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 04 / 01 / 21  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *कदम कदम श्रीमत पर चल अपने ऊपर आपेही कृपा की ?*

 

➢➢ *चलते फिरते याद का अब्यास किया ?*

 

➢➢ *अपने स्वरुप द्वारा भक्तों को लाइट के क्राउन का साक्षातकार करवाया ?*

 

➢➢ *सदा बापदादा की छत्रछाया के अन्दर रह विघन विनाशक स्थिति का अनुभव किया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *बापदादा अचानक डायरेक्शन दे कि इस शरीर रुपी घर को छोड़, देह-अभिमान की स्थिति को छोड़ देही-अभिमानी बन जाओ, इस दुनिया से परे अपने स्वीट होम में चले जाओ तो जा सकते हो?* युद्ध स्थल में युद्ध करते करते समय तो नहीं बिता देंगे! अशरीरी बनने में अगर युद्ध करने में ही समय लग गया तो अंतिम पेपर में मार्क्स वा डिवीजन कौन-सा आयेगा!

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं विश्व को सर्वशक्तियों की किरणें देने वाला मास्टर ज्ञान सूर्य हूँ"*

 

✧  ब्राह्मणों का विशेष कर्तव्य है-ज्ञान सूर्य बन सारे विश्व को सर्वशक्तियों की किरणें देना - सभी विश्व-कल्याणकारी बन विश्व को सर्वशक्तियों की किरणें दे रहे हो? मास्टर ज्ञान सूर्य हो ना। तो सूर्य क्या करता है? *अपनी किरणों द्वारा विश्व को रोशन करता है तो आप सभी भी मास्टर ज्ञान सूर्य बन सर्वशक्तियों को किरणें विश्व में देते रहते हो।*

 

✧  सारे दिन में कितना समय इस सेवा में देते हो? *ब्राह्मण जीवन का विशेष कर्तव्य ही यह है। बाकी निमित्त मात्र। ब्राह्मण जीवन वा जन्म मिला ही है विश्व कल्याण के लिए।* तो सदा इसी कर्तव्य में बिजी रहते हो?

 

  जो इस कार्य में तत्पर होंगे, वह सदा निर्विग्न होंगे। *विघ्न तब आते हैं जब बुद्धि फ्री होती है। सदा बिजी रहो तो स्वयं भी निर्विग्न और सर्व के प्रति भी विघ्न विनाशक। विघ्न विनाशक के पास विघ्न कभी भी आ नहीं सकता।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  *सेकण्ड में बिन्दी स्वरूप बन मन-बुद्धि को एकाग्र करने का अभ्यास बार-बार करो।* स्टॉप कहा और सेकण्ड में व्यर्थ देहभान से मन-बुद्धि एकाग्र हो जाए।

 

✧  *ऐसी कन्ट्रोलिंग पॉवर सारे दिन में यूज करके देखो।* ऐसे नहीं ऑर्डर करो - कन्ट्रोल और दो मिनट के बाद कन्ट्रोल हो, 5 मिनट के बाद कन्ट्रोल हो, इसलिए बीच-बीच में कन्ट्रोलिंग पॉवर को यूज करके देखते जाओ।

 

✧  *सेकण्ड में होता है, मिनट में होता है, ज्यादा मिनट में होता है, यह सब चेक करते जाओ।*

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧  *फ़रिश्ते अर्थात् ज्योति की काया वाले।* सभी अपने को ब्राह्मण सो फ़रिश्ता समझते हो? अभी ब्राह्मण हैं और ब्राह्मण से फ़रिश्ता बनने वाले हैं फिर फ़रिश्ता सो देवता बनेंगे -वह याद रहता है? *फ़रिश्ता बनना अर्थात् साकार शरीरधारी होते हुए लाइट रूप में रहना अर्थात् सदा बुद्धि द्वारा ऊपर की स्टेज पर रहना।* फ़रिश्ते के पाँव धरनी पर नहीं रहते। ऊपर कैसे रहेंगे? बुद्धि द्वारा। बुद्धि रूपी पाँव सदा ऊँची स्टेज पर। ऐसे फ़रिश्ते बन रहे हो या बन गये हो? ब्राह्मण तो हो ही - अगर ब्राह्मण न होते तो यहाँ आने की छुट्टी भी नहीं मिलती। लेकिन ब्राह्मणों ने फ़रिश्तेपन की स्टेज कहाँ तक अपनाई है? फ़रिश्तों को ज्योति की काया दिखाते हैं। प्रकाश की काया वाले। *जितना अपने को प्रकाश स्वरूप आत्मा समझेंगे- प्रकाशमय तो चलते फिरते अनुभव करेंगे जैसे प्रकाश की काया वाले फ़रिश्ते बनकर चल रहे हैं।* फ़रिश्ता अर्थात् अपनी देह के भान का भी रिश्ता नहीं, *देहभान से रिश्ता टूटना अर्थात् फ़रिश्ता।* देह से नहीं, देह के भान से। देह से रिश्ता खत्म होगा तब तो चले जायेंगे लेकिन देहभान का रिश्ता खत्म हो। तो यह जीवन बहुत प्यारी लगेगी। फिर कोई माया भी आकर्षण नहीं करेगी।

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- कदम-कदम बाप की श्रीमत पर चलते रहना"*

 

_ ➳  *मैं आत्मा बगीचे में बागवानी करते हुए पौधों के आसपास के खरपतवार को निकाल रही हूँ... जो पौधों के पोषक तत्वों को शोषित कर उनके विकास की गति को धीमी कर रहे हैं...* खरपतवार को निकालने के बाद फूल-पौधे बहुत ही सुन्दर दिख रहे हैं... मुस्कुरा रहे हैं... *ऐसे ही परम बागबान ने मुझ आत्मा के अन्दर के विकारों रूपी खरपतवार को निकालकर मुझे रूहानी फूल बना दिया है... मेरे जीवन के आंगन को खुशियों से खिला दिया है...* मैं आत्मा उड़ चलती हूँ मेरे जीवन को श्रेष्ठ बनाने वाले प्यारे बागबान बाबा के पास...

 

  *पावन दुनिया की राजाई के लिए श्रेष्ठ श्रीमत देते हुए पतित पावन प्यारे बाबा कहते हैं:-* मेरे मीठे बच्चे... *मीठे बाबा की श्रीमत पर चलकर पावन बनते हो इसलिए पावन दुनिया के सारे सुखो के अधिकारी बनते हो...* मनुष्य की मत सम्पूर्ण पावन न बन सकते हो न ही सतयुगी दुनिया के मालिक बन सकते हो... यह कार्य ईश्वर पिता के सिवाय कोई कर ही न सके...

 

_ ➳  *श्रीमत की बाँहों में झूलते हुए सतयुगी सुखों के आसमान को छूते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा अपनी मत और दूसरो की मत से अपनी गिरती अवस्था की बेहतर अनुभवी हूँ... *अब श्रीमत का हाथ थाम खुशियो के संसार में बसेरा हुआ है... प्यारा बाबा मुझे पावन बनाने आ गया है...*

 

  *प्यार भरी नज़रों से मुझे निहाल कर लक्ष्मी नारायण समान श्रेष्ठ बनाते हुए मीठे-मीठे बाबा कहते हैं:-* मीठे प्यारे फूल बच्चे... पतित पावन सिर्फ बाबा है जो स्वयं पावन है वही पावन बना भी सकता है... मनुष्य खुद इस चक्र में आता है वह दूसरो को पावनता से कैसे सजाएगा भला... *ईश्वर की मत ही सर्व प्राप्तियों का आधार है... श्रीमत ही मनुष्य को देवता श्रृंगार देकर सजाती है...*

 

_ ➳  *अपने जीवन की गाड़ी को श्रीमत रूपी पटरी पर चलाते हुए मंजिल के करीब पहुँचते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* मेरे प्राणप्रिय बाबा... *मै आत्मा इतनी भाग्यशाली हूँ कि श्रीमत मेरे भाग्य में है... श्रीमत की ऊँगली पकड़ मै आत्मा पावनता की सुंदरता से दमक रही हूँ...* और श्रीमत पर सम्पूर्ण पावन बन सतयुग की राजाई की अधिकारी बन रही हूँ...

 

  *पवित्रता की खुशबू से महकाकर खुशियों के झूले में झुलाते हुए मेरे बाबा कहते हैं:-* प्यारे सिकीलधे मीठे बच्चे... ईश्वर पिता धरती पर उतरा है प्रेम की सुगन्ध को बाँहों में समाये हुए... तो फूल बच्चे इस खुशबु को अपने रोम रोम में सुवासित कर लो... *यादो को सांसो सा जीवन में भर लो... और यही प्रेम नाद सबको सुनाकर आह्लादित रहो... हर साँस पर नाम खुदाया हो... ऐसा जुनूनी बन जाओ...*

 

_ ➳  *मैं आत्मा ज्ञान कलश को सिर पर धारण कर हीरे समान चमकते हुए कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा अपनी मत पर चलकर और परमत का अनुसरण कर निराश मायूस हो गई थी... दुखो को ही अपनी नियति मान बैठी थी... *प्यारे बाबा आपकी श्रीमत ने दुखो से निकाल... मीठे सुखो से दामन सजा दिया है... प्यारी सी श्रीमत ने मुझे पावन बनाकर महका दिया है...*

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- मायाजीत बनना है*

 

_ ➳  सारे विश्व पर जीत पहनने वाली माया के ऊपर जीत पहन मायाजीत जगतजीत बनने के लिए अपने समर्थ उस्ताद की सुमत पर सदा चलने की स्वयं से मैं प्रतिज्ञा करती हूँ और मन ही मन विचार करती हूँ कि माया ने कैसे सभी को भ्रम में डाल कर उलझा रखा है! *आज सारी दुनिया माया के धोखे में आकर कैसे उसकी मुरीद बन गई है! माया ने सबकी आंखों पर ऐसी पट्टी बांध दी है कि मनुष्य सही और गलत की पहचान करना ही भूल गए हैं*। किन्तु कितनी महान भाग्यवान हूँ मै आत्मा जो स्वयं भगवान समर्थ उस्ताद के रूप में मुझे मिले है और अपनी श्रेष्ठ मत द्वारा मुझे माया के चंगुल से छूटने का सहज उपाय बता रहें हैं। 

 

_ ➳  अपने समर्थ उस्ताद से उनकी सुमत पर चल मायाजीत बनने का मैं प्रोमिस करती हूँ और अंतर्मुखी होकर, बड़ी सूक्ष्म रीति अपनी चेकिंग करती हूँ कि माया कौन - कौन से रॉयल रूप धारण करके मेरे पुरुषार्थ में बाधा डालने का प्रयास करती है। *अपनी महीन चेकिंग करते हुए मैं अनुभव करती हूँ कि माया के हर वार से स्वयं को बचाने का शक्तिशाली शस्त्र एक ही है और वो है मेरे उस्ताद की सुमत जो अमृतवेले से लेकर रात्रि सोने तक मेरे उस्ताद ने मुझे दी है*। और इसलिए अब कदम - कदम अपने उस्ताद की सुमत पर चलते हुए मुझे माया पर जीत पाने का पुरुषार्थ कर जगतजीत बनना है। 

 

_ ➳  इसी दृढ़ संकल्प के साथ माया को पहचानने और उसे परखने की शक्ति स्वयं में धारण करने के लिए अपने सर्वशक्तिवान उस्ताद की याद में मैं अपने मन और बुद्धि को स्थिर करती हूँ और *अपने निराकार ज्योति बिंदु स्वरूप को धारण कर चल पड़ती हूँ उनके पास। देह और देह की दुनिया के हर बन्धन से मुक्त होकर मैं आत्मा ऊपर की और उड़ रही हूँ*। इस निर्बन्धन स्थिति में स्वयं को एक दम हल्का अनुभव करते हुए मैं आत्मा गहन आनन्द की अनुभूति कर रही हूँ। 

_ ➳  ज्ञान और योग के अपने खूबसूरत पँखो को फैला कर एक आजाद पंछी की भांति उड़ने का भरपूर आनन्द लेते - लेते मैं आकाश को पार कर, फरिश्तो की दुनिया से होती हुई लाल प्रकाश की एक अति सुंदर दुनिया मे प्रवेश करती हूँ। *चमकते हुए चैतन्य सितारों की निराकारी दुनिया अपने पिता परमात्मा के परमधाम घर मे अब मैं स्वयं को अपने निराकार शिव पिता के सामने देख रही हूँ। उनकी सर्वशक्तियों की किरणों की छत्रछाया के नीचे बैठ शांति, सुख, प्रेम, आनन्द की अनुभूति करते हुए गहन अतीन्द्रिय सुख में मैं डूबती जा रही हूँ*। मेरे सर्वशक्तिवान शिव पिता के स्नेह की शीतल छाया और उनकी सर्वशक्तियाँ मुझे मायाजीत बनाने के लिए मेरी सोई हुई शक्तियों को जागृत कर मुझे शक्तिशाली बना रही हैं।

 

_ ➳  63 जन्मों तक माया के जाल में फँस कर, अपनी शक्तियों को भूलने के कारण, दुखी होने की जो पीड़ा मैं सहन कर रही थी, वो पीड़ा अपने प्यारे पिता का स्नेह पाकर समाप्त हो गई है और मैं फिर से स्वयं को शक्तियों से सम्पन्न अनुभव करने लगी हूँ। *सर्वशक्तिसम्पन्न बनकर अब मैं माया पर जीत पाने के लिए फिर से साकार सृष्टि रूपी माया की नगरी में लौट रही हूँ। अपने साकार तन का आधार लेकर मैं फिर से इस माया नगरी में अपना पार्ट बजा रही हूँ लेकिन सर्वशक्तिवान समर्थ उस्ताद को सदा अपने साथ कम्बाइंड रखकर अब मैं कदम - कदम उनकी सुमत पर चल माया के हर वार को पहचान कर, निडर होकर उसका सामना कर रही हूँ*। मेरे समर्थ उस्ताद की सर्वशक्तियों की छत्रछाया सेफ्टी का किला बन कर मुझे माया के जाल में फंसने से बचाकर मायाजीत जगतजीत बना रही है।

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं अपने स्वरूप द्वारा भक्तों को लाइट के क्राउन द्वारा साक्षात्कार कराने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं आत्मा इष्ट देव हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा सदा बापदादा की छत्रछाया के अंदर रहती हूँ  ।*

   *मैं विघ्न विनाशक आत्मा हूँ  ।*

   *मैं आत्मा सदा निर्विघ्न हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  सेवा तो बहुत करते हैंदिन-रात बिजी भी रहते हैं। प्लैन भी बहुत अच्छे-अच्छे बनाते हैं और सेवा में वृद्धि भी बहुत अच्छी हो रही है। फिर भी मैजारिटी का जमा का खाता कम क्योंतो रूह-रूहान में यह निकला कि सेवा तो सब कर रहे हैंअपने को बिजी रखने का पुरुषार्थ भी अच्छा कर रहे हैं। फिर कारण क्या हैतो यही कारण निकला  *सेवा का बल भी मिलता हैफल भी मिलता है। बल है स्वयं के दिल की संतुष्टता और फल है सर्व की संतुष्टता।* अगर सेवा की, मेहनत और समय लगाया तो दिल की संतुष्टता और सर्व की संतुष्टता, चाहे साथीचाहे जिन्हों की सेवा की दिल में सन्तुष्टता अनुभव करें, बहुत अच्छा, बहुत अच्छा कहके चले जायेंनहीं। दिल में सन्तुष्टता की लहर अनुभव हो। कुछ मिला, बहुत अच्छा सुनावह अलग बात है। कुछ मिलाकुछ पाया, जिसको *बापदादा ने पहले भी सुनाया - एक है दिमाग तक तीर लगाना और दूसरा है दिल पर तीर लगाना।* अगर सेवा की और स्व की संतुष्टताअपने को खुश करने की संतुष्टता नहींबहुत अच्छा हुआबहुत अच्छा हुआ, नहीं। दिल माने स्व की भी और सर्व की भी।

 

 _ ➳  और दूसरी बात है कि *सेवा की और उसकी रिजल्ट अपनी मेहनत या मैंने किया... मैंने किया यह स्वीकार किया अर्थात् सेवा का फल खा लिया। जमा नहीं हुआ।* बापदादा ने कराया, बापदादा के तरफ अटेन्शन दिलायाअपने आत्मा की तरफ नहीं। यह बहन बहुत अच्छीयह भाई बहुत अच्छा, नहीं। *बापदादा इन्हों का बहुत अच्छा, यह अनुभव करना - यह है जमा का खाता बढ़ाना।* इसलिए देखा गया टोटल रिजल्ट में मेहनत ज्यादा, समय- एनर्जी ज्यादा और थोड़ा-थोड़ा शो ज्यादा। इसलिए जमा का खाता कम हो जाता है। जमा के खाते की चाबी बहुत सहज हैवह डायमण्ड चाबी हैगोल्डन चाबी लगाते हो लेकिन *जमा की डायमण्ड चाबी है 'निमत्त भाव और निर्मान भाव'।* अगर हर एक आत्मा के प्रति, चाहे साथीचाहे सेवा जिस आत्मा की करते हो, दोनों में सेवा के समय, आगे पीछे नहीं *सेवा करने के समय निमित्त भाव, निर्मान भाव, निःस्वार्थ शुभ भावना और शुभ स्नेह इमर्ज हो तो जमा का खाता बढ़ता जायेगा।* बापदादा ने जगत अम्बा माँ को दिखाया कि इस विधि से सेवा करने वाले का जमा का खाता कैसे बढ़ता जाता है। बस, *सेकण्ड में अनेक घण्टों का जमा खाता जमा हो जाता है।* जैसे टिक-टिक-टिक जोर से जल्दी-जल्दी करोऐसे मशीन चलती है। तो जगत अम्बा बड़बी खुश हो रही थी कि जमा का खाता, जमा करना तो बहुत सहज है।   

 

✺   *ड्रिल :-  "सेवा द्वारा सहज जमा का खाता बढ़ाने का अनुभव"*

 

 _ ➳   पांडव भवन में... बापदादा के कमरे में बैठी मैं आत्मा... अपने मन को बाहरी दुनिया से समेट कर लगा देती हूँ सिर्फ एक बिंदु रूपी बाप पर... *मन बुद्धि के तार बापदादा से जुड़ते ही बाबा के कमरे में दिव्य सुगंध की लहर फ़ैल जाती हैं...* बापदादा का फ़रिश्ता स्वरुप प्रत्यक्ष मुझ आत्मा को प्रतीत हो रहा हैं... *बापदादा का चमकता हुआ ओरा... चांदनी सा प्रकाश फैला रहा हैं... दैदीप्यमान स्वरुप मेरे बापदादा का देख मैं आत्मा भाव विभोर हो जाती हूँ...* बापदादा से निकलती पवित्र किरणों का झरना मुझ आत्मा में स्वतः धारण होता जा रहा हैं...

 

 _ ➳  मैं आत्मा शक्तियों से परिपूर्ण होती जा रही हूँ... अपने  63 जन्मो के विकर्मो को नष्ट होता हुआ देख रही हूँ...  अपने आप को एक संपूर्ण फ़रिश्ते स्वरुप में परिवर्तित होता देख रही हूँ.... लेकिन *मेरा फ़रिश्ता स्वरुप आधा ही इमर्ज होता हुआ दिखाई दे रहा हैं...* और मैं आत्मा अचरज भरी निगाहों से बापदादा को देख रही हूँ... मेरे संकल्पों को जान बापदादा मुझ आत्मा को एक सीन दिखा रहे हैं... जहाँ मैं आत्मा देख रही हूँ अपने आप को... *बापदादा के महायज्ञ में अपने मन वचन कर्म से सेवा को सफल करने में लग गई हूँ...*

 

 _ ➳  हर घड़ी... हर पल बापदादा को प्रत्यक्ष करने की सेवा में मग्न रहती मैं आत्मा... स्वयं को संतुष्ट करती जा रही हूँ... सेवा में संकल्प को... बोल को... पूर्ण रूप से सफल कर रही हूँ... *मुझ आत्मा का सेवा के प्रति लगन में सिर्फ एक ही कमी रह जाती थी... निमित्त और निर्माण भाव की प्रत्यक्षता...* मैं आत्मा सेवा में निमित्त भाव को प्रत्यक्ष नहीं कर पा रही थी... देह अभिमान रूपी संस्कार के वशीभूत मैं आत्मा... मेरेपन को पूर्ण रूप से मिटा नहीं पा रही थी... बापदादा को प्रत्यक्ष करने की सेवा में देह अभिमान रूपी कंटक को दूर नहीं का पा रही थी... *दिल की सेवा नहीं दिमाग की सेवा में उलझ गई थी...*

 

 _ ➳  *अपने जमा के खाते को न बढ़ाते... खर्च करती जा रही तो...* सेवा में परिपूर्णता का झलक नहीं दिखाई दे रही थी... इसीलिए मुझ आत्मा का फ़रिश्ता स्वरुप आधा दिखाई दे रहा था... मैं आत्मा अब अपने फ़रिश्ता स्वरुप को इमर्ज न करने का कारण जान कर बापदादा को कोटि बार धन्यवाद करती हूँ... और सेवा को सच्ची दिल की लगन से सफल करने का पक्का और सच्चा वादा करती हूँ... मेरेपन का संकल्प  भी त्याग करती हूँ... *बापदादा का कार्य... बापदादा ने करवाया... मैं सिर्फ निमित्त हूँ... यह भावना... यह संकल्प को सुनहरे अक्षरों से अपने दिल-दिमाग में अंकित करती हूँ...*

 

 _ ➳  बापदादा को एक वादा करती हूँ... *मेरेपन के अभिमान का त्याग कर दूगी...* और दिल की सेवा जो दिल में तीर बन कर लग जाये... बापदादा की प्रत्यक्षता हो जाये न कि मुझ आत्मा का मान बढे... ऐसे अब यज्ञ में खुद को स्वाहा कर देना हैं... *सेवा के समय निमित्त भाव... शुभ भाव इमर्ज हो जाये और न कि खुद आत्मा के वाह वाह के भाव इमर्ज हो जाये...* निःस्वार्थ शुभ भाव... शुभ कामना रूपी शक्तियों का आह्वान करती मैं आत्मा लौकिक का हर कार्य अब तो बापदादा को प्रत्यक्ष करने में मग्न हो गई हूँ...

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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