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 03 / 07 / 20  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *शांतिधाम और सुखधाम को याद किया ?*

 

➢➢ *ब्राह्मण सो देवता बनने का पुरुषार्थ किया ?*

 

➢➢ *तीन सेवाओं के बैलेंस द्वारा सर्व गुणों की अनुभूति की ?*

 

➢➢ *निश्चय रुपी फाउंडेशन पक्का रहा ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *अभी तो कुछ नहीं है, अभी तो सब कुछ होना है, डरना नहीं, खेल है। विनाश नहीं, परिवर्तन होना है।* सबमें वैराग्य वृत्ति उत्पन्न होनी है इसलिए रहमदिल बन सर्व शक्तियों द्वारा परेशान आत्माओं को शक्ति की सकाश दे रहम करो।

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं बाप के हर कार्य का साथी हूँ"*

 

   अपने को बाप के हर कार्य में सदा साथी समझते हो? जो बाप का कार्य है वह हमारा कार्य है। बाप का कार्य है-पुरानी सृष्टि को नया बनाना, सबको सुख-शान्ति का अनुभव कराना। यही बाप का कार्य है। तो जो बाप का कार्य है वह बच्चों का कार्य है। *तो अपने को सदा बाप के हर कार्य में साथी समझने से सहज ही बाप याद आता है। कार्य को याद करने से कार्य- कर्ता की याद स्वत: ही आती है। इसी को ही कहा जाता है सहज याद। तो सदा याद रहती है या करना पड़ता है?*

 

 जब कोई माया का विघ्न आता है फिर याद करना पड़ता है। वैसे देखो, आपका यादगार है विघ्न-विनाशक। गणेश को क्या कहते हैं? विघ्नविनाशक। तो विघ्न-विनाशक बन गये कि नहीं? *विघ्न-विनाशक अर्थात् सारे विश्व के विघ्न-विनाशक। अपने ही विघ्नविनाशक नहीं, अपने में ही लगे रहे तो विश्व का कब करेंगे? तो सारे विश्व के विघ्न-विनाशक हो। इतना नशा है? कि अपने ही विघ्नों के भाग-दौड़ में लगे रहते हो?*

 

  विघ्न-विनाशक वही बन सकता है जो सदा सर्व शक्तियों से सम्पन्न होगा। कोई भी विघ्न विनाश करने के लिए क्या आवश्यकता है? शक्तियों की ना। *अगर कोई शक्ति नहीं होगी तो विघ्न विनाश नहीं कर सकते। इसलिए सदा स्मृति रखो कि बाप के सदा साथी हैं और विश्व के विघ्न-विनाशक हैं। विघ्न-विनाशक के आगे कोई भी विघ्न आ नहीं सकता। अगर अपने पास ही आता रहेगा तो दूसरे का क्या विनाश करेंगे।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  मेरा पुरुषार्थ, मेरा इन्वेन्शन, मेरी सर्विस, मेरी टचिंग, मेरे गुण बहुत अच्छे हैं। मेरी हैन्डलिंग पॉवर बहुत अच्छी है, मेरी निर्णय शक्ति बहुत अच्छी है, मेरी समझ ही यथार्थ है। बाकी सब मिसअन्डरस्टैन्डिंग में हैं। *यह मेरा-मेरा आया कहाँ से?*

 

✧  यही रॉयल माया है, इससे मायाजीत बन जाओ तो सेकण्ड में प्रकृतिजीत बन जायेंगे। प्रकृति का आधार लेंगे लेकिन अधीन नहीं बनेंगे। प्रकृतिजीत ही विश्वजीत व जगतजीत है। *फिर एक सेकण्ड का डायरेक्शन अशरीरी भव का सहज और स्वत: हो जायेगा।*

 

✧  खेल क्या देखा। तेरे को मेरे बनाने में बडे होशियार हैं। जैसे जादू मन्त्र से जो कोई कार्य करते हैं तो पता नहीं पडता कि हम क्या कर रहे हैं। *यह रॉयल माया भी जादू-मन्त्र कर देती है जो पता नहीं पडता कि हम क्या कर रहे हैं।*

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ तो जहाँ प्रभु प्रीत है वहाँ अशरीरी बनना क्या लगता है? *प्रीत के आगे अशरीरी बनना एक सेकण्ड के खेल के समान है। बाबा बोला और शरीर भूला। बाबा शब्द ही पुरानी दुनिया को भूलने का आत्मिक बाम्ब है।* (बिजली बन्द हो गई) जैसे यह स्विच बदली होने का खेल देखा ऐसे वह स्मृति का स्विच है *बाप का स्विच ऑन और देह और देह की दुनिया की स्मृति का स्विच ऑफ। यह है एक सेकण्ड का खेल।* मुख से बाबा बोलने में भी टाइम लगता है लेकिन स्मृति में लाने में कितना समय लगता है। तो प्रीत में रहना अर्थात अशरीरी सहज बनना।

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- सर्व की सदगति करने वाले बाप की संतान होने का नशा रहना"*

 

_ ➳  *मैं आत्मा सेण्टर में बाबा के कमरे में बैठ अपने दिल दर्पण में देख रही हूँ- अपने तकदीर की तस्वीर को... स्वयं भाग्यविधाता परमात्मा ने मेरी सोई हुई तकदीर को जगाकर, मेरा सुन्दर भाग्य बनाया है... परमात्मा ने अपने ज्ञान-योग के जल से मेरी तकदीर को सींचा है... अपने स्नेह-प्यार के फूलों की खुशबू से खुशबूदार बना दिया है...* 21 जन्मों तक सुख-शांति का वर्सा देकर मुझे एवर हेल्थी, एवर वेल्थी बना दिया है... अपने भाग्य के गुण गाती मैं आत्मा पहुँच जाती हूँ सूक्ष्म वतन में मेरे भाग्यविधाता बाबा के पास...

 

  *मुझे राजयोग सिखलाकर मेरी बिगड़ी को सुधारकर तकदीरवान बनाते हुए प्यारे बाबा कहते हैं:-* मेरे मीठे बच्चे... मुझ पिता के सिवाय दुःख भरी दुनिया से छुड़ा न सके... सुख भरे जीवन जो दुखो के पहाड़ बन गए है... मेरे सिवाय परिवर्तन हो न सके... *मेरे सोने से फूल बच्चों की बिगड़ी तकदीर को मै ही संवार सकता हूँ... अपनी सारी शक्तिया ज्ञान देकर मै ही भाग्यवान बना सकता हूँ कोई और नही...*

 

_ ➳  *अपने सुन्दर भाग्य के नशे में खुशियों के गगन में उड़ते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा... आप संग ज्ञानवान बन रही हूँ... *अपने बिगड़ी सी किस्मत को हीरों से सजा रही हूँ... ज्ञान रत्नों से चमकती जा रही हूँ...  और भाग्यवान आत्मा बनती जा रही हूँ...*

 

  *ज्ञान रत्नों की झंकार से मेरे जीवन को सुरीला बनाकर प्यारे बाबा कहते हैं:-* मीठे प्यारे फूल बच्चे.... कितने सुखो और आनंद खुशियो से भरपूर दुनिया के रहवासी थे... और किस विकारो के दलदल में फस कर धस से गए हो.... *मुझ विश्व पिता से बच्चों की यह दशा देखी न जाय... बच्चों की तकदीर जगाने आया हूँ... ज्ञान रत्नों का खजाना लिए उतर आया हूँ...*

 

_ ➳  *विकारी दलदल से निकल खुबसूरत दुनिया की मालिक बनने की अधिकारी बन मैं आत्मा कहती हूँ:-* मेरे प्राणप्रिय बाबा... मुझ आत्मा ने तो दुखो को ही जीवन का अटल सत्य मान लिया था... *आपने आकर भाग्य की लकीर ही बदल दी... सुंदर जीवन का आधार दे दिया... सारे रत्न भरे खजाने मेरे हाथो में देकर सुखो से मेरा श्रृंगार कर दिया...*

 

  *प्रेम के खजाने मुझ पर बरसाते हुए प्रेम के सागर मेरे बाबा कहते हैं:-* प्यारे सिकीलधे बच्चे... *जब सब ही खेल में उतर गए तो बाहर तो सिवाय ईश्वर पिता के कोई निकाल न सके... इन दर्दो से परमपिता ही उबार सके... वही खूबसूरत सुख दामन में वही सजा सके...* फूलो भरा महकता सतयुग वही तो बना सके... सारे विश्व को सम्पन्नता की दौलत से आबाद कर दे...

 

_ ➳  *स्वर्ग का राज्य तिलक अपने नाम कर बाबा के दिल तख़्त पर बैठकर मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा खुशनुमा भाग्य को पाकर निखरती जा रही हूँ... *अपनी काली हो गई तकदीर को सुनहरा सजाती जा रही हूँ... आपके दिए ज्ञान धन से विश्व की मालिक बन सुंदर तकदीर पाती जा रही हूँ..."*

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- निश्चयबुद्धि बन याद की यात्रा में रहना है*"

 

_ ➳  मेरे कौड़ी तुल्य जीवन को हीरे तुल्य बनाने वाले, सर्व सम्बन्धो का मुझे सुख देकर मेरे जीवन को खुशहाल बनाने वाले मेरे दिलाराम बाबा ने मेरे जीवन मे आकर जो अनगिनत उपकार मुझ पर किये हैं, उनका तो बदला चुकाया भी नही जा सकता। *लेकिन उनके स्नेह का रिटर्न देने के लिए मैं सदा उनकी वफादार फरमानबरदार बनकर रहूँगी। अपने ऐसे सच्चे बाबा के प्रति निश्चय में मैं कभी कमी नही आने दूँगी। चाहे दुनिया कितने भी इल्जाम लगाए लेकिन अपने दिलाराम बाबा का हाथ और साथ मैं कभी नही छोडूंगी*। मन ही मन स्वयं से बातें करते हुए मैं बाबा के प्रति निश्चय में कभी भी ना हिलने की दृढ़ प्रतिज्ञा करती हूँ और अपने प्यारे ब्रह्मा बाबा के बारे में विचार करती हूँ जिन्होंने समाज का विरोध सहन करके भी सम्पूर्ण निश्चय बुद्धि बन परमात्म कर्तव्य को सम्पूर्ण समर्पण भाव से पूरा किया और भगवान के दिल रूपी तख्त पर सदा के लिए विराजमान हो गए।

 

_ ➳  ऐसे कदम - कदम पर फ़ॉलो फादर कर, ब्रह्मा बाप समान सम्पूर्ण निश्चय बुद्धि बन, परमात्म कार्य मे सदा सहयोगी बनने का संकल्प लेकर मैं अपने दिलाराम बाबा की दिल को आराम देने वाली मीठी सी प्यारी सी याद में अपने मन और बुद्धि को एकाग्र करती हूँ। *मन को शीतलता देने वाली सागर की मीठी - मीठी लहरों के समान मेरे मीठे बाबा की मीठी - मीठी याद मेरे मन और बुद्धि को भी शान्त और शीतल बना देती है और शरीर को पूरी तरह रिलैक्स कर देती है*। यह रिलैक्सेशन मेरे सारे शरीर से चेतना को धीरे - धीरे समेट कर मेरे सम्पूर्ण ध्यान को दोनों आईब्रोज के बीच भृकुटि के मध्य भाग पर केंद्रित कर देती है। 

 

_ ➳  मैं महसूस कर रही हूँ देह का भान पूरी तरह समाप्त हो गया है और स्वयं को मैं अशरीरी आत्मा देख रही हूँ। केवल एक अति सूक्ष्म चमकता हुआ शाइनिंग स्टार मुझे दिखाई दे रहा है। जिसमे से निकल रही किरणे मन को आनन्दित करती हुई चारों और फैल रही हैं। *देह भान से पूरी तरह मुक्त यह अशरीरी स्थिति मुझे मेरे सातों गुणों और अष्ट शक्तियों से सम्पन्न, ओरिजनल स्वरूप का स्पष्ट अनुभव करवा रही है। अपने स्वधर्म में मैं पूरी तरह स्थित हो कर अपने सत्य स्वरूप का भरपूर आनन्द ले रही हूँ*। दुनियावी आकर्षणों से बोझ से मुक्त स्वयं को मैं बहुत ही हल्का अनुभव कर रही हूँ और हल्की हो कर ऊपर की औऱ उड़ रही हूँ। *पाँच तत्वों से निर्मित इस भौतिक जगत को पार करके, उससे ऊपर सूक्ष्म लोक को भी पार करके मैं पहुँच गई हूँ ब्रह्मलोक में अपने दिलाराम शिव पिता के पास जिनके साथ मेरा जन्म - जन्म का अनादि सम्बन्ध है*।

 

_ ➳  अपनी अनन्त शक्तियों की किरणों रूपी बाहों को फैलाये मेरे मीठे शिव बाबा मेरे सामने खड़े हैं। बिना एक पल भी व्यर्थ गंवाये अपने प्यारे पिता के पास जाकर मैं उनकी किरणों रूपी बाहों में समा जाती हूँ। *पूरे पाँच हजार वर्ष उनसे बिछड़ कर उनसे दूर रहने की सारी पीड़ा को मैं उनकी किरणों रूपी बाहों में समाकर, अतीन्द्रिय सुख की गहन अनुभूति में खोकर, भुला रही हूँ*। प्यार के सागर अपने शिव पिता के प्यार की गहराई में समाकर मैं स्वयं को उनके निस्वार्थ प्यार से भरपूर कर रही हूँ। मेरे शिव पिता का अविनाशी प्यार उनके स्नेह की किरणों के रूप में निरन्तर मुझ पर बरस रहा है। *उनसे आ रही स्नेह की किरणों की मीठी फुहारें मुझे रोमांचित कर रही हैं और मेरे निश्चय को दृढ़ रखने का बल मुझे दे रही हैं*।

 

_ ➳  अपने दिलाराम बाबा की सर्व शक्तियों से स्वयं को भरपूर करके, उनके प्यार के खूबसूरत मीठे मधुर अति सुखद एहसास के साथ अब मैं वापिस देह और देह की दुनिया में लौट रही हूँ। बड़े से बड़ी परिस्थितियां भी अब बाबा के प्रति मेरे निश्चय को डिगा नही पाती क्योंकि मेरे बाबा का प्यार ढाल बन कर मुझमें असीम शक्ति का संचार प्रतिपल करता रहता है। *अपने सर्वशक्तिवान बाबा की सर्वशक्तियों की छत्रछाया को मैं सदा अपने ऊपर महसूस करते हुए, सम्पूर्ण निश्चयबुद्धि बन अब माया के हर पेपर को अपने पिता के सहयोग से सहज ही पार करती जा रही हूँ*। स्वयं पर, बाबा पर और ड्रामा पर सम्पूर्ण निश्चय मुझे व्यर्थ के हर संकल्प विकल्प से मुक्त रखते हुए, मेरी साइलेन्स की शक्ति को बढ़ाकर मेरी स्थिति को एकरस और अचल अडोल बनाता जा रहा है।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं तीनो सेवाओं में बैलेंस रखने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं सर्व गुणों की अनुभूति करने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं गुणमूर्त आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मुझ आत्मा का निश्चय रूपी फाउंडेशन पक्का है ।*

   *मैं आत्मा श्रेष्ठ जीवन का अनुभव स्वत: प्राप्त करती हूँ  ।*

   *मैं निश्चय बुद्धि विजयी आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

✺ अव्यक्त बापदादा :-

 

➳ _ ➳   *संगमयुगी श्रेष्ठ दरबारभविष्य की राज्य दरबार दोनों में कितना अन्तर है! अब की दरबार जन्म-जन्मान्तर की दरबार का फाउन्डेशन है। अभी के दरबार की रूपरेखा भविष्य दरबार की रूपरेखा बनाने वाली है। तो अपने आपको देख सकते हो कि अभी के राज्य अधिकारी सहयोगी दरबार में हमारा स्थान कहाँ है?* चेक करने का यन्त्र सभी के पास हैजब साइन्स वाले नये-नये यन्त्रों द्वारा धरनी से ऊपर के आकाशमण्डल के चित्र खींच सकते हैंवहाँ के वायुमण्डल के समाचार दे सकते हैंइनएडवांस प्रकृति के तत्वों की हलचल के समाचार दे सकते हैं तो आप सर्व शक्ति-सम्पन्न बाप के अथॉरिटी वाली श्रेष्ठ आत्मायें अपने दिव्य बुद्धि के यन्त्र द्वारा तीन काल की नॉलेज के आधार से अपना वर्तमान काल और भविष्य काल नहीं जान सकते?

 

➳ _ ➳  यन्त्र तो सभी के पास है नादिव्य बुद्धि तो सबको प्राप्त है। इस दिव्य बुद्धि रूपी यन्त्र को कैसे यूज़ करना हैकिस स्थान पर अर्थात् किस स्थिति पर स्थित हो करके यूज़ करना हैयह भी जानते हो *त्रिकालदर्शी-पन की स्थिति के स्थान पर स्थित हो तीनों काल की नॉलेज के आधार पर यन्त्र को यूज़ करो! यूज़ करने आता हैपहले तो स्थान पर स्थित होने आता है अर्थात् स्थिति में स्थित होने आता हैतो इसी यन्त्र द्वारा अपने आपको देखो कि मेरा नम्बर कौन-सा है?* समझा!

 

✺  *"ड्रिल :- दिव्य बुधी के यंत्र द्वारा खुद को चेक करना कि मेरा नंबर कौन सा है।*

 

➳ _ ➳  *मैं आत्मा बाबा के कमरे में एकांत में बैठती हूँ... अपने मन को एकाग्र करने की कोशिश करती हूँ... अपने देह को देखती हूँ... ये देह जो अनेक कर्मेन्द्रियों के संगठन से बना है... पैरों से लेकर सिर तक के सभी कर्मेंर्दियों पर से ध्यान हटाते हुए अपनी सांसों पर मन को एकाग्र करती हूँ...* भीतर आ रहीबाहर जा रही सांसों को ध्यान से अवलोकन करती हूँ... धीरे-धीरे मन शांत होता जा रहा है... बहिर्मुखी मन अंतर्मुखी हो रहा है... मन की आंखों से अंतर्मन की गहराईयों में झांकती हूँ... आत्मनिरीक्षण करती हूँ... जन्म-जन्मान्तर के विकारों और विकर्मों से अभिभूत आत्मा को देख रही हूँ...

 

➳ _ ➳  मैं आत्मा और अन्दर गहराईयों में उतरकर जाती हूँ जब इसके कारण तक पहुँचती हूँ तो पाती हूँ कि मेरी बुद्धि रूपी यंत्र में व्यर्थ संकल्पों, विचारों की जंग लगी हुई है... जिसके कारण मेरी बुद्धि मेरे चंचल मन को कंट्रोल करने में असमर्थ होकर स्वयं ही विषय विकारों में आसक्त हो गई... *मैं आत्मा परमप्रिय परमात्मा का आह्वान करती हूँ... बाबा के कमरे के छत से दिव्य प्रकाश की किरणें मुझ आत्मा पर पड़ रही हैं... सारा कमरा लाल सुनहरे प्रकाश की किरणों से भर गया है...*    

 

➳ _ ➳  *परमात्मा की दिव्य तेजस्वी किरणें बुद्धि रूपी यंत्र का ओइलिंग कर रही हैं... मुझ आत्मा के बुद्धि रूपी यंत्र से व्यर्थ संकल्पों, व्यर्थ विचारों, विकर्मों की जंग खत्म हो रही है... अब प्यारे बाबा के दिव्य ज्ञान की किरणें मुझ आत्मा की बुद्धि रूपी यंत्र में समाते जा रहे हैं...* मैं दिव्य बुद्धिधारी बन गई हूँ... दिव्य ज्ञान के पेट्रोल से मुझ आत्मा की दिव्य बुद्धि रूपी यंत्र सुचारू रूप से श्रीमत प्रमाण कार्य करना शुरू कर दिया है... मैं आत्मा दिव्य बुद्धि रूपी यंत्र द्वारा तीनों कालों की नॉलेज को प्राप्त कर त्रिकालदर्शी बन गई हूँ...    

 

➳ _ ➳  *अब मैं आत्मा त्रिकालदर्शी-पन की स्थिति में स्थित होकर अपना राज्य दरबार लगाती हूँ... और दिव्य बुद्धि रूपी यंत्र द्वारा चेक करती हूँ कि कौन-कौन से कर्मेन्द्रिय रूपी कर्मचारी अपना काम सच्चाई-सफाई से नहीं कर रहा है...* सभी इंद्रियों को उकसाने वाले चंचल, उद्विग्न मन को प्यार से समझाती हूँ कि... ये देह, देह के पदार्थ, देह के संबंध सब विनाशी हैं इनमे आसक्ति दिखाने से दुःख-अशांति ही मिलेगी... एक बाबा से ही अविनाशी सम्बन्ध रखने से अतीन्द्रिय सुख, शांति मिलती है...    

 

➳ _ ➳  मैं आत्मा अपने मन को समझानी देते हुए अपने सभी कर्मेन्द्रियों को अपने अधीन करने की रूपरेखा तैयार कर रही हूँ... *इस संगमयुगी श्रेष्ठ राज्य दरबार में भविष्य की जन्म-जन्मान्तर की दरबार का फाउन्डेशन लगा रही हूँ... भविष्य दरबार की रूपरेखा बना रही हूँ...* बाबा की ज्ञान मुरली को धारण कर अपने मन के विचारों को ज्ञानयुक्त बना रही हूँ... श्रेष्ठ और समर्थ संकल्पों से भर रही हूँ... *अपने दिव्य बुद्धि रूपी यंत्र को मन की निगरानी के कार्य में बिजी कर दी हूँ... अब मैं आत्मा अपने दरबार की राज्याधिकारी बन पहला स्थान प्राप्त करने, भविष्य विश्व राज्याधिकारी बनने का श्रेष्ठ पुरुषार्थ कर रही हूँ...*

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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