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 03 / 09 / 21  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *देहधारियों से ममत्व निकाला ?*

 

➢➢ *कर्मेन्द्रियों से कोई विकर्म तो नहीं किया ?*

 

➢➢ *साक्षीपन की सीट द्वारा परेशानी शब्द को समाप्त किया ?*

 

➢➢ *अपनी सर्व कर्मेन्द्रियों को आर्डर प्रमाण चलाया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *जब विशेष याद में बैठते हो तो अपने कोई न कोई श्रेष्ठ स्वमान की सीट पर बैठो।* कभी 'मास्टर बीजरूप' की स्थिति के आसन पर, कभी 'अव्यक्त फरिश्ते' की सीट पर कभी 'विश्व-कल्याणकारी स्थिति' की सीट पर सेट हो जाओ, ऐसे *हर रोज भिन्न-भिन्न स्थिति के आसन पर व सीट पर सेट होकर बैठो तो शक्तिशाली याद का अनुभव करेंगे।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं संगमयुगी श्रेष्ठ ब्राह्मण आत्मा हूँ"*

 

✧  अपने को सदा संगमयुगी श्रेष्ठ ब्राह्मण आत्मा अनुभव करते हो? *श्रेष्ठ ब्राह्मण अर्थात् जिन्हों का हर संकल्प, हर सेकण्ड श्रेष्ठ हो। ऐसे श्रेष्ठ बने हो कि कभी साधारण, कभी श्रेष्ठ? अभी साधारण और श्रेष्ठ दोनों चलते हैं या सिर्फ श्रेष्ठ चलते हैं? क्या होता है? थोड़ा-थोड़ा चलता है? तो सदैव मैं ऊंचे से ऊंची श्रेष्ठ ब्रह्मण आत्मा हूँ-यह स्मृति इमर्ज रखो।*

 

✧  देखो, जो आजकल के नामधारी ब्राह्मण हैं, उन ब्राह्मणों से भी कौन-सा कार्य कराते हैं? जहाँ कोई श्रेष्ठ कार्य होगा तो ब्राह्मणों को बुलाते हैं। तो यह आप लोगों के यादगार हैं ना। क्योंकि आप श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने सदा श्रेष्ठ कार्य किया है, तभी अब तक भी यादगार में ब्राह्मण श्रेष्ठ कार्य के निमित्त हैं। अगर कोई ब्रह्मण ऐसा कोई काम कर लेता है तो उसको कहते हैं यह ब्राह्मण नहीं है। *तो ब्राह्मण अर्थात श्रेष्ठ कार्य करने वाले, श्रेष्ठ सोचने वाले, श्रेष्ठ बोलने वाले। तो जैसा कुल होता है वैसे कुल के प्रमाण कर्तव्य होता है। अगर कोई श्रेष्ठ कुल वाला ऐसा-वैसा काम करे तो उसको शर्मवाते हैं कि ये क्या करते हो!*

 

✧  तो अपने आपसे पूछो कि मैं ब्राह्मण ऊंचे से ऊंची आत्मा हूँ, श्रेष्ठ आत्मा हूँ तो कोई भी ऐसा कार्य कर कैसे सकते। क्योंकि श्रेष्ठ कर्म का आधार है श्रेष्ठ स्मृति। स्मृति श्रेष्ठ है तो कर्म स्वत: ही श्रेष्ठ होंगे। तो सदा यह श्रेष्ठ स्मृति रखो कि हम श्रेष्ठ ब्राह्मण हैं। यह तो सदा याद रहता है या याद करना पड़ता है? कभी शरीर को याद करते हो कि मैं फलाना हूँ, मैं फलानी हूँ? क्योंकि याद तब किया जाता है जब भूलते हैं। अगर कोई बात भूली नहीं तो याद करनी पड़ेगी। *तो मैं ब्राह्मण आत्मा हूँ यह भी स्वत: याद रहे, न कि करना पड़े। तो स्वत: और सदा याद रहे कि 'मैं श्रेष्ठ ब्राह्मण आत्मा हूँ'। जब तक ब्राह्मण जीवन है तब तक ये स्वत: याद रहे।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  *कर्मयोगी स्थिति अति प्यारी और न्यारी है।* इससे कोई कितना भी बडा कार्य हो लेकिन ऐसे लगेगा जैसे *काम नहीं कर रहे हैं लेकिन खेल कर रहे हैं।* चाहे कितना भी मेहनत का, सखा खेल हो, फिर भी खेल में मजा आयेगा ना।

 

✧  जब मल्लयुद्ध करते हैं तो कितनी मेहनत करते हैं। लेकिन जब *खेल समझकर करते हैं तो हँसतेहँसते करते हैं।* मेहनत नहीं लगती, मनोरंजन लगता है।

 

✧  तो कर्मयोगी के लिए कैसा भी कार्य हो लेकिन मनोरंजन है, *संकल्प में भी मुश्किल का अनुभव नहीं होगा।* तो कर्मयोगी ग्रुप अपने कर्म से अनेकों के कर्म श्रेष्ठ बनाने वाले, इसी में बिजी रही। कर्म और याद कम्बाइन्ड, अलग हो नहीं सकते।

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ ओरिजिनल अभ्यास आत्मा को न्यारा होने में हैं। न्यारी थी, न्यारी हैं, फिर न्यारी बनेगी। *सिर्फ अटैचमेंट न्यारा बनने नहीं देता है।* वैसे आत्मा की ओरीजनल नेचर शरीर से न्यारे रहने की है, अलग है। शरीर आत्मा नहीं, आत्मा शरीर नही। तो न्यारे हुए ना। *सिर्फ 63 जन्मों से अटैचमेंट की आदत पड़ गई है। ओरीजनल तो ओरीजनल ही होता है।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- एक दो को बाप की याद में रहने का इशारा देना"*

 

_ ➳  *मैं आत्मा घर में बाबा के कमरे में बैठ बाबा की यादों में मगन हूँ... बाबा मिला सबकुछ मिल गया... सर्व प्राप्तियों का अनुभव करती मैं आत्मा अपने को धन्य-धन्य महसूस कर रही हूँ... फिर मुझे 'मीठे बच्चे' की आवाज़ सुनाई देती है...* मीठे बाबा बाहें पसारे वतन से मुझे बुला रहे हैं... मैं आत्मा बाबा की पुकार सुन तुरंत इस देह से निकल चमकते प्रकाश के कार्ब में बैठ, देह की दुनिया से ऊपर उड़ते हुए वतन में पहुँच जाती हूँ, बाबा से मीठी-मीठी, प्यारी-प्यारी बातें करने...   

 

   *एक दो को बाप और वर्से की याद दिलाकर सावधान करते उन्नति को पाते रहने की समझानी देते हुए प्यारे बाबा कहते हैं:-* मेरे मीठे बच्चे... इस संगम युग के वरदानी समय का एक एक पल कीमती है... यह सांसे भी अमूल्य है... अब इन्हे यूँ ही न गवाओ... *याद में रहो और सबको याद दिलाओ... समय से पूर्व सज जाओ ऐसा अनोखा पुरुषार्थ कर दिखाओ... और उन्नति को पाकर सदा की मुस्कान से सज जाओ...*

 

_ ➳  *हर पल हर स्वांस में प्यारे बाबा की यादों को समाकर मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा खुद भी सावधान होकर सबको भी सावधान कर मीठे बाबा की यादो में खोयी खोयी सी हूँ... *प्यारा बाबा मुझे हर पल निखार रहा है... मेरे सारे विकर्मो का विनाश हो रहा है... और मै खूबसूरत आत्मा बनती जा रही हूँ...*

 

   *प्यार का सागर मेरा मीठा बाबा प्यार की बरसात में मुझे भिगोते हुए कहते हैं:-* मीठे प्यारे फूल बच्चे... देह के नातो को बहुत चाह लिया निभा लिया और खालीपन को भी देख लिया... *अब प्राप्ति के सागर में डुबकी लगाओ... अपनी सांसो को ईश्वरीय यादो में भिगो दो... और महा प्रेम में मदमस्त हो जाओ...* एक पल भी न गुजरे नजरो से... यादो के बिना ऐसा अटूट प्रेम का नाता निभाओ...

 

_ ➳  *मन के तारों को प्रभु से जोडकर प्रभु प्रेम रस का पान करती हुई मैं आत्मा कहती हूँ:-* मेरे प्राणप्रिय बाबा... मै आत्मा आपकी यादो में खोकर मन्त्रमुग्ध हो गई हूँ... *इन मीठी यादो के अनन्त सागर में डूब गयी हूँ... निरन्तर याद से अथाह ख़ुशी को पाती जा रही हूँ... और हर दिल को ईश्वरीय प्रेम का पैगाम देकर निरन्तर उन्नति के अहसासो में डूबती जा रही हूँ...*

 

   *अपना प्यारा धाम छोडकर काँटों भरी जीवन से निकाल फूलों की बगिया में ले जाते हुए मेरे प्यारे बाबा कहते हैं:-* प्यारे सिकीलधे मीठे बच्चे... ईश्वर पिता धरती पर उतरा है प्रेम की सुगन्ध को बाँहों में समाये हुए... तो फूल बच्चे इस खुशबु को अपने रोम रोम में सुवासित कर लो... *यादो को सांसो सा जीवन में भर लो... और यही प्रेम नाद सबको सुनाकर आल्हादित रहो... हर साँस पर नाम खुदाया हो... ऐसा जुनूनी बन जाओ...*

 

_ ➳  *प्रभु प्रेम का उपहार पाकर सुखमय जीवन की बगिया में रूहानी गुलाब बन मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा अपनी सांसो पर आपका नाम लिख ली हूँ... *ईश्वरीय नशे से भरकर झूम उठी हूँ... सबको यादो भरा जाम पिलाती जा रही हूँ... और ईश्वरीय खुशबु से हर पल महकती जा रही हूँ... शिव बाबा याद है... यह अलख जगाती जा रही हूँ...*

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- ट्रस्टी होकर संभालना है*"

 

_ ➳  देह सहित देह के सब सम्बन्धो से ममत्व निकाल, बुद्धि का योग अपने शिव पिता परमात्मा के साथ जोड़, ट्रस्टी बन लौकिक और अलौकिक हर कर्तव्य को मैंं एकदम हल्केपन की स्थिति में स्थित हो कर सहज रीति सम्पन्न कर रही हूं और इसी हल्केपन की स्थिति में मैं स्वयं को अपने लाइट माइट स्वरूप में स्थित करती हूं। *लाइट माइट स्वरूप में स्थित होते ही मुझे ऐसा अनुभव होता है जैसे सर्वशक्तिवान मेरे शिव पिता परमात्मा की छत्रछाया मेरे ऊपर है और उनसे आ रही सर्वशक्तियाँ मुझमे असीम बल भर रही हैं*। यह असीम बल कर्म करते भी कर्म के प्रभाव से मुझे मुक्त कर हर चीज से उपराम अनुभव करा रहा है।

 

_ ➳  देह में रहते भी उपराम स्थिति की अनुभूति में उस कर्म को सम्पन्न कर, अपने लाइट माइट स्वरूप में अब मैं फ़रिशता वतन की ओर जा रहा हूँ। *रूहानी सैर का आनन्द लेते हुए, प्रकृति के सुंदर नजारों को देखते हुए मैं फ़रिशता अब आकाश मण्डल को पार कर उससे भी ऊपर उड़ते हुए पहुंच जाता हूँ सफेद प्रकाश से प्रकाशित फरिश्तो की दुनिया में*। जहां स्वयं भगवान अव्यक्त ब्रह्मा के तन में विराजमान हो कर अपने फ़रिशता बच्चों से मिलन मनाते हैं। उनसे रूह रिहान करते हैं। परमात्म लाइट और माइट से उन्हें भरपूर करते हैं।

 

_ ➳  फरिश्तों की इस दुनिया मे पहुंचते ही उस परमात्म लाइट और माइट को मैं स्पष्ट अनुभव कर रहा हूँ। मेरे सामने सृष्टि के रचियता, ऑल माइटी अथॉरिटी, सर्वशक्तिवान परमपिता परमात्मा अपने लाइट माइट स्वरूप में स्थित हैं। उनसे आ रही सर्वशक्तियों की लाइट पूरे वतन में फैली हुई है। बापदादा से आ रही लाइट माइट मुझे सहज ही अपनी और खींच रही हैं। *मैं फ़रिशता धीरे धीरे बापदादा के पास पहुंच कर बापदादा की विशाल भुजाओं में समा जाता हूँ और स्वयं को परमात्म शक्तियों से भरपूर करने लगता हूँ*। बाबा के रूहानी नयनो में अपने लिए अपार स्नेह देख कर मैं मन ही मन आनन्दित हो रहा हूँ। मीठी दृष्टि से मुझे भरपूर करके बाबा मुझे सामने बैठने का इशारा करते हैं।

 

_ ➳  बापदादा से मीठी दृष्टि ले कर, सर्वशक्तियों से भरपूर हो कर अब मैं फ़रिशता उस स्थान पर आ कर बैठ जाता हूँ जहां बहुत सारे फ़रिश्ते एकत्रित हो कर बैठे हुए हैं। *एक क्लास रूम जैसा दृश्य मैं देख रहा हूँ। अब बापदादा भी वहां आ कर बैठ जाते हैं और एक एक करके अपना फ़रिशता बच्चों को अपने पास बुलाते हैं*। कुछ बच्चों के हाथ मे तो एक चार्ट है जिसमे पूरे दिन का पोतामेल लिखा हुआ है कि पूरे दिन में कौन से सब्जेक्ट पर कितना अटेंशन रहा लेकिन कुछ बच्चे खाली हाथ हैं। *बापदादा ऐसे बच्चों को देख बहुत खुश हो रहें हैं जो पूरी लगन और सच्चाई के साथ हर रोज का अपना पोतामेल निकाल चेक करते हैं* कि आज कितनी कमाई जमा की। वरदानों से बाबा उन्हें भरपूर कर रहें हैं।

 

_ ➳  मैं फ़रिशता भी अपना पोतामेल ले कर बाबा के पास पहुंच जाता हूँ और बाबा को चारों सब्जेक्टस का पूरे दिन का विवरण दे कर बाबा से वरदान ले कर वापिस अपने स्थान पर आ कर बैठ जाता हूँ। *बाबा अब सभी फ़रिशता बच्चों को पोतामेल रखने के फायदे बताते हैं और सभी बच्चे हर रोज अपना पोतामेल रखने का बाबा से पक्का प्रोमिस करते हैं*। बाबा प्रसनचित मुद्रा में खड़े सभी बच्चों को प्यार से निहारते हुए उन्हें विदा कर रहें हैं। बाबा से विदाई ले कर अपने निराकार ज्योति बिंदु स्वरूप में अब मैं आत्मा परमधाम की ओर प्रस्थान करती हूं और वहां पहुंच कर अपने निराकार शिव पिता परमात्मा के साथ कम्बाइंड हो कर बैठ जाती हूँ।

 

_ ➳  बाबा की अनन्त शक्तियों को स्वयं में समा कर, शक्तिशाली बन अब मैं वापिस लौट रही हूं साकारी दुनिया मे। साकारी देह में विराजमान हो कर इस देह और देह की दुनिया मे रहते हुए अब मैं स्वयं को केवल ट्रस्टी समझ हर कर्तव्य कर रही हूं। *देह से जुड़े सम्बन्धों और पदार्थो से अब मेरा ममत्व टूटता जा रहा है। इस देह में मैं केवल मेहमान हूँ इस बात को सदा स्मृति में रखते, बुद्धि का योग केवल एक बाबा के साथ लगाये रोज अपना पोतामेल चेक कर अब मैं याद के चार्ट को बढ़ाने का पुरुषार्थ कर रही हूँ*।

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं साक्षीपन की सीट द्वारा परेशानी शब्द को समाप्त करने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं मास्टर त्रिकालदर्शी आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा सर्व कर्मेंद्रियों को ऑर्डर प्रमाण चलाती हूँ  ।*

   *मैं स्वराज्य अधिकारी आत्मा हूँ  ।*

   *मैं शक्तिशाली आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  1. आजकल दुनिया वाले तो स्पष्ट कहते हैं कि आजकल सच्चे लोगों का चलना ही मुश्किल हैझूठ बोलना ही पड़ेगा। लेकिन कई समय परकई परिस्थितियों में ब्राह्मण आत्मायें भी मुख से नहीं बोलती लेकिन अन्दर समझती हैं कि कहाँ-कहाँ चतुराई से तो चलना ही पड़ता है। उसको झूठ नहीं कहते लेकिन चतुराई कहते हैं। तो चतुराई क्या हैयह तो करना ही पड़ता है! तो वह स्पष्ट बोलते हैं और ब्राह्मण रायल भाषा में बोलते हैं। फिर कहते हैं मेरा भाव नहीं था,न भावना थी न भाव था लेकिन करना ही पड़ता हैचलना ही पड़ता है। लेकिन  ब्रह्मा बाप को देखासाकार है नानिराकार के लिए तो आप भी सोचते हो कि शिव बाप तो निराकार हैऊपर मजे में बैठा है, नीचे आवे तो पता पड़े क्या है! लेकिन ब्रह्मा बाप तो साकार स्वरूप में आप सबके साथ ही रहेस्टूडेन्ट भी रहे और सत्यता व पवित्रता के लिए कितनी आपोजीशन हुई तो चालाकी से चला! लोगों ने कितना राय दी कि आप सीधा ऐसे नहीं कहो कि पवित्र रहना ही हैयह कहो कि थोड़ा-थोड़ा रहो। लेकिन ब्रह्मा बाप घबराया? *सत्यता की शक्ति धारण करने में सहनशक्ति की भी आवश्यकता है। सहन करना पड़ता हैझुकना पड़ता हैहार माननी पड़ती है लेकिन वह हार नहीं हैउस समय के लिए हार लगती है लेकिन है सदा की विजय।*

 

 _ ➳  2. *सत्यता के पीछे अगर सहन भी करना पड़ता तो वह सहन नहीं है भल बाहर से लगता है कि हम सहन कर रहे हैं लेकिन आपके खाते में वह सहन शक्ति के रूप में जमा होता है।*

 

 _ ➳  3. बाहर से ऐसे समझेंगे कि हम बहुत अच्छे चलते हैं, हमको चलने की चतुराई आ गई हैलेकिन अगर अपना खाता देखेंगे तो जमा का खाता बहुत कम होगा। इसलिए चतुराई से नहीं चलो, एक दो को देखकर भी कॉपी करते हैंयह ऐसे चलती है ना तो इसका नाम बहुत अच्छा हो गया हैयह बहुत आगे हो गई है और हम सच्चे चलते हैं ना तो हम पीछे के पीछे ही रह गये। लेकिन वह पीछे रहना नहीं हैवह आगे बढ़ना है। *बाप के आगेआगे बढ़ते हो और दूसरों के आगे चाहे पीछे दिखाई भी दो लेकिन काम किससे है! बाप से या आत्माओं से? (बाप से) तो बाप के दिल में आगे बढ़ना अर्थात् सारे कल्प के प्रालब्ध में आगे बढ़ना। और *अगर यहाँ आगे बढ़ने में आत्माओं को कॉपी करते होतो उस समय के लिए आपका नाम होता हैशान मिलता है, भाषण करने वाली लिस्ट में आते होसेन्टर सम्भालने की लिस्ट में आते हो लेकिन सारे कल्प की प्रालब्ध नहीं बनती।* जिसको बापदादा कहते हैं मेहनत कीबीज डालावृक्ष बड़ा कियाफल भी निकला लेकिन कच्चा फल खा गयेहमेशा के लिए प्रालब्ध का फल खत्म हो जाता है। तो अल्पकाल के शानमाननाम के लिए कॉपी नहीं करो। यहाँ नाम नहीं है लेकिन बाप के दिल में नम्बर आगे नाम है।

 

✺   *ड्रिल :-  "सत्यता की शक्ति से बाप के दिल में नम्बर आगे लेने का अनुभव"*

 

 _ ➳  *मैं आत्मा एकांत आत्मिक स्थिति में अमृतवेले समय खुली हवा में छत पर बैठी हूँ...* हल्के हल्के टिमटिमाते तारों से, चिड़ियों की चहचाहट से, फूलों की खुशबू से, घास पर ठंडी ठंडी ओस की बूंदों से मेरा तन, मन आनंद से भर रहा है... मैं आकाश की ओर देखकर बाबा को बुलाती हूँ... ब्रह्मा बाबा की भृकुटी में विराजमान शिव बाबा सूक्ष्मवतन से नीचे आ रहे है... मम्मा, दादी, दीदीयाँ सभी ब्राह्मण सफेद ड्रेस में नीचे आ रहे हैं...

 

 _ ➳  बाबा के आते ही चिड़ियाँ, फूल, घास सब चहकने लगते है... फूलों की खुशबू जो धीमी-धीमी थी, वह हज़ारों गुणा बढ़ गयी हैं... *बाबा, मम्मा, दादी, दीदीयाँ मुझ आत्मा में वर्षा रूपी किरणे भर रहे है...* किरणों से मैं एकदम हल्कापन महसूस कर रही हूँ... मुझ आत्मा से पाँचो विकार मानो खत्म हो रहे है...

 

_ ➳  मुझ आत्मा में बाबा सत्यता की शक्ति को भर रहे हैं... *बाबा ने इतनी शक्तियाँ भर दी कि 63 जन्मों के झूठ बोलने का संस्कार एकदम नष्ट होते दिखाई दे रहे है... बाबा मुझे सच्चाई का वरदान दे रहे हैं...* बाबा शांति, पवित्रता, प्रेम, सुख, आनन्द, शक्ति और ज्ञान की किरणे भर रहे हैं... मुझ आत्मा में सागर से भी गहरी सत्यता की शक्ति बढ़ चुकी है... अब मैं आत्मा सच्ची-सच्ची ब्राह्मण आत्मा महसूस कर रही हूँ...

 

_ ➳  मेरा मन आनंद से भर चुका है... मैं अतिइंद्रिय सुख का अनुभव कर रही हूँ... मैं आत्मा अब सूक्ष्म चेकिंग कर दिनचर्या को देखती हूँ कि कही मैं झूठ का साथ तो नहीं दे रहीं हूँ... *मैं अलौकिक अनुभूतियों का अनुभव कर रही हूँ... मेरा मुख मेरा दास बन चुका है...* अब यह वही बोलता है जो मैं इसे आदेश देती हूँ... किसी भी अन्य आत्माओं के संस्कारों का प्रभाव मुझ पर नहीं पड़ रहा है...

 

_ ➳  अब मैं आत्मा कभी भी झूठ नहीं बोलती... ऐसी चतुराई नहीं दिखाती हूँ... अन्य आत्माओं को देख कॉपी नहीं करती हूँ... *ब्रह्मा बाबा की तरह सच्चाई के रास्ते पर चलती हूँ... सत्यता की शक्ति मुझे मज़बूत बना रही है...* बाबा की मैं लाडली बच्ची बन चुकी हूँ... प्यारे-प्यारे बाबा के दिल में मेरा नंबर सबसे पहले है... नाम, मान, शान मिले या न मिलें इससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ रहा हैं... मेरा जमा का खाता अब बढ़ रहा है...

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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