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 03 / 12 / 18  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *सच्ची दिल से बाप को अपना समाचार दिया ?*

 

➢➢ *अशरीरी बनने का अभ्यास किया ?*

 

➢➢ *मेरेपन को छोड़ ट्रस्टी बन सेवा की ?*

 

➢➢ *बुधी में हर समय बाप और श्रीमत की स्मृति रही ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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〰✧  जैसे यह देह स्पष्ट दिखाई देती है वैसे अपनी आत्मा का स्वरूप स्पष्ट दिखाई दे अर्थात् अनुभव में आये। *मस्तक अर्थात् बुद्धि की स्मृति वा दृष्टि से सिवाए आत्मिक स्वरूप के और कुछ भी दिखाई न दे वा स्मृति में न आये। ऐसे निरन्तर तपस्वी बनो तब हर आत्मा के प्रति कल्याण का शुभ संकल्प उत्पन्न होगा।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं संगमयुगी बेपरवाह बादशाह हूँ"*

 

  सदा अपने को संगमयुगी बेपरवाह बादशाह हूँ - ऐसे समझते हो? पुरानी दुनिया की कोई परवाह नहीं। सदा दिल में ब्रह्मा बाबा समान क्या गीत गाते हो? परवाह थी पार ब्रह्म में रहने वाले की, वह तो पा लिया, अभी क्या परवाह! तो बेपरवाह बादशाह हो, गुलाम नहीं। *इस बादशाही जैसी और कोई बादशाही नहीं। क्योंकि यह बादशाही डायरेक्ट बाप ने दी है। और जो भी बादशाही मिलती है वह या तो धन दान करने से मिलती है या आजकल के वोटों से मिलती है और आपको स्वयं बाप ने राजतिलक दे दिया। इस राजतिलक के आगे सतयुग का राजतिलक भी कोई बड़ी बात नहीं।* तो यह राजतिलक पक्का लगा हुआ है या मिट जाता है?

 

  अभी-अभी राजा और अभी-अभी गुलाम - ऐसा खेल तो नहीं करते हो? बेपरवाह बादशाह - यह कितनी अच्छी स्थिति है! जब सब-कुछ बाप के हवाले कर दिया तो परवाह किसको होगी - बाप को या आपको? बाप जाने। *जब अपने जीवन की जिम्मेवारी बाप के हवाले की है तो बाप जाने। ऐसे तो नहीं - थोड़ा-थोड़ा कहीं अपनी अथॉरिटी को छिपाकर रखा हो, मनमत को छिपाकर रखा हो। अगर श्रीमत पर हैं तो बाप के हवाले हैं।* सच्ची दिल से बाप के हवाले सबकुछ कर दिया तो उसकी निशानी सदा डबल लाईट होंगे, कोई बोझ नहीं होगा। अगर किसी भी प्रकार का बोझ है तो इससे सिद्ध है कि बाप के हवाले नहीं किया। जब बाप फर करता है कि सब बोझ मेरे को दे दो और तुम हल्के हो जाओ, तो क्या करना चाहिए? ऐसा सर्वेन्ट फिर नहीं मिलेगा। अनेक जन्म बोझ रखकर देख लिया, बोझ से क्या हुआ? नीचे ही होते गये।

 

  *अब डबल लाइट बन उड़ते रहो। तन-मन-धन सब ट्रांस्फर कर दो। कोई कहते हैं - और कोई बोझ नहीं है लेकिन थोड़ा-थोड़ा सम्बन्ध का बोझ है। तो सर्व सम्बन्ध बाप से नहीं जोड़ा है तब बोझ है। वायदा है सर्व सम्बन्ध एक बाप से। तो कोई बोझ नहीं। आराम से दाल-रोटी खाओ और उड़ती कला में उड़ो।* कहाँ भी रहते बाप को भोग लगा कर खाते हो तो ब्रह्मा भोजन खाते हो। ब्रह्मा भोजन खाओ, खूब नाचो और मौज मनाओ। अभी मौज में नहीं रहेंगे तो कब रहेंगे!

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  (बापदादा ने ड़िल कराई) एक सेकण्ड में अपने को अशरीरी बना सकते हो? क्यों? संकल्प किया मैं अशरीरी आत्मा हूँ, तो कितना टाइम लगा? सेकण्ड लगा ना! तो *सेकण्ड में अशरीरी, न्यारे और बाप के प्यारे - ये ड्रिल सारे दिन में बीच-बीच में करते रहो।*

 

✧  करने तो आती है ना? *तो अभी सब एक सेकण्ड में सब भूलकर एकदम अशरीरी बन जाओ* (बापदादा ने 5 मिनट ड़िल कराई) अच्छा। इस ड्रिल को दिन में जितना बार ज्यादा कर सको उतना करते रहना।

 

✧  चाहे एक मिनट करो। तीन मिनट, दो मिनट का टाइम न भी हो एक मिनट, आधा मिनट *यह अभ्यास करने से लास्ट समय अशरीरी बनने में बहुत मदद मिलेगी।* बन सकते हैं?

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧  *कर्तव्य करते हुए भी कि मैं फ़रिश्ता निमित्त इस कार्य-अर्थ, पृथ्वी पर पाँव रख रहा हूँ, लेकिन मैं हूँ अव्यक्त देश का वासी, अब इस स्मृति को ज़्यादा बढ़ाओ।* मैं इस कार्य-अर्थ अवतरित हुई हूँ अर्थात् जैसे कि मैं इस कार्य अर्थ पृथ्वी पर वतन से आई हूँ कारोबार पूरी हुई, फिर वापस अपने वतन में। *जैसे कि बाप आते हैं, तो बाप को स्मृति है ना कि हम वतन से आये हैं, कर्तव्य के निमित्त और फिर हमको वापिस जाना है। ऐसे ही आप सबकी भी यह स्मृति बढ़नी चाहिए कि मैं अवतार हूँ अर्थात् मैं अवतरित हुई हूँ।* मैं मरजीवा बन रही हूँ, अभी मैं ब्राह्मण हूँ और फिर मैं देवता बनूँगी- यह भी वास्तव में मोटा रूप है। यह स्टेज भी साकारी है। *अभी आप लोगों की स्टेज आकारी चाहिए, क्योंकि आकारी से फिर निराकारी सहज बनेंगे।* जैसे बाप भी साकार से आकारी बना, आकारी से फिर निराकारी और फिर साकारी बनेंगे।' *अब आप लोगों को भी अव्यक्त वतनवासी स्टेज तक पहुँचना है, तभी तो आप साथ चल सकेंगे।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- ज्ञान और योग के साथ-साथ अपनी चलन भी अच्छी रखना"*

 

_ ➳  *बरसात के भीगे भीगे खुबसूरत मौसम में... मै आत्मा ठंडी फुहारों का आनन्द लेती हुई... अपने प्रियतम बाबा को पुकारती हूँ... मीठे बाबा एक पल में हाजिर हो जाते है...और मै आत्मा... अपने प्यारे बाबा के असीम प्यार की बदौलत... मीठे हो गए, अपने मन को निहारती हूँ..*. यह मन बिना बाबा के कितना कटु और शुष्क था... आज सच्चे प्रेम में पोर पोर से डूबा हुआ है... मीठे बाबा ने मुझे प्रेम की मिसाल बना दिया है... आज सारा विश्व मेरी प्रेम तंरगों का दीवाना है... और मुझे यूँ खोया देख बाबा मुस्करा रहे है...

 

   *मीठे बाबा ने मुझ आत्मा को सतयुगी सुखो से आबाद बनाते हुए कहा :-* "मीठे प्यारे फूल बच्चे... ईश्वर पिता को टीचर, और सतगुरु को पाकर सब कुछ पा लिया है... मीठे बाबा के सारे खजाने सारी खाने आपकी है.. इतनी दौलत के मालिक बनकर... *अपनी श्रीमत के रंग में रंगी, मीठी दैवी चलन का, दीवाना विश्व को बनाओ.*.. सबको आप समान सुखो से भर आओ..."

 

_ ➳  *मै आत्मा मीठे बाबा सागर से मीठेपन को स्वयं में भरकर कहती हूँ :-* "मेरे मीठे मीठे बाबा... *आपने जीवन में आकर, अपने प्यार की मिठास से, मुझ आत्मा को कितना, मीठा, प्यारा बना दिया है.*.. मै आत्मा इस सच्चे प्रेम की तरंगे, सारे विश्व पर बरसा रही हूँ... सबको सुखो का अधिकारी बनाती जा रही हूँ..."

 

   *प्यारे बाबा मुझ आत्मा को विश्वकल्याण की भावना से ओतप्रोत करते हुए कहते है :-* "मीठे लाडले बच्चे मेरे... *मीठे बाबा को पाकर, जो सुखो की दौलत पायी है... खुशियो की जागीरे दिल में समायी है.*.. उनकी झलक अपनी रूहानियत से सारे जहान में फैलाओ... अपनी देवताई चलन से सहज ही ईश्वर पिता का परिचय दे आओ... बिछड़े हुए बच्चों को प्यारे पिता से मिलवाओ..."

 

_ ➳  *मै आत्मा मीठे बाबा की सारी रत्नों भरी खाने, अपने नाम, करते हुए कहती हूँ :-* "मीठे दुलारे बाबा मेरे... आप जीवन में न थे बाबा... तो मै आत्मा कितनी कँटीली और कड़वी थी... सच्ची मिठास से कितनी अनजान और अनभिज्ञ थी... *आपने अपने मीठे प्यार से सींच सींचकर... मुझे रूहानी गुलाब बना दिया है.*.. मै आत्मा दिव्यता की खुशबु हर दिल पर महका रही हूँ..."

 

   *मीठे बाबा मुझ आत्मा को अपनी सम्पत्ति का मालिक बनाते हुए कहते है :-* "मीठे सिकीलधे बच्चे... मीठे बाबा ने जो इतना मीठा प्यारा और दिव्य स्वरूप खिलाया है... *इस दिव्यता का मुरीद सबको बनाकर, सच्चे पिता की छवि, अपनी मीठी चलन से दिखाओ.*.. सबको मीठे बाबा के वर्से का अधिकारी, आप समान बना आओ..."

 

_ ➳  *मै आत्मा प्यारे बाबा को बड़े ही प्रेम से निहारते हुए कहती हूँ :-* "मेरे सच्चे साथी बाबा... *आपने अपनी प्यार भरी बाँहों में समाकर, मुझे रूहानी बना दिया है.*.. अपनी असली सुंदरता को पाकर, मै आत्मा... गुणो की खान बनकर मुस्करा रही हूँ... और इस दैवी सुन्दरता की छटा, पूरे विश्व में बिखेर कर, आपके करीब ला रही हूँ..."मीठे बाबा पर यूँ अपना प्यार उंडेल कर मै आत्मा... धरा की ओर रुख करती हूँ..."

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- अब वापिस जाना है इसलिए अशरीरी बनने का अभ्यास करना है*"

 

_ ➳  देह और देह की दुनिया से किनारा कर, अपने वास्तविक स्वरुप को मैं जैसे ही समृति में लाती हूं। मुझे अनुभव होता है जैसे यह देह अलग है और इस देह में विराजमान मैं आत्मा अलग हूं। *मन बुद्धि रूपी नेत्रों से मैं स्पष्ट देख रही हूं इस देह में भृकुटि सिंहासन पर विराजमान उस चैतन्य दीपक को जो इस शरीर रूपी मंदिर में जगमगा रहा है*। इस देह को चलाने वाली मैं चैतन्य शक्ति हूं। यह समृति मुझे सहज ही अपने वास्तविक स्वरुप में स्थित कर देती है। अपने सत्य स्वरुप में स्थित होते ही मुझ आत्मा के अंदर निहित गुण और शक्तियां स्वत: ही इमर्ज होने लगते हैं। *शांति, प्रेम, सुख, आनंद, पवित्रता, ज्ञान और शक्ति यही मुझे आत्मा के गुण हैं*। यही मेरा स्वधर्म है।

 

_ ➳  अपने स्वधर्म में स्थित होते ही अब मैं गहन शांति का अनुभव कर रही हूँ। शांति और सुख से भरपूर इस अवस्था में मेरी सर्व कर्मेन्द्रियां शांत और शीतल होती जा रही हैं । मेरे विचार शांत हो रहे हैं। और इस गहन शांति की अवस्था में मैं आत्मा अशरीरी बन इस देह से निकलकर अपने घर शांति धाम की ओर चल पड़ती हूं। *मन बुद्धि रूपी नेत्रों से इस साकार दुनिया के, प्रकृति के सुंदर- सुंदर नजारों को देखती हुई अपने पिता परमात्मा के प्रेम में मगन उनसे मिलन मनाने की तीव्र लग्न में मैं आत्मा एक आंतरिक यात्रा पर निरंतर बढ़ती जा रही हूं*। साकार लोक को पार कर, सूक्षम लोक को भी पार कर, मैं आत्मा पहुंच गई ब्रह्मलोक अपने शिव पिता परमात्मा के पास।

 

_ ➳  मन बुद्धि रूपी दिव्य नेत्रों से अब मैं आत्मा स्पष्ट देख रही हूं ब्रह्मलोक का दिव्य आलौकिक नजारा। चारों और चमकती हुई मणिया लाल प्रकाश से प्रकाशित इस लोक में दिखाई दे रही है। शांति के शक्तिशाली वायब्रेशन पूरे ब्रह्मलोक में फैले हुए हैं। *शांति की गहन अनुभूति करते-करते मैं इस अंतहीन ब्रह्माण्ड में विचरण रही हूं। विचरण करते करते मैं पहुंच जाती हूं शांति के सागर अपने शिव पिता परमात्मा के पास जिनसे निकल रहे शांति के शक्तिशाली वायब्रेशन पूरे ब्रह्मांड में फैल रहें हैं* और मुझे अपनी और खींच रहें हैं। इनके आकर्षण में आकर्षित हो कर मैं आत्मा पहुंच जाती हूँ अपने शिव पिता के बिल्कुल समीप और जा कर उनके साथ कम्बाइंड हो जाती हूं।

 

_ ➳  बाबा के साथ कम्बाइंड होते ही ऐसा आभास होता है जैसे सर्व शक्तियों के सागर में मैं आत्मा डुबकी लगा रही हूं। बाबा से निकल रही सर्वशक्तियों रूपी सतरंगी किरणों का झरना मुझ आत्मा पर बरस रहा हैं। मैं असीम आनन्द का अनुभव कर रही हूँ। *एक अलौकिक दिव्यता से मैं आत्मा भरपूर होती जा रही हूँ। प्यार के सागर बाबा अपना असीम प्यार मुझ पर लुटा रहे हैं*। उनके प्यार की शीतल किरणे मुझे भी उनके समान मास्टर प्यार का सागर बना रही हैं। बाबा की सर्वशक्तियों को स्वयं में समाकर मैं शक्तियों का पुंज बनती जा रही हूँ। लाइट माइट स्वरूप में स्थित हो कर मैं मास्टर बीजरूप स्थिति का अनुभव कर रही हूँ।

 

_ ➳  मास्टर बीजरूप स्थिति में स्थित हो, गहन अतीन्द्रीय सुख की अनुभूति करके मैं लौट आती हूँ साकारी लोक में और अपनी साकारी देह में आ कर फिर से भृकुटि सिहांसन पर विराजमान हो जाती हूँ किन्तु अब देह का कोई भी आकर्षण मुझे अपनी ओर आकर्षित नही कर रहा। *देह में रहते भी अशरीरी बन अपने पिता परमात्मा के साथ मनाये रूहानी मिलन के आलौकिक नजारे को स्मृति मुझे रुहानी नशे से भरपूर कर रही है*। मुझे मेरा यह स्वरूप बहुत ही न्यारा और प्यारा दिखाई दे रहा है । देह और देही दोनों अलग - अलग स्पष्ट दिखाई दे रहें हैं । देह में रहते देह से न्यारे हो कर रहने का दिव्य अलौकिक आनन्द अब मैं अनुभव कर रही हूँ।

 

_ ➳  इस दिव्य आलौकिक आनन्द की अनुभूति सदैव मैं आत्मा करती रहूं इसके लिए मैं स्वयं से प्रोमिस करती हूँ कि अब अपने मन बुद्धि को देह और देह के सम्बन्धों में कभी भी लटकने नही दूंगी। *अपने स्वधर्म में स्थित हो अशरीरी बन मन बुद्धि को केवल बाबा की याद में लगा कर इस स्मृति के साथ इस देह में रहूंगी कि मैं आत्मा अशरीरी आई थी और अशरीरी बन कर ही मुझे वापिस अपने धाम अपने शिव पिता के पास लौटना है*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं मेरे पन को छोड़ ट्रस्टी बन सेवा करने वाले सदा संतुष्ट आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं बुद्धि में हर समय बाप और श्रीमत की स्मृति रखने वाली दिल से समर्पित आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  1. *अमृतवेले से लेकर हर चलन को चेक करो - हमारी दृष्टि अलौकिक हैचेहरे का पोज सदा हर्षित है? एकरस, अलौकिक है वा समय प्रति समय बदलता रहता है?* सिर्फ योग में बैठने के समय वा कोई विशेष सेवा के समय अलौकिक स्मृति वा वृत्ति रहती है व साधारण कार्य करते हुए भी चेहरा और चलन विशेष रहता हैकोई भी आपको देखे - कामकाज में बहुत बिजी होकोई हलचल की बात भी सामने हो लेकिन आपको अलौकिक समझते हैंतो *चेक करो कि बोल-चालचेहरा साधारण कार्य में भी न्यारा और प्यारा अनुभव होता हैकोई भी समय अचानक कोई भी आत्मा आपके सामने आ जाए तो आपके वायब्रेशन सेबोल-चाल से यह समझेंगे कि यह अलौकिक फरिश्ते हैं?*

 

 _ ➳  2. बापदादा जानते हैं कि बहुत अच्छे-अच्छे पुरुषार्थी,पुरुषार्थ भी कर रहे हैंउड़ भी रहे हैं लेकिन बापदादा इस 21वीं सदी में नवीनता देखने चाहते हैं। सब अच्छे होविशेष भी होमहान भी हो लेकिन *बाप की प्रत्यक्षता का आधार है - साधारण कार्य में रहते हुए भी फरिश्ते की चाल और हाल हो।* बापदादा यह नहीं देखने चाहते कि बात ऐसी थीकाम ऐसा था, सरकमस्टांश ऐसे थे, समस्या ऐसी थीइसीलिए साधारणता आ गई। फरिश्ता स्वरूप अर्थात् स्मृति स्वरूप में होसाकार रूप में हो। सिर्फ समझने तक नहींस्मृति तक नहींस्वरूप में हो। ऐसा परिवर्तन किसी समय भीकिसी हालत में भी अलौकिक स्वरूप अनुभव हो। ऐसे है या थोड़ा बदलता हैजैसी बात वैसा अपना स्वरूप नहीं बनाओ। बात आपको क्यों बदलेआप बात को बदलो। बोल आपको बदले या आप बोल को बदलो?परिवर्तन किसको कहा जाता हैप्रैक्टिकल लाइफ का सैम्पल किसको कहा जाता हैजैसा समय, जैसा सरकमस्टांश वैसे स्वरूप बने - यह तो साधारण लोगों का भी होता है। लेकिन *फरिश्ता अर्थात् जो पुराने या साधारण हाल-चाल से भी परे हो।*

 

 _ ➳  *इस नई सदी में बापदादा यही देखने चाहते हैं कि कुछ भी हो जाए लेकिन अलौकिकता नहीं जाए।* इसके लिए सिर्फ चार शब्दों का अटेन्शन रखना पड़ेवह क्या? वह बात नई नहीं हैपुरानी है,सिर्फ रिवाइज करा रहे हैं। एक बात - शुभचिंतक। दूसरा - शुभ-चिंतन, तीसरा - शुभ-भावनायह भावना नहीं कि यह बदले तो मैं बदलूं। उसके प्रति भी शुभ-भावना, अपने प्रति भी शुभ-भावना और 4- शुभ श्रेष्ठ स्मृति और स्वरूप। *बस एक 'शुभशब्द याद कर लो,इसमें 4 ही बातें आ जायेंगी। बस हमको सबमें शुभ शब्द स्मृति में रखना है।* यह सुना तो बहुत बारी है। सुनाया भी बहुत बारी है। अब और स्वरूप में लाने का अटेन्शन रखना है। 

 

✺   *ड्रिल :-  "बाप की प्रत्यक्षता का आधार- सदा फरिश्ता स्वरूप स्थिति में रहने का अनुभव"*

 

 _ ➳  मैं आत्मा स्व चिंतन करती हुई एक झील के पास बैठी हूँ... स्व स्वरूप का चिंतन करते हुए मेरा मन पूरी तरह शांत होता जा रहा है... मैं आत्मा पास के उद्यानों की सुंदरता को निहार रही हूँ... *पक्षियों का सुंदर कलरव मन को आनंदित कर रहा है... पक्षियों की उड़ान, मधुर ध्वनि... जीवन को हल्का, प्रसन्न रखने की जैसे कि प्रेरणा दे रही है... खिलते, मुस्कुराते फूल जैसे कह रहे हैं कि... सदा मुस्कुराते हुए दिव्य गुणों की खुशबू से... स्वयं का और सर्व का जीवन सुगंधित करना है...*

 

 _ ➳  झील में किनारे पर कमल पुष्प खिले हुए बहुत सुंदर लग रहे हैं... कमल फूल तो जैसे जीवन जीने का तरीका सिखा रहे हैं... किस तरह से ये जल में जन्म लेते हैं, जल में पलते और बढ़ते हैं... लेकिन पानी की एक बूँद भी इन पर ठहर नहीं सकती... *संसार में रहते हुए, सब कुछ करते हुए किस तरह से न्यारा और प्यारा रह सकते हैं... यह सुंदर पाठ पढ़ाते हैं कमल के ये खिलखिलाते सुंदर पुष्प*... यह चिंतन करते-करते मैं आत्मा स्वयं को कमल आसन पर देख रही हूँ... ऊपर से पवित्रता के सागर शिवबाबा से... पवित्रता की किरणें, शीतल फुहारों के रूप में मुझ पर बरस रही हैं...

 

 _ ➳  बाबा की किरणों रूपी जल में नहाते-नहाते... मुझ आत्मा की जन्म जन्म की मैल धूल रही है... *व्यक्त भाव समाप्त हो अव्यक्त स्थिति बनती जा रही है... मेरी दृष्टि दिव्य, अलौकिक हो गई है... एकरस, मधुर आनंदमय अवस्था बन गई है... मेरा चेहरा खुशी से जगमगा रहा है... मेरी चलन, मेरे हर कर्म में अलौकिकता, विशेषता समाती जा रही है*... मैं आत्मा विशेष आत्मा के स्वमान में स्थित होकर हर कर्म कर रही हूँ... मेरे बोल, संकल्प, कर्म से साधारणता समाप्त हो रही है... मेरा जीवन कमल पुष्प समान न्यारा और प्रभु प्यारा बनता जा रहा है...

 

 _ ➳  मैं अव्यक्त फरिश्ता स्वरुप में बाबा की किरणों में नहाती हुई... अपने संबंध संपर्क में आने वाली हर आत्मा को दिव्यता, अलौकिकता की अनुभूति करा रही हूँ... *मेरा हर कर्म फरिश्ते समान अव्यक्त स्थिति की अनुभूति करा रहा है... फरिश्ता स्वरुप मेरी भविष्य स्टेज नहीं, मेरी वर्तमान स्थिति है... मेरा वर्तमान स्वरुप है... मैं आत्मा फरिश्ता स्वरुप में स्थित हूँ*... कोई भी बात, कोई भी परिस्थिति मेरी स्थिति को हलचल में नहीं ला सकती... हर प्रकार के पुराने, साधारण संकल्प, बोल, कर्म से परे... मैं फरिश्ता स्वरुप की न्यारी और प्यारी अवस्था में स्थित हूँ... अपनी फरिश्ता स्वरुप स्थिति द्वारा अपने मीठी बाबा की प्रत्यक्षता का आधार बन रही हूँ...

 

 _ ➳  मैं अपने मीठे बापदादा की उम्मीदों का सितारा हूँ... उनकी आशाओं का दीपक हूँ... अपनी अलौकिक स्थिति में स्थित हूँ... *मैं हर आत्मा के प्रति शुभ चिंतन कर रही हूँ... हर एक के प्रति मेरी वृति शुभचिंतक की है... सर्व के प्रति और स्वयं के प्रति भी मेरे मन में शुभ भावना समाई हुई है*... मैं आत्मा शुभ और श्रेष्ठ स्मृति और स्वरूप में स्थित हूँ... *बाबा की मीठी मीठी शिक्षाओं का प्रैक्टिकल स्वरुप बनती हुए मैं फरिश्ता... अपने मीठे बाबा को विश्व में प्रत्यक्ष करने के निमित्त बन रही हूँ...*

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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