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 03 / 06 / 22  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *माता पिता को पूरा फॉलो किया ?*

 

➢➢ *सब कुछ इन्श्योर कर भविष्य में फुल बादशाही का अधिकार लिया ?*

 

➢➢ *ब्राह्मण जीवन में सदा ख़ुशी की खुराक खायी और खिलाई ?*

 

➢➢ *हर परिस्थिति में सहनशील बने ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *योग माना शान्ति की शक्ति। यह शान्ति की शक्ति बहुत सहज स्व को और दूसरों को परिवर्तन करती है, इससे व्यक्ति भी बदल जायेंगे तो प्रकृति भी बदल जायेगी।* व्यक्तियों को तो मुख का कोर्स करा लेते हो लेकिन प्रकृति को बदलने के लिए शान्ति की शक्ति अर्थात् योगबल ही चाहिए।

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं तपस्वी आत्मा हूँ"*

 

  तपस्वी आत्माएं हैं - ऐसे अनुभव करते हो? *तपस्या अर्थात् एक बाप दूसरा न कोई। ऐसे है या दूसरा कोई है अभी भी कोई है? कोई व्यक्ति या कोई वैभव? एक के सिवाए और कोई नहीं या थोड़ा लगाव है? निमित्त बनकर सेवा करना वह और बात है लेकिन लगाव जहाँ भी होगा, चाहे व्यक्ति में, चाहे वैभव में, तो लगाव की निशानी है, वहाँ बुद्धि जरूर जायेगी। मन भागेगा जरूर।* तो चेक करो कि सारे दिन में मन और बुद्धि कहाँ-कहाँ भागती है? सिवाए बाप और सेवा के और कहाँ तो मन-बुद्धि नहीं जाती? अगर जाती है तो लगाव है। अगर व्यवहार भी करते हो, जो भी करते हो, वो भी ट्रस्टी बनकर। मेरा नहीं, तेरा। मेरा काम है, मुझे ही देखना पड़ता है.. मेरी जिम्मेवारी है.. ऐसे कहते हो कभी? क्या करें, मेरी जिम्मेवारी है ना, निभाना पड़ता है ना, करना पड़ता है ना, कहते हो कभी? या तेरा तेरे अर्पण, मेरा कहां से आया? तो यह बोल भी नहीं बोल सकते हो? मुझे ही देखना पड़ता है, मुझे ही करना पड़ता है, मेरा ही है, निभाना ही पड़ेगा...। मेरा कहा और बोझ हुआ। बाप का है, बाप करेगा, मैं निमित्त हूँ तो हल्के। बोझ उठाने की आदत तो नहीं है? 63 जन्म बोझ उठाया ना। कइयों की आदत होती है बोझ उठाने की। बोझ उठाने बिना रह नहीं सकते। आदत से मजबूर हो जाते हैं।

 

✧  मेरा मानना माना बोझ उठाना सभी तपस्या में सफलता को प्राप्त कर रहे हो ना। तपस्या में सन्तुष्ट हो? अपने चार्ट से सन्तुष्ट हो? या अभी होना है? यह भी एक लिफ्ट की गिफ्ट है। गिफ्ट जो होती है उसमें खर्चा नहीं करना पड़ता, खरीदने की मेहनत नहीं करनी पड़ती। *एक तो है अपना पुरुषार्थ और दूसरा है विशेष बाप द्वारा गिफ्ट मिलना। तो तपस्या वर्ष एक गिफ्ट है, सहज अनुभूति की गिफ्ट। जितना जो करना चाहे कर सकता है। मेहनत कम, निमित्त मात्र और प्राप्ति ज्यादा कर सकते हैं।* अभी भी समय है, वर्ष पूरा नहीं हुआ है। अभी भी जो लेने चाहो ले सकते हो। इसलिए सफलता का सूर्य इस्ट में जगाओ। सदा सभी खुश हैं या कभी-कभी कुछ बातें होती तो नाखुश भी होते हो? खुशी बढ़ती जाती है, कम तो नहीं होती है?

 

  मायाजीत हो या माया रंग दिखा देती है? वह कितना भी रंग दिखाये, मैं मायापति हूँ। माया रचना है, मैं मास्टर रचयिता हूँ। तो खेल देखो लेकिन खेल में हार नहीं खाओ। कितना भी माया अनेक प्रकार का खेल दिखाये, आप देखने वाले मनोरंजन समझकर देखो। देखते-देखते हार नहीं जाओ। साक्षी होकर के, न्यारे होकर के देखते चलो। सभी तपस्या में आगे बढ़ने वाले, गिफ्ट लेने वाले हो? सेवा अच्छी हो रही है? स्वयं के पुरुषार्थ में उड़ रहे हैं और सेवा में भी उड़ रहे हैं। सभी फर्स्ट हैं। *सदा फर्स्ट रहना, सेकेण्ड में नहीं आना। फर्स्ट रहेंगे तो सूर्यवंशी बनेंगे, सेकेण्ड बनें तो चन्द्रवंशी। फर्स्ट नम्बर मायाजीत होंगे। कोई समस्या नहीं, कोई प्रॉब्लम नहीं, कोई क्वेश्चन नहीं, कोई कमजोरी नहीं। फर्स्ट नम्बर अर्थात् फास्ट पुरुषार्थ। जिसका फास्ट पुरुषार्थ है वो पीछे नहीं हो सकता। सदा साक्षी और सदा बाप के साथी - यही याद रखना।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  अशरीरी भव - यह वरदान प्राप्त कर लिया है? *जिस समय संकल्प करो कि 'मैं अशरीरी हूँ', उसी सेकण्ड स्वरूप बन जाओ।* ऐसा अभ्यास सहज हो गया है? *सहज अनुभव होना - यही सम्पूर्णता की निशानी है।*

 

✧  कभी सहज, कभी मुश्किल, कभी सेकण्ड में, कभी मिनिट में या और भी ज्यादा समय में अशरीरी स्वरूप का अनुभव होना अर्थात सम्पूर्ण स्टेज से अभी दूर है। *सदा सहज अनुभव होना - यही सम्पूर्णता की परख है।*

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ रायल्टी किन बातों की व रीयल्टी किस बात की? पहले अपने स्वरूप की रीयल्टी। *अगर रीयल्टी अर्थात् अपने असली स्वरूप की सदा स्मृति है तो स्वरूप की रीयल्टी से इस स्थूल सूरत में भी अलौकिक रायल्टी नज़र आयेगी। जो भी देखेंगे उनके मुख से यही निकलेगा कि यह इस दुनिया के नहीं हैं लेकिन अलौकिक दुनिया के फरिश्ते हैं अथवा यह स्वर्ग का कोई देवता उतरा है। ऐसे रायल्टी से अनुभव होगा।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  कब्रिस्तान से दिल न लगाना"*

 

_ ➳  अपने प्रियतम बाबा से  मै आत्मा मिलन मनाने, देह से निकल उड़ चली...सफेद प्रकाशमय काया में प्यारे बाबा, मुझे स्नेह भरी नजरो से आमन्त्रण दे रहे... बाहे पसारे मुझे बुला रहे है... और कह रहे फूल बच्चे... अपने फूल से दिल को सदा तरोताजा सा रखने के लिए सिर्फ मुझसे ही दिल लगाना... मेरे रूहानी फूल इस कब्रिस्तान के काबिल नही... तभी तो *मीठा बाबा अपना धाम छोड़ धरा पर सुखो का परिस्तान बनाने आया है.*..आप महकते फूलो के लिए ही तो यह गुलिस्तां सजाने आया है..."

 

   *मीठे बाबा मुझ आत्मा के असीम सुखो की व्यवस्था परिस्तान में करते हुए मुस्कराये और बोले:-* "मेरे फूल बच्चे *ईश्वरीय सन्तान होकर,अब इस कब्रिस्तान बनी दुनिया से और दिल न लगाओ..*. यह दुखदायी दुनिया आप फूलो के लिए नही है... यहाँ के क्षणिक से सुख में गहरे दुखो की तपिश समायी है... अब ईश्वरीय हाथ को पकड़कर इस दलदल से निकल जाओ..."

 

_ ➳  *प्यारे बाबा की श्रीमत को सुनकर... मै आत्मा, ईश्वर पिता की दिल से आभारी हो गयी और कहा :-* "हाँ मेरे मीठे बाबा आपकी श्रीमत ही अब मेरे दिल का आराम है... मुझ आत्मा का सच्चा सौंदर्य श्रीमत में ही छुपा है... यह दुखदायी कब्रिस्तान मेरे किसी काम का नही... *आपकी यादो में मै आत्मा परिस्तान की परी बनने का भाग्य पा रही हूँ.*.."

 

   *मीठे बाबा मेरी दिली स्वीकृति पर मोहित होकर कहने लगे :-* "मेरे लाडले मीठे बच्चे... सब कुछ तो अनुभव करके देख लिया... क्या सच्चा सुख, सच्चे प्रेम और शांति का अनुभव इस कब्रिस्तान में कभी किया... तो क्यों ना *उन मीठे सुखो की यादो को संजोलो... जो 21 जनमो तक सच्ची खुशियां लुटाएंगे.*.. और सतयुग परिस्तान का मालिक सजायेंगे..."

 

_ ➳  *मै आत्मा अपने मीठे बाबा को मुझ आत्मा के सुखो में... इतना तल्लीन होकर देखती हूँ तो कहती हूँ :-* "ओ सिकीलधे बाबा आपका शुक्रिया कर सकूं वो अल्फाज कहाँ से मै लाऊँ... *आपने दिव्य बुद्धि से मेरा दामन सजा दिया.*.. सारी चिंताए, सारे कष्टो को काफूर कर दिया... और यूँ बेठे बिठाये मुझे परिस्तान की सोनपरी बना दिया..."

 

   *मीठे बाबा मुस्कराते हुए कह रहे :-* "लाडले बच्चे... अपने बच्चों के सुखो की फ़िक्र में ही तो मै पिता सदा खपता हूँ... तभी तो कभी धरती तो कभी परमधाम में विचरण करता हूँ... मेरे दुखो में कुम्हलाये फूल बच्चे... फिर से असीम खुशियो में महकने लगे तो पिता के कलेजे को आराम आये... *बच्चे खुशियो के परिस्तान में खिलखिलाए, झूमे, नाचे और गुनगुनाये तो इन किलकारियों में पिता दिल सुकून पाये.*.."

 

_ ➳  *अपने प्यारे बाबा के दिली भाव सुनकर, मै आत्मा भाव विभोर हो गई... मीठे बाबा के प्यार में खो गयी और कहने लगी :-* "प्यारे बाबा... धरती के रिश्तो में सुख की एक बून्द के लिए व्याकुल थी...और *आपने सच्चे सुखो का समन्दर देकर जीवन कितना प्यारा और सुखदायी बना दिया है* मै आत्मा कब्रिस्तान की और नजर भी न फेरूँगी... और खुशियो के परिस्तान को निगाहो से ओझल भी न होने दूंगी कभी... अपने मीठे बाबुल से यह वादा कर मै आत्मा,अपने कर्मक्षेत्र पर लौट आई..."

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- और सब संग तोड़ मात पिता को पूरा-पूरा फॉलो करना है*"

 

_ ➳  मात पिता को फॉलो करने का दृढ़ संकल्प अपने मन मे ले कर मैं जैसे ही मम्मा बाबा के बारे में विचार करती हूं, मन बुद्धि से पहुंच जाती हूं उनकी कर्मभूमि मधुबन में जहां उनके हर कर्म का यादगार है। *अब मैं स्वयं को उस स्थान पर देख रही हूं जहां मम्मा बाबा के मुखारविंद से मन को आलोकित, आनंदित और निर्मल करने वाले महावाक्य सुनने के लिए सभी ब्राह्मण आत्माएं एकत्रित हैं*।

 

_ ➳  सामने संदली पर मम्मा बाबा आकर बैठ जाते हैं। दोनों दिव्य मूर्त, दोनों के मुखमंडल पर पवित्रता की अनोखी झलक और दिव्य तेज स्पष्ट दिखाई दे रहा है। *मम्मा बाबा दोनों मधुर मुस्कान से, स्नेह भरे नयनो से सबको निहार रहें हैं*। उनके आने का ढंग, बैठने की रीति, उनकी प्रीति, उनके निहारने की विधि बहुत ही न्यारी है। मैं इस दृश्य को देख मन ही मन अपने भाग्य की सराहना कर रही हूं।

 

_ ➳  तभी शिव बाबा ब्रह्मा बाबा के साकारी तन में प्रवेश करते हैं। बाबा के प्रवेश होते ही ब्रह्मा बाबा के मुखमण्डल पर दिव्य तेज कई गुणा बढ़ जाता है और उनकी भृकुटि से शक्तिशाली प्रकंपन निकल कर पूरी क्लास में फैल जाते हैं। *क्लास में खुशी की लहर के साथ साथ मन को गहन शांति का अनुभव कराने वाला सन्नाटा छा जाता है*। सभी ब्राह्मण बच्चे बाप दादा को निहारते हुए, बाप दादा की मीठी दृष्टि लेकर स्वयं को भरपूर कर रहे हैं। बाप दादा सभी बच्चों को एक-एक करके अपने पास बुला रहे हैं, उन्हें मीठी दृष्टि देते हुए उन से मीठी मीठी रूह रिहान कर रहे हैं। *एक एक करके सभी बच्चे मात-पिता की अलोकिक गोद का दिव्य सुख और उनके पवित्र हाथों से टोली ले रहे हैं*।

 

_ ➳  बापदादा अपने मधुर महावाक्यों से बच्चों को मीठी समझानी भी दे रहें हैं। सबको परमात्म मिलन का अलौकिक सुख प्रदान कर शिव बाबा अपने धाम लौट जाते हैं। *मम्मा सभी बच्चों से खुश - खैराफ़त पूछते हुए कह रही है, देखो बच्चे-"बाप दादा के घर आए हो सुख पाने के लिए*। कोई भी स्थूल सूक्ष्म सेलवेशन चाहिए हो तो बताना, किसी प्रकार की लज्जा नहीं करना।

 

_ ➳  अब ब्रह्मा बाबा सभी बच्चों को ड्रिल कराते हुए कहते हैं - अच्छा बच्चे, अब बैठो अपने अति प्यारे शिव बाबा की याद में। अशरीरी हो जाओ और बुद्धि को ले जाओ परमधाम। *देखो तुम बैठे तो फर्श पर हो लेकिन तुम्हारी बुद्धि सदा अर्श अर्थात परमधाम में रहनी चाहिए*। देह और देह के सर्व सम्बन्धो से तोड़ निभाते हुए बुद्धि का योग केवल शिव बाबा के साथ लगा रहे यह अभ्यास हर समय करते रहो। बाबा के ऐसा कहते ही सभी आत्मिक स्थिति में स्थित हो जाते हैं और शिव बाबा की याद में अशरीरी हो कर बैठ जाते हैं।

 

_ ➳  अशरीरी स्थिति में स्थित होते ही अब मैं आत्मा अपनी साकारी ब्राह्मण देह से निकल कर पहुंच जाती हूँ अपने पिता परमात्मा शिव बाबा के पास परमधाम और उनके साथ कम्बाइंड हो कर उनकी सर्वशक्तियो को स्वयं में समाने लगती हूं। *भरपूर हो कर लौट आती हूँ वापिस अपने साकारी ब्राह्मण तन में और अपने प्यारे बाबा से प्रोमिस करती हूं कि देह और देह की दुनिया मे रहते, सबसे तोड़ निभाते, मम्मा बाबा को फॉलो कर उनके समान बनने का तीव्र पुरुषार्थ मैं अभी से ही अवश्य करूँगी*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं ब्राह्मण जीवन मे सदा खुशी की खुराक खाने और खिलाने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं श्रेष्ठ नसीबवान आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा हर परिस्थिति में सदा सहनशील बन जाती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा सदैव मौज का अनुभव करती हूँ  ।*

   *मैं सहनशील आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

✺ अव्यक्त बापदादा :-

➳ _ ➳ *इस पुरानी देह को बापदादा द्वारा मिली हुई अमानत' समझो। सेवा अर्थ कार्य में लगाना है। यह मेरी देह नहीं लेकिन सेवा अर्थ अमानत है। जैसे मेहमान बन देह में रह रहे हैं।* थोड़े समय के लिए बापदादा ने कार्य के लिए आपको यह तन दिया है। तो आप क्या बन गये? मेहमान! मेरे-पन का त्याग और मेहमान समझ महान कार्य में लगाओ। मेहमान को क्या याद रहता है? असली घर याद रहता है या उसी में ही फँस जाते हो! तो आप सबका यह शरीर रूपी घर भी, यह फारिश्ता स्वरूप है, फिर देवता स्वरूप है। उसको याद करो। इस पुराने शरीर में ऐसे ही निवास करो जैसे बापदादा पुराने शरीर का आधार लेते हैं लेकिन शरीर में फँस नहीं जाते हैं। कर्म के लिए आधार लिया और फिर अपने फरिश्ते स्वरूप में स्थित हो जाओ। अपने निराकारी स्वरूप में स्थित हो जाओ। न्यारेपन की ऊपर की ऊँची स्थिति से नीचे साकार कर्मेन्द्रियों द्वारा कर्म करने लिए आओ, इसको कहा जाता है - मेहमान अर्थात् महान'। ऐसे रहते हो? त्याग का पहला कदम पूरा किया है?

✺ *"ड्रिल :- स्वयं को इस देह में मेहमान समझ महान अवस्था का अनुभव करना"*

➳ _ ➳ मैं आत्मा बाबा की याद में चली जा रही हूँ... बाबा तेज धूप में मुझपर अपनी ठंडी छत्रछाया डाल रहे हैं... कुछ दूर चलते-चलते मुझे कुछ लोग दिखाई दिए... उन्होंने मुझे रोका और किसी घर का पता पूछा... तभी मैने जाना तो वो मेरे ही लौकिक घर का पता था... मैं उनको आदर भाव से घर ले गयी... और उसी समय से मैं उन्हें ध्यान से देखने लगी... मैने देखा कि *वो एक स्थान पर बैठे हैं... और इस घर की किसी भी चीज को छू भी नहीं रहे है... और बार बार उस घर की बात कर रहे हैं, जहाँ से वो आये है... हमने उनका बहुत आदर भाव और मान मनुहार किया... वो बहुत खुश भी थे... परंतु बार बार अपने घर को याद करते है...*

➳ _ ➳ उन्हें देखकर मैं सोचने लगती हूँ... कि इन्हे इतना मान सम्मान और प्यार मिल रहा है तब भी ये अपने घर को नहीं भूल रहे... यहाँ की किसी भी चीज में ममत्व नहीं है... हर कर्म करते भी अपनी बुद्धि से अपने घर को याद कर रहे है... इन्हे मालूम है ये सिर्फ कुछ दिनो के लिए यहाँ आये है... फिर इन्हे वापिस अपने घर जाना है... *इसलिए जब ये मेहमान यहाँ से जाएंगे तब इन्हे यहाँ की चीजें याद नहीं आएँगी... और ना ही इनमें इनका मोह होगा... क्योंकि इन्हे पता है कि ये कोई भी चीज इनकी नहीं है...* मेहमान यहाँ पूरे परिवार के साथ रहते भी मन बुद्धि से अपने घर की याद में थे... इसलिए ये आसानी से बिना किसी दुःख के यहाँ से प्रस्थान कर रहे है...

➳ _ ➳ इस दृश्य को देखकर मैं मन बुद्धि से बाबा के पास चली जाती हूँ... और बाबा से कहती हूँ... बाबा... मेरा मार्गदर्शन कीजिये... और बाबा मुझसे कहते है... मेरे मीठे बच्चे, *तुम्हारा यह शरीर भी तुम्हारा नहीं है... यह सिर्फ कर्म करने के लिये तुम्हें मिला है...* तुम हमेशा इस शरीर को समझो जैसे तुम इसमे मेहमान हो... तुम्हे इस कमरे रूपी मकान में हमेशा नहीं रहना... इसमे रहकर अपना हर कर्म निभाना है... मेहमान के बुद्धि में हमेशा अपना घर रहता है... ऐसे ही तुम्हारी बुद्धि में भी हमेशा अपना असली स्वरूप रहना चाहिए... इस विनाशी शरीर से किसी भी प्रकार का लगाव नहीं रखना है... अगर इससे लगाव रखोगे तो अंत में इससे आसानी से नहीं निकल पाओगे... निकलते समय बहुत दुःख होगा...

➳ _ ➳ बाबा के वचन सुनकर मैं आत्मा बाबा से वादा करती हूँ... और कहती हूँ... बाबा... *मैं भी इस शरीर को सिर्फ़ कर्म करने का साधन मात्र समझूँगी... मैं हमेशा यह याद रखूँगी कि मैं एक ज्योतिर्बिन्दु हूँ... मैं इस शरीर और इन कर्मेन्द्रियों की मालिक हूँ...* मैं यह याद रखूँगी कि ये शरीर मुझे इस कर्मक्षेत्र पर कर्म करने के लिए मिला है... कर्म करते समय मैं अपने आपको चलता फिरता फ़रिश्ता स्वरूप में ही अनुभव करूँगी... जब कार्य समाप्त होगा मैं ज्योतिर्बिन्दु बनकर अपनी शक्तियां बढ़ाऊंगी... मैं आत्मा इस शरीर में मेहमान बनकर प्रवेश करूँगी... और मेहमान बनकर ही प्रस्थान करूँगी... और जब भी मैं आत्मिक स्थिति में रहकर कर्म करूँगी तो अपनी महान स्थिति का अवश्य ही अनुभव करूँगी...

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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