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 03 / 10 / 21  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *दिल के स्नेह से बाप पर कुर्बान गए ?*

 

➢➢ *सम्बन्ध संपर्क में शक्तिशाली मनसा रही ?*

 

➢➢ *हर बोल में शुभ भावना रही ?*

 

➢➢ *सहज कर्मयोगी बनकर रहे ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  कर्मातीत बनने के लिए कर्मों के हिसाब-किताब से मुक्त बनो। सेवा में भी सेवा के बंधन में बंधने वाले सेवाधारी नहीं। बन्धनमुक्त बन सेवा करो अर्थात् हद की रायॅल इच्छाओं से मुक्त बनो। *जैसे देह का बन्धन, देह के सम्बन्ध का बन्धन, ऐसे सेवा में स्वार्थ-यह भी बन्धन कर्मातीत बनने में विघ्न डालता है। कर्मातीत बनना अर्थात् इस रॉयल हिसाब-किताब से भी मुक्त।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं महावीर आत्मा हूँ"*

 

✧  सदैव अपने को महावीर अर्थात् महान् आत्मा अनुभव करते हो? *महान् आत्मा सदा जो संकल्प करेंगे, बोल बोलेंगे वो साधारण नहीं होगा, महान् होगा। क्योंकि ऊंचे-ते-ऊंचे बाप के बच्चे भी ऊंचे, महान् हुए ना।* जैसे कोई आजकल की दुनिया में वी.आई.पी. का बच्चा होगा तो वह अपने को भी वी.आई.पी. समझेगा ना। तो आप से ऊंचा तो कोई है ही नहीं।

 

✧  *तो ऐसे, ऊंचे-ते-ऊंचे बाप की सन्तान ऊंचे-ते-ऊंची आत्मायें हैं-यह स्मृति सदा शक्तिशाली बनाती है। ऊंचा बाप, ऊंचे हम, ऊंचा कार्य-ऐसी स्मृति में रहने वाले सदा बाप समान बन जाते हैं। तो बाप समान बने हो? बाप हर बच्चे को ऊंचा ही बनाते हैं। कोई ऊंचा, कोई नीचा नहीं, सब ऊंचे-ते-ऊंचे।* अगर अपनी कमजोरी से कोई नीचे की स्थिति में रहता है तो उसकी कमजोरी है। बाकी बाप सबको ऊंचा बनाता है। सारे विश्व के आगे श्रेष्ठ और ऊंची आत्मायें आपके सिवाए कोई नहीं हैं, इसलिए तो आप आत्माओंका ही गायन और पूजन होता है।

 

✧  अभी तक गायन, पूजन हो रहा है। कभी भी कोई मन्दिर में जायेंगे तो क्या समझेंगे? कोई भी मन्दिर में मूर्ति देखकर क्या समझते हो? यह हमारी ही मूर्ति है। सिर्फ बाप नहीं पूजा जाता, बाप के साथ आप भी पूजे जाते हो। ऐसे महान् बन गये! एक बार नहीं, अनेक बार बने हैं-जहाँ यह नशा होगा वहाँ माया की आकर्षण अपने तरफ आकर्षित नहीं कर सकेगी, सदा न्यारे होंगे। सभी अपने आप से सन्तुष्ट हो? *जैसे बाप सुनाते हैं, वैसे ही अनुभव करते हुए आगे बढ़ना-यह है अपने आप से सन्तुष्ट रहना। 'ऊंचे-ते-ऊंचे'-यही विशष बरदान याद रखना। याद करना सहज है या मुश्किल लगता है? सहज स्मृति स्वत: आती रहेगी। माया कहाँ रोक नहीं सकेगी, सदा आगे बढ़ते रहेंगे।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  आज बच्चों के स्नेही बापदादा हर एक बच्चे को विशेष दो बातों में चेक कर रहे थे। स्नेह का प्रत्यक्ष स्वरूप बच्चों को सम्पन और सम्पूर्ण बनाना है। हर एक में *रूलिंग पॉवर और कन्ट्रोलिंग पॉवर कहाँ तक आई है - आज यह देख रहे थे।*

 

✧  जैसे आत्मा की स्थूल कर्मेन्द्रियाँ आत्मा के कन्ट्रोल से चलती है, जब चाहे, जैसे चाहे और जहाँ चाहे वैसे चला सकते हैं और चलाते रहते हैं। कन्ट्रोलिंग पॉवर भी है। जैसे हाथ-पाँव स्थूल शक्तियाँ हैं ऐसे *मन-बुद्धि-संस्कार आत्मा की सूक्ष्म शक्तियाँ हैं।*

 

✧  सूक्ष्म शक्तियों के ऊपर कन्ट्रोल करने की पॉवर अर्थात मन-बुद्धि को, संस्कारों को जब चाहें, जहाँ चाहे, जैसे चाहे, जितना समय चाहे - ऐसे कन्ट्रोलिंग पॉवर, रूलिंग पॉवर आई है? क्योंकि इस ब्राह्मण जीवन में मास्टर आलमाइटी अर्थार्टी बनते हो। *इस समय की प्राप्ति सारा कल्प - राज्य रूप और पुजारी के रूप में चलती रहती है।*

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ मन के मालिक हो ना! तो सेकण्ड में स्टॉप, तो स्टॉप हो जाए। *ऐसा नहीं आप कहो स्टॉप और मन चलता रहे, इससे सिद्ध है कि मालिकपन की शक्ति कम है। अगर मालिक शक्तिशाली है तो मालिक के डायरेक्शन बिना मन एक संकल्प भी नहीं कर सकता।* स्टॉप, तो स्टॉप। चलो, तो चले। जहाँ चलाने चाहो वहाँ चले। *ऐसे नहीं कि मन को बहुत समय की व्यर्थ तरफ चलने की आदत है, तो आप चलाओ शुद्ध संकल्प की तरफ और मन जाये व्यर्थ की तरफ। तो यह मालिक को मालिकपन में चलाना नहीं आता।* यह अभ्यास करो। चेक करो स्टॉप कहने से, स्टॉप होता है? या कुछ चलकर फिर स्टॉप होता है? *अगर गाड़ी में ब्रेक लगानी हो लेकिन कुछ समय चलकर फिर ब्रेक लगे, तो वह गाड़ी काम की है? ड्राइव करने वाला योग्य है कि एक्सीडेंट करने वाला है? ब्रेक, तो फौरन सेकण्ड में ब्रेक लगनी चाहिए। यही अभ्यास कर्मातीत अवस्था के समीप लायेगा।* संकल्प करने के कर्म में भी फुल पास। कर्मातीत का अर्थ ही है हर सबजेक्ट में फुल पास।

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- "वाचा और कर्मणा दोनों शक्तियों को जमा करना*

 

_ ➳  *मैं आत्मा मधुबन बाबा की कुटिया में बैठ बाबा के प्रेम तरगों में डूबी हुई हूँ... यह पावन भूमि बहुत ही मीठी भूमि है... जहाँ निराकार परमपिता परमात्मा ब्रह्मा तन में आकर नई दुनिया के लिए नया  ज्ञान देते हैं...* पतितों को पावन बनाते हैं... यहाँ की हवाओं में फैली मीठी-मीठी पावन खुशबू मन को आह्लादित कर रही है... *फिर मीठे बाबा मेरा हाथ पकड बगीचे में ले जाते हैं और मुझे अपने हाथों से मीठे-मीठे अंगूर तोड़कर खिलाते हुए मीठी समझानी देते हैं...*

 

  *मनसा-वाचा-कर्मणा कभी किसी को भी दुःख ना देने की शिक्षा देते हुए प्यारे बाबा कहते हैं:-* मेरे लाडले बच्चे... *प्यार के सागर के दिल की मणि हो तो मीठे बन प्यार से मुस्कराओ...* हर दिल को पिता जैसे प्यार से सहलाओ... सबके सहयोगी बन सदा का दिल जीतो... *मीठे बोलो की टोली खाते रहो और खिलाते रहो... और मीठी वाणी से मीठे पिता का पता दे आओ...*

 

_ ➳  *मैं आत्मा प्यारे बाबा के प्यार में दीवानी होकर सर्व पर प्यार के फूल बरसाते हुए कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा कितनी मीठी और प्यारी बन गई हूँ... हर दिल की राहत हो गई हूँ... सारा विश्व मेरा परिवार है... *सब मेरे अपने ही आत्मा भाई है... इस सुंदर भाव में डूबकर सदा की मीठी हो गयी हूँ...*

 

  *प्यार के सागर प्यारे बाबा प्यार की मिठास का एहसास कराते हुए कहते हैं:-* मीठे प्यारे फूल बच्चे... सारी दुनिया दुखो में डूबी हुई निढाल हो गई है... आप प्यार भरी मिठास से उनमे नव जीवन का संचार करो... प्यार के मरहम से उनके दुखो को दूर करो... *मनसा-वाचा-कर्मणा सुख देकर उनके थके तनमन को आनन्द से भर दो... मा. प्यार सागर बन प्यार का दरिया बहाओ...*

 

_ ➳  *मैं आत्मा प्रेम की बदली बन पूरे विश्व को प्रेम की वर्षा में भिगोते हुए कहती हूँ:-* मेरे प्राणप्रिय बाबा... मै आत्मा आपके मीठे साये में प्रेम से ओतप्रोत हो रही हूँ... सब पर प्यार लुटाती जा रही हूँ... *सबपर सुखो की वर्षा कर दुखो से मुक्त कर रही हूँ.... मा. प्रेमसागर बन प्रेम के झरनो में सबको भिगो रही हूँ...*

 

  *अपने प्रेम किरणों से विकारों को भस्म कर निर्विकारी बनाते हुए मेरे बाबा कहते हैं:-* प्यारे सिकीलधे मीठे बच्चे... आप बड़े वाले देवता हो... आपको सबको प्यार देना है सबका ध्यान रखना है सबकी सम्भाल करनी है... *ईश्वर के बच्चे हो सबको खुशियां देने के निमित्त हो... सारे विश्व को खुशियो से भर दो... हर आत्मा को प्रेम से सींच कर खुशहाली दो...*

 

_ ➳  *मैं आत्मा डबल अहिंसक बन भाई-भाई की मीठी दृष्टि रख सब पर प्रेम लुटाते हुए कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... *मै आत्मा प्रेम धारा बनकर सबकी मीठी पालना कर रही हूँ...* मेरा पोर पोर प्यार में डूब रहा है और यह प्रेम तरंगे पूरे विश्व में फैला कर सुखो का कारवां ला रही हूँ.... *चारो और सुख और प्रेम बिखरा है...*

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- दिल के स्नेह से बाप पर कुर्बान जाना*"

 

_ ➳  हीरे के समान चमकती मैं मस्तक मणि आत्मा इस देह में भृकुटि सिहांसन पर विराजमान हो कर अपनी दिव्य आभा चारों ओर बिखेर रही हूं। *मैं अजर, अमर, अविनाशी आत्मा शिव पिता की अजर, अमर, अविनाशी सन्तान हूं*। मेरा वास्तविक स्वरुप तो हीरे के समान अति उज्ज्वल ही है किंतु देह अभिमान में आने के कारण, *विकारों की प्रवेशता ने मेरे इस अति उज्ज्वल रूप को लोहे के समान बना कर उसे मैला कर दिया था* जिसे मेरे दिलाराम दिलरुबा शिव बाबा ने आ कर ज्ञान और योग द्वारा फिर से चमकदार बनाने का सहज उपाय बता दिया।

 

_ ➳  मेरे दिलाराम शिव बाबा अपनी श्रेष्ठ मत द्वारा हर *रोज ज्ञान और योग रूपी साबुन से मुझ आत्मा की धुलाई कर मेरे मैले हो चुके स्वरूप को फिर से चमकदार बना कर मुझ आत्मा को कौड़ी से हीरे जैसा बना रहे हैं*। मेरे कौड़ी तुल्य जीवन को हीरे तुल्य बनाने वाले ऐसे दिलाराम बाप पर मुझे कितना बलिहार जाना चाहिए, यह विचार करते करते अपने दिलरुबा शिव बाबा से मिलने के लिए मैं आत्मा इस नश्वर देह को छोड़ चल पड़ती हूँ उस रूहानी यात्रा पर जो मुझे मेरे दिलाराम शिव बाबा तक पहुंचाने वाली है।

 

_ ➳  मन मे अपने शिव प्रीतम से मिलने का उमंग उत्साह लिए, ज्ञान और योग के पंख लगाए मैं आत्मा उड़ती जा रही हूं। सूर्य, चांद, सितारों को पार करते हुए उससे परे सूक्ष्म लोक को भी पार करते हुए मैं पहुंच गई आत्माओं की उस निराकारी दुनिया मे जहां मेरे शिव पिया रहते हैं। *अब मैं देख रही हूं अपने सामने अपने दिलरुबा शिव बाबा को जिनकी अनन्त शक्तियों रूपी किरणों से यह निराकारी दुनिया एक दिव्य प्रकाश से प्रकाशित हो रही है*। शांति और शक्ति के शक्तिशाली वायब्रेशन इस पूरे ब्रह्मांड में सर्वत्र फैले हुए हैं जो मन को असीम शान्ति और शक्ति से भरपूर कर शक्तिशाली बना रहे हैं।

 

_ ➳  गहन शान्ति की अनुभूति करते हुए अपने शिव पिया के सानिध्य में मैं उनकी सर्वशक्तियों से स्वयं को भरपूर कर रही हूं। उनसे आ रही सर्वशक्तियों की शक्तिशाली किरणे मुझ आत्मा के ऊपर चढ़ी विकारों की कट को जला कर मुझे हीरे के समान चमकदार बना रही है। मेरा स्वरुप अति उज्ज्वल होता जा रहा है। *विकर्मों का बोझ मुझ आत्मा के ऊपर से उतरने लगा हैं और मैं स्वयं को एकदम हल्का अनुभव करने लगी हूँ। अपने मीठे प्यारे शिव बाबा की लाइट और माइट को स्वयं में समा कर लाइट माइट स्वरूप बन कर अब मैं आत्मा लौट रही हूँ* फिर से उसी कर्मक्षेत्र पर अपना पार्ट बजाने के लिए। अपनी साकारी देह में प्रवेश कर मैं आत्मा फिर से आ कर भृकुटि सिहांसन पर विराजमान हो जाती हूँ।

 

_ ➳  साकारी तन में विराजमान हो कर, इस कर्मभूमि पर रहते, हर कर्म करते अब मैं आत्मा अपने शिव पिया की शिक्षाओं को जीवन मे धारण कर अपने जीवन को हीरे तुल्य बनाने का दृढ़ संकल्प करती हूं। मेरा *यह दिव्य अलौकिक ब्राह्मण जीवन मेरे दिलाराम शिव बाबा की अमानत है इसलिए मनमत या परमत पर चल कर मुझे इस अमानत में खयानत नही डालनी* बल्कि एक-एक कदम अपने दिलाराम बाबा की श्रेष्ठ मत पर चल कर अब मुझे उन पर पूरी तरह बलिहार जाना है। सच्चा परवाना बन शमा पर पूरी तरह फिदा हो जाना है।

 

_ ➳  मन ही मन स्वयं से यह दृढ़ प्रतिज्ञा करती हुई अपने शिव पिया की श्रेष्ठ मत पर चल अब मै अपने हर कर्म को दिव्य और श्रेष्ठ बना रही हूँ। *शिव बाबा द्वारा रचे इस रुद्र ज्ञान यज्ञ में स्वयं को समर्पित कर, ईश्वरीय कार्य मे उनकी मददगार बन उन पर फिदा होने का सच्चा सबूत दे रही हूं*।

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं कल्याण की भावना द्वारा हर आत्मा के संस्कारों को परिवर्तन करने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं निश्चयबुद्धि आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा पवित्रता की शक्ति को धारण करती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा अपने संकल्पों को शुद्ध, ज्ञान स्वरूप बनाती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा कमजोरियों को समाप्त करती हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  कोई कैसा भी हो उनके साथ चलने की विधि सीखो। कोई क्या भी करता होबार-बार विघ्न रूप बन सामने आता हो लेकिन यह विघ्नों में समय लगाना, आखिर यह भी कब तक? इसका भी समाप्ति समारोह तो होना है नातो *दूसरे को नहीं देखना। यह ऐसे करता हैमुझे क्या करना हैअगर वह पहाड़ है तो मुझे किनारा करना हैपहाड़ नहीं हटना है। यह बदले तो हम बदलें - यह है पहाड़ हटे तो मैं आगे बढूं। न पहाड़ हटेगा न आप मंजिल पर पहुंच सकेंगे। इसलिए अगर उस आत्मा के प्रति शुभ भावना हैतो इशारा दिया और मन-बुद्धि से खाली।* खुद अपने को उस विघ्न स्वरूप बनने वाले के सोच-विचार में नहीं डालो। जब नम्बरवार हैं तो नम्बरवार में स्टेज भी नम्बरवार होनी ही है लेकिन हमको नम्बरवन बनना है।

 

 _ ➳  ऐसे विघ्न वा व्यर्थ संकल्प चलाने वाली आत्माओं के प्रति स्वयं परिवर्तन होकर उनके प्रति शुभ भावना रखते चलो। टाइम थोड़ा लगता हैमेहनत थोड़ी लगती है लेकिन *आखिर जो स्व-परिवर्तन करता हैविजय की माला उसी के गले में पड़ती है। शुभ भावना से अगर उसको परिवर्तन कर सकते हो तो करो, नहीं तो इशारा दोअपनी रेसपान्सिबिल्टी खत्म कर दो और स्व परिवर्तन कर आगे उड़ते चलो*। यह विघ्न रूप भी सोने का लगाव का धागा है। यह भी उड़ने नहीं देगा। यह बहुत महीन और बहुत सत्यता के पर्दे का धागा है। यही सोचते हैं यह तो सच्ची बात है ना। यह तो होता है ना। यह तो होना नहीं चाहिए ना। *लेकिन कब तक देखतेकब तक रुकते रहेंगेअब तो स्वयं को महीन धागों से भी मुक्त करो। मुक्ति वर्ष मनाओ।*

 

✺   *ड्रिल :-  "विघ्न-विनाशक बन महीन धागों से मुक्त होने का अनुभव"*

 

 _ ➳  अमृतवेला के सुंदर सुहावने समय में मैं आत्मा मीठे बाबा की याद में बैठी हुई हूँ... *मेरा मन अपने श्रेष्ठ भाग्य के नशे में झूम रहा है... कितनी खुशकिस्मत आत्मा हूँ मैं... स्वयं भगवान ने मुझे अपना बना लिया है... मेरे प्यारे बाबा ने मुझे स्वयं की सत्य पहचान दी...* मेरे 84 जन्मों के चक्र के बारे में बताया... सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलियुग में अनेक जन्म लेते लेते... अब मैं आत्मा कल्प के इस अंतिम पड़ाव पर आ गई हूँ... इस बेहद सुंदर, कल्याणकारी संगम के समय में... मेरे मीठे शिवबाबा मेरे साथी बन गए हैं...

 

 _ ➳  बाबा से अविरल स्नेह की धारा मुझ आत्मा पर पड़ रही है... मीठे बाबा अपनी स्नेहिल दृष्टि से मुझे निहाल कर रहे हैं... उनकी भृकुटी से, नयनों से दिव्य तेज निकलकर मुझमें समाता जा रहा है... मैं आत्मा सशक्त बनती जा रही हूँ... मैं चिंतन कर रही हूँ कि... कितना सुंदर भाग्य है मेरा स्वयं भगवान ने मुझे अपना बना लिया है... सारा संसार जिसकी एक झलक पाने के लिए तरस रहा है उससे मैं सम्मुख मिलन मना रही हूँ... *परमात्म मिलन और ईश्वरीय प्राप्तियों की चंद ही घड़ियाँ शेष रही हैं... इस बात को मैं आत्मा गहराई से स्वयं में समाती जा रही हूँ...*

 

 _ ➳  मैं आत्मा संगम के अपने एक-एक पल को सफल कर रही हूँ... भिन्न-भिन्न स्वभाव संस्कार वाली आत्माओं से संस्कार मिलन की रास मना रही हूँ... कैसी भी आत्मा हो, कोई कुछ भी करता रहे... मैं आत्मा सभी के प्रति शुभ भावना ही रखती हूँ... *संस्कारों के टकराव में, विघ्नों में अपने अमूल्य समय को न गंवा कर... मैं ईश्वरीय फ़खुर में झूम रही हूँ... दूसरों के पार्ट पर ध्यान देने की बजाय मैं स्वचिंतन और स्व-परिवर्तन पर ध्यान दे रही हूँ...*

 

 _ ➳  विघ्न रूपी पहाड़ों से टकराने में समय और शक्तियों को व्यर्थ ना करके... मैं किनारा करती जा रही हूँ... विघ्न रूपी पहाड़ हटे तो मैं मंजिल पर पहुँचूँ, इन कपोल कल्पना में एक पल भी ना गंवा कर... हर आत्मा के प्रति कल्याण की भावना ही रख रही हूँ... मेरे बाबा मुझे राजा बच्चा देखना चाहते हैं... तो जैसा लक्ष्य उसी अनुसार मैं लक्षण धारण कर रही हूँ... *कोई भी आत्मा जो विघ्न डालने या व्यर्थ संकल्प चलाने के निमित्त बनती है उनके प्रति भी मेरे मन में कल्याण की ही भावना है... मैं स्वयं को मोल्ड करती जा रही हूँ... क्योंकि स्व परिवर्तन करने वालों की विजय निश्चित होनी ही है...*

 

 _ ➳  शुभ भावना, श्रेष्ठ भावना रख उस आत्मा को इशारा देकर आगे बढ़ रही हूँ... *स्व परिवर्तन द्वारा उड़ती कला के लक्ष्य की ओर अग्रसर हो रही हूँ... ये विघ्न सोने के लगाव के धागों के जैसे हैं...* बहुत ही महीन धागे हैं ये... जो पुरुषार्थ में उड़ान भरने नहीं देते... बाबा के साथ और सहयोग से मैं आत्मा स्वयं को इन महीन धागों से मुक्त, स्वतंत्र करती जा रही हूँ... समय अब अपनी अंतिम घड़ियां गिन रहा है, ऐसे में *मैं आत्मा... प्यारे बाबा के इशारे समझकर विघ्न विनाशक बन हर प्रकार के महीन धागों से मुक्त हो रही हूँ... संपन्नता की अपनी मंजिल की ओर बढ़ती जा रही हूँ...*

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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