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 03 / 09 / 20  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *अपना चार्ट व रजिस्टर रखा ?*

 

➢➢ *"मैं आत्मा हूँ" - इस अभ्यास से शरीर का भान तोडा ?*

 

➢➢ *किसी भी विकराल समस्या को शीतल बनाया ?*

 

➢➢ *बाप और सेवा के प्यार द्वारा परिवार का प्यार स्वतः ही प्राप्त किया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *जब विशेष याद में बैठते हो तो अपने कोई न कोई श्रेष्ठ स्वमान की सीट पर बैठो।* कभी 'मास्टर बीजरूप' की स्थिति के आसन पर, कभी 'अव्यक्त फरिश्ते' की सीट पर कभी 'विश्व-कल्याणकारी स्थिति' की सीट पर सेट हो जाओ, ऐसे *हर रोज भिन्न-भिन्न स्थिति के आसन पर व सीट पर सेट होकर बैठो तो शक्तिशाली याद का अनुभव करेंगे।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं संगमयुगी श्रेष्ठ ब्राह्मण आत्मा हूँ"*

 

✧  अपने को सदा संगमयुगी श्रेष्ठ ब्राह्मण आत्मा अनुभव करते हो? *श्रेष्ठ ब्राह्मण अर्थात् जिन्हों का हर संकल्प, हर सेकण्ड श्रेष्ठ हो। ऐसे श्रेष्ठ बने हो कि कभी साधारण, कभी श्रेष्ठ? अभी साधारण और श्रेष्ठ दोनों चलते हैं या सिर्फ श्रेष्ठ चलते हैं? क्या होता है? थोड़ा-थोड़ा चलता है? तो सदैव मैं ऊंचे से ऊंची श्रेष्ठ ब्रह्मण आत्मा हूँ-यह स्मृति इमर्ज रखो।*

 

✧  देखो, जो आजकल के नामधारी ब्राह्मण हैं, उन ब्राह्मणों से भी कौन-सा कार्य कराते हैं? जहाँ कोई श्रेष्ठ कार्य होगा तो ब्राह्मणों को बुलाते हैं। तो यह आप लोगों के यादगार हैं ना। क्योंकि आप श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने सदा श्रेष्ठ कार्य किया है, तभी अब तक भी यादगार में ब्राह्मण श्रेष्ठ कार्य के निमित्त हैं। अगर कोई ब्रह्मण ऐसा कोई काम कर लेता है तो उसको कहते हैं यह ब्राह्मण नहीं है। *तो ब्राह्मण अर्थात श्रेष्ठ कार्य करने वाले, श्रेष्ठ सोचने वाले, श्रेष्ठ बोलने वाले। तो जैसा कुल होता है वैसे कुल के प्रमाण कर्तव्य होता है। अगर कोई श्रेष्ठ कुल वाला ऐसा-वैसा काम करे तो उसको शर्मवाते हैं कि ये क्या करते हो!*

 

✧  तो अपने आपसे पूछो कि मैं ब्राह्मण ऊंचे से ऊंची आत्मा हूँ, श्रेष्ठ आत्मा हूँ तो कोई भी ऐसा कार्य कर कैसे सकते। क्योंकि श्रेष्ठ कर्म का आधार है श्रेष्ठ स्मृति। स्मृति श्रेष्ठ है तो कर्म स्वत: ही श्रेष्ठ होंगे। तो सदा यह श्रेष्ठ स्मृति रखो कि हम श्रेष्ठ ब्राह्मण हैं। यह तो सदा याद रहता है या याद करना पड़ता है? कभी शरीर को याद करते हो कि मैं फलाना हूँ, मैं फलानी हूँ? क्योंकि याद तब किया जाता है जब भूलते हैं। अगर कोई बात भूली नहीं तो याद करनी पड़ेगी। *तो मैं ब्राह्मण आत्मा हूँ यह भी स्वत: याद रहे, न कि करना पड़े। तो स्वत: और सदा याद रहे कि 'मैं श्रेष्ठ ब्राह्मण आत्मा हूँ'। जब तक ब्राह्मण जीवन है तब तक ये स्वत: याद रहे।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  *कर्मयोगी स्थिति अति प्यारी और न्यारी है।* इससे कोई कितना भी बडा कार्य हो लेकिन ऐसे लगेगा जैसे *काम नहीं कर रहे हैं लेकिन खेल कर रहे हैं।* चाहे कितना भी मेहनत का, सखा खेल हो, फिर भी खेल में मजा आयेगा ना।

 

✧  जब मल्लयुद्ध करते हैं तो कितनी मेहनत करते हैं। लेकिन जब *खेल समझकर करते हैं तो हँसतेहँसते करते हैं।* मेहनत नहीं लगती, मनोरंजन लगता है।

 

✧  तो कर्मयोगी के लिए कैसा भी कार्य हो लेकिन मनोरंजन है, *संकल्प में भी मुश्किल का अनुभव नहीं होगा।* तो कर्मयोगी ग्रुप अपने कर्म से अनेकों के कर्म श्रेष्ठ बनाने वाले, इसी में बिजी रही। कर्म और याद कम्बाइन्ड, अलग हो नहीं सकते।

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ ओरिजिनल अभ्यास आत्मा को न्यारा होने में हैं। न्यारी थी, न्यारी हैं, फिर न्यारी बनेगी। *सिर्फ अटैचमेंट न्यारा बनने नहीं देता है।* वैसे आत्मा की ओरीजनल नेचर शरीर से न्यारे रहने की है, अलग है। शरीर आत्मा नहीं, आत्मा शरीर नही। तो न्यारे हुए ना। *सिर्फ 63 जन्मों से अटैचमेंट की आदत पड़ गई है। ओरीजनल तो ओरीजनल ही होता है।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  पढाई से कमाई जमा करनी"*

 

_ ➳  मीठे बाबा ने जब से जीवन में पर्दापण किया है... जीवन खुशियो के फूलो से महक उठा है... हर पल, हर कर्म मीठे बाबा की यादो से सजा धजा है... *मूर्तियो और मन्दिरो में मात्र दर्शन की प्यासी मै आत्मा... यूँ भगवान को जानूंगी, खुद को पहचानुगी यह तो कल्पनाओ में भी न था..*. आज मीठे बाबा को पाकर, सच की अमीरी से जीवन छलक रहा है... *खुद को जानने की और ईश्वर को पाने की ख़ुशी ने जीवन को बेशकीमती बना दिया है.*. मै आत्मा ईश्वरीय यादो से भरपूर होकर मा दाता बनकर मुस्करा हूँ... और यूँ मीठे चिंतन में डूबी हुई मै आत्मा... मीठे बाबा को हाले दिल सुनाने, सूक्ष्म वतन में उड़ चलती हूँ...

 

   *मीठे बाबा ने मुझ आत्मा को सच्ची कमाई के गहरे राज समझाते हुए कहा :-* "मीठे प्यारे फूल बच्चे... *ईश्वर पिता के साथ भरा यह वरदानी समय... बहुत कीमती है, इसे अब यूँ ही व्यर्थ में न गंवाओ.*.. चलते फिरते हर कर्म को, ईश्वर पिता की यादो में कर, सच्ची कमाई से सम्पन्न हो, देवताई सुखो में मुस्कराओ... हर साँस से मीठे बाबा को याद कर, समर्थ चिंतन से देवताई अमीरी को पाओ..."

 

_ ➳  *मै आत्मा प्यारे बाबा की सारी जागीरों पर अपना अधिकार करते हुए कहती हूँ :-* "मीठे मीठे बाबा मेरे... *आपने अपना यादो भरा हाथ, मेरे हाथो में देकर, मुझे देवताओ की अमीरी से पुनः नवाजा है.*.. आपको पाकर मै आत्मा... अपने सारे खोये खजाने लेकर...  विश्व का ताजोतख्त पा रही हूँ... सच्ची कमाई से भरपूर होकर फिर से खोयी हुई बादशाही को पा रही हूँ..."

 

   *प्यारे बाबा ने मुझ आत्मा को मेरे खोये सतयुगी सुखो को पुनः दिलाते हुए कहा :-* "मीठे प्यारे लाडले बच्चे... *भाग्य ने जो खुबसूरत दिन दिखलाया है... और भगवान को पिता, टीचर, सतगुरु रूप में सम्मूख मिलवाया है.*.. अब हर पल इन मीठी यादो में खोकर, सच्ची कमाई करो... ईश्वर पिता की याद में हर साँस को पिरो दो...और 21 जनमो के लिए मालामाल हो जाओ..."

 

_ ➳  *मै आत्मा मीठे बाबा की सारी वसीयत की मालिक बनते हुए कहती हूँ :-* "प्यारे प्यारे बाबा मेरे... मै आत्मा *ज्ञान धन से सम्पन्न होकर, यादो के झूले में खोयी हुई, हर क्षण सच्चे आनन्द को जी रही हूँ.*.. आपकी मीठी यादो में जीवन कितना प्यारा मीठा और सच्ची कमाई से भरपूर हो रहा है,... सदा आपके प्यार की छत्रछाया में पलने वाली महान भाग्यवान ही गयी हूँ..."

 

   *मीठे बाबा ने मुझ आत्मा को अपनी मीठी यादो के तारो में पिरोते हुए कहा :-* "मीठे प्यारे सिकीलधे बच्चे... संगम के सुहावने पलों में, मीठे बाबा की यादो में, सदा के धनवान् बन जाओ... *हर कर्म करते हुए मन और बुद्धि के तारो से मीठे बाबा को थामे रहो..*. सदा प्यारे बाबा के साथ रहो... और एक पल भी खुद को ईश्वरीय याद से जुदा नही करो... यादो की सच्ची कमाई से देवताई सम्पन्नता से भरपूर हो जाओ..."

 

_ ➳  *मै आत्मा मीठे बाबा से अखूट खजाने लेकर सरे विश्व की मालिक बनकर कहती हूँ :-* "मीठे प्यारे बाबा मेरे... आपने मुझ आत्मा के साधारण जीवन में आकर, जीवन को बेशकीमती बना दिया है... *सदा की गरीबी से छुड़ाकर, मुझ आत्मा को देवताई सुखो भरा ताज पहनाकर, राजरानी बनाया है.*.. मै आत्मा ईश्वरीय यादो में अथाह खुशियो को अपनी बाँहों में भर रही हूँ..."मीठे बाबा से प्यारी सी रुहरिहानं कर मै आत्मा... स्थूल तन में लौट आयी...

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- अंतिम विनाश की सीन देखने के लिए हिम्मत वान बनना है*

 

_ ➳  इस पुरानी दुनिया का जब विनाश होगा तो वो दृश्य कैसा होगा, और उस दृश्य को देखने के लिए कितनी शक्तिशाली स्थिति चाहिए! एकांत में बैठी, मैं जैसे ही ये विचार करती हूँ अनेक दृश्य मेरी आँखों के सामने उभर आते हैं। *कहीं बाढ़ के कारण भारी तबाही तो कहीं अकाल के कारण भूखे मरते लोग, कहीं बॉम्ब ब्लास्ट तो कहीं अर्थ क्वेक चारों तरफ मौत का तांडव। रोते बिलखते, चीखते-चिल्लाते लोग कोई कहाँ भाग रहें है कोई कहाँ लेकिन कहीं भी उन्हें कोई सेलवेज करने वाला नही*। इस दृश्य के साथ एक और दृश्य मैं देख रही हूँ कि बाबा के सर्विसएबुल पक्के ब्राह्मण बच्चे फरिश्ता रूप में मसीहा बन हर तरफ शन्ति सुख शक्ति की शीतल किरणे प्रवाहित कर रहे हैं। *बाबा के घर जैसे आश्रय स्थल बन गए है जहाँ मनुष्य आत्मायें सेफ्टी के लिए भाग - भाग कर आ रही हैं और सर्विसएबुल ब्राह्मण बच्चे उन्हें मुक्ति, जीवन मुक्ति की राह दिखा रहें हैं*।

 

_ ➳  इन दृश्यों को देखते हुए अब मैं मन ही मन विचार करती हूँ कि अंतिम विनाश की इस भयावह सीन को देखने और दुखी अशांत भटकती आत्माओं का कल्याण करने के लिए अब मुझे अपने अंदर ज्ञान और योग का बल जमाकर, पक्का ब्राह्मण, सर्विसएबुल बनना है। *इसी दृढ़ संकल्प के साथ अपने पुरुषार्थ को तीव्र करने की स्वयं से प्रतिज्ञा कर, मैं बाबा का दिल से शुक्रिया अदा करती हूँ कि समय रहते उन्होंने आकर मुझे सम्भाल लिया। अपना बच्चा बना लिया और इस विनाश लीला को साक्षी होकर देखने का साहस स्वयं में भरने का सहज रास्ता भी मुझे बता दिया*। 

 

_ ➳  ज्ञान और योग का बल ही ताकत बन कर, विनाश के अंतिम दृश्य को साक्षी होकर देखने में मेरी मदद करेगा। इसलिए अब इसी पुरुषार्थ को मुझे बढ़ाना है। मन को फिर से दृढ़ संकल्प देकर स्वयं को शक्तिशाली बनाने के लिए अपने सर्वशक्तिवान शिव पिता की याद में अब मैं शांत और स्थिर होकर बैठ जाती हूँ। *हर संकल्प और विकल्प से अपने ध्यान को हटाकर मनबुद्धि को मैं पूरी तरह से एकाग्र करती हूँ और स्वयं को अपने निराकार बिंदु स्वरूप में स्थित कर, अशरीरी हो जाती हूँ*। देह के भान का त्याग कर, अपने झिल मिल, जगमग करते प्वाइंट ऑफ लाइट स्वरूप के साथ मैं भृकुटि की कुटिया से बाहर आती हूँ और पांचो तत्वों के आकर्षण से मुक्त होकर, ऊपर आकाश की और उड़ जाती हूँ।

 

_ ➳  मन बुद्धि की एक खूबसूरत रूहानी यात्रा पर चलते हुए, सेकण्ड में पाँच तत्वों से बनी साकारी दुनिया को पार कर, उससे परे सूक्ष्म वतन को भी पार कर मैं पहुंच जाती हूँ अपनी निराकारी दुनिया परमधाम में। *संकल्पों विकल्पों की हलचल से दूर सर्वगुणों, सर्वशक्तियों के सागर अपने प्यारे पिता के सामने मैं आत्मा बैठी हूँ और मन बुद्धि रूपी नेत्रों से मैं अपलक शक्तियों के सागर अपने बाबा को निहार रही हूँ*। धीरे - धीरे अब मैं उनके बिल्कुल समीप जाकर उन्हें टच करती हूँ। शक्तियों का झरना फुल फोर्स के साथ बाबा से निकल कर अब मुझ आत्मा में समाने लगा है। *बाबा से आ रही शक्तियों की शीतल किरणे पाकर मेरा स्वरूप बहुत ही शक्तिशाली और चमकदार बनने लगा है*।

 

_ ➳  निरसंकल्प, मास्टर बीजरूप अवस्था में स्थित हो कर अपने बीज रूप परमात्मा बाप के साथ का यह अद्भुत मंगल मिलन मुझे अतीन्द्रिय सुख का अनुभव करवा रहा है।  *परमात्म लाइट मुझ आत्मा में समाकर मुझे पावन बना रही है। मैं स्वयं में परमात्म शक्तियों की गहन अनुभूति कर रही हूँ। शक्ति स्वरुप बनकर अब मैं परम धाम से नीचे आ रही हूँ*। अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित हो कर, अब मैं शक्तिशाली स्व स्थिति बनाने का पूरा पुरुषार्थ कर रही हूँ। 

 

_ ➳  अंतिम विनाश की सीन को साक्षी हो कर देखने के लिए, विनाश के भयावह दृश्य को स्मृति में रख उस स्थिति में अचल अडोल रहने के लिए और विनाश लीला में रोती बिलखती आत्माओं का कल्याण करने के लिए, अब मैं दृढ़ता के साथ अपने अंदर ज्ञान और योग का बल जमा कर रही हूँ। *सर्व शक्तियों, सर्व गुणों, सर्व खजानो से स्वयं को सदा भरपूर करके पक्का ब्राह्मण सर्विसएबुल बनने की स्वयं से की हुई प्रतिज्ञा को मैं लगन के साथ पूरा कर रही हूँ*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं किसी भी विकराल समस्या को शीतल बनाने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं सम्पूर्ण निश्चयबुद्धि आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा बाप और सेवा से अटूट प्यार करती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा परिवार का प्यार सदा प्राप्त करती हूँ  ।*

   *मैं निष्काम सेवाधारी आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  1. आजकल दुनिया वाले तो स्पष्ट कहते हैं कि आजकल सच्चे लोगों का चलना ही मुश्किल हैझूठ बोलना ही पड़ेगा। लेकिन कई समय परकई परिस्थितियों में ब्राह्मण आत्मायें भी मुख से नहीं बोलती लेकिन अन्दर समझती हैं कि कहाँ-कहाँ चतुराई से तो चलना ही पड़ता है। उसको झूठ नहीं कहते लेकिन चतुराई कहते हैं। तो चतुराई क्या हैयह तो करना ही पड़ता है! तो वह स्पष्ट बोलते हैं और ब्राह्मण रायल भाषा में बोलते हैं। फिर कहते हैं मेरा भाव नहीं था,न भावना थी न भाव था लेकिन करना ही पड़ता हैचलना ही पड़ता है। लेकिन  ब्रह्मा बाप को देखासाकार है नानिराकार के लिए तो आप भी सोचते हो कि शिव बाप तो निराकार हैऊपर मजे में बैठा है, नीचे आवे तो पता पड़े क्या है! लेकिन ब्रह्मा बाप तो साकार स्वरूप में आप सबके साथ ही रहेस्टूडेन्ट भी रहे और सत्यता व पवित्रता के लिए कितनी आपोजीशन हुई तो चालाकी से चला! लोगों ने कितना राय दी कि आप सीधा ऐसे नहीं कहो कि पवित्र रहना ही हैयह कहो कि थोड़ा-थोड़ा रहो। लेकिन ब्रह्मा बाप घबराया? *सत्यता की शक्ति धारण करने में सहनशक्ति की भी आवश्यकता है। सहन करना पड़ता हैझुकना पड़ता हैहार माननी पड़ती है लेकिन वह हार नहीं हैउस समय के लिए हार लगती है लेकिन है सदा की विजय।*

 

 _ ➳  2. *सत्यता के पीछे अगर सहन भी करना पड़ता तो वह सहन नहीं है भल बाहर से लगता है कि हम सहन कर रहे हैं लेकिन आपके खाते में वह सहन शक्ति के रूप में जमा होता है।*

 

 _ ➳  3. बाहर से ऐसे समझेंगे कि हम बहुत अच्छे चलते हैं, हमको चलने की चतुराई आ गई हैलेकिन अगर अपना खाता देखेंगे तो जमा का खाता बहुत कम होगा। इसलिए चतुराई से नहीं चलो, एक दो को देखकर भी कॉपी करते हैंयह ऐसे चलती है ना तो इसका नाम बहुत अच्छा हो गया हैयह बहुत आगे हो गई है और हम सच्चे चलते हैं ना तो हम पीछे के पीछे ही रह गये। लेकिन वह पीछे रहना नहीं हैवह आगे बढ़ना है। *बाप के आगेआगे बढ़ते हो और दूसरों के आगे चाहे पीछे दिखाई भी दो लेकिन काम किससे है! बाप से या आत्माओं से? (बाप से) तो बाप के दिल में आगे बढ़ना अर्थात् सारे कल्प के प्रालब्ध में आगे बढ़ना। और *अगर यहाँ आगे बढ़ने में आत्माओं को कॉपी करते होतो उस समय के लिए आपका नाम होता हैशान मिलता है, भाषण करने वाली लिस्ट में आते होसेन्टर सम्भालने की लिस्ट में आते हो लेकिन सारे कल्प की प्रालब्ध नहीं बनती।* जिसको बापदादा कहते हैं मेहनत कीबीज डालावृक्ष बड़ा कियाफल भी निकला लेकिन कच्चा फल खा गयेहमेशा के लिए प्रालब्ध का फल खत्म हो जाता है। तो अल्पकाल के शानमाननाम के लिए कॉपी नहीं करो। यहाँ नाम नहीं है लेकिन बाप के दिल में नम्बर आगे नाम है।

 

✺   *ड्रिल :-  "सत्यता की शक्ति से बाप के दिल में नम्बर आगे लेने का अनुभव"*

 

 _ ➳  *मैं आत्मा एकांत आत्मिक स्थिति में अमृतवेले समय खुली हवा में छत पर बैठी हूँ...* हल्के हल्के टिमटिमाते तारों से, चिड़ियों की चहचाहट से, फूलों की खुशबू से, घास पर ठंडी ठंडी ओस की बूंदों से मेरा तन, मन आनंद से भर रहा है... मैं आकाश की ओर देखकर बाबा को बुलाती हूँ... ब्रह्मा बाबा की भृकुटी में विराजमान शिव बाबा सूक्ष्मवतन से नीचे आ रहे है... मम्मा, दादी, दीदीयाँ सभी ब्राह्मण सफेद ड्रेस में नीचे आ रहे हैं...

 

 _ ➳  बाबा के आते ही चिड़ियाँ, फूल, घास सब चहकने लगते है... फूलों की खुशबू जो धीमी-धीमी थी, वह हज़ारों गुणा बढ़ गयी हैं... *बाबा, मम्मा, दादी, दीदीयाँ मुझ आत्मा में वर्षा रूपी किरणे भर रहे है...* किरणों से मैं एकदम हल्कापन महसूस कर रही हूँ... मुझ आत्मा से पाँचो विकार मानो खत्म हो रहे है...

 

_ ➳  मुझ आत्मा में बाबा सत्यता की शक्ति को भर रहे हैं... *बाबा ने इतनी शक्तियाँ भर दी कि 63 जन्मों के झूठ बोलने का संस्कार एकदम नष्ट होते दिखाई दे रहे है... बाबा मुझे सच्चाई का वरदान दे रहे हैं...* बाबा शांति, पवित्रता, प्रेम, सुख, आनन्द, शक्ति और ज्ञान की किरणे भर रहे हैं... मुझ आत्मा में सागर से भी गहरी सत्यता की शक्ति बढ़ चुकी है... अब मैं आत्मा सच्ची-सच्ची ब्राह्मण आत्मा महसूस कर रही हूँ...

 

_ ➳  मेरा मन आनंद से भर चुका है... मैं अतिइंद्रिय सुख का अनुभव कर रही हूँ... मैं आत्मा अब सूक्ष्म चेकिंग कर दिनचर्या को देखती हूँ कि कही मैं झूठ का साथ तो नहीं दे रहीं हूँ... *मैं अलौकिक अनुभूतियों का अनुभव कर रही हूँ... मेरा मुख मेरा दास बन चुका है...* अब यह वही बोलता है जो मैं इसे आदेश देती हूँ... किसी भी अन्य आत्माओं के संस्कारों का प्रभाव मुझ पर नहीं पड़ रहा है...

 

_ ➳  अब मैं आत्मा कभी भी झूठ नहीं बोलती... ऐसी चतुराई नहीं दिखाती हूँ... अन्य आत्माओं को देख कॉपी नहीं करती हूँ... *ब्रह्मा बाबा की तरह सच्चाई के रास्ते पर चलती हूँ... सत्यता की शक्ति मुझे मज़बूत बना रही है...* बाबा की मैं लाडली बच्ची बन चुकी हूँ... प्यारे-प्यारे बाबा के दिल में मेरा नंबर सबसे पहले है... नाम, मान, शान मिले या न मिलें इससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ रहा हैं... मेरा जमा का खाता अब बढ़ रहा है...

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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