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 03 / 02 / 19  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *स्वयं को पदमापदम् भाग्यशाली अनुभव किया ?*

 

➢➢ *निरंतर योगी और निरंतर सेवाधारी बनकर रहे ?*

 

➢➢ *प्राप्त हुए खजाने के भाग्य को सेवा अर्थ लगाया ?*

 

➢➢ *साक्षीपन की सीट पर बैठ सभी दृश्यों को देखा ?*

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*अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  अभी-अभी आवाज में आना और अभी-अभी आवाज से परे हो जाना - जैसे आवाज में आना सहज लगता है वैसे यह भी सहज अनुभव हो क्योंकि आत्मा मालिक है। *रुहानी एक्सरसाइज में सिर्फ मुख की आवाज से परे नहीं होना है। मन से भी आवाज में आने के संकल्प से परे होना है। ऐसे नहीं मुख से चुप हो जाओ और मन में बातें करते रहो। आवाज से परे अर्थात मुख और मन दोनों की आवाज से परे, शान्ति के सागर में समा जायें।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं सच्ची लगन द्वारा विघ्नों को समाप्त करने वाली मास्टर सर्वशक्तिवान आत्मा हूँ"*

 

  *सच्ची लगन विघ्नों को समाप्त कर देती है। कितनी भी रूकावटें आएं लेकिन एक बल एक भरोसे के आधार पर सफलता मिलती रही है और मिलती रहेगी, ऐसा अनुभव होता रहता है ना।*

 

  *जहाँ सर्व शक्तिवान बाप साथ है वहाँ यह छोटी छोटी बातें ऐसे समाप्त हो जाती हैं जैसे कुछ भी थी ही नहीं। असम्भव भी सम्भव हो जाता है क्योंकि सर्व शक्तिवान के बच्चे बन गए। 'मक्खन से बाल' समान सब बातें सिद्ध हो जाती हैं।*

 

  अपने को ऐसे मास्टर सर्वशक्तिवान श्रेष्ठ आत्मायें अनुभव करते हो ना। कमजोरी तो नहीं आती। *बाप सर्वशक्तिवान हैं, तो बच्चों को बाप अपने से भी आगे रखते हैं। बाप ने कितना ऊंच बनाया है, क्या क्या दिया है - इसी का सिमरण करते-करते सदा हर्षित और शक्तिशाली रहेंगे।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  अंत मते सो गति क्या होगी? समझदार तो हो ना? इसलिए अपनी मनसा को बिजी रखेंगे ना, *मनसा सेवा का टाइमटेबुल बनायेंगे अपना तो बिन्दी लगाने की आवश्यकता नहीं पडेगी। बस, होंगे ही बिन्दी रूप। इसलिए अभी अपने मन का टाइमटेबुल फिक्स करो।*

 

✧  *मन को सदा बिजी रखो, खाली नहीं रखो।* फिर मेहनत करनी पडती है। ऊँचे-ते-ऊँचे भगवान के बच्चे हो, तो *आपका एक-एक सेकण्ड का टाइमटेबुल फिक्स होना चाहिए* क्यों नहीं बिन्दी लगती, उसका कारण क्या?

 

✧  *ब्रेक पॉवरफुल नहीं है। शक्तियों का स्टॉक जमा नहीं है इसलिए सेकण्ड में स्टॉप नहीं कर सकते।* कई बच्चे कोशिश बहुत करते हैं, जब बापदादा देखते हैं मेहनत बहुत कर रहे हैं, यह नहीं हो, यह नहीं हो, कहते हैं नहीं हो लेकिन होता रहता है।

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧  किसको देखते हो? आकार को देखते व अव्यक्त का देखते हो? *अगर अपनी व औरों की आकृति को न देख अव्यक्त को देखेंगे तो आकर्षण मूर्त बनेंगे।* अगर आकृति को देखते तो आकर्षण-मूर्त नहीं बनते हो। *आकर्षण-मूर्त बनना है तो आकृति को मत देखो। आकृति के अन्दर जो आकर्षण रूप है, उसको देखने से ही अपने से औरों को आकर्षण होगा। तो अब यही अव्यक्त सर्विस रही हुई है।* कोई भी चित्र को देखते हो, तो चित्र को नहीं देखो, लेकिन चित्र के अन्दर जो चेतन है उसको देखो। *और उस चित्र के जो चरित्र हैं उन चरित्रों को देखो। चेतन और चरित्र को देखेंगे तो चरित्र तरफ ध्यान जाने से चित्र अर्थात् देह के भान से दूर हो जायेंगे।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- पदमापदम भाग्यशाली की निशानी"*

 

_ ➳  *भोली -सी पथिक, और डगर अनजान... जब से मिले, वो, मै बनी, चतुर सुजान*... *संगम पर मेरे श्रेष्ठ भाग्य की अनोखी सी सौगात लेकर हाजिर हुए वो सच्चें- सच्चे रूहानी रत्नाकर*... मुझ आत्मा को सौदागरी सिखा रहे है... *पदमापदम भाग्यशाली हूँ मैं आत्मा, मेरे भाग्य का दर्पण दिखा रहे है, और इस भाग्य के दर्पण में कोहिनूर की भाँति जगजगाती मैं आत्मा बैठी हूँ बापदादा के सम्मुख, और दिलोजान से ग्रहण कर रही हूँ उनकी हर मीठी समझानी को*...

 

  *रत्नों के खजानों से मालामाल करने वाले चतुर सुजान बाप मुझ आत्मा से बोले:-* "दुनिया के हिसाब से भोली, मगर बाप को पहचानने की दिव्य नेत्रधारी मेरी बच्ची... आपने मेरा बाबा कहकर पदमों की कमाई का अधिकार पा लिया,.. *दिन रात ज्ञान रत्नों से खेलते आप बच्ची स्वयं का महत्व समझी हो, बापदादा आप बच्ची को जिस नजर से देखते है अब उन नजरों को साकार करों..."*

 

_ ➳  *मुझ आत्मा को सच्चा सौदा सिखा सौदागर बनाने वाले बाप से मैं दिव्य नेत्र धारी आत्मा बोली:-* "मीठे बाबा... *मुरीद हूँ मैं इन आँखों की, जिसने आपको पहचाना है, हर शुक्रिया आपको ही जाता है, क्योंकि ये आँखें भी तो आपका ही नजराना है*... मीठे बाबा, ये बुद्धि अब दिव्य हो गई है, जीवन ही दिव्यता में ढल रहा है, इस रूह के ताने बाने में आपके गुण और शक्तियों के रंग और भी गहरे हो गये है... देखो, मेरा हर संस्कार बदल रहा है... *आपकी आँखों मे मैं अपना सम्पूर्ण स्वरूप देखती हूँ बाबा और हर पल उसी का स्वरूप बन रही हूँ..."*

 

  *हर पल उमंगो की बरसात कर मेरे रोम- रोम को उमंगों से भरपूर करने वाले बापदादा बोले:-* "इनोसैन्ट से सैन्ट बनी मेरी राॅयल बच्ची... देखो, अनेक बातों को समझने वाले समझदार अरबों- खरबो की गिनती कर रहे है... समय स्वाँस और संकल्प का खजाना कौडियों के भाव लुटा घाटे का सौदा कर रहे है... *ये वैरी वैरी इनोसैन्ट परसन है जो खुद को बहुत समझू सयाने समझ रहे है... अब इन सबको भी आप समान सौदागर बनाओं... जो अपनी आँखों से पहचाना है उसकी पहचान इनको भी कराओं..."*

   

_ ➳  *अमृत वेले से अमृत का पान कर दिन भर ज्ञान रत्नों से खेलने वाली मैं आत्मा रत्नागर बाप से बोलीं:-* "मीठे बाबा... *उंमगों के उडनखटोले में आपने संग बैठाकर उडना सिखाया है... आपकी अनोखी पालना ने हर पल मुझे मेरे श्रेष्ठ भाग्य का अनुभव कराया है*... आपकी हर चाहत अब मेरी धडकन बन रही है... *बैक बोन बने आप निमित्त बन चला रहे हो, वैरी वैरी इनोसैन्ट इन आत्माओं को ज्ञान रत्नों का अनोखा खेल भाने लगा है*... सांइलेंस की जादूगरी से बाबा इनको खेल पदमों का समझ आने लगा है..."

 

  *हर प्रकार की माया से सेफ रख मायाजीत बनाने वाले रूहानी जादूगर मुझ आत्मा से बोले:-* "अपनी निर्विघ्न स्थिति द्वारा वायुमंडल को पावर फुल बनाने वाली मेरी श्रेष्ठ ब्राह्मण बच्ची... *एकता और दृढता के बल से सर्व के प्रति शुभसंकल्पों की लहर फैलाओं, सब के प्रति शुभ संकल्पो से हर आत्मा को बदलकर अब बाप की प्रत्यक्षता का झंडा फहराओं...* संकल्पों के इस खजाने से अब हर आत्मा का परिचय कराओं... संगठन की एकता में अब बस शुभभावो की लहर फैलाओं..."

 

_ ➳ *बाप को कदम हर कदम फालो करने वाली मैं मास्टरज्ञान सागर आत्मा, ज्ञान सागर बापदादा से बोली:-* "मीठे बाबा... संकल्पों की दृढतासंगठन की एकता और साइलेंस के बल से आत्माओं को आपका निरन्तर संदेश जा रहा है...* संगम युगी मुझ श्रेष्ठ ब्राह्मण आत्मा का भाग्य देखकर हर आत्मा परम सुख पा, इस ओर आ रही है... बस *एक बाबा* कहकर *पदमो की कमाई का सुख पाकर अपने भाग्य की सराहना करने वाली ये भोली आत्माए बाप समान चतुर सुजान बनती जा रही है...* और बापदादा मुझे गले से लगाकर सफलता का वरदान दे रहे है..."

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  स्वयं को पदमापदम भाग्यशाली अनुभव करना*"

 

_ ➳  अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित मैं आत्मा मन ही मन विचार करती हूँ कि कितनी पदमापदम सौभाग्यशाली हूँ मैं आत्मा कि *जिस ब्राह्मण सम्प्रदाय को भक्ति में सबसे ऊंच माना जाता है वो सच्ची ब्राह्मण आत्मा मैं हूँ जिसे स्वयं परम पिता परमात्मा ने आ कर ब्रह्मा मुख से अडॉप्ट करके ईश्वरीय सम्प्रदाय का बनाया है*। मैं वो कोटो में कोई और कोई में भी कोई सौभाग्यशाली आत्मा हूँ जिसे स्वयं भगवान ने चुना है।

 

_ ➳  बड़े - बड़े महा मण्डलेशवर, साधू सन्यासी जिस भगवान की महिमा के केवल गीत गाते हैं लेकिन उसे जानते तक नही, वो भगवान रोज मेरे सम्मुख आकर मेरी महिमा के गीत गाता है। *रोज मुझे स्मृति दिलाता है कि "मैं महान आत्मा हूँ" "मैं विशेष आत्मा हूँ" "मैं इस दुनिया की पूर्वज आत्मा हूँ"। *"वाह मेरा सर्वश्रेष्ठ भाग्य" जो मुझे घर बैठे भगवान मिल गए और मेरे जीवन मे आकर मुझे नवजीवन दे दिया*। उनका निस्वार्थ असीम प्यार पा कर मेरा जीवन धन्य - धन्य हो गया। इस जीवन में अब कुछ भी पाने की इच्छा शेष नही रही। जो मैंने पाना था वो अपने ईश्वर, बाप से मैंने सब कुछ पा लिया है।

 

_ ➳  अपने सर्वश्रेष्ठ भाग्य की स्मृति में खोई हुई मैं अपने भाग्य को बदलने वाले भाग्यविधाता बाप को जैसे ही याद करती हूँ वैसे ही मेरे भाग्यविधाता बाप मेरे सामने उपस्थित हो जाते हैं। *अपने लाइट माइट स्वरूप में भगवान जैसे ही मुझ ब्राह्मण आत्मा पर दृष्टि डालते हैं उनकी पावन दृष्टि मुझे भी लाइट माइट स्वरूप में स्थित कर देती है और डबल लाइट फ़रिश्ता बन मैं चल पड़ती हूँ बापदादा के साथ इस साकारी लोक को छोड़ सूक्ष्म लोक में*। बापदादा के सामने मैं फ़रिश्ता बैठ जाता हूँ।

 

_ ➳  बापदादा की मीठी दृष्टि और उनकी सर्वशक्तियों से स्वयं कोभरपूर करके मैं अपने जगमग करते ज्योतिर्मय स्वरूप को धारण कर अपने परमधाम घर की ओर चल पड़ती हूँ। *सेकण्ड में मैं आत्मा पहुँच जाती हूँ अपने घर मुक्तिधाम में। यहां मैं परम मुक्ति का अनुभव कर रही हूँ। मैं आत्मा शांति धाम में शांति के सागर अपने शिव पिता परमात्मा के सम्मुख गहन शान्ति का अनुभव कर रही हूँ*। मेरे शिव पिता परमात्मा से सतरंगी किरणे निकल कर मुझ आत्मा पर पड़ रही हैं और मैं स्वयं को सातों गुणों से सम्पन्न अनुभव कर रही हूँ। शिव बाबा से अनन्त शक्तियाँ निकल कर मुझ में समाती जा रही हैं। कितना अतीन्द्रिय सुख समाया हुआ है इस अवस्था में।

 

_ ➳  बीज रूप अवस्था की गहन अनुभूति करने के बाद अब मैं आत्मा वापिस लौट आती हूँ अपने साकारी ब्राह्मण तन में और भृकुटि पर विराजमान हो जाती हूँ। *अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित मैं आत्मा अब सदा इसी नशे में रहती हूँ कि मैं सबसे उंच चोटी की हूँ, ईश्वरीय सम्प्रदाय की हूँ*। आज दिन तक मेरा यादगार भक्ति में ब्राह्मणों को दिये जाने वाले सम्मान के रूप में प्रख्यात है। *आज भी भक्ति में ब्राह्मणों का इतना आदर और सम्मान किया जाता है कि उनकी उपस्थिति के बिना कोई भी कार्य सम्पन्न नही माना जाता और वो सच्ची ब्राह्मण आत्मा वो कुख वंशवाली ब्राह्मण नही बल्कि ब्रह्मा मुख वंशावली, ईश्वरीय पालना में पलने वाली, मैं सौभाग्यशाली आत्मा हूँ"।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

✺   *मैं फरिश्ते स्वरूप की स्मृति द्वारा बाप की छत्रछाया का अनुभव करने वाली विघ्न जीत आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

✺   *मैं स्वस्थिति से परिस्थिति पर सहज विजय प्राप्त कर लेने वाली सुख स्वरूप आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  1. बापदादा देख रहे थे कि सबसे *तीव्र गति की सेवा है - 'वृत्ति द्वारा वायब्रेशन फैलाना'। वृत्ति बहुत तीव्र राकेट से भी तेज है।* वृत्ति द्वारा वायुमण्डल को परिवर्तन कर सकते हो। जहाँ चाहो, जितनी आत्माओं के प्रति चाहो वृत्ति द्वारा यहाँ बैठे-बैठे पहुँच सकते हो। वृत्ति द्वारा दृष्टि और सृष्टि परिवर्तन कर सकते हो।

 

 _ ➳  2. आपके जड़ चित्र अब तक, लास्ट जन्म तक वायब्रेशन द्वारा सेवा कर रहे हैं ना! देखा है ना! मन्दिर देखा हैं ना!

 

 _ ➳  3. *मन्दिर की मूर्तियाँ प्रत्यक्ष रूप में वायब्रेशन द्वारा सेवा कर रहे हैं* अर्थात् आप आत्मायें मन्दिर की मूर्तियां सेवा कर रही हैं। कितने भक्त वायब्रेशन द्वारा अपनी सर्व इच्छायें पूर्ण कर रहे हैं। तो हे चैतन्य मूर्तियाँ, *अब अपने शुभ भावना की वृत्ति, शुभ कामनाओं की वृत्ति से वायुमण्डल में वायब्रेशन फैलाओ।*

 

✺   *ड्रिल :-  "वृत्ति द्वारा वायब्रेशन फैलाने का अनुभव"*

 

 _ ➳  मैं मास्टर सर्वशक्तिमान ब्राह्मण आत्मा *डाइमंड हॉल में बापदादा के समक्ष बिराजमान हूँ... बापदादा मुझे अपनी दृष्टि और वायब्रेशन से निहाल कर रहे है...* बाबा की भृकुटि से नैनो से कभी प्रेम तो कभी सुख तो कभी आनंद कि किरणें फैल रही है... कभी बापदादा मुझे शक्तिशाली फरिश्ता बना देते तो कभी पवित्रता के झरने में नहलाते है... मीठे बाबा को मुझ पर कितना गर्व है... *सबके मुख से यही निकल रहा है मेरा बाबा मेरा बाबा...* मेरा बाबा मीठा बाबा प्यारा बाबा... बापदादा देख रहे थे कि सबसे तीव्र गति की सेवा है - 'वृत्ति द्वारा वायब्रेशन फैलाना'... वृत्ति बहुत तीव्र राकेट से भी तेज है...

 

 _ ➳  जैसी हमारी वृति अर्थात हमारी कामनाएँ और हमारी भावनाएँ होती है वैसा ही वायुमंडल बनता जा रहा है... शुभ कामनाएँ और शुभ भावनाओं की मात्रा में थोडी सी भी कमजोरी आई तो वायुमंडल भी कमजोर संकल्पो का बन रहा है... जब की *बाबा की पॉवरफुल दृष्टि से वायुमंडल भी अचानक पॉवरफुल बन गया...* ये बाबा की पॉवरफुल वृति का ही कमाल है जो हम सब यहाँ मधुबन में बैठे है... इस तरह हम वृत्ति द्वारा वायुमण्डल को परिवर्तन कर सकते है... *वृत्ति द्वारा जहाँ चाहे, जितनी आत्माओं के प्रति चाहे यहाँ बैठे-बैठे पहुँच सकते है...*

 

 _ ➳  यहाँ बैठे बैठे मैं आत्मा संपूर्ण विश्व में *शुभभावना और शुभकामनाओ की वृत्ति द्वारा आत्माओ की दृष्टि और सृष्टि परिवर्तन कर रही हूँ...* मुझसे शुभभावना और शुभकामनाओ के प्रकंपन फैल रहे है... चाहे कुछ आत्माओ के प्रति हो या कोई आत्मा के प्रति हो या विश्व के प्रति हो सब जगह शुभ वायब्रेशन फैल रहे है... अब मैं आत्मा मंदिरो में स्थापित अपनी ही मूर्तियो को देख रही हूँ... मैं देख रही हूँ की *आज भी लास्ट जन्म तक ये मूर्तियां वायब्रेशन द्वारा सेवा कर रही हैं...*

 

 _ ➳  मन्दिर की *मूर्तियाँ प्रत्यक्ष रूप में वायब्रेशन द्वारा सेवा कर रही हैं...* अर्थात् मैं आत्मा मन्दिर की मूर्ति सेवा कर रही हूँ... मंदिर में खडे सारे भक्तो की वायब्रेशन द्वारा सर्व इच्छायें पूर्ण कर रही हूँ... घर घर में जहाँ कही भी मेरी मूर्ति विराजमान है उस घर की सारी आत्माएँ निश्चिंत और निर्भय स्थिति की अनुभूति कर रही है... मंदिरो में भीड बढती जा रही हैं... सारे भक्त तृप्त हो रहे है... *सबकी शुभ मनोकामनाएं पूर्ण होने पर सब सुख शांति संपन्न निर्विध्न जीवन जी रहे है...*

 

 _ ➳  जैसे मेरी जड मूर्ति इतना कर सकती है तो मैं तो स्वयं ही चैतन्य मूर्ति हूँ तो कितना कर सकती हूँ... *मैं संबंध संपर्क में आनेवाली हर एक आत्मा के प्रति शुभ भावना की वृत्ति और शुभ कामनाओं की वृत्ति से वायुमण्डल में वायब्रेशन फैलाती जा रही हूँ...* सबके विघ्न नष्ट हो रहे है... पूरे विश्व का भ्रमण करती जा रही हूँ... मैं सुन रही हूँ चारो ओर भक्तो की पुकार को... अपने हस्तो द्वारा, नैनो द्वारा और वायब्रेशन द्वारा सबका कल्याण करती जा रही हूँ... सब सुखी हो रहे है सबका भला हो रहा है... सब स्वयं को भरपूर महसूस कर रहे है... शुक्रिया बाबा आपका बहुत बहुत शुक्रिया...

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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