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 04 / 02 / 21  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *कांटो को फूल बनाने की सेवा की ?*

 

➢➢ *बाप समान दुःखहर्ता बनकर रहे ?*

 

➢➢ *ड्रामा की ढाल को सामने रख ख़ुशी की खुराक खायी ?*

 

➢➢ *परचिंतन और परदर्शन की धुल से दूर रहे ?*

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*अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  किसी भी कर्म में बहुत बिजी हो, *मन-बुद्धि कर्म के सम्बन्ध में लगी हुई है, लेकिन डायरेक्शन मिले-फुलस्टाप। तो फुलस्टाप लगा सकते हो कि कर्म के संकल्प चलते रहेंगे?* यह करना है, यह नहीं करना है, यह ऐसे है, यह वैसे है....। तो यह प्रैक्टिस एक सेकण्ड के लिये भी करो लेकिन अभ्यास करते जाओ, *क्योंकि अन्तिम सर्टीफिकेट एक सेकण्ड के फुलस्टाप लगाने पर ही मिलना है। सेकण्ड में विस्तार को समा लो, सार स्वरूप बन जाओ।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं बाप समान सर्वगुण, सर्वशक्तियों से सम्पन्न आत्मा हूँ"*

 

  सदा अपने को बाप समान सर्वगुण, सर्वशक्तियों से सम्पन्न आत्मा हैं - ऐसे अनुभव करते हो? *बाप के बच्चे तो सदा हो ना। जब बच्चे सदा हैं तो बाप समान धारणा स्वरूप भी सदा चाहिए ना। यही सदा अपने आप से पूछो कि बाप के वर्से की अधिकारी आत्मा हूँ।* अधिकारी आत्मा को अधिकार कभी भूल नहीं सकता।

 

  जब सदा का राज्य पाना है तो याद भी सदा की चाहिए। हिम्मत रखकर, निर्भय होकर आगे बढ़ते रहे हो इसलिए मदद मिलती रही है। *हिम्मत की विशेषता से सर्व का सहयोग मिल जाता है। इसी एक विशेषता से अनेक विशेषताये स्वत: आती जाती हैं। एक कदम आगे रखा और अनेक कदम सहयोग के अधिकारी बने इसलिए इसी विशेषता का औरों को भी दान और वरदान देते आगे बढ़ाते रहो।*

 

 *जैसे वृक्ष को पानी मिलने से फलदायक हो जाता है, वैसे विशेषताओंको सेवा में लगाने से फलदायक बन जाते हैं। तो ऐसे विशेषताओंको सेवा में लगाए फल पाते रहना।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  *बापदादा को बच्चों की मेहनत अच्छी नहीं लगती। कारण यह है, जैसे देखो रावण को मारते भी हैं, लेकिन सिर्फ मारने से छोड नहीं देते हैं, जलाते हैं और जला के फिर हड़ियाँ जो है वह आजकल तो नदी में डाल देते हैं।* कोई भी मनुष्य मरता है तो हड़ियाँ भी नदी में डाल देते है तभी समाप्ति होती है।

 

✧  तो आप क्या करते हो? *ज्ञान की प्वाइन्टस से, धारणा की प्वाइन्टस से उस बात रूपी रावण को मार तो देते हो लेकिन योग अग्नि में स्वाहा नहीं करते हो।* और फिर जो कुछ बातों की हड़ियाँ बच जाती है ना - वह ज्ञान सागर बाप के अर्पण कर दो। तीन काम करो - एक काम नहीं करो।

 

✧  *आप समझते हो पुरुषार्थ तो किया ना, मुरली पढी, 10 बारी मुरली पढी फिर भी आ गई क्योंकि आपने योग अग्नि में जलाया नहीं, स्वाहा नहीं किया।* अग्नि के बाद नाम-निशान गुम हो जाता है फिर उसको भी बाप सागर में डाल दो, समाप्त। इसलिए *इस वर्ष मे बापदादा हर बच्चे को व्यर्थ से मुक्त देखने चाहते हैं। मुक्त वर्ष मनाओ।*

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧  *परखने की शक्ति को तीव्र बनाने लिए मुख्य कौन -सा साधन है?* परखने का तरीका कौन-सा होना चाहिए ? तुम्हारे सामने कोई भी आये उनको परख सकते हो? (हरेक ने अपना-अपना विचार बताया) सभी का रहस्य तो एक ही है। अव्यक्त स्थिति व याद व आत्मिक-स्थिति बात तो वही है। *लेकिन आत्मिक स्थिति के साथ-साथ यथार्थ रूप से वही परख सकता है जिनकी बुद्धि एक की ही याद में, एक के ही कार्य में और एकरस स्थिति में होगी।* वह दूसरे को जल्दी परख सकेंगे।

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺  *"ड्रिल :- बाप आयें हैं अमृत वर्षा कर साथ ले जाने"*

 

_ ➳  *मंद मंद मुस्कुराते पवन के झोंके... गुलाबी खुशबू से भरी समी संध्या की वेला में... मैं आत्मा बैठी हूँ... संगम नदी के तट पर... मन-बुद्धि में शान्ति के सागर... शिवबाबा को याद करती... दूर दूर से आते हुए... हल्के हल्के शहनाई के सुर सुनाई दे रहे हैं...* मैं आत्मा... शहनाई के सुर में मग्न हो कर पहुँचती हूँ सूक्ष्म वतन में... बाबा को धन्यवाद करने... अपने को... बाबा को समर्पित करने...

 

  *मेरे मीठे बाबा ने मुझ आत्मा को अपना बनाते हुए कहा :-*  "मीठी प्यारी मेरी बच्ची... मेरी श्रीमत पर चल... अविनाशी खजानों की मालिक... साम्राज्ञी महान आत्मा हो... रूहानी शक्तियों से अपनी रूह का श्रृंगार कर लो... *मैं आया हूँ... तुम्हे अपने साथ ले जाने... दैवीय गुणों की उत्तराधिकारी आत्मा... अपने साज श्रृंगार कर लो... पवित्रता का गहना हो... सदाचारी श्रेष्ठ आत्मा हो..."*

 

_ ➳  *मैं आत्मा प्यारे बाबा का प्यार भरा पैगाम सुनकर अपनी खुशियों को अश्रु के रूप में छलकाते हुए कहती हूँ :-* "मेरे प्यारे बाबा... मैं सदियों से जिसका इंतजार कर रही थी... आप आ गए... *खुशियों के फूल खिल गए... बहार छा गई... मौसम बदल गया... मेरे जैसा भाग्यवान... कोइ हो ही नही सकता...* जिसका श्रृंगार स्वयं आप ने किया हो... योग अग्नि में तपा कर... मुझ आत्मा को सच्चा सोना बनाया हैं..."

 

  *अपने हाथों से मुझ पर फूलों की वर्षा करता मेरा मीठा बाबा रूहानी फुलो की खुशबू से मुझ आत्मा को तरबतर कर कहता हैं:-* "दुःख की शैया को छोड़... सुख के अमृत तुल्य झूले में झूलने वाली... पवित्र... बालक समी मासूमियत से भरी आत्मा... मेरे दिल पर छा गईं हो... असीम मासूमियत... *इस कलियुगी दुनिया मे कोटो में कोई ही धारण कर पाता है... नेचुरल मासूमियत के श्रृंगार से सजी मेरी बच्ची... तुझे अखंड सुरक्षा कवच में महफूज़ रखा हैं..."*

 

_ ➳  *अपने आप को बाबा के आशीर्वचनों से भरपूर करती मैं आत्मा बाबा की दृष्टि लेती बाबा से कहती हूँ :-*  "शुक्रिया मेरे बाबा... आप की पालना बड़े सौभाय से प्राप्त होती हैं... मेरे जैसा सौभाग्यशाली आत्मा कोई हो ही नही सकती हैं... *मुझ पर अपनी प्यार की कृपा युही बरसातें रहना... अग्नि परीक्षा से पार उतारा है रूह को और यह शरीर को... पवित्रता के गहनो से सजाया हैं... अपने लायक बनाया हैं... अब तू आया है ना तू ही संभाल... तेरा दामन पकड़ा हैं... जहाँ चाहे ले चल..."*

 

  *मंद मंद मुस्कुराते हुए बाबा अपनी मीठी नजरों से रंगबिरंगी किरणों को मुझ पर न्योछावर करते हुए कहते हैं:-* "मेरी बच्ची अपना हाथ मेरे हाथों में रख कर चलो... अब समय पूरा हुआ हैं... बहुत इंतजार करवाया हैं मुझे... अब सज-धज कर तैयार हो गयी हो... अब देर न करो... बाप समान बन गई हो... *बाप की आखो के नूरे रत्न हो... पवित्रता की ऊंची शिखर पर विराजमान हो... फरिश्ता बन कर पूरे ब्रह्मांड में सुखों की लहरों की तरह फैल गयी हो..."*

 

_ ➳  *अपना दैवीय रूप को निहारती मैं आत्मा अपना हाथ अपने बाबा के हाथ में रख प्रकृति को आह्वान करती बाबा से कहती हूँ :-*  "चलो मेरे मीठे बाबा... इस दुनिया से पार... अपनी अनंत शक्तियों की वर्षा कर... मुझे ले चलो... अपना सर्वस्व तुझे समर्पित... बिंदु बन कर तुझ में समा जाऊ... *अपनी रूह को स्थूल शरीर से निकल सूक्ष्म स्वरूप में बाप के साथ... हाथो में हाथ लिए झूमती हुई इस संगमयुग को अलविदा कहती पहुँचती हूँ परमधाम में...* सूक्ष्म वतन के इस अलौकिक मिलन के नज़ारे को अपने स्मृति पटल पर अंकित करती मैं आत्मा वापिस अपने स्थूल देह में समा जाती हूँ..."

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- इस अंतिम जन्म में विष को त्याग अमृत पीना और पिलाना है*"

 

_ ➳  ज्ञान अमृत पिला कर, अमर बनाने वाले अपने अमरनाथ शिव बाबा को याद करते - करते मैं अनुभव करती हूँ कि मेरे अमरनाथ बाबा जैसे वतन में खड़े मुझे बुला रहें हैं। मेरे शिव बाबा की याद संकल्प के रूप में मुझ तक पहुंच रही है। *अपने मीठे बाबा के संकल्पो को कैच कर, मैं सेंकड में अपना लाइट का फ़रिशता स्वरूप धारण करती हूँ और बिना एक क्षण भी व्यर्थ गंवाये, इस साकारी देह से निकल कर ऊपर आकाश की और चल पड़ती हूँ*। चारों और अपनी श्वेत आभा बिखेरता हुआ मैं फ़रिशता वतन की ओर उड़ता जा रहा हूँ।

 

_ ➳  साकार लोक को पार कर, सूर्य, चाँद, तारा गणों के विशाल समूह को पार करके अब मैं पहुँच गया उस अव्यक्त वतन में जहां बापदादा अव्यक्त इशारों से मुझे बुला रहे हैं। *अब मैं स्वयं को बापदादा के सामने देख रहा हूँ। बापदादा के लाइट माइट स्वरूप से निकल रही लाइट और माइट पूरे सूक्ष्म वतन को एक दिव्य अलौकिक प्रकाश से प्रकाशित कर रही हूँ*। बापदादा इशारे से मुझे अपने पास बुला रहें हैं।

 

_ ➳  बाहें पसारे बापदादा का ममतामयी स्वरूप मुझे उनकी बाहों में समाने के लिए व्याकुल कर रहा है। मैं दौड़ कर उनके पास पहुंचता हूँ और जा कर उनकी बाहों में समा जाता हूँ। *उनका प्रेम और वात्सलय पा कर मेरा अंतर्मन जैसे खिल उठा है*। उनकी करुणा वरदानों के रूप में निरन्तर मुझ पर बरस रही है।

 

_ ➳  बापदादा के आनन्दमयी प्रेम के रस में मैं फ़रिशता डूबता जा रहा हूँ। इस आनन्दमयी स्थिति में एक बहुत ही खूबसूरत दृश्य मेरी आँखों के सामने बार - बार आ रहा है। *मैं देख रहा हूँ मेरे सामने एक बहुत ही सुंदर अति लुभावना सरोवर है और उस सरोवर में हंसो का बहुत सुंदर जौड़ा बैठा है*। हंसो की उस खूबसूरत जौड़ी पर मम्मा बाबा विराजमान है।

 

_ ➳  मम्मा के हाथ मे एक कलश है । मैं मम्मा बाबा के इस अति सुंदर मनोहारी स्वरूप को निहार रहा हूँ। जैसे ही मम्मा की नज़र मुझ पर पड़ती है, मम्मा बड़े प्यार से मुझे अपने पास बुलाती है। *मैं फ़रिशता धीरे धीरे मम्मा के पास पहुँचता हूँ और उत्सुकता से उस कलश की ओर देखता हूँ। देखते ही देखते उस कलश में से ज्ञान की दिव्य अमृत धारा निकल कर अपने आप मेरे मुख में जाने लगती है*। ज्ञान अमृत पीकर अब मैं स्वयं को बहुत ही शक्तिशाली अनुभव कर रहा हूँ। ऐसा लग रहा है जैसे मेरी सारी प्यास बुझ चुकी है और मैं तृप्त हो चुका हूँ।  तृप्त हो कर जैसे ही मैं उस सरोवर से बाहर निकलता हूँ, स्वयं को वापिस बापदादा की ममतामयी गोद मे पाता हूँ।

 

_ ➳  बापदादा की ममतामयी गोद का सुख ले कर अब मैं बापदादा के सामने आ कर बैठ जाता हूँ। *बाबा अपना वरदानी हाथ मेरे सिर पर रख देते हैं और मुझे "ज्ञान के अखुट खजाने से सदा सम्पन्न भव" का वरदान देते हैं*। ज्ञान के अखुट खजाने से भरपूर हो कर अब मैं फ़रिशता बापदादा से विदाई लेता हूँ और वापिस साकार लोक की ओर प्रस्थान करता हूँ।

 

_ ➳  अपने लाइट के सूक्ष्म आकारी शरीर के साथ मैं फिर से अपने साकारी शरीर में प्रवेश कर, भृकुटि पर विराजमान हो जाती हूँ, इस दृढ़ प्रतिज्ञा के साथ कि *मुरली के माध्यम से बाबा जो ज्ञान अमृत मुझे हर रोज पिलाने आते है, उस ज्ञान अमृत को मैं जब तक जिऊंगी तब तक पीती रहूँगी*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं ड्रामा की ढाल को सामने रख चलने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं खुशी की खुराक खाने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं सदा शक्तिशाली आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा परचिंतन और परदर्शन की धूल से सदा दूर रहती हूँ  ।*

   *मैं सच्चा अमूल्य हीरा हूँ  ।*

   *मैं आत्मा सदैव स्वचिंतन और स्वदर्शन में बिजी रहती हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  1. *अभी आपके अन्दर चेक करो - मेरी वृत्ति में किसी आत्मा के प्रति भी कोई निगेटिव है तो वह विश्व परिवर्तन कर नहीं सकेगा।* बाधा पड़ती रहेगी, समय लग जायेगा। वायुमण्डल में पावर नहीं आयेगी। कई बच्चे कहते हैं वह है ही ऐसा ना! है ही ना! तो वायब्रेशन तो होगा ना! बाप को भी ज्ञान देते हैं, बाबा आपको पता नहीं है, वह आत्मा है ही ऐसी। लेकिन बाप पूछते हैं कि वह खराब है, राँग है, होना नहीं चाहिए लेकिन खराब को अपने वृत्ति में रखो, क्या यह बाप की छूट्टी है?

 

 _ ➳  2. जब तक हर ब्राह्मण आत्मा के स्वयं की वृत्ति में कैसी भी आत्मा के प्रति वायब्रेशन निगेटिव है तो विश्व कल्याण प्रति वृत्ति से वायुमण्डल में वायब्रेशन फैला नहीं सकेंगे। यह पक्का समझ लो। कितनी भी सेवा कर लो, रोज आठ-आठ भाषण कर लो, योग शिविर करा लो, कई प्रकार के कोर्स करा लो लेकिन किसी के प्रति भी अपनी वृत्ति में कोई पुराना निगेटिव वायब्रेशन नहीं रखो। अच्छा वह खराब है, बहुत गलतियाँ करता है, बहुतों को दुःख देता है, तो क्या आप उसके दुःख देने में जिम्मेवार बनने के बजाए, उसको परिवर्तन करने में मददगार नहीं बन सकते। दुःख में मदद नहीं करना है, उसको परिवर्तन करने में आप मददगार बनो। अगर कोई ऐसी भी आत्मा है जो आप समझते हैं, बदलना नहीं है। चलो, आपकी जजमेन्ट में वह बदलने वाली नहीं है, लेकिन नम्बरवार तो हैं ना! तो आप क्यों सोचते हो यह तो बदलने वाली है ही नहीं। आप क्यों जजमेन्ट देते हो, वह तो बाप जज है ना। आप सब एक दो के जज बन गये हो। बाप भी तो देख रहा है, यह ऐसे हैं, यह ऐसे हैं, यह ऐसे हैं...। *ब्रह्मा बाप को प्रत्यक्ष में देखा कैसी भी बार-बार गलती करने वाली आत्मा रही लेकिन बापदादा (विशेष साकार रूप में ब्रह्मा बाप) ने सर्व बच्चों प्रति याद-प्यार देते, सर्व बच्चों को मीठे-मीठे कहा। दो चार कडुवे और बाकी मीठे... क्या ऐसे कहा?* फिर भी ऐसी आत्माओं के प्रति भी सदा रहमदिल बने। क्षमा के सागर बने। लेकिन अच्छा आपने अपनी वृत्ति में किसी के प्रति भी अगर निगेटिव भाव रखा, तो इससे आपको क्या फायदा है? अगर आपको इसमें फायदा है, फिर तो भले रखो, छुट्टी है। अगर फायदा नहीं है, परेशानी होती है..., वह बात सामने आयेगी। बापदादा देखते हैं, उस समय उसको आइना दिखाना चाहिए। तो जिस बात में अपना कोई फायदा नहीं है, नालेजफुल बनना अलग चीज है, नालेज है - यह राँग है, यह राइट है। नालेजफुल बनना राँग नहीं है, लेकिन वृत्ति में धारण करना यह राँग है क्योंकि अपने ही मूड आफ, व्यर्थ संकल्प, याद की पावर कम, नुकसान होता है। जब प्रकृति को भी आप पावन बनाने वाले हो तो यह तो आत्मायं हैं। वृत्ति, वायब्रेशन और वायुमण्डल तीनों का सम्बन्ध है। वृत्ति से वायब्रेशन होते हैं, वायब्रेशन से वायुमण्डल बनता है। लेकिन मूल है वृत्ति। अगर आप समझते हो कि जल्दी-जल्दी बाप की प्रत्यक्षता हो तो तीव्र गति का प्रयत्न है सब अपनी वृत्ति को अपने लिए, दूसरों के लिए पाजिटिव धारण करो। नालेजफुल भले बनो लेकिन अपने मन में निगेटिव धारण नहीं करो। निगेटिव का अर्थ है किचड़ा। अभी-अभी वृत्ति पावरफुल करो, वायब्रेशन पावरफुल बनाओ, वायुमण्डल पावरफुल बनाओ क्योंकि सभी ने अनुभव कर लिया है, वाणी से परिवर्तन, शिक्षा से परिवर्तन बहुत धीमी गति से होता है, होता है लेकिन बहुत धीमी गति से। अगर आप फास्ट गति चाहते हो तो नालेजफुल बन, क्षमा स्वरूप बन, रहमदिल बन, शुभ भावना, शुभ कामना द्वारा वायुमण्डल को परिवर्तन करो।

 

✺   *ड्रिल :-  "वृत्ति द्वारा आत्माओं को परिवर्तन करने का अनुभव"*

 

 _ ➳  संगमयुग के अपने सुहाने सफर में आगे बढ़ते हुए मैं आत्मा अपने बाबा को याद करते हुए एक शान्त स्थान पर बैठी हुई हूँ... प्रकृति के बीच बैठ कर मैं यहाँ की सुंदरता को निहार रही हूँ... प्रकृति के इस शान्त वातावरण में मेरा मन भी शान्त हो रहा है... मेरी देह धीरे धीरे हल्की होती जा रही है और मैं अपने मन को स्वयं पर केंद्रित कर रही हूँ... मेरे संकल्पों की गति धीमी हो गयी है... *मैं एक दम शान्त अवस्था में स्थित हो गयी हूँ... अब मैं इस स्थूल देह के चोले को छोड़ अपना सूक्ष्म शरीर धारण करती हूं...*

 

 _ ➳  मैं आत्मा फरिश्ता बन कर इस देह को छोड़ कर इस संसार में विचरण कर रही हूँ... अलग अलग स्थानों पर मैं फरिश्ता जाती हूँ... मैं देखती हूँ कि आज सर्व ओर की आत्मायें अनेक प्रकार के विकारों के वशीभूत हैं... घृणा के संस्कार, क्रोध के संस्कार, द्वेष के संस्कार, ईर्ष्या के संस्कार, किसी की आलोचना करने के संस्कार, लोभ के संस्कार आज हर जगह हर आत्मा में दिखाई देते हैं... *सर्व आत्मायें अपने मूल स्वभाव संस्कारों को भूल इन कलियुगी संस्कारों को स्वयं के संस्कार समझ कर उसी अनुसार व्यवहार कर रही हैं...*

 

 _ ➳  ये सब आत्मायें इन विकारों में फंस कर स्वयं भी दुखों का अनुभव करती हैं... और अपने आस पास के वातावरण को भी दूषित कर रही हैं... मैं आत्मा जब इन सब आत्माओ को ऐसे देखती हूँ तो मुझे इन सब पर तरस पड़ता है... और मैं इन सब की मदद करने का संकल्प ले अपने स्थूल शरीर में वापिस आती हूँ... *मैं आत्मा अमृतवेले बाबा की शक्तियों से स्वयं को चार्ज करती हूँ और सारा दिन ये शक्तिशाली वाइब्रेशन वातावरण में फैला रही हूँ...*

 

 _ ➳  मैं आत्मा जहाँ भी जाती हूँ मेरे प्योर और शक्तिशाली वाइब्रेशन अन्य आत्मायें भी महसूस करती हैं... *किसी भी आत्मा के आसुरी स्वभाव संस्कार को देख कर मैं आत्मा उसके प्रति कोई नेगेटिव फीलिंग नहीं रखती...* बल्कि उसके इन संस्कारों को परिवर्तित करने में मैं उसकी मदद करती हूँ... किसी की कोई भी कमज़ोरी को चित्त पर न रखते हुए उसके प्रति शुभभावना रखती हूँ...

 

 _ ➳  मैं आत्मा इस सृष्टि के राज़ को जान गयी हूँ और इस सारे ड्रामा की नॉलेज मेरे मीठे बाबा ने मुझे दे दी है... उस नॉलेज को यूज़ करते हुये मैं किसी भी आत्मा के प्रति कोई भी गलत भाव अपने मन मे नहीं रखती... *बाबा की तरह क्षमा का सागर बन अपने लिए बुरा करने वालों को भी माफ कर देती हूँ...* उनके प्रति भी रहमदिल बन शुभभावना और शुभकामना द्वारा उन्हें भी परिवर्तित करने के निमित बनती हूँ... मेरी ये पवित्र और श्रेष्ठ वृत्ति वायुमण्डल को भी परिवर्तित कर रही है...

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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