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 04 / 03 / 19  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *मोह की रगें तोड़ने का पुरुषार्थ किया ?*

 

➢➢ *बाप समान विदेही बनने का पुरुषार्थ किया ?*

 

➢➢ *श्रेष्ठ वृत्ति का व्रत धारण कर सच्ची शिव रात्री मनाई ?*

 

➢➢ *दिल में सदा ख़ुशी का सूर्य उदय रहा ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  जो प्यार होता है, उसे याद किया नहीं जाता, उसकी याद स्वत: आती है। सिर्फ प्यार दिल का हो, सच्चा और नि:स्वार्थ हो। *जब कहते हो मेरा बाबा, प्यारा बाबा-तो प्यारे को कभी भूल नहीं सकते। और नि:स्वार्थ प्यार सिवाए बाप के किसी आत्मा से मिल नहीं सकता इसलिए कभी मतलब से याद नहीं करो, नि:स्वार्थ प्यार में लवलीन रहो।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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✺   *"मैं विश्व में शान्ति स्थापन करने वाली बाप की विशेष सहयोगी आत्मा हूँ"*

 

✧  सदा शान्ति के सागर की संतान शान्त स्वरूप आत्मा बन गये? हम विश्व में शान्ति स्थापन करने वाली आत्मा हैं, यह नशा रहता है? स्व धर्म भी शान्त और कर्तव्य भी विश्व शान्ति स्थापन करने का। *जो स्वयं शान्त स्वरूप हैं वही विश्व में शान्ति स्थापन कर सकते हैं। शान्ति के सागर बाप की विशेष सहयोगी आत्मायें हैं।*

 

  बाप का भी यही काम है तो बच्चों का भी यही काम है। तो स्वयं सदा शान्त स्वरूप, अशान्ति का नाम-निशान भी न हो। *अशान्ति की दुनिया छूट गई। अभी शान्ति की देवी, शान्ति के देव बन गये। 'शान्ति देवा' कहते हैं ना।*

 

  *शान्ति देने वाले शान्ति देवा और शान्ति देवी बन गये। इसी कार्य में सदा बिजी रहने से मायाजीत स्वत: हो जायेंगे।* जहाँ शान्ति है वहाँ माया कैसे आयेगी? शान्ति अर्थात् रोशनी के आगे अंधकार ठहर नहीं सकता। अशान्ति भाग गई, आधा कल्प के लिए विदाई दे दी। ऐसे विदाई देने वाले हो ना!

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  *बापदादा एक सेकण्ड में अशरीरी भव की ड्रिल देखने चाहते हैं, अगर अन्त में पास होना है तो यह ड्रिल बहुत आवश्यक है।* इसलिए अभी इतने बडे संगठन में बैठे *एक सेकण्ड में देहभान से परे स्थिति में स्थित हो जाओ।* कोई आकर्षण आकर्षित नहीं करे। (बापदादा ने ड़िल कराई) अच्छा।

 

✧  *आजकल विश्व में दो बातें विशेष चलती हैं - एक एक्सरसाइज और दूसरा भोजन के ऊपर अटेन्शन।* तो आप भी यह दोनों बातें करते हो? आपकी एक्सरसाइज कौन-सी है? *शरीरिक एक्सरसाइज तो सब करते हैं लेकिन मन की एक्सरसाइज अभी-अभी ब्राह्मण, व्राह्मण सो फरिश्ता, और फरिश्ता सो देवता।*

 

✧  यह मन्सा ड्रिल का अभ्यास सदा करते रहो। और शुद्ध भोजन, मन का शुद्ध संकल्प। *अगर व्यर्थ संकल्प, निगेटिव संकल्प चलता है तो यह मन का अशुद्ध भोजन है।* तो मन में सदा शुद्ध संकल्प रहे, दोनों करना आता है ना! जितना समय चाहो उतना समय शुद्ध संकल्प स्वरूप बन जाओ। अच्छा।

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧  *पहला परिवर्तन - अाँख खुलते ही मैं शरीर नहीं आत्मा हूँ, यह है आदि समय का आदि परिवर्तन संकल्प, इसी आदि संकल्प के साथ सारे दिन की दिनचर्या का आधार है।* अगर आदि संकल्प में परिवर्तन नहीं हुआ तो सारा दिन स्वराज्य वा विश्व-कल्याण में सफल नहीं हो सकेगे।

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- स्वयं ज्ञानसागर बाप टीचर बनकर पढ़ाते हैं"*

 

_ ➳  *मैं आत्मा स्वयं को एक सुंदर उपवन मैं बैठा हुआ अनुभव कर रही हूँ और मन ही मन बाबा से मीठी मीठी बातें कर रही हूं... बाबा की यादों में खोई मैं आत्मा पहुंच जाती हूँ शान्तिधाम निराकारी दुनिया में...* बाबा से प्रवाहित होती समस्त शक्तियों को अपने भीतर समाती, स्वयं को बहुत हल्का अनुभव कर रही हूं, परमात्म शक्तिओं से भरपूर मैं आत्मा पहुंच जाती हूँ सूक्ष्म लोक ... मैं आत्मा बाबा को दूर से आता देख रही हूँ और देखते ही देखते बाबा मेरे बहुत समीप आकर खड़े हो जाते हैं... बाबा मुझे संकेत से एक अत्यंत सुंदर पुष्पक विमान पर बैठने को कहते हैं और मुझ आत्मा को एक सुंदर बाग़ में सेर पर लेजाते हैं... *आसपास सुंदर सुंदर झरने, पेड़,तालाब और मखमली हरि हरि घास, चारों ओर फूलों से लदी वृक्षों की टहनियां जिनकी सुंदरता देखते ही बनती है...मैं आत्मा बाबा के साथ बाग़ में टहलने लगती हूँ...*

 

   *बाबा मेरे हाथों को अपने हाथों में लेकर बोले:-* "मीठे फूल बच्चे... *बाप आये हैं तुमपर कृपा करने... टीचर बन तुम्हें पढ़ाने और सतगुरू बन साथ लेजाने... इस ईश्वरीय अलौकिक पढ़ाई को पढ़कर तुम अपनी दिव्य ऐम ऑब्जेक्ट से भविष्य में महाराजा महारानी बनते हो यही बाप की कृपा है...* बाप तुम्हें श्रीमत देते हैं अब सम्पूर्ण पवित्र बनों इस आखरी जन्म में सम्पूर्ण पवित्र बन बाप की याद में रहो इससे ही तुम्हारे विकर्म विनाश होंगे और तुम पवित्र दुनिया के मालिक बन जाएंगे..."

 

_ ➳  *मैं आत्मा बाबा की श्रीमत को अपने में धारण करती हुई बाबा से बोली:-* "हाँ मेरे जीवन आधार मेरे प्यारे बाबा... आपने मुझ आत्मा को ज्ञान रत्नों से सजाकर मेरे रूप को अलौकिकता से सम्पन्न बना दिया है... *मेरा जीवन तो नीरस हो चुका था आपने आकर उसे नई दिशा देकर उसमें अपने जादुई प्रेम से रस भर दिया है...*"

 

   *मुझ आत्मा के हाथों में गुलाब का फूल देकर बाबा बोले:-* "लाडली बच्ची... जैसे फूल टहनी से टूटने पर मुरझा जाता है, ऐसे ही *तुम बच्चे भी बाप के बाग़ के फूल हो बाप की याद नहीं तो उदासी तुम्हें घेर लेती है और तुम्हारे चेहरे मुरझा जाते हैं... जब तक तुम मुझ बाप से जुड़े हुए हो उदासी तुम्हें छू भी नही सकती इसलिए बाप का साथ कभी मत छोड़ना...*"

 

_ ➳  *मैं आत्मा बाबा के अनमोल वाक्यों को अपने में समाते हुए बाबा से बोली:-* "मीठे प्यारे बाबा... मेरे आपने आकर मेरे बेरंग जीवन में रंग भर दिए हैं... *कितने जन्मों से भटक रही थी आपने आकर मुझे इस दुखदाई दुनिया से निकाल लिया है... टीचर बनकर मुझे  पवित्र जीवन का पाठ पढ़ाया है... मुझे पावन बना मुझ आत्मा को अपने ज्ञान रत्नों से अलंकृत कर दिया है...*"

 

  *मेरे सर को सहलाते हुए बहुत प्यार से बाबा मुझ आत्मा से बोले:-* " मीठे बच्चे... *बाप टीचर भी है और सतगुरु भी, बाप ही गति सदगति दाता है, बाप के सिवाय कोई देहधारी तुम्हे गति सदगति दे नही सकता... तुम्ह हो गोडली स्टूडेंट ईश्वर तुम्हें परमधाम से पढाने आते हैं... बाप तुम्ह ब्राह्मण बच्चों की बहुत महिमा करते हैं... इस ईश्वरीय पढ़ाई को कभी मिस नहीं करना...* इस पढ़ाई से ही तुम्हें 21 जन्मों का राज्य भाग्य मिलेगा और तुम सतयुगी दुनिया के मालिक बनेंगे..."

 

_ ➳  *ज्ञान रत्नों से झोली भरकर  मैं आत्मा बाबा से बोली:-* "हाँ मेरे दिलाराम बाबा... मैं आत्मा आपको अपना बनाकर मालामाल हो गयी हूँ... *आपने मेरे जीवन में आकर मेरे संस्कारों को परिवर्तन कर मुझे विशेष बना दिया है... आपकी श्रीमत ने मुझे कर्मातीत बना दिया है... सभी दुखों से छुड़ाकर मेरे जीवन में खुशियों के रंग भर दिए हैं... बाबा आपने मुझे अपार शक्ति का मालिक बना दिया है... बाबा को दिल की गहराइयों से शुक्रिया कर मैं आत्मा अपने साकारी तन में लौट आती हूँ...*"

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- सूर्यवंशी राजधानी की प्राइज लेने के लिए बापदादा की आफरीन लेनी है*"

 

_ ➳  लाइट की दिव्य आकारी देह धारण कर मैं आत्मा साकारी दुनिया से दूर ऊपर की और उड़ती जा रही हूँ। *पांचो तत्वों को पार करते हुए, आकाश को भी पार करके उससे भी परे मैं पहुँच जाती हूँ सफेद चांदनी के प्रकाश से प्रकाशित एक दिव्य अलौकिक दुनिया मे, जहां अव्यक्त बापदादा की दिव्य अलौकिक किरणे चारों ओर फैली हुई हैं*। देह और देह की दुनिया से अलग, सफेद प्रकाश से प्रकाशित यह दुनिया बहुत ही न्यारी और प्यारी है।

 

_ ➳  फरिश्तो की इस दिव्य अलौकिक दुनिया मे अब मैं स्वयं को बापदादा के सम्मुख देख रही हूँ। बाबा मुझे दृष्टि दे रहें हैं। *बाबा के नयनो से अथाह स्नेह की धाराएं बह रही हैं। बाबा मुझे विजयी भव का तिलक दे रहें हैं*। अपना वरदानी हाथ बाबा ने मेरे सिर पर रख दिया। बाबा के वरदानी हस्तों से गुण और शक्तियों की किरणें निकल कर मुझ में समा रही हैं।

 

_ ➳  परमात्म प्रेम और शक्तियों से भरपूर हो कर, बाबा के सामने बैठ अब मैं बाबा के दिव्य स्वरूप को अपलक निहार रही हूं। एकाएक बाबा के चेहरे पर अति गुह्य मुस्कराहट देख कर मैं अचंभित हो कर बाबा से सवाल करती हूं, बाबा:- "आपके चेहरे पर अचानक आई इस गुह्य मुस्कराहट में अवश्य कोई गहरा राज समाया है"। *बाबा प्रसनचित मुद्रा से मेरी ओर देखते हुए मुझ से कहते हैं, हाँ बच्चे:- "जो दृश्य मैं देख रहा हूँ वो मुझे अति हर्षित कर रहा है"*। उस दृश्य को देखने की जिज्ञासा को जैसे बाबा मेरे मन के भावों से स्पष्ट पड़ लेते है। इसलिए मुझे अपने पास बुला कर दिव्य दृष्टि से उस दृश्य का साक्षात्कार करवाते हैं जो बाबा देख रहे थे।

 

_ ➳  मैं देख रही हूं सामने अति साधारण गरीब से दिखने वाले ब्राह्मण बच्चे जो बाबा की याद में मग्न बैठे हैं। वनवाह में रहते, उनके चेहरे दिव्य आभा से चमक रहें हैं। बाबा की याद उन्हें उस सुकून से भरपूर कर रही है जिन्हें साहूकार कभी विनाशी साधनों से प्राप्त नही कर सकते। तभी एक बहुत ही खूबसरत दृश्य मुझे दिखाई देता है। *मैं देख रही हूं बाबा की याद में मग्न, बाबा के अति साधारण गरीब से दिखने वाले उन सभी ब्राह्मण बच्चों के मस्तक पर एक दिव्य ताज सुशोभित हो रहा है*। विश्व महाराजन की ड्रेस पहने, डबल ताजधारी उन ब्राह्मण बच्चो को देख कर ऐसा लग रहा है जैसे कोई बहुत बड़ा राजदरबार हैं जिसमे राजाओ, महाराजाओ की महफ़िल लगी हुई है।

 

_ ➳  मन को लुभाने वाले इस दृश्य को देख कर स्वत: ही मेरे चेहरे पर भी मुस्कराहट आ जाती है। *बाबा अब मुझे संबोधित करते हुए कहते हैं, समझा बच्चे:- "इस गुह्य मुस्कराहट का रहस्य"*। देखा ना कैसे बिगर कौड़ी खर्चा किये ये गरीब बच्चे बाप की याद से विश्व की बादशाही लेने का पुरुषार्थ कर रहें हैं। जी बाबा, कह कर मन ही मन मैं संकल्प करती हूं कि अब मुझे केवल बाबा की याद से विश्व की बादशाही लेने का पुरुषार्थ करना है। *मनुष्य से देवता, कौड़ी से हीरे तुल्य बनाने वाले अपने मीठे शिव बाबा की याद में रह कर अब मुझे अपनी हर श्वांस को सफल करना है*।

 

_ ➳  इसी दृढ़ संकल्प के साथ, लाइट की सूक्ष्म आकारी देह सहित मैं आत्मा अपने प्यारे, मीठे बाबा की यादों को अपने साथ लिए जागती ज्योत बन लौट रही हूं वापिस अपने साकारी तन में। *पांच तत्वों की बनी साकारी देह में विराजमान हो कर अब मैं हर श्वांस में अपने शिव पिता की याद को समाये, बिगर कौड़ी खर्चा किये अपने जीवन को हीरे तुल्य बना कर विश्व की बादशाही प्राप्त कर रही हूं*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं श्रेष्ठ वृति का व्रत धारण कर सच्ची शिव रात्रि मनाने वाली विश्व परिवर्तक     आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं दिल में सदा खुशी का सूर्य उदय रखने वाली खुशनुमः आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  वर्तमान समय आप सभी बच्चों का रहमदिल और दाता स्वरूप प्रत्यक्ष होने का समय है। आप ब्राह्मण आत्माओं के अनादि स्वरूप में भी दातापन के संस्कार भरे हुए हैं इसलिए कल्प वृक्ष के चित्र में भी आप वृक्ष की जड़ में दिखाये हुए हैं क्योंकि जड़ द्वारा ही सारे वृक्ष को सब कुछ पहुँचता है। *आपका आदि स्वरूप देवता रूप, उसका अर्थ ही है देवता अर्थात् देने वाला। आपका मध्य का स्वरूप पूज्य चित्र हैं तो मध्य समय में भी पूज्य रूप में भी आप वरदान देने वाले, दुआयें देने वाले, आशीर्वाद देने वाले दाता रूप हो। तो आप आत्माओं का विशेष स्वरूप ही दातापन का है।* तो अभी भी परमात्म सन्देश वाहक बन विश्व में बाप की प्रत्यक्षता का सन्देश फैला रहे हैं। *तो हर एक ब्राह्मण बच्चा चेक करो कि अनादि, आदि दातापन के संस्कार हर एक के जीवन में सदा इमर्ज रूप में रहते हैं? दातापन के संस्कार वाली आत्माओं की निशानी है - वह कभी भी यह संकल्प-मात्र भी नहीं करते कि कोई दे तो देवें, कोई करे तो करें, नहीं। निरंतर खुले भण्डार हैं।*

 

 _ ➳  तो बापदादा चारों ओर के बच्चों के दातापन के संस्कार देख रहे थे। क्या देखा होगा? नम्बरवार तो है ही ना! कभी भी यह संकल्प नहीं करो - यह हो तो मैं भी करूँ। दातापन के संस्कार वाले को सर्व तरफ से सहयोग स्वतः ही प्राप्त होता है। न सिर्फ आत्माओं द्वारा लेकिन प्रकृति भी समय प्रमाण सहयोगी बन जाती है। *यह सूक्ष्म हिसाब है कि जो सदा दाता बनता है, उस पुण्य का फल समय पर सहयोग, समय पर सफलता उस आत्मा को सहज प्राप्त होता है। इसलिए सदा दातापन के संस्कार इमर्ज रूप में रखो।*

 

✺   *ड्रिल :-  "अपने रहमदिल और दातापन के संस्कार इमर्ज रूप में रखने का अनुभव"*

 

 _ ➳  *मैं आत्मा भृकुटी सिंहासन में विराजमान मन-बुद्धि द्वारा सूक्ष्मवतन में आत्मा रूपी देवी पहुँचती हूँ... वहाँ सभी मनुष्यात्माएं सूक्ष्म शरीर धारण किये हुए बैठी हैं... बाबा धीरे-धीरे मुझपर अपनी शक्तियों की किरणें न्यौछावर कर रहे हैं... मैं अष्ट शक्तियों वाली देवी, बाबा से किरणें लेती हुई उन दुःखी मनुष्यात्माओं पर बरसा रही हूँ...*  सभी मनुष्यात्माओं के दुःख दूर हो रहे है...

 

_ ➳  *अब बाबा और मैं गंगा तट पर पहुँचते हैं... मैं आत्मा रूपी गंगा नदी बह रही हूँ... वहाँ बहुत से भक्त मेरी पूज्य स्वरूप में भक्ति कर रहे हैं...* वह बहुत दुःखी हो चुके हैं क्योंकि उन्हें लगता हैं कि हमें सहारा देने वाला कोई नहीं हैं... मैं शिव बाबा से शांति, पवित्रता, प्रेम की किरणें लेकर उन दुःखी आत्माओं पर बरसा रही हूँ...

 

_ ➳  मुझ गंगा जल में कोई भी गंदगी डाल रहा हो परन्तु मुझे अपनी शीतलता सबको देनी ही हैं... मैं सभी की प्यास बुझा रही हूँ... इससे मैं एकदम शीतल होती जा रही हूँ... मैं उन्हें आशीर्वाद और दुआयें दे रही हूँ... *मैं सभी सेंटर्स पर जा रही हूँ... वहाँ कई नई आत्मायें आयी हुई हैं जिन्होंने कुछ समय पहले बाबा से ज्ञान प्राप्त किया हैं... मैं बाबा से किरणें लेकर उनपर न्यौछावर कर रही हूँ ...*

 

_ ➳  *मुझ आत्मा में दातापन के संस्कार इमर्ज हो रहे हैं... मैं आत्मा परमात्म सन्देश वाहक बन विश्व में बाप की प्रत्यक्षता का सन्देश फैला रही हूँ...* अब मैं आत्मा सदा चेक करती हूँ कि अनादि, आदि दातापन के संस्कार सदा इमर्ज रूप में रहते हैं या नहीं... अब मैं आत्मा कभी नहीं सोचती कि किसने मुझे कुछ दिया या नहीं और दिया तो कितना दिया... मुझे हमेशा देना ही हैं...

 

_ ➳  *अब मैं संकल्प-मात्र भी नहीं करती कि कोई दे तो देवें, कोई करें तो करें... अब मैं कभी भी यह संकल्प नहीं करती कि यह परिस्थिति बदले तो मैं करूं...* मुझ आत्मा को सर्व तरफ से सहयोग स्वतः ही प्राप्त हो रहा हैं... अब प्रकृति भी समय प्रमाण सहयोगी बन रही है... समय पर सहयोग और समय पर सफलता सहज प्राप्त हो रही है।

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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