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 03 / 10 / 20  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *सब कुछ सच सच रूहानी सर्जन को बताया ?*

 

➢➢ *बहुत बहुत नम्रता से सेवा की ?*

 

➢➢ *अपने श्रेष्ठ जीवन द्वारा परमात्म ज्ञान का प्रतक्ष्य प्रूफ दिया ?*

 

➢➢ *अटेंशन रुपी पहरेदार की मदद से अतीन्द्रिय सुख का अनुभव किया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  कर्मातीत बनने के लिए कर्मों के हिसाब-किताब से मुक्त बनो। सेवा में भी सेवा के बंधन में बंधने वाले सेवाधारी नहीं। बन्धनमुक्त बन सेवा करो अर्थात् हद की रायॅल इच्छाओं से मुक्त बनो। *जैसे देह का बन्धन, देह के सम्बन्ध का बन्धन, ऐसे सेवा में स्वार्थ-यह भी बन्धन कर्मातीत बनने में विघ्न डालता है। कर्मातीत बनना अर्थात् इस रॉयल हिसाब-किताब से भी मुक्त।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं महावीर आत्मा हूँ"*

 

✧  सदैव अपने को महावीर अर्थात् महान् आत्मा अनुभव करते हो? *महान् आत्मा सदा जो संकल्प करेंगे, बोल बोलेंगे वो साधारण नहीं होगा, महान् होगा। क्योंकि ऊंचे-ते-ऊंचे बाप के बच्चे भी ऊंचे, महान् हुए ना।* जैसे कोई आजकल की दुनिया में वी.आई.पी. का बच्चा होगा तो वह अपने को भी वी.आई.पी. समझेगा ना। तो आप से ऊंचा तो कोई है ही नहीं।

 

✧  *तो ऐसे, ऊंचे-ते-ऊंचे बाप की सन्तान ऊंचे-ते-ऊंची आत्मायें हैं-यह स्मृति सदा शक्तिशाली बनाती है। ऊंचा बाप, ऊंचे हम, ऊंचा कार्य-ऐसी स्मृति में रहने वाले सदा बाप समान बन जाते हैं। तो बाप समान बने हो? बाप हर बच्चे को ऊंचा ही बनाते हैं। कोई ऊंचा, कोई नीचा नहीं, सब ऊंचे-ते-ऊंचे।* अगर अपनी कमजोरी से कोई नीचे की स्थिति में रहता है तो उसकी कमजोरी है। बाकी बाप सबको ऊंचा बनाता है। सारे विश्व के आगे श्रेष्ठ और ऊंची आत्मायें आपके सिवाए कोई नहीं हैं, इसलिए तो आप आत्माओंका ही गायन और पूजन होता है।

 

✧  अभी तक गायन, पूजन हो रहा है। कभी भी कोई मन्दिर में जायेंगे तो क्या समझेंगे? कोई भी मन्दिर में मूर्ति देखकर क्या समझते हो? यह हमारी ही मूर्ति है। सिर्फ बाप नहीं पूजा जाता, बाप के साथ आप भी पूजे जाते हो। ऐसे महान् बन गये! एक बार नहीं, अनेक बार बने हैं-जहाँ यह नशा होगा वहाँ माया की आकर्षण अपने तरफ आकर्षित नहीं कर सकेगी, सदा न्यारे होंगे। सभी अपने आप से सन्तुष्ट हो? *जैसे बाप सुनाते हैं, वैसे ही अनुभव करते हुए आगे बढ़ना-यह है अपने आप से सन्तुष्ट रहना। 'ऊंचे-ते-ऊंचे'-यही विशष बरदान याद रखना। याद करना सहज है या मुश्किल लगता है? सहज स्मृति स्वत: आती रहेगी। माया कहाँ रोक नहीं सकेगी, सदा आगे बढ़ते रहेंगे।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  आज बच्चों के स्नेही बापदादा हर एक बच्चे को विशेष दो बातों में चेक कर रहे थे। स्नेह का प्रत्यक्ष स्वरूप बच्चों को सम्पन और सम्पूर्ण बनाना है। हर एक में *रूलिंग पॉवर और कन्ट्रोलिंग पॉवर कहाँ तक आई है - आज यह देख रहे थे।*

 

✧  जैसे आत्मा की स्थूल कर्मेन्द्रियाँ आत्मा के कन्ट्रोल से चलती है, जब चाहे, जैसे चाहे और जहाँ चाहे वैसे चला सकते हैं और चलाते रहते हैं। कन्ट्रोलिंग पॉवर भी है। जैसे हाथ-पाँव स्थूल शक्तियाँ हैं ऐसे *मन-बुद्धि-संस्कार आत्मा की सूक्ष्म शक्तियाँ हैं।*

 

✧  सूक्ष्म शक्तियों के ऊपर कन्ट्रोल करने की पॉवर अर्थात मन-बुद्धि को, संस्कारों को जब चाहें, जहाँ चाहे, जैसे चाहे, जितना समय चाहे - ऐसे कन्ट्रोलिंग पॉवर, रूलिंग पॉवर आई है? क्योंकि इस ब्राह्मण जीवन में मास्टर आलमाइटी अर्थार्टी बनते हो। *इस समय की प्राप्ति सारा कल्प - राज्य रूप और पुजारी के रूप में चलती रहती है।*

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ मन के मालिक हो ना! तो सेकण्ड में स्टॉप, तो स्टॉप हो जाए। *ऐसा नहीं आप कहो स्टॉप और मन चलता रहे, इससे सिद्ध है कि मालिकपन की शक्ति कम है। अगर मालिक शक्तिशाली है तो मालिक के डायरेक्शन बिना मन एक संकल्प भी नहीं कर सकता।* स्टॉप, तो स्टॉप। चलो, तो चले। जहाँ चलाने चाहो वहाँ चले। *ऐसे नहीं कि मन को बहुत समय की व्यर्थ तरफ चलने की आदत है, तो आप चलाओ शुद्ध संकल्प की तरफ और मन जाये व्यर्थ की तरफ। तो यह मालिक को मालिकपन में चलाना नहीं आता।* यह अभ्यास करो। चेक करो स्टॉप कहने से, स्टॉप होता है? या कुछ चलकर फिर स्टॉप होता है? *अगर गाड़ी में ब्रेक लगानी हो लेकिन कुछ समय चलकर फिर ब्रेक लगे, तो वह गाड़ी काम की है? ड्राइव करने वाला योग्य है कि एक्सीडेंट करने वाला है? ब्रेक, तो फौरन सेकण्ड में ब्रेक लगनी चाहिए। यही अभ्यास कर्मातीत अवस्था के समीप लायेगा।* संकल्प करने के कर्म में भी फुल पास। कर्मातीत का अर्थ ही है हर सबजेक्ट में फुल पास।

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- आत्मा रूपी बैटरी को याद की यात्रा से भरपूर करना"*

 

_ ➳  *अमृतवेले के रूहानी समय में... उठो, जागो मेरे लाडले बच्चे... कहते हुए मीठे बाबा मुझे प्यार से जगाते हैं... मैं आत्मा अपने सामने प्यारे बाबा को देख मुस्कुराते हुए बाबा को गुड मॉर्निंग कर उठती हूँ...* और बाबा के गले लग जाती हूँ... मीठे बाबा प्यार से मुझे अपनी गोदी में बिठाते हैं और मेरे सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए वरदानों से भरपूर करते हैं... दृष्टि देते हुए बाबा मुझे अमृतपान कराते हैं... फिर वन्डरफुल रूहानी बाबा मुझे अपने साथ वन्डरफुल रूहानी सैर कराते हैं...  

 

  *यादों की महफिल में ज्ञान के फूल बरसाते हुए प्यारे बाबा कहते हैं:-* मेरे मीठे फूल बच्चे... *मीठे बाबा के साथ का यह वरदानी युग कितना प्यारा है जिसमे पिता की याद भर से ही आप बच्चे 21जनमो के लिए सुखो भरे आलिशान जीवन और निरोगी स्वस्थ काया के हकदार बन जाते हो...* ईशरीय यादो में हर विकार से परे निष्कलंक जीवन पाते हो...

 

_ ➳  *वंडरफुल रूहानी यादों से अनुभवों और खजानों की मालकिन बन मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे प्यारे बाबा... मै आत्मा देहभान में आकर स्वयं को शरीर समझ कितनी गरीब रोगी मोहताज हो गयी थी... *आपने मुझे रोगों से मुक्तकर खुशनुमा जीवन की स्वामिन् बना दिया है... मै आत्मा सुख समृद्धि और स्वस्थता की पर्याय बनती जा रही हूँ...*

 

  *मीठे बाबा स्वर्णिम सुखों के सौगातों से मुझ आत्मा को सम्पन्न बनाते हुए कहते हैं:-* मीठे प्यारे लाडले बच्चे... एक जन्म ईश्वर पिता के हाथो में देते हो और 21 जनमो तक अथाह सुख बाँहों में भर लेते हो... *कितने वन्डरफुल रूहानी यात्री हो... ईश्वर पिता की यादों से सारे सुख अपने नाम लिखवाते हो... और सतयुगी धरती पर सुंदर तन मन धन से मुस्कराते हो...*

 

_ ➳  *मीठी यादों के सुनहरे नाव में बैठकर मंजिल के समीप पहुँचते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* मेरे प्राणप्रिय बाबा... *मै आत्मा मात्र देह नही खुबसूरत मणि हूँ और सदा रूहानी यात्रा पर हूँ... यह खुबसूरत लक्ष्य जीवन का पाकर तो धन्य धन्य हो गयी हूँ...* मीठे बाबा आपकी मीठी यादो में मै आत्मा रूहानियत से भरकर कितनी प्यारी और मीठी हो गयी हूँ...

 

  *यादों की जादू भरी छड़ी से अमरत्व का वरदान देते हुए मेरे जादूगर बाबा कहते हैं:-* प्यारे सिकीलधे मीठे बच्चे... ईश्वर पिता संग रूहानी बन यादों की यात्रा पर हो... *कितनी प्यारी और वन्डरफुल जादूगरी है कि यह यात्रा सतयुगी सुनहरे सुखो के द्वार पर पूरी होती है... यादो की यह यात्रा जन्नत में सुखो के फूलो भरा खुबसूरत जीवन दे जाती है...*

 

_ ➳  *यादों के खानों से अविनाशी खजाने निकालकर अपने 21 जन्मों को सजाते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... *मै आत्मा वन्डरफुल बाबा को पाकर वन्डरफुल रूहानी यात्री बन गई हूँ...* मीठे बाबा की गहरी यादों में हर पल खोयी खोयी सी... मै आत्मा सारे खजानो को अपनी झोली में समेट कर सबसे धनी हो मुस्करा रही हूँ...

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- फ्राकदिल बन सर्विस करनी है*"

 

_ ➳  अपने गिरधर गोपाल शिव बाबा के प्रेम की लगन में मगन मैं आत्मा रूपी गोपी, मन को सुकून देने वाली अपने कान्हा की मीठी मीठी यादों में खोई हुई, स्वयं को इस संसार के शोरगुल से दूर एक छोटे से सुंदर से टापू पर देख रही हूं। *चारों और पहाड़ियों से घिरा यह छोटा सा स्थान प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर है*। तन और मन दोनों तरफ से बिल्कुल शांत चित्त स्थिति में स्थित होकर मैं प्रकृति की इस अद्भुत छटा का आनंद ले रही हूं। *प्रकृति के इस अद्भुत सौंदर्य का आनन्द लेते लेते मैं अपनी आंखें बंद कर अपने गिरधर गोपाल अपने मीठे शिव बाबा को याद करती हूँ* तभी कानों में बांसुरी की मधुर आवाज सुनाई देने लगती है और मैं मंत्रमुग्ध होकर उस आवाज को सुनने लगती हूं।

 

_ ➳  बांसुरी की मधुर आवाज के साथ साथ एक बहुत ही सुंदर नजारा मुझे दिखाई देता है। मैं देख रही हूँ मेरे शिव बाबा, मेरे नटखट गिरधर गोपाल सामने खड़े बांसुरी बजा रहे हैं और बांसुरी की मधुर आवाज को सुनकर गोपियां दौड़ी दौड़ी चली आ रही है। *नटखट कान्हा गोपियों के संग रास रचा रहे हैं*। एक अद्भुत दृश्य मैं देख रही हूँ कि बांसुरी की मधुर आवाज से बेसुध होकर कोई गोपी मुस्करा रही है, कोई जोर - जोर से हंस रही है और कोई अपने कान्हा के प्रेम में डूबी आंसू बहा रही है। एकाएक गिरधर गोपाल का स्वरूप बापदादा के लाइट माइट स्वरूप में परिवर्तित हो जाता है।

 

_ ➳  अब मैं देख रही हूं कान्हा के प्रेम में डूबी उन सभी गोपियों को लाइट के फ़रिशता स्वरुप में बाप-दादा के सामने बैठे हुए। *बापदादा मधुर महावाक्य उच्चारण कर रहे हैं और सभी फरिश्ते मंत्रमुग्ध होकर बाबा की वाणी को सुन रहे हैं*। कुछ बाबा के प्रेम में मगन होकर आंसू बहा रहे हैं और कोई पूरी तरह से बाबा के प्रेम में डूबे हुए हैं।

 

_ ➳  मन को लुभाने वाले इस दृश्य को देख कर मैं सोचती हूं कि भक्ति में जो गायन है कि कान्हा जब मुरली बजाता था तो गोपियां अपनी सुध-बुध खो कर दौड़ी चली आती थी। वास्तव में यह गायन तो इस समय का है जो मैं मन बुद्धि रूपी दिव्य नेत्रो से इस समय देख रही हूं कि *शिव बाबा जब ब्रह्मा तन में आकर मुरली चलाते हैं तो ब्राह्मण आत्माएं रुपी गोपिकाएं कैसे अपने कान्हा अपने शिव बाबा के प्रेम में मग्न हो कर अपनी सुध बुध खो देती है*।

 

_ ➳  इस खूबसूरत नजारे को देख अपने गिरधर गोपाल से मिलने की तड़प और तीव्र हो जाती है और मैं आत्मा गोपी इस नश्वर देह को छोड़ अपने गिरधर गोपाल से मिलने चल पड़ती हूँ उनके धाम। आवाज की दुनिया से पार, पांचो तत्वों से भी पार, मैं पहुँच जाती हूँ गोल्डन प्रकाश से परिपूर्ण, संपूर्ण शांति से भरपूर अपने निजधाम में । *यहां मैं पूर्ण शांत और आनन्दमय स्थिति का अनुभव कर रही हूँ । मेरे सामने हैं सर्व सुखों के दाता, आनन्द के सागर मेरे गिरधर गोपाल मेरे प्यारे परम पिता परमात्मा*। उनको देखते ही मेरा रोम रोम जैसे खिल उठा है। मेरी ख़ुशी का कोई पारावार नही है। मन में एक ही गीत बज रहा है "पाना था सो पा लिया"।

 

_ ➳  अपने शिव प्रीतम के प्रति अपने असीम प्रेम के उदगार को अपने मन में उठ रहे संकल्पो के माध्यम से मैं उनके सामने प्रकट कर रही हूँ। हे मेरे प्राणेश्वर, मेरे नाथ जन्म -जन्म से मैं आपको याद कर रही थी। आखिर मैं आपके पास पहुँच ही गई। *आपसे मिल कर मेरे जन्म-जन्म के कष्ट मिट गये*। सर्व दुखों से परे आपके पावन प्रेम की शीतल छाया को पाकर मैं धन्य-धन्य हो गई हूँ। आपको पाकर मैंने सब कुछ पा लिया मेरे स्वामी।

 

_ ➳  मेरे प्यार का प्रतिफल मेरे प्राणेश्वर शिव बाबा के प्यार की शक्तिशाली किरणों के रूप में अब मुझ पर बरस रहा है जो मुझे आनन्द विभोर कर रहा है। अपने गिरधर गोपाल से असीम प्रेम पा कर अब मैं धीरे - धीरे परमधाम से नीचे आ रही हूँ और प्रवेश कर रही हूँ अपनी साकारी देह में। *मेरा मन अब परम आनन्द से भरपूर है। मेरा जीवन ईश्वरीय प्रेम से भर गया है। अब मुझे बाप समान फ्राकदिल बन सर्व आत्माओं को इस परमात्म सुख, परमात्म प्रेम का अनुभव करवाना है* और सबको परमात्म वर्से का अधिकारी बनाना है । यही मेरा अब इस साकार सृष्टि पर कर्तव्य रह गया है ।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

✺   *मैं अपने श्रेष्ठ जीवन द्वारा परमात्म ज्ञान का प्रत्यक्ष प्रूफ देने वाली आत्मा हूँ।*

✺   *मैं माया प्रूफ आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

✺   *मैं आत्मा अटेंशन रूपी पहरेदार को सदैव ठीक रखती हूँ  ।*

✺   *मैं आत्मा अतींद्रिय सुखों के खज़ाने को खोने से सदैव मुक्त हूँ  ।*

✺   *मैं सुख स्वरूप संपन्न आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  कोई कैसा भी हो उनके साथ चलने की विधि सीखो। कोई क्या भी करता होबार-बार विघ्न रूप बन सामने आता हो लेकिन यह विघ्नों में समय लगाना, आखिर यह भी कब तक? इसका भी समाप्ति समारोह तो होना है नातो *दूसरे को नहीं देखना। यह ऐसे करता हैमुझे क्या करना हैअगर वह पहाड़ है तो मुझे किनारा करना हैपहाड़ नहीं हटना है। यह बदले तो हम बदलें - यह है पहाड़ हटे तो मैं आगे बढूं। न पहाड़ हटेगा न आप मंजिल पर पहुंच सकेंगे। इसलिए अगर उस आत्मा के प्रति शुभ भावना हैतो इशारा दिया और मन-बुद्धि से खाली।* खुद अपने को उस विघ्न स्वरूप बनने वाले के सोच-विचार में नहीं डालो। जब नम्बरवार हैं तो नम्बरवार में स्टेज भी नम्बरवार होनी ही है लेकिन हमको नम्बरवन बनना है।

 

 _ ➳  ऐसे विघ्न वा व्यर्थ संकल्प चलाने वाली आत्माओं के प्रति स्वयं परिवर्तन होकर उनके प्रति शुभ भावना रखते चलो। टाइम थोड़ा लगता हैमेहनत थोड़ी लगती है लेकिन *आखिर जो स्व-परिवर्तन करता हैविजय की माला उसी के गले में पड़ती है। शुभ भावना से अगर उसको परिवर्तन कर सकते हो तो करो, नहीं तो इशारा दोअपनी रेसपान्सिबिल्टी खत्म कर दो और स्व परिवर्तन कर आगे उड़ते चलो*। यह विघ्न रूप भी सोने का लगाव का धागा है। यह भी उड़ने नहीं देगा। यह बहुत महीन और बहुत सत्यता के पर्दे का धागा है। यही सोचते हैं यह तो सच्ची बात है ना। यह तो होता है ना। यह तो होना नहीं चाहिए ना। *लेकिन कब तक देखतेकब तक रुकते रहेंगेअब तो स्वयं को महीन धागों से भी मुक्त करो। मुक्ति वर्ष मनाओ।*

 

✺   *ड्रिल :-  "विघ्न-विनाशक बन महीन धागों से मुक्त होने का अनुभव"*

 

 _ ➳  अमृतवेला के सुंदर सुहावने समय में मैं आत्मा मीठे बाबा की याद में बैठी हुई हूँ... *मेरा मन अपने श्रेष्ठ भाग्य के नशे में झूम रहा है... कितनी खुशकिस्मत आत्मा हूँ मैं... स्वयं भगवान ने मुझे अपना बना लिया है... मेरे प्यारे बाबा ने मुझे स्वयं की सत्य पहचान दी...* मेरे 84 जन्मों के चक्र के बारे में बताया... सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलियुग में अनेक जन्म लेते लेते... अब मैं आत्मा कल्प के इस अंतिम पड़ाव पर आ गई हूँ... इस बेहद सुंदर, कल्याणकारी संगम के समय में... मेरे मीठे शिवबाबा मेरे साथी बन गए हैं...

 

 _ ➳  बाबा से अविरल स्नेह की धारा मुझ आत्मा पर पड़ रही है... मीठे बाबा अपनी स्नेहिल दृष्टि से मुझे निहाल कर रहे हैं... उनकी भृकुटी से, नयनों से दिव्य तेज निकलकर मुझमें समाता जा रहा है... मैं आत्मा सशक्त बनती जा रही हूँ... मैं चिंतन कर रही हूँ कि... कितना सुंदर भाग्य है मेरा स्वयं भगवान ने मुझे अपना बना लिया है... सारा संसार जिसकी एक झलक पाने के लिए तरस रहा है उससे मैं सम्मुख मिलन मना रही हूँ... *परमात्म मिलन और ईश्वरीय प्राप्तियों की चंद ही घड़ियाँ शेष रही हैं... इस बात को मैं आत्मा गहराई से स्वयं में समाती जा रही हूँ...*

 

 _ ➳  मैं आत्मा संगम के अपने एक-एक पल को सफल कर रही हूँ... भिन्न-भिन्न स्वभाव संस्कार वाली आत्माओं से संस्कार मिलन की रास मना रही हूँ... कैसी भी आत्मा हो, कोई कुछ भी करता रहे... मैं आत्मा सभी के प्रति शुभ भावना ही रखती हूँ... *संस्कारों के टकराव में, विघ्नों में अपने अमूल्य समय को न गंवा कर... मैं ईश्वरीय फ़खुर में झूम रही हूँ... दूसरों के पार्ट पर ध्यान देने की बजाय मैं स्वचिंतन और स्व-परिवर्तन पर ध्यान दे रही हूँ...*

 

 _ ➳  विघ्न रूपी पहाड़ों से टकराने में समय और शक्तियों को व्यर्थ ना करके... मैं किनारा करती जा रही हूँ... विघ्न रूपी पहाड़ हटे तो मैं मंजिल पर पहुँचूँ, इन कपोल कल्पना में एक पल भी ना गंवा कर... हर आत्मा के प्रति कल्याण की भावना ही रख रही हूँ... मेरे बाबा मुझे राजा बच्चा देखना चाहते हैं... तो जैसा लक्ष्य उसी अनुसार मैं लक्षण धारण कर रही हूँ... *कोई भी आत्मा जो विघ्न डालने या व्यर्थ संकल्प चलाने के निमित्त बनती है उनके प्रति भी मेरे मन में कल्याण की ही भावना है... मैं स्वयं को मोल्ड करती जा रही हूँ... क्योंकि स्व परिवर्तन करने वालों की विजय निश्चित होनी ही है...*

 

 _ ➳  शुभ भावना, श्रेष्ठ भावना रख उस आत्मा को इशारा देकर आगे बढ़ रही हूँ... *स्व परिवर्तन द्वारा उड़ती कला के लक्ष्य की ओर अग्रसर हो रही हूँ... ये विघ्न सोने के लगाव के धागों के जैसे हैं...* बहुत ही महीन धागे हैं ये... जो पुरुषार्थ में उड़ान भरने नहीं देते... बाबा के साथ और सहयोग से मैं आत्मा स्वयं को इन महीन धागों से मुक्त, स्वतंत्र करती जा रही हूँ... समय अब अपनी अंतिम घड़ियां गिन रहा है, ऐसे में *मैं आत्मा... प्यारे बाबा के इशारे समझकर विघ्न विनाशक बन हर प्रकार के महीन धागों से मुक्त हो रही हूँ... संपन्नता की अपनी मंजिल की ओर बढ़ती जा रही हूँ...*

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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