछ देर तक एकटक देखता हुआ मैं समझ गया हूँ इनके पीछे के रहस्य को... हर एक पहाडी पर प्रकाश की लडियों से कोई नाम लिखा है... ये पहाडियाँ लगातार अपना आकार बदल रही है...छोटी से बडी और बडी से छोटी... मैं ढूँढ रहा हूँ अपने नाम की कोई पहाडी... जैसे जैसे समय बीत रहा है... मै अपना नाम न पाकर अधीर हो रहा हूँमेरी बैचेनी बढती जा रही है...

 

 _ ➳  कुछ और आगे जाकर मै देख रहा हूँ, *योग की गहरी अनुभूतियों में खोये कुछ फरिश्ते... और इन फरिश्तों की सेवा में मगन मेरा ही दूसरा फरिश्ता रूप*... हर एक को जमा का खाता बढाने का तरीका बताता हुआ... *युक्ति युक्त बोल और कर्म से सेवा करता हुआ... योगी जीवन के उतार चढाव के सशंयो से ग्रस्त, कुछ दूसरें नवल फरिश्तों की शंकाओं का समाधान करता हुआ*... और मैं, सोच में पड गया हूँ कुछ पल के लिए, अपने इस सम्पूर्ण स्वरूप को देखकर... जमाखाता कितना हुआ इस बात से भी अनासक्त... बस, हर पल सबको आगे बढाने का प्रयास करता, मेरा सम्पूर्ण स्वरूप ही वास्तव में योग द्वारा अपना जमाखाता बढा रहा है...

 

 _ ➳  *मै तुलना कर रहा हूँ अपने योगी जीवन से उस योगी जीवन की... मैं जमा खाता तलाश रहा हूँ... अधीर हो गया हूँ... मगर वहाँ न कोई उतावला पन है,न आसक्ति है*... अनासक्त कर्म और बोल... यही है, योगयुक्त जीवन... *तभी आँखों के सामने जगमगाती भव्य रत्नों की बिना नाम की पहाडी*और उस पर मुस्कुरातें बापदादा... *मानों मेरा आह्वान कर रहे है उस पर अपना नाम लिखने के लिए*... मन में दृढ सकंल्प के साथ साथ बहुत से वादे स्वयं से करता हुआ मैं बिन्दु बन उड चला हूँ परमधाम की ओर...

 

 _ ➳  *परमधाम में मैं आत्मा बस एक ही संकल्प के साथ... मेरे एक तरफ बिन्दु रूप में ब्रह्मा बाबा और मम्मा... और ऊपर शिव ज्योति... सम्पूर्ण योगी जीवन का वरदान पाते हुए मै... देर तक वरदानों की शक्ति को स्वयं में समायें हुए... मैं लौट आया हूँ अपनी देह में... अपने सम्पूर्ण स्वरूप की गहरी अनुभूति मन में लिए*... युक्ति युक्त कर्म और बोल से... *बिना नाम की उस भव्य, विशाल और जगमगाती पहाडी पर अपना नाम बापदादा द्वारा लिखवाने का लक्ष्य मन में समायें*... जिसे मैं अभी सूक्ष्म वतन में देखकर आया हूँ... जो मेरे जमा खाते की प्रतीक है...

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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